इन्दिरा का पर्यावरण प्रेम

Wednesday 15 November 2017

राष्ट्राध्यक्ष के रूप में सम्पूर्ण कार्यकाल में वह संकटों से जूझती रहीं। हर परिस्थिति में पर्यावरण सरंक्षण के प्रति वचनबद्ध अनुराग के माध्यम से इन्दिरा ने अपना यथार्थ रूप पेश किया। 

गूंजती विरासत

क्या इन्दिरा गांधी पहली पर्यावरणविद प्रधानमंत्री थीं? 1984 में जब उनकी हत्या की गई तब करीब 40 प्रतिशत भारतीय पैदा भी नहीं हुए होंगे, इसके बाद भी वह राजनीतिक विमर्शों के केंद्र में बनी हुई हैं। उनकी जिंदगी के हर पहलू पर विस्तार से चर्चा और बहस की गई है, सिर्फ पर्यावरण के प्रति उनके प्रेम और इसके लिए निर्णय लेने की क्षमता को छोड़कर। इन्दिरा गांधी की जन्मशती के मौके पर डाउन टू अर्थ उन्हें नजदीक से जानने वाले उनकी जीवनी लेखक और एक वरिष्ठ पत्रकार की मदद से उनके इस पहलू पर रोशनी डाल रहा है

जयराम रमेश

मैं यह लेख इन्दिरा गांधी का मूल्यांकन या उनका आकलन करने की चाहत में नहीं लिख रहा l यह कोशिश उस व्यक्तित्व की नई तस्वीर को लोक समक्ष रखने की है जिन पर लिखा बहुतों ने पर उसे समझने की कोशिश शायद ही किसी ने की l एक नेत्री जिसे किसी ने उसके जटिल व विरोधाभासी व्यक्तित्व के लिए जाना तो किसी की निगाह में एक बेहद करिश्माई और सम्मोहक व्यक्तित्व के रूप में समाईं l कौन थीं इन्दिरा? क्या थे उनके महत्वपूर्ण कार्य? यह लेख एक यात्रा है उनके इन आयामों को खोज की और उन पर प्रकाश डालने की जिसने उनके जीवन व कार्यों के मूल्यांकन करनेवालों का ध्यान कभी आकृष्ट नहीं किया l

इन्दिरा गांधी की संस्थागत शैक्षिक यात्रा अत्यधिक सर्पिल-पथ पर चली थी l उन्होंने विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण अवश्य की लेकिन परिस्थितिवश औपचारिक शैक्षिक उपाधि से वंचित रहीं l व्यवहारिक अनुभवों  ने उन्हें जीवन के विश्वविद्यालय द्वारा सर्वोच्च सम्मान के साथ प्रतिष्ठित किया l

इन्दिरा गांधी असल में कौन थीं? इतिहासकार हमेशा इस प्रश्न के उत्तर की खोज में मानसिक मल्लयुद्ध करते रहे और संभवतः भविष्य में भी करते रहेंगे! प्रभावशाली उपलब्धियों से मुग्ध उनके विश्वव्यापी गुणग्राही थे। भारी संख्या में उनके ऐसे आलोचक भी थे जो उनके गलत निर्णय या त्रुटिपूर्ण कार्यों से आगे देखने में असमर्थ थे l कई उनकी स्वयं की गलतियां थीं, तो कई उन पर थोपी गईं l

यह निर्विवादित सत्य है कि उनके व्यक्तित्व में एक तीक्ष्ण विरोधाभास था l लेकिन पर्यावरण के प्रति उनकी वचनबद्धता समस्त सन्देह से परे थी, यह सत्य इस कालखंड के लिखित दस्तावेज (जयराम रमेश की किताब, इन्दिरा गांधी: ए लाइफ इन नेचर) से प्रमाणित होती है l उनके उथलपुथल भरे सम्पूर्ण राजनीतिक व व्यक्तिगत जीवन  में, पर्यावरण के प्रति उनके व्यक्तिगत प्रेम ने हमेशा उन्हें प्रेरित एवं उद्दीप्त किया है l उनका पर्यावरण के हर पक्ष से प्रेम वंशानुगत विरासत ही नहीं, उनकी अपनी प्रकृति का अटूट अंग था, जिसका उन्होंने चिरस्थायी अनुराग की तरह लालन किया l

उनके आलोचक यह कह सकते हैं, “इन्दिरा की पर्यावरण चिंता और उसके प्रति सहानुभूति से क्या फर्क पड़ेगा?” ऐसी प्रतिक्रियाएं अभद्रता की सूचक हैं l उनके सत्ता काल में पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनका सदा जाग्रत अनुराग व्यक्तिगत कह कर अप्रासंगिक करार नहीं दिया जा सकता l उनका यह अनुराग भारतीय नागरिकों के लिए आह्वान बन गया था, जिसने यह परिभाषित कर दिया था कि वह कौन हैं और मुल्क के प्रधानमंत्री के रूप कौन सी दिशा वह तय कर रहीं थीं l अत: उनके कार्यों के मूल्यांकन करते वक्त पर्यावरण संरक्षण के प्रखर समर्थक के रूप उन्होंने क्या हासिल किया, इसका आकलन अत्यावश्यक है l

एक राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में अपने सम्पूर्ण कार्यकाल में वह लगातार संकटों से जूझती रहीं और हर परिस्थिति में पर्यावरण सरंक्षण के प्रति वचनबद्ध अनुराग के माध्यम से इन्दिरा गांधी ने अपना यथार्थ रूप पेश किया l आजाद हिंदुस्तान के इतिहास के सर्वाधिक मुश्किल काल खंड में राष्ट्राध्यक्ष के रूप में, सरकारी कामकाज के बावजूद पर्यावरण सम्बन्धी मसलों पर पूरा ध्यान देते रहना उन्हें और आकर्षक व मोहक बनाता है l जैसे-जैसे राजनीतिक दबाव उन पर बढ़ते रहे, इन्दिरा प्रकृति के और नजदीक जाती रहीं l शायद वह राजनीति को अपने जीवन में क्षणिक और प्रकृति को अटल, महत्वपूर्ण व नित्य मानती रहीं l यह सुप्रसिद्ध है कि वह अक्सर अपने मिलने वालों के साथ अथवा बैठकों में उदासीन व अनमनी दिखती थीं, अपनी फाइलें पढ़तीं या अपने प्रिय शगल तस्वीर बनाने में लिप्त रहती थीं l पर, पर्यावरणविदों से मिलते वक्त अथवा वन्यजीवों, जंगलों या पर्यावरण सरंक्षण की बैठकों में नि:संदेह ऐसा नहीं था l ऐसे मौकों पर वह पूरे मनोयोग, एकाग्रचित्त संलिप्त तथा स्थिति का प्रभार लिए रहती थीं l

वर्तमान परिदृश्य में जलवायु परिवर्तन एवं दीर्घकालिक विकास के मुद्दों पर आज के अधिकतर राष्ट्राध्यक्ष अथवा सरकारें अपने चिकनी चुपड़ी भाषण पटुता में व्यस्त दिखते हैं, परन्तु, आज से चार दशक पहले इन्दिरा गांधी उन चुनिन्दा राजनैतिक व्यक्तित्वों में थीं जिन्होंने पर्यावरण विषयक मसलों को गम्भीरता से लिया और दैनंदिन शासन प्रणाली में स्थान दिया l स्मरणार्थ याद दिलाना उचित होगा कि जून 1972 को स्टॉकहोम में आयोजित प्रथम संयुक्त राष्ट्र के मानवीय पर्यावरण सम्मेलन में आयोजक राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष के अलावा वह एक मात्र राष्ट्राध्यक्ष थीं, जिन्होंने अपनी बात रखी थी l इसी प्रकार, वह उन पांच राष्ट्राध्यक्षों में थीं जिन्होंने अगस्त 1976 में नैरोबी में आयोजित प्रथम नवीन एवं अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन को संबोधित किया था। 1992 में विख्यात रियो अर्थ समिट कॉन्फ्रेंस से इसकी तुलना कीजिए, जहां सौ से अधिक राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे।

इन्दिरा गांधी पर्यावरण सम्बन्धित मसलों पर, मात्र भारत में ही नहीं,अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भी अग्रणी रहीं l अक्सर इन्दिरा गांधी को एक तानाशाही प्रवृत्ति के व्यक्ति के रूप में पेश किया जाता है l प्रकृति में उनके जीवन ने अक्सर यह साबित किया था कि हर अधिकार रहने पर भी उनका कहा नहीं हुआ। असंदिग्ध रूप से ऐसा कई बार हुआ कि उन्होंने किसी विशेष कार्य को करने के लिए दृढ़तापूर्वक कहा हो l लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उनका जीवन सुझावों और अनुनयों की एक लम्बी यात्रा थी l यह पद्धति दो तथ्यों से निर्देशित थी l प्रथमत: भारतीय परिदृश्य में जीवन यापन के स्तर को सुधारना व आर्थिक विकास के माध्यम से जीवन शैली की गुणवत्ता को बेहतर बनाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य है l दूसरा पर्यावरण का संरक्षण व वातावरण की सुरक्षा सम्बन्धित अधिकांश निर्णय जो वह लेना चाहती थीं, राज्य सरकारों की मूल जिम्मेदारी है l अगर उनमें तथाकथित तानाशाही रवैया मौजूद होता तो एक पर्यावरणविद के रूप में उन्होंने जो कुछ हासिल किया, उससे कहीं अधिक कर चुकी होतीं l

उसी प्रकार, इन्दिरा गांधी का जीवन हमें उनके द्वारा लिए गए निर्णयों के कारण हुए उनके मानसिक सन्ताप की याद भी दिलाता है l उदाहरणार्थ, साइलेंट वैली को हाइडेल प्रोजेक्ट से बचाना आवश्यक था, यह उन्हें मालूम था पर इस मुद्दे पर तीन साल चली चर्चा के उपरान्त ही उन्होंने अंतिम निर्णय लिया था l कई मौकों पर, अपने पर्यावरणीय दृढ़ निश्चय के विरुद्ध कोई विशेष निर्णय, वृहत्तर आर्थिक व राजनीतिक लाभ के निमित्त, लेने के लिए खुद को मनाया भी। कभी ऐसा भी हुआ कि निर्णय लेने से पूर्व उन्होंने अपने विश्वस्त व विख्यात पर्यावरणविद सलीम अली, पीटर स्कॉट और पीटर जैक्सन जैसे व्यक्तियों से राय मशविरा किया हो l उनका नजरिया हर नई परिस्थिति से सामना होते हुए विकसित हुआ। वक्त के साथ उन्हें यह विश्वास होने लगा कि स्थानीय समुदायों की सहभागिता के बिना न वन्यजीवों का और न ही जंगलों का दीर्घकालिक संरक्षण सम्भव है, जबकि शुरुआती दौर में उनकी सोच शुद्धतावादी थी l

इसमें सन्देह नहीं कि तिलिस्मों से घिरा था उनका व्यक्तित्व, पर मौलिक इन्दिरा गांधी सम्पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ एक संरक्षणकर्त्री थीं जिन्होंने समृद्ध प्राकृतिक विरासत को मुल्क की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक परम्परा के संरक्षण को आर्थिक गतिशीलता के मूल आधार के रूप में देखा। वास्तविकता यही थी कि उनके लिए संरक्षण के अभाव में विकास अल्पकालिक व क्षणभंगुर था, अविकसित संरक्षण अग्राह्य था l उनके लिए संरक्षण, जैविक विविधता के प्रति सम्मान एवं पर्यावरणीय संतुलन का प्रयोजन इत्यादि हमारे सांस्कृतिक चरित्र से ही उत्पन्न हुआ है l वह प्राय: हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों की मूल शिक्षा “प्रकृति के प्रति आदरभाव व उसके सामंजस्य में जिओ” का सन्दर्भ देती रहीं l उनकी पर्यावरणीय विरासत किसी विशेषज्ञ अथवा चेतावनी के रूप में नहीं दिखती l यह विरासत हमेशा के लिए एक निरन्तर गुंजन है l

(पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की 2017 में प्रकाशित पुस्तक “इन्दिरा गांधी :  ए लाइफ इन नेचर” से साभार)

जो जान लिया वो मान लिया

जन आन्दोलनों से उदासीन रहने वाली इन्दिरा पर्यावरण के मामलों में गंभीरता दिखाती थीं। हालांकि कई बार उनका अहंकार यहां भी आड़े आया

डेरेल डीमोंटे

1970 के दशक की एक घटना का हवाला देना चाहूंगा िजससे मैं भी जुड़ा था। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ बैंक मैनेजमेंट, बम्बई (वर्तमान में मुम्बई) ने 6 करोड़ रुपए की लागत से बान्द्रा उपनगर के कार्टर रोड पर पथरीली समुद्र तट पर बैंकर्स ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट स्थापित करने का निर्णय लिया l जमीन की जांच के लिए खुदाई शुरू हो चुकी थी l भवन का ढांचा ऊपर उठे हुए चबूतरे पर बनना तय हुआ, जिसमें सामुद्रिक ज्वार-भाटा के स्वच्छंद आवागमन के लिए फाटक लगाया जाना था। प्रशिक्षणार्थियों के लिए षटकोणीय छात्रावास बनाने की परियोजना बनी ताकि समुद्र के प्राकृतिक सौन्दर्य को आसानी से देख सकें l

 शहर के मानद शेरिफ महबूब नसरुल्लाह व “ब्लिट्ज” अखबार के शक्तिशाली संपादक रूसी करंजिया के नेतृत्व में स्थानीय निवासियों ने इसके विरोध में ऐतिहासिक बैठक की l उसी घटनाक्रम में “बिजनेस इंडिया” के संपादक अशोक अडवानी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की नजदीकी सहकर्मी उषा भगत से संपर्क किया l उन्होंने प्रधानमंत्री को इस घटना की सूचना दी और प्रधानमंत्री ने तुरन्त सख्त आदेश जारी कर दिया l परियोजना को पुणे स्थानान्तरित कर दिया गया। पर्यवेक्षकों के मुताबिक, शहर के पर्यावरणविदों की यह पहली विजय थी।

यह घटना उनके निर्णय लेने की उसी शैली की तरफ इंगित करता है जिस पर जयराम रमेश ने अपनी पुस्तक “इन्दिरा गांधी : ए लाइफ इन नेचर” में प्रकाश डाला है l वह अत्यन्त शालीन, भद्र व व्यक्तिगत सम्बन्धों की कद्रदान, देशी-विदेशी प्रभावशाली व्यक्तियों तथा संस्थाओं के साथ नियमित पत्राचार के माध्यम से संपर्क बनाए रखती थीं। ऐसा भी देखा गया कि दबाव में कभी घुटने भी नहीं टेके, विशेषकर विदेशी संस्थाओं के सामने l

 उनकी शासकीय विश्वसनीयता पर कुछ लोग यह तर्क भी दे सकते हैं कि जन आंदोलनों से अप्रभावित उनके अधिकांश निर्णय अमूमन सही होते थे, जबकि वही पर्यावरणीय सक्रियतावाद की वास्तविक आत्मा हैं। यह उनके चरित्र के द्योतक थे। इस प्रवृत्ति की व्याख्या करते दो विचारणीय विषय हैं। पहला था “नेचर” पत्रिका के लिए अनिल अग्रवाल को “चिपको आन्दोलन” पर 1980 में दिए गए एक साक्षात्कार के दौरान उनकी टिप्पणी l जब 1973 में आरम्भ हुए लोकप्रिय “चिपको आन्दोलन” के शुरू होने के पूरे 7 साल बाद उनसे इस पर जब राय पूछी गई तो उन्होंने स्पष्ट कहा था “ईमानदारी से मुझे नहीं पता कि इस आन्दोलन का उद्देश्य क्या है l अगर पेड़ों को न काटने देना इनका उद्देश्य है तो मैं इनके साथ हूं।” चिपको के सम्बन्ध में उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया आन्दोलन के नेता सुन्दरलाल बहुगुणा, एक अंशकालिक पत्रकार जो देश-विदेश के लोगों का ध्यान आन्दोलन के प्रति आकर्षित कर रहे थे, के बहिष्कार से था।

साथ ही चंडीप्रसाद भट्ट को भी नजरअंदाज किया जिन्होंने रोजगार के लिए पहाड़ से शहर को पलायन करते लोगों को अपने इलाकों में ही काम मुहैया करने की कोशिश में गोपेश्वर, गढ़वाल में दसोहली ग्राम स्वराज्य मण्डल 1964 की स्थापना की थी l इस संस्था ने पहाड़ों पर भारी मात्रा में जंगल उत्पादों के पैदावार को बढ़ावा देने के लिए चीड़ के पेड़ों से निकलने वाली प्राकृतिक गोंद का कारखाना लगाने की कोशिश की थी l यह पहाड़ों में वहां के लोगों को रोजगार प्राप्त कराने और लोगों को रोजगार की तलाश में मैदानी इलाकों में पलायन रोकने का कारगर उपाय था l जैसा कि रामचंद्र गुहा ने 1989 में प्रकाशित अपनी किताब द यूनीक वुड्स में कहा, इन्दिरा गांधी और उनके सहयोगी इस बात से अनभिज्ञ थे कि चिपको आन्दोलन संसाधनों के उपनिवेशीय उपयोग के विरुद्ध कृषक प्रतिरोध आन्दोलन की ही कड़ी थी l

 केरल के साइलेंट वैली जलविद्युत परियोजना को रोकने में उनकी भूमिका दूसरा विचारणीय विषय है l जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक टेंपल्स ओर टॉम्ब? इंडस्ट्री वर्सेज एनवायरमेंट: थ्री कंट्रोवर्सीज में विस्तार से वर्णन किया है कि किस प्रकार उन्होंने समर्पित नागरिकों के विज्ञान आन्दोलन केरल शास्त्र साहित्य परिषद के विरोध को दनकिनार किया था। परिषद का झुकाव वामपंथ की ओर था। इसके बावजूद उसने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्ववाली सरकार व केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के इच्छा के विरुद्ध उक्त परियोजना का विरोध किया था। इन्दिरा गांधी विख्यात पक्षी विज्ञानी व प्रकृतिविद डॉ. सलीम अली और वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ), इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) जिन्होंने उक्त परियोजना के विरुद्ध प्रस्ताव ग्रहण किया था, जैसी संस्थाओं से प्रभावित थीं l

 इन्दिरा गांधी ने 1972 में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के प्रतिनिधि से मिलने के एक दिन बाद ही डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सहयोग से “प्रोजेक्ट टाइगर” शुरू करने का निर्णय लिया था जो बेहद कामयाब हुआ था l परियोजना के शुरुआती दौर और संभवत: आपातकाल के दौरान अभ्यारण्य के रेखांकित इलाकों से ग्रामीण नागरिकों को स्थानान्तरित किया गया था l यह कदम उनके अन्दर छुपे तानाशाह का प्रकाश था l उनका नीदरलैंड के राजकुमार बर्नहार्ड से तादात्म्य रहा जो डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सहसंस्थापक भी थे और जिन्हें वन्यजीवन के संरक्षण की चिंता तो थी पर उस परियोजना के शिकार हुए आदिवासी के दुःख दर्द की नहीं l
 जैसा जयराम रमेश याद दिला रहे हैं, 1972 में स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित प्रथम पर्यावरण सम्मलेन में थोड़े अलग ढंग से उनके द्वारा कहे गए वाक्य “गरीबी प्रदूषण की सबसे निकृष्ट अवस्था है” के कारण इन्दिरा को विश्वव्यापी सम्मान मिला l यह वाक्य आज भी, सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विकासशील देश में पर्यावरण संरक्षण से पहले अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की कोशिश को न्यायसंगत और उचित प्रमाणित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है l नेहरू के वक्त से अब तक पूरी की गईं कई विकास परियोजनाएं गरीबी उन्मूलन के स्थान पर इसकी वृद्धि ही की है। ऐसा नर्मदा बांध परियोजना के विस्थापित कह सकते हैं l पर्यावरण और वास्तविक विकास एक-दूसरे के साथ ही चलकर सफल हो सकते हैं, यही कारण है कि दिल्ली-बम्बई औद्योगिक कॉरिडोर अथवा भारत-जापान के सहयोग से बम्बई- अहमदाबाद के बीच चलाई जानेवाली बुलेट ट्रेन जिसे प्रगति का मानक समझा जा रहा, लेकिन वास्तविकता यही है कि उसमे लगने वाले सारे संसाधन जरुरत मंदों की जरूरतों को पूरी करने में लगाना चाहिए था l

दूसरा उदाहरण जिसका जिक्र मैंने अपनी पुस्तक में किया, वह है मथुरा स्थित इंडियन आयल रिफाइनरी l मथुरा से 40 किमी की दूर आगरा का ताजमहल सम्भ्रांत वर्ग के पर्यावरण सक्रियतावाद का एक विशिष्ट उदाहरण है, जहां इन्दिरा गांधी ने कोई कदम नहीं उठाए l एस़ वरदराजन- इंडियन पेट्रोकेमिकल कारपोरेशन लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष के नेतृत्व में बनी समिति (ताजमहल पर पड़ने वाले खतरों के सिलसिले में उनकी जांच रिपोर्ट उस काल खंड की किसी भी धरोहर पर पड़नेवाले वायु प्रदूषण के खतरों के मामलों में सर्वाधिक व्यापक है), आईएनटीएसीएच, इंटरनेशनल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ द प्रिजरवेशन एंड रेस्टोरेशन ऑफ कल्चरल प्रॉपर्टी इन रोम इत्यादि के माध्यम से शामिल सभी उपक्रम व संस्थाएं अधिकारी अथवा पेशेवरों ने बिना किसी जमीनी आन्दोलन के परियोजना को बंद करने की सलाह दी थी l

1983 में एम. एस. स्वामीनाथन, जो उन दिनों आईयूसीएन के अध्यक्ष थे, के उस वक्तव्य से कोई भी असहमत होगा जब उन्होंने कहा कि इन्दिरा “हमारे जमाने की सबसे बड़ी पर्यावरणविद थीं”l वास्तविकता में, इतिहास में वह इस विशेषण की अधिकारी के रूप नहीं जानी जाएंगी। पर साथ ही, यह सत्य है कि वह अपने जमाने के किसी भी व्यक्ति से बड़ी राजनीतिक नेता थीं जो किसी भी कीमत पर आर्थिक विकास के उन्माद के खिलाफ गईं l पर्यावरण पर पड़ने वाले परिणामों की चिन्ता किये बगैर पर्यावरण सम्बन्धी कानून की धज्जियां उड़ाने, नदियों को आपस में जोड़ने और बिना सोचे विशाल परियोजनाओं का बुनियादी ढांचा बनाने में व्यस्त वर्तमान शासकों की तुलना में इन्दिरा गांधी का का व्यक्तित्व उत्कृष्ट था l

(लेखक वरिष्ठ पर्यावरण पत्रकार हैं)

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