असमानता पर गांधी के मन की बात

"मेरे अनुयायी लोगों से यह कभी नहीं कहते कि अंग्रेज या जनरल डायर बुरे हैं। वे बताते हैं कि ये लोग व्यवस्था के शिकार हैं और इसीलिए व्यवस्था को नष्ट करना जरूरी है, व्यक्ति को नहीं।"

 
By Bhagirath Srivas
Last Updated: Wednesday 14 February 2018
इलस्ट्रेशन: तारिक अजीज / सीएसई
इलस्ट्रेशन: तारिक अजीज / सीएसई इलस्ट्रेशन: तारिक अजीज / सीएसई

भारत समेत दुनिया भर में आय की असमानता और कृषि संकट चरम पर है। पूंजीवाद भी लगभग पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। महात्मा गांधी के इन विषयों पर क्या विचार थे, यह जानने के लिए फ्रेंच पत्रकार चार्ल्स पैट्रार्क ने वर्ष 1932 में उनका साक्षात्कार लिया था। उसी साक्षात्कार से दस सवाल

आपके विचार से भारतीय शासकों, भूमालिकों, उद्योपतियों और बैंकरों ने अपनी संपत्ति में कैसे इजाफा किया है?

वर्तमान में जनता का शोषण करके। ये लोग काफी हद तक जनता का शोषण किए बिना अपनी संपत्ति का विस्तार करने में असमर्थ हैं।

क्या इन अमीरों के पास साधारण मजदूर या किसान जो मेहनत से अपनी संपत्ति अर्जित करता है, से बेहतर जिंदगी जीने का विशेषाधिकार है?

अधिकार नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि हमें बराबरी के अवसरों का अधिकार है लेकिन हमारे पास समान क्षमताएं नहीं होतीं। प्राकृतिक रूप से यह संभव नहीं है कि सभी का स्तर समान हो। सभी का रंग, विवेक समान नहीं हो सकता। हममें से कुछ दूसरों के मुकाबले अधिक सक्षम हैं। जो लोग अधिक की कामना करते हैं वे अपनी क्षमताओं का इस दिशा में इस्तेमाल करते हैं। अगर वे अपनी क्षमताओं का सबसे बेहतर इस्तेमाल करेंगे तो लोगों के कल्याण के लिए काम कर रहे होंगे। ये लोग ट्रस्टी के अलावा कुछ नहीं होंगे। मैं बौद्धिकता से अधिक अर्जित करने की इजाजत दूंगा लेकिन इस लाभ का बड़ा हिस्सा लोगों के पास जाना चाहिए।

क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय किसान और मजदूर सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता के लिए खुद को वर्ग संघर्ष में झोंक रहे हैं?

मैं खुद भी उनके लिए क्रांति कर रहा हूं लेकिन अहिंसक तरीके से।

किसान और मजदूर अगर शासकों, भूमालिकों, पूंजीपतियों और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ क्रांति करते हैं तो इसके प्रति आपका क्या नजरिया रहेगा?

मेरी कोशिश होगी कि अमीर और संपन्न वर्ग को ट्रस्टी में तब्दील करूं जो वे पहले से हैं। वे धन रख सकते हैं लेकिन उन्हें लोगों के कल्याण के लिए काम करना होगा। इन लोगों ने ही उन्हें अमीर बनाने में योगदान दिया है।

अगर जनता सत्ता में आती है और इन वर्गों को खत्म करती है तो आपका झुकाव किस ओर होगा?

वर्तमान में जनता शासकों और भूमालिकों को अपना शत्रु नहीं मानती। लेकिन यह जरूरी है कि उन्हें उन गलत कामों से परिचित कराया जाए जो उन्होंने किया है। मैं जनता से यह नहीं कहूंगा कि वह पूंजीपतियों को अपना शत्रु समझे। मेरे अनुयायी लोगों से यह कभी नहीं कहते कि अंग्रेज या जनरल डायर बुरे हैं। वे बताते हैं कि ये लोग व्यवस्था के शिकार हैं और इसीलिए व्यवस्था को नष्ट करना जरूरी है, व्यक्ति को नहीं।

आप व्यवस्था का खात्मा चाहते हैं लेकिन ब्रिटिश और भारतीय पूंजीवादियों की व्यवस्था में कोई अंतर नहीं है। आप करों का भुगतान न करने की व्यवस्था यहां लागू क्यों नहीं करते?

भूमि के स्वामी व्यवस्था का सिर्फ एक अंश है। इसकी बिल्कुल भी जरूरत नहीं है कि अंग्रेजी व्यवस्था के खिलाफ चल रहे आंदोलन के समानांतर उनके खिलाफ भी आंदोलन चलाया जाए। हमने लोगों से कहा है कि वे जमींदारों को भुगतान न करें क्योंकि यह धन सरकार के पास जाता है। जमींदारों के साथ भी हमारे अच्छे संबंध हैं।

यह देखा गया है कि क्रांति के समय रूस कृषि पर आधारित था। भारत में वैसी ही धार्मिक और सांस्कृतिक स्थिति है। इस संबंध में आपका क्या कहना है?

मैं अपने विचार दूसरों पर थोपने की कोशिश नहीं करता। मैं रूस की स्थिति की प्रशंसा करने में असमर्थ हूं। सोवियत के नेता भी मानते हैं कि सोवियत का तंत्र रोजगार की ताकत पर स्थापित हुआ है। मुझे इसके अंतिम निर्णय पर संदेह है।

किसान और मजदूर अपनी किस्मत खुद तय करें, इस संबंध में आपका ठोस कार्यक्रम क्या है?

मेरा कार्यक्रम वही है जिसकी व्याख्या कांग्रेस द्वारा की गई है। मुझे पक्का यकीन है कि यह किसानों और मजदूरों की स्थिति में परिलक्षित हो रही है। मैं उनकी भौतिक स्थिति की बात नहीं कर रहा हूं। मेरा मतलब उनके असाधारण पुनर्जागरण से है जो उन्हें अन्याय और शोषण के खिलाफ प्रभावित कर रही है।

मशीन से आपका क्या मतलब है?

चरखा और इस तरह के उपकरण साफ तौर पर मशीन हैं। मैं यह मानता हूं कि मशीनों के गलत इस्तेमाल ही पूरी दुनिया में कामगारों के शोषण की वजह है।

क्या आप पूंजीवाद के खात्मे के पक्षधर हैं?

अगर मैं सत्ता में आता हूं तो निश्चित रूप से पूंजीवाद को खत्म कर दूंगा लेकिन पूंजी को नहीं। इसके लिए जरूरी है कि पूंजीपतियों का खात्मा न हो। मैं मानता हूं कि पूंजी और श्रम का बेहतर समन्वय संभव है। मैं पूंजी को बुराई के तौर पर नहीं देखता।

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