पेड़ हटे, नदियों के रास्ते बंटे

Friday 15 December 2017

ब्रह्मपुत्र घाटी के प्राकृतिक जल स्रोतों की संरचना अब काफी बदल गई है। पेड़ों के हट जाने से नदियां “आजाद” हो गईं और जहां मन होता है मुड़ जाती हैं और बर्बादी ढाती जाती हैं। 


                    असम घाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे अनेक प्राकृतिक झील और चंवर हैं। ये पानी को थामते हैं। इन चंवरों में धान की फसल भी उगाई जाती है (अरविंद यादव / सीएसई)
असम घाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे अनेक प्राकृतिक झील और चंवर हैं। ये पानी को थामते हैं। इन चंवरों में धान की फसल भी उगाई जाती है (अरविंद यादव / सीएसई)

ब्रह्मपुत्र घाटी दो समानांतर श्रृंखलाओं-अरुणाचल प्रदेश व उत्तर में भूटान वाली पूर्वी हिमालय पर्वत श्रृंखला और मेघालय, उत्तरी कछार व नगालैंड वाली पूर्वोत्तर पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित है। इस घाटी का जो हिस्सा असम में आता है उसे तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है- ग्वालपाड़ा और कामरूप जिलों वाला पश्चिमी भाग, दरांग और नौगांव जिलों वाला मध्यवर्ती भाग तथा लखीमपुर, डिब्रूगढ़ और सिबसागर जिलों वाला पूर्वी भाग। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले का कुछ भाग भी तीस्ता नदी से कटकर इसी ब्रह्मपुत्र घाटी का हिस्सा बनता है।

जलपाईगुड़ी

पहाड़ियों से निकलने वाले सोतों से मैदानी इलाकों में सिंचाई करने और जल संचित करने की परंपरा बहुत पुरानी है। शुरुआती गजेटियरों से पता चलता है कि जलपाईगुड़ी के पश्चिमी दुआर इलाके में कृत्रिम व्यवस्थाओं से सिंचाई बहुत आम थी। यहां काफी सारी नदियां और सोते हैं। पानी का उपयोग अमन धान की सिंचाई में होता था। किसान सोतों से छोटी-छोटी नालियों में पानी मोड़ लेते थे, जिन्हें स्थानीय लोग जाम्पोई कहते थे। पर दुआर की नदियां अक्सर अपनी दिशा बदल देती थीं, इसलिए इन जल मार्गों पर सदा नजर रखनी होती थी।

19वीं सदी के मध्य में इन नालियों को दुंग कहा जाता था, पर बाद में जाम्पोई कहा जाने लगा। जिले में सिंचाई के मुख्य स्त्रोत यही थीं। उत्तर बंगाल के अनेक हिस्सों की मिट्टी भुरभुरी होने और नदियों-सोतों के मार्ग बदलते रहने के चलते कोई बड़ी नहर या जल मार्ग बनाना संभव नहीं था। नदियों के अपनी दिशा बदलने या उनमें आने वाले पानी की मात्रा अचानक बहुत बढ़ने या घटने के असंख्य उदाहरण हैं। वर्तमान तीस्ता और अन्य नदियों की न जाने कितनी बार अपनी दिशा बदल चुकी हैं और इससे लोगों को काफी परेशानी भी उठानी पड़ी है। ऐसा सबसे बड़ा बदलाव 1770 के दशक में हुआ। तब तक तीस्ता 240 किमी. तक अकेली बहती थी और गंगा के समांतर चलती थी। इसका आकार भी काफी बड़ा था, अटराई जल मार्ग से यह पनरभाबा, कारोटोया और गंगा को भी पानी देती थी। जब बाढ़ बहुत ज्यादा हो तब गंगा का पानी तीस्ता में भी आ जाता था और तीस्ता इस जल को ब्रह्मपुत्र में छोड़ देती थी। यह पानी एक पुराने, लेकिन खाली पड़े जल मार्ग से होकर निकलता था। 1787 की भयंकर बाढ़ के समय तीस्ता अटराई जल मार्ग से काफी दूर चली गई और उसने उसी पुराने जल मार्ग वाला रास्ता पकड़ लिया। अब उसका पानी बहुत कम दूरी तय करके ही ब्रह्मपुत्र में जा गिरता है। इस बदलाव के बाद उत्तर बंगाल की अधिकांश नदियों को उसका पानी नहीं मिलता। इससे उनका पुराना मार्ग चाहे जितना बड़ा और चौड़ा हो, इन नदियों को उनके अनुरूप पानी ही नहीं मिलता।

पहले उत्तर बंगाल की नदियों का आकार बहुत बड़ा था। उनका प्रवाह बहुत तेज था और वे अक्सर ऊंचे- ऊंचे बांधों के बीच से गुजरती थीं। आमतौर पर इन बांधों पर जंगल उगे होते थे, जिससे उसे अतिरिक्त मजबूती मिला करती थी। लेकिन जलपाईगुड़ी जिले की सेटलमेंट रिपोर्ट (1906-16) बताती है कि 19वीं सदी और 20वीं सदी के शुरू में कहीं भी जंगलों-पेड़ों को बांधों पर न रहने देकर बहुत बड़ा नुकसान किया जा चुका है। एकमात्र जंगल ही इन बावली नदियों के मनचाहे प्रवाह पर रोक लगा पाने में सक्षम थे।

पेड़ों के हट जाने से नदियां “आजाद” हो गईं और जहां मन होता है मुड़ जाती हैं और बर्बादी ढाती जाती हैं। इनके साथ ही अब स्थायी जल मार्ग या नहरें नहीं बन सकतीं और न बांध डाले जा सकते हैं। जाम्पोई कोई स्थायी ढांचा नहीं है और बाढ़ इसके आकार-गहराई को बढ़ा-घटा भी देती है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब नदियों की धार जाम्पोई होकर ही निकल पड़ती है और उसका पुराना पूरा रेत भरा मार्ग यूं ही खाली छूट जाता है। उत्तर बंगाल में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, पर इनसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शुरू में हुई किसी गलती, चाहे वह छोटी ही क्यों न हो, का खमियाजा कितने समय तक और कितने लोगों को भुगतते रहना पड़ता है।

यह गड़बड़ छोटे किसानों, चाय बागानों के मैनेजरों और बड़ी जमीन के जोतदारों सभी ने की। चाय बागानों और बड़ी जोतों के पास से गुजरने वाली नदी के बांधों पर ये अमीर लोग हर साल नई मिट्टी डलवाते थे। एक तरफ तटबंध ज्यादा मजबूत हो तो पानी दूसरी तरफ भागेगा ही। सो अमीर किसानों, बागान मालिकों की जमीन तो बच गई, पर छोटे किसान मारे गए। 20वीं सदी के शुरू में बंगाल की जमीन की उत्पादकता में भारी गिरावट आई।

असम घाटी

सन 1909 में प्रकाशित असम इंपीरियल गजेटियर से पता चलता है कि असम घाटी के कुछ इलाकों में कृत्रिम सिंचाई की परंपरा काफी पुरानी है। ब्रह्मपुत्र घाटी के पश्चिमी हिस्से में स्थित ग्वालपाड़ा जिले के पूर्वी दुआर इलाके में ही कृत्रिम सिंचाई का चलन था। यह क्षेत्र पहाड़ियों के पास और यहां घना जंगल था। पूर्वी दुआर के खेतों में लगने वाले धान की फसल की सिंचाई जरूर होती थी। किसान मिल-जुलकर जल मार्गों का निर्माण करते थे, जिनकी लंबाई कई-कई किलोमीटर तक भी हो जाती थी। इनसे खेतों तक पानी पहुंचता था। सरकार की तरफ से सिंचाई के किसी साधन का निर्माण नहीं कराया जाता था।

इसी प्रकार कामरूप जिले में कृत्रिम सिंचाई की एकमात्र व्यवस्था कचारी गांव के लोगों द्वारा खोदी गई छोटी नहरें ही थीं। कई जल मार्ग तो कुछ मीटर ही चौड़े होते थे, पर वे कई किमी़ दूरी तक सिंचाई करते थे। इनसे 1,000 से 1,500 हेक्टेयर तक जमीन की सिंचाई हो जाती थी। इनका निर्माण गांव के लोग बिना किसी सरकारी मदद के खुद कर लिया करते थे। ब्रह्मपुत्र घाटी के मध्यवर्ती भाग में भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। दरांग और नौगांव जिलों के उन्हीं खेतों में सिंचाई की जाती थी जो पहाड़ियों के ठीक नीचे थे। मैदानी हिस्से में सिंचाई की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि खूब बरसात होती है। जमीन काफी नीची है। घाटी के पूर्वी हिस्से में भी इतनी बरसात होती है कि पहले लोग अलग से सिंचाई की व्यवस्था बेमानी मानते थे। खेती को सूखे से नहीं, बाढ़ से खतरा था।

राज्य के कुछ हिस्सों, खासकर गोलाघाट, सिबसागर और जोरहाट में पोखर खोदने का रिवाज था, पर इनका पानी पीने और घरेलू कामों में ही प्रयोग किया जाता था। सिबसागर के प्रसिद्ध शिव मंदिर के पास दो प्रसिद्ध तालाब हैं। एक ऐसा ही बड़ा पोखर शहर से 3 किमी. दूर है, जिसे जैसागर कहते हैं। इन पोखरों का निर्माण असम के नामी अहोम राजाओं ने कराया था और निर्माण कराने वाले के नाम से ही पोखरों को भी जाना जाता है।

घाटी में थोड़ी ज्यादा ऊंचाई पर रहने वाले बोड़ो आदिवासी लोग खास तरह के पोखर बनाने में माहिर थे, जिन्हें वे डोंग कहते थे। इनमें संचित होने वाला पानी सितंबर के नवंबर तक खेतों को सींचने में काम आता था। तालाब से पानी लाहोमी नामक उपकरण से उठाया जता था, जो लंबे हत्थे वाला होता हे। लोग पोखरों का निर्माण कराते थे और इस पर उनका स्वामित्व होता था। इनकी खुदाई और रखरखाव में सामुदायिक भागीदारी नहीं होती थी। असम घाटी में ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों के किनारे-किनारे काफी सारे चंवर-चांचर हैं। इनमें नदियों की बाढ़ का पानी जमा हो जाता हें जब बाढ़ का पानी घटना हे तब इनके अंदर ही धान की खेती की जाती है।

(बूंदों की संस्कृति पुस्तक से साभार)

ऑफर: 'डाउन टू अर्थ' पत्रिका पर छूट पाने के लिए क्लिक करें

परंपरागत जल प्रणाली का धनी

परंपरागत जल प्रणाली का धनी

अहमदाबाद में पानी को जमा रखने के लिए अनेक जलाशय और झील थी। 34 बराबर किनारों वाले कांकरिया तालाब का निर्माण सन 1451 में सुल्तान कुतुबुद्दीन ने कराया था। 

पानी से घिरे फिर भी प्यासे

पानी से घिरे फिर भी प्यासे

शोंपेन आदिवासियों को बुलेटवुड लकड़ी शायद ही कभी मिल पाती है। इसी के चलते लट्ठों से बांधों का बनना भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। 

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.

Scroll To Top