हवा में जहर का कारोबार

Friday 15 December 2017

दुनियाभर से सबसे गंदे ईंधनों पेट कोक और फर्नेस तेल को भारत में बड़ी मात्रा में मंगाया जा रहा है। अप्रैल 2007 तक 5 करोड़ 23 लाख टन टन पेट कोक का आयात किया जा चुका है। 


                    स्रोत: रॉयटर्स
स्रोत: रॉयटर्स
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पेट कोक से फैलने वाले प्रदूषण का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें सल्फर का स्तर 65000-75000 पीपीएम के बीच होता है। 

उद्योगों में ऊर्जा के स्रोत के रूप में इन ईंधनों का उपयोग किया जाता है। बड़े जेनरेटरों और स्टील उद्योग में इसका बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल किया जाता है। 

भारत में पेट कोक का घरेलू उत्पादन 120-130 लाख टन है। यानी अब घरेलू उत्पादन से ज्यादा इसका आयात किया जाने लगा है।

दिल्ली-एनसीआर में हवा की गुणवत्ता अब इतनी खराब हो गई है सभी उसके आगे लाचार नजर आ रहे हैं। वायु प्रदूषण के कारण स्कूलों को बंद करने की नौबत आ गई है। सभी हवा में जहर घुलने का दोष वाहनों के निकलने वाले धुएं, पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने, सड़क की धूल और निर्माण कार्यों को दे रहे हैं। लेकिन हवा के एक बड़े गुनहगार की तरफ लोगों का ध्यान न के बराबर है। वह गुनहगार हैं दुनिया का सबसे गंदे ईंधन पेट कोट और फर्नेस तेल। रिफाइनरी उत्पाद तेल की अंतिम अवस्था फर्नेस तेल और पेट कोक है। जब इन्हें जलाया जाता है तो भारी मात्रा में सल्फर निकलता है जो वातावरण में जाकर हवा को जहरीला बनाता है।

24 अक्टूबर को उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान, उत्तर  प्रदेश और हरियाणा में पेट कोक और फर्नेस तेल के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया तो लोगों को थोड़ा ध्यान इन ईंधनों की तरफ गया। आदेश के बाद उद्योगों ने उच्चतम न्यायालय ने याचिका दाखिल कर समय देने की गुहार लगाई लेकिन न्यायालय ने 9 नवंबर को उनकी इस याचिका को खारिज कर दिया। 17 नवंबर को सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों को सुझाव दिया कि वे पेट कोट और फर्नेस तेल का इस्तेमाल रोकें। न्यायालय ने कहा कि ये ईंधन केवल दिल्ली और एनसीआर में ही प्रदूषण नहीं फैला रहे हैं बल्कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रदूषण का कारण हैं। न्यायालय में फिलहाल इन ईंधनों के इस्तेमाल पर ही प्रतिबंध लगाया है। इनकी खरीद और आयात पर प्रतिबंध लगाने के बारे में आगामी 4 दिसंबर को आदेश दे सकता है। ऐसा होने पर देश को वायु प्रदूषण से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

पेट कोक और फर्नेस तेल पर प्रतिबंध की वकालत करने वाले पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) का भी मानना है कि दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण की बड़ी वजह इन ईंधनों का इस्तेमाल है। हालांकि दिल्ली में इन दोनों ईंधनों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार 1980 का वायु कानून (धारा 19.1 और 19.3) देता है। 1996 में दिल्ली में पेट कोट और फर्नेस तेल को ईंधन के रूप में मान्यता नहीं मिली। हालांकि दिल्ली में चोरी छुपे फर्नेस तेल बेचने की घटना सामने आई है। इस साल मार्च में ईपीसीए को पश्चिमी दिल्ली के वजीरपुर ओद्यौगिक इलाके में फर्नेस तेल बेचने की सूचना मिली तो अध्यक्ष भूरेलाल ने औचक निरीक्षण के दौरान फर्नेस तेल से भरे टैंकरों को घूमते पाया। यह सरकारी आदेश का सरासर उल्लंघन था। अब इस बात की भी आशंका है कि जिन राज्यों में इन ईंधनों का इस्तेमाल प्रतिबंधित किया गया है, वहां भी इसे चोरी छुपे न बेचा जाने लगे।

2.27 मौत प्रति मिनट

लांसेट की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत वायु प्रदूषण से सबसे बुरी तरह प्रभावित है। यहां हवा की खराब गुणवत्ता के कारण हर साल 19 लाख असमय मौत होती है। इसी साल जनवरी में प्रकाशित ग्रीनपीस की रिपोर्ट “एयरपोकेलिप्स : असेसमेंट ऑफ एयर पॉल्यूशन इन इंडियन सिटीज” के अनुसार, वायु प्रदूषण दिल्ली-एनसीआर या केवल महानगरों की नहीं बल्कि यह राष्ट्रीय समस्या है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर साल वायु प्रदूषण से 12 लाख मौतें होती हैं। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, भारत में तीन प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद का नुकसान वायु प्रदूषण से हो रहा है। ग्रीनपीस की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जितनी मौतें तंबाकू उत्पादों के सेवन से होती हैं, उससे थोड़ी कम जिंदगियां वायु प्रदूषण की भेंट चढ़ जाती हैं। “ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज” कार्यक्रम के अनुसार, 2015 में वायु प्रदूषण के चलते प्रतिदिन 3283 भारतीयों की मौत हुई यानी साल में करीब 11 लाख 98 हजार लोगों को जान गंवानी पड़ी। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रति मिनट 2.27 भारतीयों की मौत वायु प्रदूषण से हुई।

ये आंकड़े वायु प्रदूषण की भयावहता से परिचित कराने के लिए काफी हैं। शायद यही वजह है कि रोहतक से कांग्रेस के सांसद दीपेंदर हुड्डा ने 15 दिसंबर से शुरू होे रहे संसद के शीतकालीन सत्र में स्वच्छ हवा के अधिकार के लिए लोकसभा में निजी विधेयक लाने की बात कही। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि भोजन का और शिक्षा का अधिकार हो सकता है तो स्वच्छ हवा का अधिकार क्यों नहीं हो सकता? प्रदूषण को देखते हुए केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने ऐलान कर दिया कि अप्रैल 2020 से नहीं बल्कि अप्रैल 2018 से ही बीएस-6 मानकों को दिल्ली में लागू किया जाएगा। ये तमाम उपाय स्वागत योग्य हैं लेकिन यह भी जरूरी है कि हवा को सबसे अधिक खराब करने वाले पेट कोक और फर्नेस तेल पर भी देशभर में प्रतिबंध लगाने पर गंभीरता से विचार किया जाए।  

खतरनाक है पेट कोक, फर्नेस तेल

पेट कोक से फैलने वाले प्रदूषण का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें सल्फर का स्तर 65000-75000 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) के बीच होता है। जबकि फर्नेस तेल में सल्फर का स्तर 20000 पीपीएम होता है। डीजल में अभी इसका स्तर 50 पीपीएम है। बीएस-6 मानकों के बाद यह भी घटकर 10 पीपीएम हो जाएगा। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब डीजल जैसे ईंधन में प्रदूषण का स्तर कम करने के लिए इतना काम किया जा सकता है तो पेट कोक और फर्नेस तेल जैसे भारी प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन को बर्दाश्त करने का क्या औचित्य है। इन ईंधनों से होने वाला प्रदूषण फेफड़ों की क्षमता को भी बुरी तरफ प्रभावित करता है। साथ ही लोगों की औसत उम्र भी कम कर रहा है।

स्रोत:  ईपीसीए

लगाव की वजह

उद्योगों में ऊर्जा के स्रोत के रूप में इन ईंधनों का उपयोग किया जाता है। बड़े जेनरेटरों और स्टील उद्योग में इसका बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल किया जाता है। 2015-16 में 318,000 टन फर्नेस तेल एनसीआर में बेचा गया। अप्रैल से अक्टूबर 2016 के बीच 204,000 टन फर्नेस तेल एनसीआर के जिलों में बेचा गया। फर्नेस तेल की कीमत में पिछले कुल वर्षों में उतार-चढ़ाव आया है। वर्तमान में यह 22-24 रुपए प्रति लीटर बेचा जा रहा है। बिजली के उत्पादन में फर्नेस तेल के इस्तेमाल से इसकी कीमत 5-6 रुपए प्रति यूनिट बैठती है जबकि प्राकृतिक गैस से 6-7 रुपए और डीजल के इस्तेमाल प्रति यूनिट खर्च 13-14 रुपए बैठता है। दूसरे ईंधनों के मुकाबले सस्ता होने के कारण औद्योिगक इकाइयां प्रदूषण के लिए जिम्मेदार फर्नेस तेल और पेट कोक को प्राथमिकता देती हैं। हैरानी के बात यह है कि ये ईंधन कर से मुक्त हैं और वस्तु एवं सेवा कर के तहत इन ईंधनों का इस्तेमाल करने पर उद्योगों को पूर्ण रिफंड दिया जाता है। यह एक बड़ी वजह है जिससे उद्योग स्वच्छ ईंधन अपनाने से हिचकते हैं। कुछ समय पहले तक उद्योग ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले के चूर्ण का इस्तेमाल कर रहे थे लेकिन इसी दौरान पेट कोक के दाम में वैश्विक स्तर पर गिरावट दर्ज की गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसकी बड़ी मात्रा आयात करने वाले चीन ने पर्यावरण को नुकसान के चलते इसका इस्तेमाल बंद कर दिया। पेट कोक का सबसे अधिक निर्यात करने वाले अमेरिका में भी प्रदूषण फैलाने वाले इन ईंधनों का पर्यावरण के सख्त नियमों के चलते इस्तेमाल बंद हो गया। इसके उलट भारत में न केवल इसका इस्तेमाल जारी रहा बल्कि इसके आयात में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। एक तरह से भारत वैश्विक स्तर पर पेट कोक का डंपिंग जोन बन गया। भारत में पिछले साल घरेलू उत्पादन से ज्यादा पेट कोक का आयात किया गया (देखें मानचित्र और जहर का आयात,)। इस तरह कोयला पर आश्रित उद्योग पेट कोक पर निर्भर होते जा रहे हैं।

46 देशों से भारत आता है पेट कोक

भारत 46 देशों से पेट कोक का आयात कर रहा है। अप्रैल 2007 अब तक 5 करोड़ 23 लाख टन टन पेट कोक का आयात किया जा चुका है। 2016-17 में 143 लाख टन कोक का आयात किया गया है। 2010-11 यह आयात करीब 10 लाख टन था। पिछले सात सालों में इसके आयात में बेहताशा वृद्धि हुई है। साल 2017-18 में जुलाई तक ही करीब 44 लाख टन आयात किया जा चुका है। इस वक्त भारत करीब 58 प्रतिशत पेट कोक अमेरिका से आयात कर रहा है। सउदी अरब से 17.3 प्रतिशत और चीन से 10.6 प्रतिशत पेट कोक आयात किया जा रहा है। ध्यान देने की बात यह है कि भारत में पेट कोक का घरेलू उत्पादन 120-130 लाख टन है। यानी अब घरेलू उत्पादन से ज्यादा इसका आयात किया जाने लगा है। जहां तक फर्नेस तेल की बात है तो भारत सबसे अधिक 35.6 प्रतिशत संयुक्त अरब अमीरात (यूएसई) से आयात करता है। अल्जीरिया से 27.6 प्रतिशत, सिंगापुर से 8.7 प्रतिशत, यमन रिपब्लिक 8.4 प्रतिशत फर्नेस तेल आयात किया गया है। भारत घाना, नेपाल, बांग्लादेश से भी इसका आयात करता है। सबसे हैरानी की बात यह है कि भारत में ओपन जनरल लाइसेंस (ओजीएल) के तहत सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले इन ईंधनों का धड़ल्ले से कारोबार किया जाता है। इस लाइसेंस के तहत व्यापार आसान होता है और इसके तहत आने वाली वस्तुओं को कोई भी निर्यात कर सकता है। पर्यावरणविद मांग कर रहे हैं पेट कोक और फर्नेस तेल को इस श्रेणी से हटाकर नुकसानदेह श्रेणी में शामिल किया जाए।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) में सीनियर रिसर्च एसोसिएट पोलाश मुखर्जी बताते हैं कि सरकार ने पेट कोक और फर्नेस तेल का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों के लिए मानक नहीं बनाए हैं। मई में उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान पता चला कि सरकार ने 35 उद्योगों के लिए सल्फर के उत्सर्जन के मानक नहीं हैं। मंत्रालय को जून तक मानक तय करने थे। ऐसा न कर पाने पर न्यायालय ने 24 अक्टूबर को पर्यावरण मंत्रालय पर दो लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। उच्चतम न्यायालय ने 31 दिसंबर मानकों को लागू करने का आदेश दिया है।

स्रोत: एक्जिम डाटाबेस, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय

मौजूद हैं विकल्प

पोलाश बताते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में प्रतिबंध के बावजूद फर्नेंस तेल को सीबीएफएस (कार्बन ब्लैक फीड स्टॉक) के नाम से बेचा जा रहा है।

पेट कोक और फर्नेस तेल से बचने के विकल्प मौजूद हैं। उद्योग बिना बर्नर बदले लाइट डीजल ऑयल (एलडीओ) और सामान्य डीजल पर फर्नेस तेल से आसानी से तब्दील हो सकते हैं।

पेट कोक और फर्नेस तेल का सबसे अच्छा विकल्प बिजली और प्राकृतिक गैस हैं। इनका उपयोग करने के लिए मशीनों में बदलाव की जरूरत है। ऐसा करने के लिए निवेश की भी जरूरत होगी। एक अन्य विकल्प कोयला भी है। हालांकि यह प्रदूषण फैलाता है लेकिन फर्नेस तेल और पेट कोक से कम।

पोलाश ने बताया कि दिल्ली-एनसीआर में बिजली और प्राकृतिक गैस की पर्याप्त उपलब्धता है, इसलिए यहां आसानी से प्रदूषित ईंधनों से  बचा जा सकता है। लेकिन भारत के अन्य हिस्सों में बिजली की अनिश्चितता है। इसलिए जरूरी  है कि बिजली आपूर्ति में सुधार किया जाए। यह दीर्घकालिक और सबसे टिकाऊ उपाय है। हवा  को साफ रखना है तो इन्हें अमल में लाना ही पड़ेगा। सस्ते ईंधन के लिए पर्यावरण और  स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।  

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