कैसे दोगुनी होगी किसानों की आय?

मोदी ने दो साल पहले भी 2022 तक आमदनी को दोगुना करने का वादा किया था। इस दफा उन्होंने नए भारत के अजेंडे की बात जोड़ी है, ठीक उसी समय जब किसान सड़कों पर हैं। 

 
By Richard Mahapatra
Last Updated: Friday 13 October 2017

तारिक अजीज / सीएसई

एक “नया भारत” ताजा राष्ट्रीय अजेंडा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्रचीर से लगातार चौथे भाषण में अपने चिर परिचित अंदाज में दोनों हाथ बढ़ाकर एकत्रित जनसमूह से कहा कि नए भारत में युवाओं और महिलाओं के सपने पूरे होंगे और किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी। मोदी ने दो साल पहले भी 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने का वादा किया था। इस दफा पहली बार उन्होंने नए भारत के अजेंडे की बात जोड़ी है, ठीक उसी समय जब किसान सड़कों पर हैं। वे अपनी फसल के उचित दाम के लिए और कृषि संकट से बाहर निकालने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री का यह वादा किसानों के गले नहीं उतर रहा है।

उनका यह वादा पूरा होगा या नहीं, इस पर संशय बना हुआ है। अशोक दलवई की अध्यक्षता में किसानों की आमदनी दोगुनी करने के संबंध में बनी समिति ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट सौंपी है। इसमें किसानों की आय दोगुनी करने में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख है। रिपोर्ट कृषि की ऐतिहासिक प्रगति से शुरू होकर क्या करना चाहिए पर समाप्त होती है। इस विस्तृत रिपोर्ट में कई सुझाव दिए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

रिपोर्ट बताती है कि 2004-2014 के दौरान कृषि के क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रगति हुई है। इस अवधि के दौरान कृषि विकास दर चार प्रतिशत थी जबकि 1995 से 2004 के बीच यह दर 2.6 प्रतिशत ही थी। कृषि के क्षेत्र में चार प्रतिशत विकास दर स्वर्णिम मानी जाती है लेकिन हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में सुस्ती आई है।

रिपोर्ट कहती है कि यह विकास दर न्यूनतम समर्थन मूल्य, सार्वजनिक निवेश और बेहतर बाजार मूल्य के कारण संभव हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, खेती से होने वाली वास्तविक आय दोगुनी होनी चाहिए। किसान की कुल आमदनी में खेती से होने वाली आय का हिस्सा 60 प्रतिशत है। इसका मतलब यह भी है कि किसान की कुल आय का यह स्रोत ही 2022 तक दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

रिपोर्ट कहती है कि इससे किसान की कृषि और गैर कृषि आय के अनुपात में बदलाव होगा। अभी यह अनुपात 60:40 है जो 2022 में 70:30 हो जाएगा। इसका मतलब यह कि भारत ने खेती से होने वाली आय को समग्र कल्याण का पैमाना मान लिया है। इसका एक और पहलू है, यह मान लेना कि कृषि संकट के वक्त गैर कृषि आय के विकल्प के सपने को बेकार माना जाना।

इस लक्ष्य को हासिल करने की लागत पर नजर डालने की जरूरत है। यह जरूरी इसलिए है क्योंकि कृषि एक निजी व्यवसाय है जिस पर आधिकारिक नीतियों और कार्यक्रमों का असर पड़ता है। इसका अर्थ यह भी है कि किसानों की आमदनी को दोगुना करने के लिए निजी और सार्वजनिक निवेश की जरूरत है।

समिति ने माना है कि निजी और सार्वजनिक निवेश के बाद भी 2022 तक कृषि की विकास दर वही रहेगी जो 2015-16 के दौरान थी। इस हिसाब से देखें तो किसान की आय में सालाना वृद्धि दर 9.23 प्रतिशत रहेगी। ऐसा करने के लिए किसानों को अगले पांच साल में 46,299 करोड़ रुपये (2004-05 के मूल्य) का निवेश करना होगा। 2015-16 के दौरान किसानों ने 29,559 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 102,269 करोड़ रुपये के सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता होगी। यह 2015-16 में 64,022 करोड़ रुपये के निवेश से कहीं ज्यादा है।

ऐसे में कुछ सवाल उठने लाजिमी हैं। मसलन, क्या किसानों में इतनी क्षमता है कि वे बिना लाभ इतनी भारी भरकम राशि को कृषि में निवेश कर पाएंगे? सार्वजनिक क्षेत्र की एक विशाल राशि सिंचाई परियोजनाओं में लगाई जानी है। ज्यादातर लोग जानते हैं कि इस दिशा में काम नहीं हो रहा है। किसान पहले से कर्ज में डूबे हैं। यह पूरी कवायद उनके  कर्ज में ही इजाफा करेगी। आदर्श स्थिति तो तब होती जब किसानों को कर्ज से मुक्ति दिलाकर उनकी आमदनी दोगुना करने की दिशा में पहल की जाती लेकिन केंद्र सरकार चाहती है कि राज्य सरकारें ही इसका खयाल रखें। इसी के साथ तू-तू, मैं-मैं का एक और चरण शुरू होता है। 

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