चिकित्सकों और दवा कंपनियों की सांठगांठ

मोदी की बातों में सच्चाई है। यह बात कई बार साबित हो चुकी है कि डॉक्टर अनैतिक कार्यों में लिप्त रहे हैं। क्लिनिकल ट्रायल में डॉक्टरों के लिप्त होने की बातें उजागर होती रहती है। 

 
By Bhagirath Srivas
Last Updated: Monday 21 May 2018 | 10:13:12 AM

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किस बयान से चिकित्सक खफा हैं?

मोदी ने लंदन में दिए बयान में चिकित्सकों पर दवा कंपनियों से मिलीभगत का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा “आप उन चिकित्सकों को शायद जानते हों। कभी सिंगापुर तो कभी दुबई में सम्मेलन होते हैं। चिकित्सक वहां बीमार लोगों के लिए नहीं बल्कि इसलिए जाते हैं क्योंकि दवा कंपनियों को उनकी जरूरत होती है।”

मोदी के बयान पर चिकित्सकों का क्या कहना है?

चिकित्सकों के ढाई लाख सदस्यों वाले संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) और 10 हजार सदस्यों वाले एसोसिएशन ऑफ मेडिकल कंसल्टेंट्स ने प्रधानमंत्री के बयान पर तीखी प्रतिक्रया देते हुए उन्हें पत्र लिखकर कहा है कि वहनीय स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध कराने में विफल होने पर सरकार को चिकित्सकों को बलि का बकरा नहीं बनाना चाहिए। उनका कहना है कि यह चिकित्सकों की छवि को बदनाम करने की कोशिश है।

मोदी की बातों में कितनी सच्चाई है?

मोदी की बातों में सच्चाई है और उसकी वाजिब वजहें भी हैं। यह बात कई बार साबित हो चुकी है कि डॉक्टर अनैतिक कार्यों में लिप्त रहे हैं। क्लिनिकल ट्रायल में डॉक्टरों के लिप्त होने की बातें उजागर होती रहती हैं। 19 मार्च को राजस्थान में 28 ग्रामीणों अवैध ड्रग ट्रायल किया गया था। सर गंगाराम अस्पताल के सर्जिकल गैस्ट्रांटेरोलॉजी के अध्यक्ष समीरन नंदी स्वीकार कर चुके हैं कि सरकार और मेडिकल काउंसिल उन डॉक्टरों पर लगाम लगाने में विफल रही है जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। ये डॉक्टर विशुद्ध रूप से व्यापारी की तरह काम कर रहे हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं पर 2015 का नेशनल सैंपल सर्वे क्या कहता है?

यह बताता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में हर चार में एक परिवार चिकित्सा बिलों के भुगतान के लिए कर्ज लेता है। शहरी क्षेत्रों में स्थिति मामूली रूप से बेहतर है। शहरों में हर पांच परिवारों में एक स्वास्थ्य के खर्चों को पूरा करने के लिए कर्ज लेता है।

नेशनल फार्माक्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) इस मुद्दे पर क्या कहती है?

एनपीपीए का कहना है कि निजी अस्पतालों के चिकित्सक जानबूझकर नॉन शेड्यूल्ड महंगी ड्रग्स की सलाह देते हैं जबकि सस्ती दरों पर यह ये दवाएं उपलब्ध होती हैं। 20 अप्रैल को एनपीपीए ने 4 बड़े निजी अस्पतालों की जांच में पाया था कि 69.35 लाख रुपए चार शिकायतकर्ताओं से वसूल गए। इनमें से 17.78 लाख रुपए नॉन शेड्यूल्ड फॉर्मूलेशन से लिए गए जबकि केवल 3 लाख रुपए शेड्यूल्ड फॉर्मूलेशन से वसूल किए गए। शेड्यूल्ड ड्रग्स की सूची सरकार तैयार करती है और ये सस्ती दरों पर उपलब्ध होती है।

क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट (सीईए) का विरोध क्यों हो रहा है?

निजी अस्पताल और डॉक्टर ही इस कानून का विरोध कर रहे हैं। चिकित्सा सेवाओं में अनैतिक गतिविधियों को रोकने में यह बिल मददगार है। निजी अस्पतालों को डर है कि इस कानून से उनकी अवैध और अनैतिक गतिविधियों पर रोक लग जाएगी और उनका लाभ कम हो जाएगा, इसीलिए वे इसका विरोध कर रहे हैं।

यह कानून कब बना था?

2010 में सीईए को नोटिफाई किया गया था। यह कानून सभी तरह के चिकित्सा संस्थानों और दवाओं के लिए है। लेकिन आठ साल में यह कानून लागू नहीं हुआ है।

हरियाणा में इस कानून को लागू करने का क्या परिणाम निकला?

नवंबर 2017 में हरियाणा सरकार इस कानून को लागू करने की तैयारियां कर रही थी लेकिन निजी अस्पतालों और चिकित्सकों के विरोध के चलते सरकार बैकफुट पर चली गई। इंडियन मेडिकल असोसिएशन के हरियाणा चैप्टर ने इसका तीखा विरोध किया। 15 दिसंबर को राज्य के सभी निजी अस्पतालों में सेवाएं ठप कर दी गईं। उनके दबाव के आगे झुकते हुए सरकार ने घोषणा कर दी कि 50 बेड तक के अस्पताल इस कानून के दायरे से बाहर रहेंगे।

सीईए का बाकी राज्यों में क्या हाल है?

इस कानून को 14 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपना चुके हैं। इन राज्यों में असम, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और सिक्किम शामिल हैं लेकिन किसी भी राज्य ने यह कानून लागू नहीं किया है।

कानून के प्रावधान से निजी अस्पताल क्यों डर रहे हैं?

स्वास्थ्य सेवाओं के भ्रष्टाचार पर डिसेंटिंग डायग्नोसिस पुस्तक लिखने वाले अरुण गदरे कहते हैं कि कानून में क्लिनिक या अस्पताल स्थापित करने का न्यूनतम मापदंड है। उदाहरण के लिए इसे स्थापित करने के लिए बैठने का पर्याप्त स्थान, कचरा प्रबंधन के उचित प्रावधान और ऑपरेशन और लेबर रूम स्थापित करने के लिए मापदंड हैं। गड़बड़ी होने पर मरीज अस्पताल की शिकायत कर सकता है जिनके आधार पर कार्रवाई होगी। अस्पतालों के लिए मरीजों का रिकॉर्ड रखना भी अनिवार्य है। इन तमाम वजहों से निजी अस्पताल कानून से बच रहे हैं।

Subscribe to Weekly Newsletter :
We are a voice to you; you have been a support to us. Together we build journalism that is independent, credible and fearless. You can further help us by making a donation. This will mean a lot for our ability to bring you news, perspectives and analysis from the ground so that we can make change together.

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.