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करिश्माई कैथा

औषधि के रूप में सदियों तक इस्तेमाल होने वाले कैथा को अब लोग भूलने लगे हैं

By Chaitanya Chandan
Last Updated: Friday 21 September 2018
कैथा
कैथा की चटनी (श्रीकांत चौधरी / सीएसई) कैथा की चटनी (श्रीकांत चौधरी / सीएसई)

देखने में बेल के समान पर उससे अधिक कठोर आवरण वाला फल कैथा अब बहुत कम देखने को मिलता है। आज से दो-तीन दशक पहले कैथा के पेड़ बहुतायत में पाए जाते थे। लेकिन विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और इसके फलों के प्रति लोगों की उपेक्षा ने कैथा को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया है। कैथा का वानस्पतिक नाम लिमोनिया एसिडिसिमा है और अंग्रेजी में इसे वुड ऐपल अथवा मंकी फ्रूट के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि अंग्रेजों ने शायद बंदरों को कैथा खाते देखा होगा, इसलिए इसका नाम मंकी फ्रूट रख दिया। कैथा के पेड़ पर्णपाती होते हैं और जंगलों में भी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। कैथा के पेड़ उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में बहुतायत में हैं। लेकिन आबादी वाले इलाकोें में इनकी संख्या कम होती जा रही है। शुष्क क्षेत्रों में कैथा के पेड़ सिलोन (ब्रिटिश उपनिवेश में श्रीलंका का नाम) में आसानी से देखे जा सकते हैं। दक्षिणी एशिया और जावा में ये पेड़ घरों के आसपास के बगीचों में उगाए जाते हैं। बीज से उगाए गए पौधे करीब 15 साल में फल देने के लायक होते हैं।

वर्ल्ड एग्रोफॉरेस्ट्री सेंटर के अनुसार, कैथा के पत्तों से निकाले गए तेल का इस्तेमाल खुजली के उपचार सहित अन्य कई प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए औषधि के तौर पर सदियों से किया जाता रहा है। पके हुए कैथा के गूदे का स्वाद खट्टा-मीठा होता है और इसके बीज गूदे से ही लगे होते हैं। दक्षिण भारत में कैथा के गूदे को ताल मिसरी और नारियल के दूध के साथ मिलाकर खाया जाता है। कैथा के गूदे से जेली और चटनी (देखें बॉक्स: कैथा की चटनी) भी बनाई जाती है। इंडोनेशिया में कैथा के गूदे में शहद मिलाकर सुबह के नाश्ते में खाया जाता है। वहीं थाईलैंड में इसके पत्तों को सलाद में मिलाकर खाया जाता है।

कैथा के पेड़ की लकड़ी हल्की भूरा, कठोर और टिकाऊ होती है, इसलिए इसका इस्तेमाल इमारती लकड़ी के तौर पर भी किया जाता है।

थाई-म्यांमार सीमा क्षेत्र में महिलाओं द्वारा कैथा की लुगदी कॉस्मेटिक में एक घटक के रूप में उपयोग की जाती है। इस क्षेत्र को अक्सर डेंगू से प्रभावित माना जाता है और अध्ययनों के अनुसार, गर्भावस्था में महिलाओं की त्वचा पर इसकी लुगदी और रेपलेंट के मिश्रण को लगाने से यह डेंगू-मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों से उनकी रक्षा करता है।

सांस्कृतिक महत्व

कैथा का विभिन्न संस्कृतियों में अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहा है। बिहार के मिथिला क्षेत्र की चित्रकला विधा मधुबनी चित्रकारी की विशेषता चटकीले और विषम रंगों से भरे गए रेखाचित्र अथवा आकृतियां हैं। इस चित्रकारी में अमूमन प्राकृतिक तरीके से बनाए गए रंगों का इस्तेमाल किया जाता था। इनमें से हरा रंग कैथा के पत्तों से तैयार किया जाता था।

ओडिशा की एक प्रसिद्ध लोककला “पत्ताचित्र” में भी कैथा विशेष महत्व रखता है। पत्ताचित्र संस्कृत के दो शब्दों को मिलाकर बना है- पत्ता, जिसका अर्थ होता है कैनवास और चित्र, यानि तस्वीर। पत्ताचित्र कैनवास पर की गई एक चित्रकारी है, जिसमें चटकीले रंगों का प्रयोग करते हुए सुन्दर तस्वीरों और डिजाइनों के माध्यम से साधारण विषयों को प्रदर्शित किया जाता है। पेंट तैयार करना पत्ताचित्र बनाने का सबसे महत्वपूर्ण काम होता है। कैथा वृक्ष की गोंद इसकी मुख्य सामग्री है।

कैथा का आवरण काफी कठोर होता है

कैथा को संस्कृत में कपित्थ कहा जाता है और गणेश वंदना में इस फल का जिक्र आता है। गणेश वंदना के अनुसार, कपित्थ फल गणेश जी के प्रिय फलों में से एक है। पुण्यक वनस्पति तंत्रम के अठारहवें अध्याय में कैथा के बारे में एक अद्भुत बात बताई गई है। इस शास्त्र के अनुसार, हाथी अगर यह फल साबुत खा जाए, तो अगले दिन उसके मल में साबुत फल ही मिल जाएगा, लेकिन फोड़कर देखने पर उसके अन्दर का गूदा गायब मिलेगा। साहित्यकारों ने भी कैथा की विशेषताओं को अपनी लेखनी के माध्यम से रेखांकित किया है। अंगिक भाषा के वरिष्ठ कवि अमरेन्द्र की एक कविता में कैथा अथवा कठबेल की कठोरता का चित्रण एक सन्यासी के सिर के तौर पर किया है-

“चकय के चकधुम, मकय के लावा
केना के कटतै समय हो बाबा।
छुछुंदर सर पर चमेली तेल
सन्यासी सर पर फुलै कठबेल
लते मोचारै, की होतै गाभा”

मध्यप्रदेश के कवि असंग घोष ने भी अपनी कविता “मनुवादी न्याय” के आखिरी पैरा में कैथा की कठोरता का बखान किया है-

“मनु!
मैं किसी दिन
तराजू
काली पट्टी
सहित उठाकर
कैथा की तरह दे मारूंगा,
तेरे सिर पर
इसे”

प्राकृतिक औषधि

कैथा औषधीय गुणों का भंडार है, जिसकी पुष्टि विभिन्न समय में कई अध्ययनों द्वारा की गई है। 1996 में प्रकाशित द एनसाइक्लोपीडिया ऑफ मेडिसिनल प्लांट्स के अनुसार, कैथा में पाए जाने वाले अम्ल, विटामिन और खनिज लिवर टॉनिक का काम करते हैं और पाचन प्रक्रिया को उद्दीप्त करते हैं। 2006 में प्रकाशित पुस्तक फ्लोरा ऑफ पाकिस्तान के अनुसार, कैथा के कच्चे फल के गूदे का इस्तेमाल दस्त के उपचार में किया जा सकता है। रिसर्च जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल, बायोलॉजिकल एंड केमिकल साइंसेस में वर्ष 2010 में प्रकाशित शोध में भी इस बात का जिक्र है।

ट्रॉपिकल जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल रिसर्च में जून 2012 के अंक में प्रकाशित शोध के अनुसार, कैथा में स्तन कैंसर की कोशिकाओं को फैलने से रोकने की क्षमता है। वर्ष 2009 में डेर फार्मासिया लेत्ते नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि कैथा में मधुमेह की रोकथाम की भी क्षमता है।

व्यंजन

कैथा की चटनी
सामग्री:
  • कैथा: 2
  • हरी मिर्च: 3
  • सूखी लाल मिर्च: 3
  • मेथी के दाने: 1/2 चाय चम्मच
  • सरसों के दाने: 1/2 चम्मच
  • हींग: 1 चुटकी
  • नमक: स्वादानुसार
  • तेल: आवश्यकतानुसार
विधि: कैथा को तोड़कर उसके गूदे को निकाल लें। अब गूदे में से बीज को अलग कर दें। इसके बाद एक बर्तन में तेल डालकर धीमी आंच पर रखें। तेल के गर्म होते ही इसमें सरसों के दाने डालें। जैसे ही सरसों के दाने चटकने लगें, इसमें मेथी दाना, हींग, सूखी लाल मिर्च और हरी मिर्च मिलाकर भून लें। अब इन मसालों को स्टोव से उतारकर ठंडा होने दें। इसके बाद मसाले को पीसकर इसका पाउडर बना लें। अब इसमें कैथा का गूदा और नमक मिलाएं और दोबारा दरदरा पीस लें। कैथा की चटनी तैयार है। इसे रोटी या परांठे के साथ परोसें।

पुस्तक

बाउंड टू द फायर: हाउ वार्जीनियास एनस्लेव्ड कुक्स हेल्प्ड इनवेंट अमेरिकन क्यूजीन
लेखक: केली फंटो दीत्ज
प्रकाशक: यूनिवर्सिटी प्रेस ऑफ केंटकी
पृष्ठ: 192 | मूल्य: $29.95

इस किताब में पुरातात्विक सबूतों, कुकबुक, वृक्षारोपण के रिकॉर्ड और लोकगीत के आधार पर औपनिवेशिक काल में वृक्षारोपण के लिए गुलाम बनाए गए रसोइयों के जीवन का एक अनुमानित अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

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