मैं नास्तिक बनना चाहती हूं

Wednesday 15 November 2017

पूरी दुनिया नास्तिक बन जाए जिससे फिर कभी कोई स्कूल किसी त्योहार के लिए बंद न हो और ‘मिड-डे-मील’ बंद हो जाने से कोई बच्चा भूख से तड़प कर न मरे। 


                    सोरित/सीएसई
सोरित/सीएसई

पावें,
कोइली देवी, गांव करीमाटी
जलदेगा ब्लॉक
सिमडेगा, झारखंड

अम्मा,
सुना है मरने के बाद मैं बड़ी खबर बन गई हूं! हाय री दइया!

नेता से लेकर बाबू लोग सब के सब सुना बड़े परेशान हो गए हैं। जानती हो अम्मा, मेरे मरने के बाद दो यमदूत मुझे लेने आए। अम्मा, मुझे उन यमदूतों को देखकर डर तो लगा था पर वे मेरे स्कूल के मास्टर लोगों से कम डरावने थे। चलते हुए एक ने कहा कि एक विशाल नदी आने वाली है, वैतरिणी, जिसे हमें पार करना होगा। पर यह क्या, वहां तो नदी के नाम पर एक गन्दा सा नाला था, ठीक वैसा ही जैसा हमारी बाकी नदियों का हाल है। उस नदी को पार करने में कोई कठिनाई ही नहीं हुई और हम जा पहुंचे यमलोक। मैं तो डर रही थी और क्यों न डरती भला? मैं इससे पहले अकेले कभी अपने करीमाटी से भी बाहर नहीं गई। पर यहां तो बहुत भीड़ थी अम्मा! यहां सैकड़ों किसान मिले और मिले कश्मीरी युवक हजारों की तादाद में। जानती हो अम्मा इनमें कुछ को तो यही नहीं पता था कि वह मर गए हैं क्योंकि सरकारी फाइलों में तो वे “गुमशुदा” थे। यमदूत यही नहीं समझ पा रहे थे कि सरकारी फाइलों की बात मान कर उन्हें  गुमशुदा मानें या अपनी रिपोर्ट के आधार पर मुर्दा?  यहां मैं सैकड़ों नन्हे-मुन्ने बच्चों से भी मिली जो गोरखपुर के अस्पतालों से आए थे।

अम्मा,  यहां एक बूढ़े से अंकल हैं। उनका नाम है चित्रगुप्त। उनकी हालत उस समय तो देखने लायक होती है जब वह बच्चों के पाप-पुन्य का हिसाब करते हैं। अब तुम ही कहो कि मेरा या गोरखपुर के उन बच्चों के पाप-पुन्य का भला क्या हिसाब होगा? बिचारे बच्चे तो पालने में दम घुट कर मर गए। हां, मैंने एक पाप किया था। एक दिन दोपहरिया को तुमसे छुपकर आम के पेड़ के अमिया खाई थी। मुझे यमराज के सामने ले जाया गया। उन्होंने मुझसे पूछा कि अगले जनम क्या बनना चाहती हूं तो मैंने कहा, मैं नास्तिक बनना चाहती हूं। मैंने यह भी कहा कि मैं चाहती हूं कि सारे देवी-देवता का अस्तित्व हमेशा के लिए मिट जाए और मैं जिस स्कूल में पढूं वहां कभी छुट्टी न पड़े। गर्मी की छुट्टियां भी नहीं।

मैंने सही कहा न अम्मा? यमराज तो मेरी बातों को सुनकर बहुत नाराज हुए, शायद उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं। पर मेरी बला से। उन्होंने अपनी लाल-लाल आंखों से मुझे घूर कर देखा। मैं बिलकुल नहीं डरी अम्मा। मैंने कहा कि काश देवी देवता न होते तो त्योहार भी न होते। तब न ही मेरी स्कूल में छुट्टियां पड़तीं और न ही मेरा “मिड-डे-मील” बंद होता। अम्मा! तुमने तो देखा था कि भूख के मारे मैं कितना तड़प रही थी, सचमुच अम्मा बहुत दर्द  हो रहा था। मुझे फिर एक समय कुछ हुआ कि पेट की वह अकड़न खत्म हो गई।


अम्मा मुझे तो अपने तमाम देवी-देवताओं पर बहुत गुस्सा आता है जिसके लिए मुझे तड़प-तड़प कर मर जाना पड़ा। और इसीलिए मैं चाहती हूं कि नास्तिक बनूं। पूरी दुनिया नास्तिक बन जाए जिससे फिर कभी कोई स्कूल किसी त्योहार के लिए बंद न हो और ‘मिड-डे-मील’ बंद हो जाने से कोई बच्चा भूख से तड़प कर न मरे। मैंने सही कहा न अम्मा?

पर जानती हो अम्मा, मेरी बातों को सुनकर जानें क्यों सब चुप हो गए थे। मैंने देखा कि चित्रगुप्त अंकल और यमराज अंकल रो रहे थे।

अम्मा, ऐसा मैंने क्या कह दिया कि चित्रगुप्त अंकल और यमराज अब अंकल रो रहे थे? बताओ ना अम्मा!

तुम्हारी,
संतोषी।

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