आयुर्वेदिक फल ओऊ

ओऊ की छाल, पत्तों और फल को पीसकर निकाले गए रस का इस्तेमाल सर्दी, खांसी, बुखार, हैजा और अपच के उपचार के लिए किया जाता है। 

 
By Chaitanya Chandan
Last Updated: Wednesday 14 March 2018 | 04:56:22 AM
ओऊ खाटा । ओऊ के फल और पत्ते का रस अतिसार के उपचार में कारगर है (फोटो: विकास चौधरी)
ओऊ खाटा । ओऊ के फल और पत्ते का रस अतिसार के उपचार में कारगर है (फोटो: विकास चौधरी) ओऊ खाटा । ओऊ के फल और पत्ते का रस अतिसार के उपचार में कारगर है (फोटो: विकास चौधरी)

कुछ महीने पहले मैं एक असमिया फिल्म “कोथानोदी” देख रहा था। उस फिल्म में केतकी नाम की एक महिला है जो गर्भवती है और बच्चे की जगह एक अजीब से फल को जन्म देती है। वह फल हमेशा उसके इर्द गिर्द लुढ़कता रहता है। उस फल को मैंने पहली बार इसी फिल्म में देखा था तो मेरे मन में उसके बारे में जानने की उत्सुकता जागी। पिछले दिनों जगन्नाथ पुरी जाने पर मुझे वहां फुटपाथ पर सब्जी बेचने वाले के पास वह फल दिखा। मैं तुरंत वहां पहुंचा और उस फल के बारे में पूछा। उसने उस फल का नाम ओऊ बताया। मैंने उससे 2 फल खरीद लिए और वापस दिल्ली आने पर उस फल के बारे में जानकारियां जुटानी शुरू कर दी। मेरी एक सहकर्मी, जो कि मूलतः असम की रहने वाली हैं, ने बताया कि असम में इसे ओऊटेंगा कहते हैं और अंग्रेजी में इसे एलीफैंट एप्पल के नाम से जाना जाता है। उसने इस फल के बारे में और अधिक जानने की राह मेरे लिए आसान कर दी थी।

ओऊ मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया का फल है जिसका वानस्पतिक नाम डिलेनिया इंडिका है। इसे उत्तर भारत में चालता के नाम से जाना जाता है। इसके पेड़ हिमालय से लगे हुए क्षेत्र के जंगलों में पाए जाते हैं, मुख्य रूप से नेपाल से मेघालय तक। यह फल हरे रंग का बड़े सेब के आकार का होता है। ओऊ भारत के अलावा अन्य एशियाई देशों में भी पाया जाता है। इन देशों में बांग्लादेश, श्रीलंका, दक्षिण-पश्चिमी चीन, वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया शामिल हैं। भारत में अधिकारिक तौर पर इस फल का संग्रहण प्रतिबंधित है क्योंकि यह फल जंगली हाथियों का पसंदीदा भोजन है। यही वजह है कि इस फल को अंग्रेजी में एलीफेंट एप्पल नाम दिया गया है।

ओऊ का पेड़ 15 मीटर तक ऊंचा होता है और इसके पत्ते 15 से 36 सेंटीमीटर तक लम्बे होते हैं। इसके फूल सफेद और पांच पंखुड़ियों वाले होते हैं जिसके बीच में पीले रंग के कई तंतु होते हैं। इसके फूल आकार में भी काफी बड़े होते हैं जिसका व्यास करीब-करीब 15-20 सेंटीमीटर होता है। पूरी तरह से विकसित एक ओऊ का आकार लगभग 5-12 सेंटीमीटर व्यास का होता है। ओऊ के अंदर भूरे रंग का गूदा होता है जिसका स्वाद खट्टा होता है और इसका उपयोग खाद्य पदार्थों में स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है। ओऊ का बाहरी आवरण मुख्यतः पंखुड़ियों की तरह होता है, जिसका उपयोग कई प्रकार के व्यंजन बनाने में किया जाता है।

ओऊ की लकड़ियों का इस्तेमाल जलावन के तौर पर किया जाता है। भारत के कई राज्यों में ओऊ का इस्तेमाल खाद्य पदार्थ के रूप में अलग-अलग तरीके से किया जाता है। असम में ओऊ का इस्तेमाल ज्यादातर दाल और मछली के पकवान बनाते समय किया जाता है। वहीं इसके गूदे का इस्तेमाल जैम और जेली बनाने में भी किया जाता है। थाईलैंड में बांस के खट्टे सलाद बनाते समय ओऊ का प्रयोग होता है और श्रीलंका में ओऊ के गूदे को नारियल के दूध में मिलाकर आइसक्रीम, मिल्कशेक और मूस बनाया जाता है। ओऊ के सूखे पत्तों का इस्तेमाल हाथी दांत और जानवर के सींगों से बने सामानों की पॉलिश करने में किया जाता है। उत्तर प्रदेश में ओऊ के पत्ते का इस्तेमाल बीड़ी बनाने के लिए किया जाता है।

ब्राजील में प्रचलित एक किंवदंती के अनुसार,  ओऊ के पेड़ को पुर्तगाली ब्राजील लेकर आए थे। मान्यता है कि ब्राजील के डी पेद्रो-I (ब्राजील साम्राज्य के संस्थापक और प्रथम शासक)  ने ओऊ के फल को एक संदेश के साथ पुर्तगाल भेजा। वह संदेश था, “ इस धरती पर पैसे पेड़ पर उगते हैं।” जब पुर्तगालियों ने ओऊ के फल को काटा तो वह हैरान रह गए। सभी फलों के अंदर एक ब्राजीलियाई सिक्का था। डी पेड्रो-I इसके माध्यम से ब्राजील की  प्राकृतिक संपदा को प्रदर्शित करना चाहते थे। यह तरकीब इतना प्रचलित हुई कि आज भी पुर्तगाल के लोग आसानी से पैसे बनाने को “पटाका” (ब्राजीलियाई मुद्रा) के पेड़ की संज्ञा देते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर ओऊ के फल के अंदर बिना काटे सिक्के कहां से आए? दरअसल जब ओऊ के पेड़ पर फूल लगते हैं तो उसके बीच में छोटा सा फल भी लगता है। साथ ही उस फल को ढंकने के लिए चारों तरफ से पंखुड़ियां भी विकसित होने लगती हैं जो आखिरकार फल के भीतरी भाग को सुरक्षित करने के लिए आवरण का काम करती है। इसलिए फूल के बीच में जो कुछ भी रखा जाएगा, वह फल के पूरी तरह से विकसित होने पर उसके अंदर विद्यमान रहेगा। डी पेड्रो-I ने भी फूलों के बीच में सिक्के फंसा दिए जो कि फल के विकसित होने पर उसके अंदर रह गए और काटने पर लोगों को मिले।

औषधीय गुण

ओऊ का इस्तेमाल न सिर्फ व्यंजन बनाने में किया जाता है, बल्कि यह अपने अंदर कई प्रकार के औषधीय गुणों को भी समेटे हुए है। आयुर्वेद में ओऊ के पेड़ की छाल, पत्तों और फल को पीसकर निकाले गए रस का इस्तेमाल सर्दी, खांसी, बुखार, हैजा और अपच के उपचार के लिए किया जाता रहा है। ओऊ के औषधीय गुणों की पुष्टि कई वैज्ञानिक अध्ययनों से भी होती है। वर्ष 2011 में जर्नल ऑफ चाइनीज इंटीग्रेटिव मेडिसिन में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, ओऊ में टाइप-1 मधुमेह से लड़ने की क्षमता पाई गई है। वर्ष 2011 में ही ब्राजीलियन जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंस में प्रकाशित एक शोध के अनुसार ओऊ बढ़े हुए कोलेस्टरॉल को घटाने में भी कारगर है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोसाइंसेज में वर्ष 2011 में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि ओऊ के पत्ते और फल के रस अतिसार के उपचार में सफल है।

व्यंजन
 

ओऊ खाटा

सामग्री:
  • ओऊ : 1
  • अदरक : 1 छोटा टुकड़ा (बारीक कटा हुआ)
  • सूखी लाल मिर्च : 2-3
  • सरसों के दाने : 1/2 चम्मच
  • गुड़ : 30 ग्राम
  • हल्दी पाउडर : 1/4 चम्मच
  • सरसों तेल : 2-3 चम्मच
  • नमक : स्वादानुसार
  • करी पत्ता : 15-20 पत्ते
विधि:
  1. ओऊ को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें। अब एक कड़ाही में तेल गरम करें और उसमें सरसों के दाने छोड़ें।
  2. जब दाने उछलने लगें तब उसमें करी पत्ता, बारीक कटा हुआ अदरक, सूखी लाल मिर्च डालकर 2 मिनट तक भूनें।
  3. अब इसमें कटे हुए ओऊ के टुकड़े, हल्दी पाउडर और नमक डालकर ओऊ के हल्का भूरा रंग का होने तक अच्छी तरह से पकाएं।
  4. अब मिश्रण में पानी और गुड़ डालकर अच्छी तरह से मिलाएं।
  5. अब कड़ाही को ढंककर मध्यम आंच पर ओऊ के अच्छी तरह से नरम होने तक पकाएं।
  6. लीजिये ओऊ खाटा तैयार है।
  7. इसे गरमागरम भात के साथ परोसें।
पुस्तक

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