तोरा में बड़-बड़ गुण हौ गे मड़ुआ

Sunday 31 December 2017

मड़ुआ में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और फाइबर पाया जाता है इसलिए यह अन्य अनाजों की तुलना में अधिक ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है। 


                    मड़ुआ से रोटी और स्वादिष्ट हलवा बनाया जाता है (फोटो: विकास चौधरी / सीएसई)
मड़ुआ से रोटी और स्वादिष्ट हलवा बनाया जाता है (फोटो: विकास चौधरी / सीएसई)
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  • मड़ुआ की विशेषता यह है कि यह समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर भी उगाया जा सकता है और इसमें आयरन एवं अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में निहित हैं। 
  • मड़ुआ में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और फाइबर पाया जाता है इसलिए यह अन्य अनाजों की तुलना में अधिक ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है। 
  • वर्ष 1981 में वान रेसबर्ग द्वारा किए गए शोध के अनुसार, मड़ुआ खाने वाली आबादी में खाने की नली के कैंसर होने की संभावना कम हो जाती है।

तोरा में बड़-बड़ गुन हौ गे मड़ुआ
जब मड़ुआ में दू पत्ता भेल
बुढ़िया-बुढवा कलकत्ता गेल
तोरा में बड़-बड़ गुन हौ गे मड़ुआ
तोरा कोठी में रखबो गे मड़ुआ
तोरा में बड़-बड़ गुन हौ गे मड़ुआ

दीनानाथ साहनी की पुस्तक “मां की लोरियां और संस्कार गीत” में संकलित यह लोकगीत मड़ुआ के गुणों का बखान करता है। इस लोकगीत में बताया गया है कि मड़ुआ को काफी दिनों तक कोठी में रखा जा सकता है और यह खराब नहीं होता। अंगिका भाषा का यह लोक गीत एक समय मड़ुआ की कटाई के समय गाया जाता था। हालांकि अब मड़ुआ की खेती को छोड़कर लोग गेहूं और धान की खेती करने लगे हैं। इसका कारण मड़ुआ को लेकर सरकार का उपेक्षापूर्ण रवैया भी रहा है। मड़ुआ की खरीदी सरकार नहीं करती इसलिए किसानों को इसे बेचने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है।

मड़ुआ को अंग्रेजी में फिंगर मिलेट कहा जाता है और इसका वानस्पतिक नाम इलुसिन कोराकाना है। मड़ुआ की विशेषता यह है कि यह समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर भी उगाया जा सकता है और इसमें आयरन एवं अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में निहित हैं। इसमें सूखे को झेलने की अपार क्षमता है और इसे लंबे समय (करीब 10 साल) तक भंडारित किया जा सकता है। आश्चर्यजनक बात यह है कि मड़ुआ में कीड़े नहीं लगते। इसलिए सूखा प्रवण क्षेत्रों के लिए मड़ुआ जीवन-रक्षक की भूमिका निभा सकता है।

मड़ुआ की उत्पत्ति पूर्वी अफ्रीका (इथियोपिया और युगांडा के पर्वतीय क्षेत्र) में हुई थी जो ईसा पूर्व 2000 के दौरान भारत लाया गया। कनाडा स्थित नेशनल रिसर्च काउन्सिल की 1996 की रिपोर्ट के अनुसार, अफ्रीका के प्रारंभिक कृषि से संबंधित पुरातात्विक रिकार्ड्स में मड़ुआ को 5000 वर्ष पहले इथियोपिया में मौजूद होने का प्रमाण मिलता है। यह अफ्रीका के कई हिस्सों में प्रमुख खाद्य अनाज है और पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में लौह युग के प्रारंभ (करीब 1300 ईसा पूर्व) से उगाया जा रहा है।  इथियोपिया में मड़ुआ से शराब भी बनाई जाती है जिसे अराका कहा जाता है।

नेशनल रिसर्च काउन्सिल की 1996 की रिपोर्ट के अनुसार, मड़ुआ की घास मवेशियों के चारे के लिए भी उपयुक्त होता है क्योंकि इसमें करीब 61% सुपाच्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। वर्ष 2000 में प्रकाशित पुस्तक पीपुल्स प्लांट्स : ए गाइड टू यूजफुल प्लांट्स ऑफ सदर्न अफ्रीका के लेखक बेन-इरिक वान विक और नाइजल जेरिक के अनुसार, मड़ुआ का इस्तेमाल कुष्ठ और यकृत संबंधी रोगों के उपचार के लिए पारंपरिक औषधि के तौर किया जाता है।

मड़ुआ में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और फाइबर पाया जाता है इसलिए यह अन्य अनाजों की तुलना में अधिक ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है। मड़ुआ के यही गुण इसे नवजात शिशुओं और बुजुर्गों के लिए उपयुक्त खाद्य पदार्थ बनाते हैं।

मड़ुआ से बने खाद्य पदार्थ नवजात शिशुओं और बुजुर्गों के लिए उपयुक्त माना गया है

तमिलनाडु में मड़ुआ को देवी अम्मन (मां काली का एक स्वरूप) का एक पवित्र भोजन माना जाता है। देवी अम्मन से जुड़े हर पर्व-त्योहार में महिलाएं मंदिरों में मड़ुआ का दलिया, जिसे कूझ कहा जाता है, बनाती हैं और गरीबों और जरूरतमंदों में बांटती हैं। कूझ कृषक समुदाय का मुख्य भोजन है जिसे कच्चे प्याज और हरी मिर्च के साथ खाया जाता है।

उत्तर भारत में महिलाएं अपनी संतानों की लंबी उम्र की कामना को लेकर जितिया नामक व्रत रखती हैं। तीन दिवसीय इस व्रत के आखिरी दिन, जिसे पारण कहा जाता है, मड़ुआ के आटे की रोटी खाकर व्रत तोड़ने का विधान है। ऐसा माना जाता है कि दो दिनों के व्रत के बाद मड़ुआ की रोटी शरीर में ऊर्जा को जल्दी से लौटा देती है।

नेपाल में मडुआ के आटे की मोटी रोटी बनाई जाती है। मड़ुआ का इस्तेमाल बीयर, जिसे नेपाली भाषा में जांड कहते हैं और शराब जिसे रक्शी के नाम से जाना जाता है, बनाई जाती है। इसका इस्तेमाल उच्च जाति के लोग हिन्दुओं के त्योहारों के दौरान करते हैं।

श्रीलंका में मड़ुआ को कुरक्कन के नाम से जाना जाता है। वहां नारियल के साथ इसकी मोटी रोटी बनाई जाती है और इसे काफी मसालेदार मांस के साथ खाया जाता है। वहां मड़ुआ का सूप भी बनाया जाता है, जिसे करक्कन केंदा के नाम से जाना जाता है। मड़ुआ से बने मीठे खाद्य पदार्थ को हलापे कहा जाता है।

वियतनाम में मड़ुआ का इस्तेमाल औषधि के तौर पर महिलाओं के प्रसव के दौरान किया जाता है। कई जगहों पर मड़ुआ का इस्तेमाल शराब बनाने के लिए भी किया जाता है। ये खासकर हमोंग अल्पसंख्यक समुदाय का प्रमुख पेय है।
     
औषधीय गुण

मड़ुआ प्रोटीन, विटामिन और कार्बोहाइड्रेट का मुख्य स्रोत है और यह न सिर्फ मानव शरीर के लिए आवश्यक पौष्टिक तत्वों की पूर्ति कर सकता है बल्कि कई प्रकार के रोगों से बचाव में भी सहायक है। वर्ष 2005 में अमेरिकन डायबिटीज एसोशिएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार मड़ुआ को अपने दैनिक आहार में शामिल करने वाली आबादी में मधुमेह रोग होने की आशंका बहुत कम होती है। मड़ुआ में चावल और गेहूं के मुकाबले अधिक फाइबर पाया जाता है और यह ग्लूटन मुक्त भी होता है, जिसके कारण यह आंतों से संबंधित रोगों से बचाता है।

न्यूट्रिशन रिसर्च नामक जर्नल में वर्ष 2010 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, मड़ुआ का सेवन हृदय संबंधी रोगों से बचाव में कारगर है क्योंकि यह खून में प्लाज्मा ट्रायग्लायसराइड्स को कम करता है। वर्ष 1981 में वान रेसबर्ग द्वारा किए गए शोध के अनुसार, मड़ुआ खाने वाली आबादी में खाने की नली के कैंसर होने की संभावना कम हो जाती है।

व्यंजन: मड़ुआ का हलवा
 सामग्री:
  • मडुआ का आटा - 1 कप
  • चीनी - 4 चम्मच
  • घी - 3 चम्मच
  • काजू - 6
  • बादाम - 6
  • किसमिश - 8
  • पानी - 2 कप
विधि: सबसे पहले चूल्हे पर कड़ाही रखें और इसे गर्म होने दें। कड़ाही गर्म होने पर इसमें मंडुआ का आटा डालकर हल्का भूरा होने तक भूनें। जब आटे से सोंधी खुशबू आने लगे तो इसमें घी डालें और अच्छी तरह से मिलाएं।

अब इसमें काजू, किशमिश और बादाम को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर मिलाएं और 2 मिनट तक भूनें। इसके बाद कड़ाही में चीनी और पानी डालें और करछी से अच्छी तरह से मिलते रहें ताकि गांठ न बन पाए।

अब आंच धीमी करके पानी सूखने तक करछी से हिलाते रहें। पानी सूख जाने पर कड़ाही को चूल्हे से उतार लें और सूखे मेवे से सजाएं और परोसें।

 

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