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किसने परोसा जीएम भोजन?

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) के अध्ययन में 32 प्रतिशत खाद्य उत्पादों में जीएम के अंश मिले हैं। सीएसई ने कुल 65 प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों में जीएम अंश पता लगाने के लिए जांच की। ये उत्पाद दिल्ली, पंजाब ओर गुजरात से लिए गए। जीएम पॉजिटिव पाए गए करीब 80 प्रतिशत उत्पाद आयातित हैं।

किसने परोसा जीएम भोजन?
विकास चौधरी / सीएसई विकास चौधरी / सीएसई

निक्की (परिवर्तित नाम) एक साल की होने वाली थी, तभी से उसका वजन बढ़ना बंद हो गया। तमाम परीक्षणों और बाल चिकित्सक को कई बार दिखाने के बाद पता चला कि उसे गाय के दूध में मौजूद प्रोटीन से एलर्जी है। यह विकार देश के लगभग 7 प्रतिशत बच्चों में पाया जाता है। चिकित्सकों ने परिजनों को बताया कि निक्की का तंत्रिका तंत्र इस प्रोटीन से प्रतिरोध उत्पन्न कर रहा है। इससे निक्की की आंतों को नुकसान पहुंच रहा है। इसी वजह से वह खाया गया भोजन नहीं पचा पा रही और क्रोनिक डायरिया से पीड़ित है। उन्होंने भोजन में बदलाव का सुझाव दिया और सबसे पहले वह भोजन बंद करने को कहा जो एलर्जी का कारण हो सकता है ताकि आंतें ठीक हो सकें।

इसके बाद एक समय में एक नया भोजन देने और उसके असर पर ध्यान देने को कहा। करीब आठ महीने तक निक्की के भोजन में केवल चावल, आलू और केला ही शामिल रहे। एजर्ली से उबरने पर चिकित्सकों ने हाइपोएलजर्निक इनफेंट फॉर्म्यूला (शिशु आहार) सिमिलेक एलिमेंटम का सुझाव दिया ताकि उसके पोषण की जरूरतें पूरी हो सकें। इस आयातित उत्पाद का उत्पादन अमेरिका की बड़ी हेल्थकेयर कंपनी एबॉट लेबोरेटरी द्वारा किया जाता है। इसके 400 ग्राम का पैकिट 2,800 रुपए का आता है और इससे निक्की के आहार की 10 दस तक की जरूरतें इससे पूरी हो सकती हैं। हालांकि पेशे से ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट निक्की की मां के जेहन में इसकी कीमत सबसे बाद में आती है।

वह पूरी सावधानी से निक्की को प्रतिदिन निर्धारित सिमिलेक एलिमेंटम फॉर्म्यूला देती हैं ताकि वह स्वस्थ हो जाए। लेकिन वह शायद इस बात से अनजान हैं कि जो आहार वह इतने महीने से अपनी बच्ची को दे रही हैं वह जेनिटिकली मॉडिफाइड (जीएम) है और इसकी सुरक्षा दुनियाभर में संदेह की दृष्टि से देखी जा रही है। दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) के रिसर्चरों ने सिमिलेक एलिमेंटम और लैक्टोस इनटॉलरेंट समझे जाने वाले शिशु आहार सिमिलेक आइसोमिल में जीएम के अंश पाए हैं। लैक्टोस इनटॉलरेंट बच्चे दूध में मौजूद एक तरह की चीनी लैक्टोस और डेरी से बने अन्य उत्पाद पचाने में असमर्थ होते हैं। उन्हें प्राकृतिक रूप से लैक्टोस मुक्त सोया दूध का सेवन कराने का सुझाव दिया जाता है। यह खतरनाक है क्योंकि ये उत्पाद डॉक्टरों द्वारा उन शिशुओं को देने की सलाह दी जाती है जिनकी विशेष स्वास्थ्य जरूरतें हैं। यह निष्कर्ष इसलिए भी चिंताजनक हैं क्योंकि उच्चतम न्यायालय में पिछले साल दाखिल भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) का एक हलफनामा कहता है, “केंद्र सरकार ने खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के सेक्शन 22 के तहत जीएम भोजन के उत्पादन, वितरण, बिक्री एवं आयात से संबंधित कोई नियम अधिसूचित नहीं किया है। इसलिए देश में जीएम भोजन स्वीकृत नहीं है और अधिसूचना जारी होने तक यह नियंत्रित भी नहीं किया जा सकता।”

सबसे बुरी बात यह है कि देश में बेचे जा रहे अवैध जीएम उत्पादों की सूची यहीं समाप्त नहीं होती। सीएसई के रिसर्चरों ने पिछले 6 महीने में 65 खाद्य उत्पादों का निरीक्षण किया जिनमें सोया, कॉर्न, रेपसीड (कनौला) की मौजूदगी है। ये वे फसलें हैं जिनके जीएम रूप दुनियाभर के 99 प्रतिशत क्षेत्रों में उगाए जा रहे हैं। इनका इस्तेमाल प्रतिदिन भोजन बनाने के तेल, नाश्ते के अनाज और पकाने और खाने के लिए तैयार भोजन, शिशु आहार और प्रोटीन सप्लीमेंट में किया जाता है। परीक्षण में शामिल 30 खाद्य उत्पादों का उत्पादन देश में किया गया था जबकि अन्य आयातित थे। ये उत्पाद सीएसई की अत्याधुनिक पॉल्यूशन मॉनिटरिंग लेबोरेटरी (पीएमएल) में परखे गए। यह प्रयोगशाला अलवर जिले के नीमली गांव में स्थित है। इसने पिछले दो दशकों में कई हिला देने वाले खुलासे किए हैं (देखें, मानकों का निर्धारण)। इस बार उत्पादों में जीएम के अंश परखने के लिए पीएमएल में अत्याधुनिक मशीनें और उपकरण मंगाए गए जो क्यूपीसीआर (क्वांटिटेटिव पॉलिमरेस चेन रिएक्शन) एडवांस एनेलिसिस टेक्नॉलजी पर आधारित है। यह जीएम मार्कर से खाद्य पदार्थों में जीएम की मौजूदगी पता लगाने में सक्षम है (देखें, मार्कर की जांच)।

सीएसई के उपमहानिदेशक चंद्र भूषण बताते हैं, “हमें अंदेशा था कि जीएम भोजन हमारी थाली में उन तमाम रास्तों से प्रवेश कर रहा है जिनके बारे में हम कम ही जानते हैं। मीडिया में ऐसी रिपोर्ट्स हैं जो बताती हैं कि अवैध जीएम बीज देश भर में उपलब्ध हैं और इनसे खेती की जा रही है। लेकिन हमें आयातित पैकिटबंद खाद्य पदार्थों और तेल में अवयवों की प्रकृति नहीं पता थी।” वह बताते हैं, “ऐसे अधिकांश उत्पाद जीएम कॉर्न, सोयाबीन और रेपसीड पर आधारित हैं, इसलिए हमने वास्तविकता जानने का निर्णय लिया।”

परीक्षण में शामिल 65 उत्पादों में से 32 प्रतिशत में जीएम के अंश पाए गए। इनमें से करीब 80 प्रतिशत उत्पाद आयातित हैं। सीएसई ने जिन 16 आयातित उत्पादों को जीएम पॉजिटव पाया वे अमेरिका, कनाडा, नीदरलैंड्स, थाईलैंड और यूएई के हैं। अमेरिका और कनाडा जीएम फसल उगाने व उत्पादन करने वाले अग्रणी देश हैं। शेष तीन देश जीएम फसलों की व्यावसायिक खेती की अनुमति नहीं देते पर इनकी फूड प्रोसिसिंग यूनिट अमेरिका और कनाडा से आयातित कनौला जैसी फसलों पर आश्रित हैं।



सीएसई के रिसर्चर उस वक्त हैरान हो गए जब देश में उत्पादित करीब 17 प्रतिशत सैंपल भी जीएम पॉजिटिव पाए गए। ये सैंपल परिष्कृत कॉटन सीड तेल अथवा कपासिया तेल के थे जो तिरुपति, अंकुर, गिन्नी और विमल ब्रांड के बैनर तले बेचे जा रहे हैं। एकमात्र कच्चे कॉटन सीड तेल का सैंपल भी जीएम पॉजिटिव मिला। ये निष्कर्ष साफ तौर पर बताते हैं कि देश में 2002 में जिस बीटी कॉटन को व्यवसायिक खेती के तौर पर स्वीकार किया और जो 94 प्रतिशत कॉटन के खेतों को घेर चुका है, वह जीएम फसल हमारी खाद्य श्रृंखला में शामिल हो चुकी है।

निष्कर्ष इसलिए भी चिंताजनक हैं क्योंकि कुछ ऐसे उत्पाद भी जीएम पॉजिटिव मिले हैं जिनका सेवन प्रतिदिन किया जाता है। उदाहरण के लिए कॉटन सीड तेल को ही लीजिए। यह सूरजमुखी और सोयाबीन तेल के मुकाबले 30-40 प्रतिशत सस्ता है। देश के अधिकांश हिस्सों में खाना बनाने में इसका प्रयोग किया जाता है। पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री नमकीन और भुजिया जैसा नाश्ता बनाने में इसका बड़े पैमाने पर उपयोग करती है। गरीबों का घी समझे जाने वाले वनस्पति में यह स्वीकृत अवयव है। उत्पादों को लंबे समय तक उपयोग लायक बनाए रखने के लिए बैकरी उद्योग में इसका इस्तेमाल किया जाता है। ये ऐसे उत्पाद हैं जो स्वास्थ्य के प्रति सजग शहरी लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। दक्षिण दिल्ली में अध्यापिका माया मिश्रा ने हाल ही में कनौला तेल का इसकी खूबियों के कारण इस्तेमाल शुरू किया है। वह कहती हैं कि यह तेल उनके पति और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए ठीक है क्योंकि दोनों गठिया से पीड़ित हैं। इस तेल के प्रचार में दावा किया जाता है कि यह हृदय की बीमारियों को कम करने में भी सक्षम है। सीएसई ने पाया कि 7 में से 4 कनौला ब्रांड जीएम पॉजिटिव हैं। माया मिश्रा और निक्की की मां जैसे उपभोक्ताओं के पास सच जानने का कोई जरिया नहीं है क्योंकि उत्पाद के लेबल पूरी तस्वीर साफ नहीं करते। कई उत्पादों में तो झूठे दावे तक होते हैं।



सीएसई के निष्कर्षों के मुताबिक, 74 प्रतिशत आयातित उत्पादों और 96 प्रतिशत घरेलू उत्पादों के लेबल में जीएम की कोई जानकारी नहीं दी गई। लेकिन जब परीक्षण किया गया तो इनमें से करीब एक चौथाई-24 प्रतिशत में जीएम के अंश मिले।

पांच में तीन ब्रांड जो अपने लेबल में जीएम के अंश न होने की जानकारी देते हैं, वे भी जीएम पॉजिटिव पाए गए। इनमें कनाडा से आयातित कैनड्रॉप कनौला तेल, अमेरिका से आयातित मोरी नू सिलकन टोफू और थाईलैंड से आयातित प्रॉमप्लस स्वीट होल करनल कॉर्न शामिल हैं। कैनड्रॉप के लेबल में दावा किया गया है कि उत्पाद जीएमओ मुक्त है। मोरी नू टोफू का लेबल कहता है “नॉन जीएमओ प्रोजेक्ट वैरिफाइड” जबकि प्रॉमप्लस स्वीट होल करनल कॉर्न में “नॉन जीएमओ” का लेबल लगा है।

इनमें से अधिकांश उत्पाद बड़े उद्योगों द्वारा आयातित किए जाते हैं। ऐसे कुछ बड़े नाम हैं- जिंदल रीटेल्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, एबॉट हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड, डालमिया कॉन्टिनेंटल प्राइवेट लिमिटेड, जीवो वेलनेस प्राइवेट लिमिटेड, बजोरिया फूड प्राइवेट लिमिटेड (दिल्ली), न्यूएज गूरमे फूड (दिल्ली), सेंचुरी एडिबल्ज कुकिंग आयल प्राइवेट लिमिटेड, ओलिव ट्री ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड और गुरु कृपा इम्पैक्स, दिल्ली।

डाउन टू अर्थ ने इन उद्योगों के प्रतिनिधियों से संपर्क करके यह पता करने की कोशिश की कि क्या उनके पास जीएम खाद्य पदार्थों के आयात की अनुमति है। जहां ऑल इंडिया कॉटन सीड क्रशर्स एसोसिएशन ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया जबकि भारत में कनौला तेल का सबसे बड़ा विक्रेता होने का दावा करने वाले जीवो वेलनेस लिमिटेड ने हमारे सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। वहीं दूसरी ओर पुणे स्थित निर्यातक ऑलिव ट्री ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड ने डाउन टू अर्थ के छपने तक कोई जवाब नहीं दिया।

मानकों का निर्धारण
 
सीएसई द्वारा किए गए परीक्षणों ने सरकार की नीति के लिए मानदंड बनाए हैं


सीएसई की पॉल्यूशन मॉनिटरिंग लेबोरेटरी (पीएमएल) को साल 2000 में स्थापित किया गया था ताकि लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले मामलों और समुदायों के अनुरोध पर ध्यान दिया जा सके। इतने सालों में यहां कई अध्ययन किए गए हैं। पारिस्थितिक सुरक्षा व सरकारी नीति और मानदंड बनाने के लिए स्वतंत्र सूचनाएं सार्वजनिक पटल पर रखी गई हैं।

साल 2000 में पहला अध्ययन केरल के कासरगोड में एंडोसल्फान के जहर का किया गया। इसके बाद राज्य सरकार ने इस रसायन के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। 2003 में पीएमएल ने बोतलबंद पानी में कीटनाशकों का परीक्षण किया। बाजार में उपलब्ध पानी के कई ब्रांड में निर्धारित मानकों से कई गुणा अधिक कीटनाशक मिले। इसी साल पीएमएल ने सॉफ्ट ड्रिंक्स में कीटनाशकों की जांच की और सभी सैंपलों में कीटनाशक पाए गए। इस अध्ययन ने खाद्य प्राधिकरणों को मानक बनाने के लिए बाध्य किया।

संगठन को पंजाब के लोगों के कई आवेदन मिले। लोग चाहते थे कि सीएसई राज्य में कैंसर के बढ़ते मामलों की जांच करे। 2005 में पीएमएल ने इस संबंध में जांच और किसानों के खून में कीटनाशक पाए गए। इसके बाद क्षेत्र में इस सह-संबंध के अध्ययन के लिए एक कैंसर रजिस्ट्री गठित की गई।

2009 में पीएमएल ने पेंट्स में लेड पाया और यह सामने आया कि इसकी मात्रा मानकों से कहीं अधिक है। इसके बाद कंपनियों ने अपने उत्पादों से लेड हटा दिया। इसी साल खाद्य तेलों में ट्रांसफैट की मौजूदगी जांची गई और पता चला कि वनस्पति का स्तर वैश्विक मानकों से 5-12 गुणा अधिक है। अध्ययन के बाद मानक बनाए गए और अब भारत खाद्य श्रृंखला से वनस्पति को पूरी तरह से हटाने पर विचार कर रहा है। 2010 में पीएमएल के अध्ययन में शहद में एंटीबायोटिक्स मिले। इस अध्ययन ने एफएसएसएआई को मानक तय करने को बाध्य किया। 2011 में एनर्जी ड्रिंक्स में कैफीन का उच्च स्तर पाया गया।

साल 2014 में पोल्ट्री फार्म चिकन का परीक्षण किया और पाया कि जीवन रक्षक एंटीबायोटिक्स का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। इससे देश में एंटीबायोटिक्स के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो रही है। 2016 में जांच में पाया गया कि बेकरी इकाइयां ब्रेड में कैंसर के कारक पोटेशियम ब्रोमेट का इस्तेमाल हो रहा है। इसके बाद ब्रेड और बैकरी में इस रसायन को प्रतिबंधित कर दिया गया।

 

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