गुणों से भरपूर सुथनी

Wednesday 15 November 2017

छठ व्रत में प्रसाद के रूप में इस्तेमाल होने वाला कंद सुथनी कई पोषक तत्वों से भरपूर है और यह भूख को भी नियंत्रित करता है। 


                    आदित्यन पीसी / सीएसई
आदित्यन पीसी / सीएसई

लोक आस्था का पर्व सूर्य षष्ठी व्रत जिसे छठ व्रत के नाम से भी जाना जाता है, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। इस त्यौहार में प्रसाद के रूप में सभी मौसमी फलों, कंदों का उपयोग किया जाता है। इन्हीं में से एक “सुथनी” विशेष महत्त्व रखता है। सुथनी एक प्रकार का कंद है जो शकरकंद परिवार से आता है। हालांकि इसका स्वाद शकरकंद के सामान मीठा नहीं होता, फिर भी यह कठिन परिश्रम करने वाले लोगों को लंबे समय तक ऊर्जा प्रदान करता है।

शकरकंद प्रजाति का यह कंद अब विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुका है। यह जमीन की सतह से पांच-छः इंच नीचे पैदा होता है। सुथनी को मुख्यतः उबालकर खाया जाता है और इसका स्वाद हल्का मीठा होता है। हालांकि प्रत्येक कंद का कुछ भाग स्वादहीन होता है। आजकल सुथनी के कई व्यंजन भी बनाए जाने लगे हैं।

सुथनी को अंग्रेजी में लेसर येम कहा जाता है और इसका वानस्पतिक नाम दायोस्कोरिया एस्कुलान्ता है। इसकी लता तीन मीटर तक लंबी होती है। यह उष्णकटिबंधीय प्रदेशों, खासकर एशिया और प्रशांत क्षेत्रों में मुख्य खाद्य पदार्थों में से एक रहा है। चीन में 1700 सालों से भी अधिक समय से इसका बड़ी मात्रा में उत्पादन किया जाता रहा है।

सुथनी मुख्यतः भारत, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, न्यू गिनी में पाया जाता है। इसे शुष्क जलवायु में उपजाया जा सकता है। कंद को परिपक्व होने में 7-10 महीने लगते हैं और प्रति हेक्टेयर 7-20 टन उपज प्राप्त की जा सकती है।

नेचुरल प्रोडक्ट रैडिएन्स नामक जर्नल में वर्ष 2008 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, असम के कर्बी जनजाति के लोगों के मुख्य भोजन में सुथनी भी शामिल है। कर्बी जनजाति के लोग सुथनी को रुइफेंग सेलु नाम से पुकारते हैं। कर्बी लोग सुथनी को उबालकर खाते हैं। मान्यता के अनुसार, भगवान बुद्ध की मृत्यु सूअर का मांस खाने की वजह से नहीं, बल्कि सुथनी खाने से हुई थी। बुद्ध शाकाहारी थे और जीवन के आखिरी समय में सुथनी खाने की वजह से उनका हाजमा खराब हो गया था और जिसकी वजह से उनकी मृत्यु हो गई थी।

अफ्रीका में कंद उत्पादन करने वाले क्षेत्र नाइजीरिया में भी सुथनी को काफी तवज्जो मिली है। यहां के कृषि क्षेत्र के लोगों के साथ ही शहरी आबादी भी बड़े पैमाने पर सुथनी को उबालकर या भूनकर खाते हैं। कैरिबियन द्वीप समूह देशों में सुथनी को सुखाकर उसका आटा बनाया जाता है और इस आटे का इस्तेमाल ब्रेड बनाने में किया जाता है।

पापुआ न्यू गिनी में उगाई जाने वाली कंद की सभी प्रजातियों में से सुथनी, जिसे वहां “मामी” नाम से जाना जाता है, सबसे आम प्रजाति है और इसका उत्पादन भी अधिक होता है। अच्छी परिस्थिति में इसकी उपज और इसमें पोषक तत्व शकरकंद के बराबर होते हैं। हालांकि पापुआ न्यू गिनी में सुथनी को मुख्यतः सेपिक नदी क्षेत्र में उगाया जाता है, जहां जनसंख्या का घनत्व बहुत ज्यादा है और शिशुओं में कुपोषण की दर भी अधिक पाई जाती है। फिर भी सुथनी यहां का मुख्य खाद्य पदार्थ है और यहां के बच्चे उन क्षेत्रों के बच्चों से ज्यादा पोषित हैं, जहां सुथनी का उत्पादन नहीं होता है।

थाइलैंड में सुथनी बड़े पैमाने पर खाया जाता है। वहां इसे “मन-मुसुआ” के नाम से जाना जाता है। थाइलैंड में सुथनी को मुख्यतः उबालकर, छीलकर और नमक, चीनी या कभी-कभी नारियल के साथ भी खाया जाता है। इसकी लोकप्रियता के कारण यह सड़क किनारे के बाजारों में आसानी से मिल जाता है। थाइलैंड में सुथनी से एक मीठा खाद्य पदार्थ भी बनाया जाता है जिसमें सुथनी को छीलकर और साफ करके टुकड़ों में काट लिया जाता है। इसके बाद इसको चावल के आटे में मिलकर 30-45 मिनट तक स्टीम किया जाता है। इसके बाद इसमें चीनी और नारियल मिलकर परोसा जाता है।     
 
औषधीय गुण

सुथनी न केवल भूख को नियंत्रित करता है बल्कि इसके अंदर कई बीमारियों को ठीक करने की भी क्षमता है। चीन में जहां बेरीबेरी रोग (विटामिन बी-1 की कमी से होने वाली बीमारी) के उपचार के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है, वहीं भारत में इसका इस्तेमाल अल्सर के इलाज के लिए किया जाता है। कई वैज्ञानिक शोध भी सुथनी के औषधीय गुणों की पुष्टि करते हैं।

अगस्त 2007 में अफ्रीकन जर्नल ऑफ बायोटेक्नॉलॉजी में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, सुथनी जलन और सूजन के उपचार में कारगर पाया गया है। एशियन पैसिफिक जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल बायोमेडिसिन में वर्ष 2012 में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि सुथनी में एंटीऑक्सीडेंट बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है जो कि बुढ़ापे को दूर रखने में मददगार है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फार्मटेक रिसर्च में वर्ष 2011 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, सुथनी में शुक्राणुओं को गाढ़ा होने से रोकने वाले तत्व पाए जाते हैं। इसलिए इसका उपयोग गर्भनिरोधक आहार के तौर पर भी किया जा सकता है।

सुथनी को मुख्यतः उबालकर खाया जाता है और इसका स्वाद हल्का मीठा होता है। आजकल सुथनी के कई व्यंजन भी बनाए जाने लगे हैं। जलेबी भी इनमें एक है। इसमें अरबी मिलाई जाती है
 
व्यंजन
 

सुथनी की जलेबी सामग्री:

  • सुथनी : 200 ग्राम (उबालकर मीसा हुआ)
  • केसर के धागे : 25 से 30
  • मैदा : ¼एक कप
  • चीनी : 1.5 कप (300 ग्राम)
  • घी : जलेबी तलने के लिए

विधि:  केसर को एक कटोरी में थोड़ा पानी में घोल लें। अब मैदा में पानी डालकर घोल बना लीजिए। इसे अच्छे से 4 से 5 मिनट तक फेंटिए ताकि इसकी गुठलियां खत्म हो जाएं और यह पतला हो जाए। घोल को ढांककर किसी गरम जगह पर 1 घंटे के लिए रख दें ताकि मैदे में थोड़ी खमीर उठ जाए। इस बीच सुथनी को उबालकर उसके छिलके उतार लीजिए।
फिर इसे मैश करके  अलग रख लीजिए। अब एक बर्तन में चीनी और 1 कप से थोड़ा ज्यादा पानी डालकर 2 से 3 मिनट तक पकने दीजिए। जब चाशनी शहद की तरह चिपकने लगे तो इसमें केसर का पानी मिलाकर अलग रख दीजिए। इसके बाद एक प्याले में मैश्ड सुथनी और मैदे के तैयार घोल को मिलाकर अच्छे से फेंट लीजिए, जिससे कि सुथनी घोल में अच्छी तरह से मिल जाए। जलेबी का बैटर तैयार है।
अब एक समतल तले की कड़ाही को चूल्हे पर रखें और कड़ाही गर्म होने पर इसमें घी डालें। जब तक घी गरम होता है, एक कोन में जलेबी का बैटर डालकर ऊपर से बांध लीजिए। अब नीचे की तरफ कैंची से छोटा सा छेद कर दीजिए।
कड़ाही में घी पर्याप्त गरम हो जाने के बाद कोन को दबाते हुए गोल-गोल जलेबियां बनाते जाइए। जलेबियों को धीमी व मध्यम आंच पर दोनों तरफ से ब्राउन होने तक तल लीजिए। तली हुई जलेबियों को चाशनी में डुबोकर एक मिनट तक छोड़ दीजिए। लीजिए तैयार है सुथनी की जलेबी।

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