Governance

असुविधाजनक शोध क्यों रोकता है कारपोरेट जगत?

कीटनाशक विषाक्तता पर शोध न के बराबर हुआ है। वायु प्रदूषण पर किए जा रहे शोधों से निपटने के लिए भी यही रणनीति अपनाई जा रही है

 
By Sunita Narain
Last Updated: Thursday 10 January 2019

तारिक अजीज / सीएसई

असुविधाजनक सार्वजनिक शोध को कैसे रोका जाए? यह एक ऐसी केस स्टडी है जो निश्चित तौर पर कारपोरेट बिजनेस स्कूलों में पढ़ाई जाती होगी। मैं ऐस क्यों कह रही हूं? क्योंकि भारत का कारपोरेट जगत हमेशा से यही करता आया है। इस शोधों का विरोध करने के पीछे उनकी मंशा यही रहती है कि वैज्ञानिक, जो स्वयं इन विवादों में पड़ने से बचना चाहते हैं, इन मुद्दों से दूर ही रहें। यह हमने तब देखा जब हमारे भोजन में कीटनाशकों द्वारा हो रहे प्रदूषण का मुद्दा उठा था। कीटनाशक प्रदूषण का मुद्दा जब पहले पहल उठा तब वे सरकारी वैज्ञानिक ही थे जो संकटग्रस्त कीटनाशक उद्योग के पक्ष में खड़े हुए थे। ऐसा इसलिए क्योंकि इन वैज्ञानिकों के जेहन में कीटनाशक का मतलब विकास होता है। और फिर जब कुछ बागी वैज्ञानिकों ने कीटनाशकों की विषाक्तता व मानव स्वास्थ्य पर उनके प्रभावों के विषय में शोध करना शुरू किया तो कीटनाशक उद्योग जगत उन पर अपनी पूरी ताकत से टूट पड़ा। शोधकर्ताओं पर व्यक्तिगत हमले करना शुरू से ही उनकी रणनीति का हिस्सा रहा है। वे पहले विज्ञान पर हमला करते और फिर वैज्ञानिक पर।

केरल के कासरगोड जिले में एंडोसल्फन विषाक्तता पर काम कर रहे सरकारी वैज्ञानिकों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था इसके अलावा वैसे सरकारी वैज्ञानिक जिन्होंने आंध्र प्रदेश या महाराष्ट्र के कपास के खेतों में कीटनाशकों के उपयोग के स्वास्थ्य प्रभावों पर शोध करने की हिम्मत की, उनका भी यही हश्र हुआ।

कीटनाशक उद्योग की जवाबी कार्रवाई त्वरित व दुखद रूप से प्रभावी रही है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में, कीटनाशक विषाक्तता पर शोध न के बराबर हुआ है। लेकिन आज मैं यह क्यों लिख रही हूं? क्योंकि वायु प्रदूषण पर किए जा रहे शोधों से निपटने के लिए भी यही रणनीति अपनाई जा रही है। वायु प्रदूषण के स्रोतों से सम्बंधित असुविधाजनक जानकारी को झुठलाने और शोध को पूरी तरह से रोकने के तिकड़म किए जा रहे हैं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) ने दिल्ली में वायु प्रदूषण के स्रोतों पर हाल ही में एक रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट के प्रकाशन के दिन से ही सोसाइटी फॉर इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआईएएम) इस पर हमले किए जा रही है। तथ्यों पर विवाद पैदा करने और निष्कर्षों को झुठलाने की जीतोड़ कोशिश जारी है।

रिपोर्ट में उठाए गए तकनीकी मुद्दों पर सवाल किए गए और उनका समुचित जवाब दिए जाने के बावजूद यह संस्था रिपोर्ट के खिलाफ लॉबी कर रही है। आखिर क्यों? इस वैज्ञानिक रिपोर्ट से एसआईएएम की परेशानी क्यों बढ़ रही है? यह जहरीला अभियान आखिर क्यों? क्योंकि यह रिपोर्ट असुविधाजनक है। यह रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के कुल प्रदूषण में वाहनों का योगदान 40 प्रतिशत से अधिक है। वाहनों का उत्सर्जन लगभग आधे पीएम 2.5, NOx के 60 प्रतिशत से अधिक और कार्बन मोनोऑक्साइड के 80 प्रतिशत से अधिक भार के लिए जिम्मेदार है। इसका मतलब यह है कि वाणिज्यिक और हल्के वाहनों की तकनीक में बदलाव वायु प्रदूषण से निपटने की योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। इसके अलावा ईंधन में भी बदलाव लाने की आवश्यकता। आखिर एसआईएएम चाहती क्या है? वह चाहती है कि सरकार पीछे हट जाए और इस शोध को अपनी वेबसाइट से हटा ले। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती।

एसआईएएम अपने स्वयं के शोध को स्वीकृति दिलवाना चाहती है। ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई) और द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टीईआरआई) द्वारा किये गए इस शोध को एक अन्य सरकारी मंत्रालय, भारी उद्योग विभाग का भी समर्थन प्राप्त है। यह अध्ययन “स्थापित करता है” कि शहर में पीएम 2.5 के कुल भार के केवल 15-23 प्रतिशत के लिए ही वाहन जिम्मेदार हैं। पीएम 10 के लिए तो यह आंकड़ा और भी कम है। यह रिपोर्ट प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से धूल ( 42 प्रतिशत) को जिम्मेदार ठहराती है। यहां हितों का संघर्ष स्पष्ट है- इस मंत्रालय का काम ही वाहन उद्योग को बढ़ावा देना है और ऑटोमोटिव रिसर्च असोसिएशन को तो सीधा वाहन निर्माताओं का समर्थन प्राप्त है। हालांकि तथ्य यह कि इन दोनों अध्ययनों की तुलना करना गलत है।

एमओईएस द्वारा किया गया अध्ययन एक उत्सर्जन सूची है, जो विभिन्न स्रोतों के कुल प्रदूषण भार को देखता है। वहीं दूसरी और एआरआईआई-टीईआरआई द्वारा किया अध्ययन स्रोत विभाजन है जो पर्टिक्युलेट मैटर को स्रोत तक ट्रैक करता है। वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो दोनों में उतना ही अंतर है जितना सेबों और संतरों में होता है, मतलब जमीन-आसमान का। हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं उसकी विषाक्त्तता बढ़ चली है। इस प्रदूषण के सारे स्रोतों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है चाहे वह वाहन या उद्योग हों या धूल। हालांकि उद्योग जगत का कहना है कि वे निर्दोष हैं और असल जिम्मेदारी किसी और की है। वे तो समस्या का छोटा-सा हिस्सा भर हैं। एआरआईआई-टीईआरआई अध्ययन ने ऐसा स्थापित करने में उनकी मदद की है और वे चाहते हैं कि इसे मान लिया जाए।

इसलिए उन्हें इस हमले के दुष्परिणामों की कोई चिंता नहीं है। वे पूरा जोर लगा रहे हैं। कई नामी गिरामी वैज्ञानिकों को इन निष्कर्षों की सत्यता पर सवाल खड़े करने के काम में लगाया गया है। यह असुविधाजनक तो है ही, साथ ही साथ गलत भी है। मैं विश्वास के साथ यह कह सकती हूं कि वही वाहन उद्योग अब यह तर्क नहीं दे सकता कि वायु प्रदूषण जहरीला नहीं है या डीजल उत्सर्जन कैंसर के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकते। पिछले कुछ सालों में उन्होंने अपने विज्ञान के माध्यम से यह “स्थापित” करने के लिए कड़ी मेहनत की है। इसलिए, मेरा मानना है कि सार्वजनिक विज्ञान उद्योग के हमले से बच जाएगा। यह आवश्यक भी है।

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