Governance

अपना टाइम आएगा!

सरकारी किताब के मुताबिक, हम लोग इंसान नहीं, चिड़िया हैं। बस तब से हम घर-बार छोड़कर पेड़ों पर रह रहे हैं।

 
By Sorit Gupto
Last Updated: Sunday 19 May 2019
हाल ही में पता चला कि हम इंसान नहीं चिड़िया हैं
सोरित / सीएसई सोरित / सीएसई

सुरम्य, मनोरम और घने जंगलों के बीच बसा था डोंगरिया कोंध लोगों का एक गांव। गांव को चारों ओर से सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) की छावनियों ने घेर रखा था और इन छावनियों को नियमगिरि के पहाड़ियों ने घेर रखा था। शांत और प्रकृति की गोद में बसी ऐसी जगह को कवियों के लिए आदर्श माना गया है, पर जाने कैसे हमारे पत्रकार महोदय वहां जा फंसे थे।

अलसुबह पत्रकार महोदय शांत जंगलों के बीच से होते हुए चले जा रहे थे। जंगल के गेस्ट हाउस से वह निकले तो थे मॉर्निंग वॉक के लिए पर आज उन्हें अपने मॉर्निंग वॉक में कोई खास मजा नहीं आ रहा था। कुछ दूर दौड़ कर बोर हो चुके थे। वह गेस्ट हाउस की ओर मुड़ने ही वाले थे कि जंगलों के बीच उन्हें दिखा, सुरम्य, मनोरम और घने जंगलों के बीच बसा डोंगरिया कोंध लोगों का एक गांव। वह त्रिलोचनपुर गांव में थे।

“वाह! आदिवासियों का गांव!” उन्होंने मन ही मन आल्हादित होकर विचार किया।

पर तभी उनके अंदर के पत्रकार ने उन्हें आगाह किया, “सावधान आप आदिवासियों के इलाके में हो, जिसका सीधा मतलब है कि आप देश के विकास में बाधक लोगों और इस देश के “बिगेस्ट इंटरनल थ्रेट” के इलाके में हो... नक्सल!” और ऐसा सोचते ही उनको पहली बार डर लगा।

इस डर के अलावा एक जिज्ञासा भी थी कि “इस आदिवासी गांव में घर तो हैं, टूटी-फूटी कच्ची सड़कें हैं पर आदिवासी लोग कहां हैं?”

तभी अचानक एक आवाज ने उनको चौंका दिया, “क्या किसी को खोज रहे हो बाबू?”

यह आवाज उनके ऊपर से आई थी। पत्रकार महोदय ने ऊपर देखा तो पेड़ों पर कुछ लोग दिखे।

“आप लोग कौन हो और पेड़ों पर क्या कर रहे हो?” पत्रकार महोदय ने उत्सुकता से पूछा।

“हम इस गांव के निवासी हैं बाबू। हाल ही में पता चला कि हम इंसान नहीं, चिड़िया हैं!” एक आदिवासी ने कहा।

“तुम्हें किसने कहा कि तुम चिड़िया हो?” पत्रकार महोदय ने किसी तरह खुद को गश खाने से बचाते हुए पूछा। “अब क्या बताएं बाबू! एक दिन पहले कुछ पुलिस वाले आए और हमसे बोले कि हम लोग गैरकानूनी ढंग से यहां रह रहे हैं क्योंकि यह जो जंगल है वह सरकारी किताब में जंगल नहीं है” दूसरा आदिवासी बोला।

“भला ऐसा कैसे हो सकता है? कोई भी बोलेगा कि यह जंगल है” पत्रकार महोदय ने कहा।

“अब किताब की बात हम अनपढ़ क्या जानें” अगला आदिवासी बोला, “हमारे मुखिया जिला दफ्तर में गए थे पता करने। वहां जाने पर पता चला कि यह जंगल तो जंगल है पर सरकारी किताब के मुताबिक, हम लोग इंसान नहीं, चिड़िया हैं। बस तब से हम घर-बार छोड़कर पेड़ों पर रह रहे हैं।”

“भला आप लोग कब तक ऐसे पेड़ों पर रहेंगे?” पत्रकार महोदय ने पूछा।

“सुना है सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है। हम उसी के फैसले का इंतजार कर रहे हैं” पेड़ की फुनगी पर बैठे एक अन्य आदिवासी ने चीखकर कहा।

पत्रकार महोदय से इसके आगे कुछ कहते नहीं बना। अपने इस अनूठे इंटरव्यू को अधूरा छोड़कर वह उल्टे पैर गेस्ट हाउस की ओर चल पड़े। उनके पीछे रह गया सुरम्य, मनोरम और घने जंगलों के बीस बसा डोंगरिया कोंध लोगों का एक गांव।

जिस गांव को चारों ओर से सीआरपीएफ की छावनियों ने घेर रखा था और इन छावनियों को नियमगिरि के पहाड़ियों ने घेर रखा था।

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