Governance

जमीन पर “जंग”

उत्तराखंड में एक तरफ तो गांव के गांव खाली हो रहे हैं तो दूसरी ओर भूमि विवादों की संख्या में तेजी दर्ज की गई है

 
By Anil Ashwani Sharma
Last Updated: Wednesday 26 September 2018
देहरादून
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जमीन से संबंधित संघर्ष तेजी से बढ़ रहे हैं। देहरादून के रायपुर इलाके में एक विवादित भूमि को ईंटों की चारदीवारी से घेरा हुआ है  (अभिनय) उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जमीन से संबंधित संघर्ष तेजी से बढ़ रहे हैं। देहरादून के रायपुर इलाके में एक विवादित भूमि को ईंटों की चारदीवारी से घेरा हुआ है (अभिनय)

उत्तराखंड में जहां-जहां विकास हो रहा है, वहां-वहां भूमि विवाद के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। राज्य के मैदानी इलाकों में ही नहीं अब आश्चर्यजनक ढंग से पर्वतीय इलाकों में भी इस तरह के मामले सामने आने लगे हैं। यह बात उत्तराखंड के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक(लॉ एंड ऑर्डर) अशोक कुमार ने कही। उत्तराखंड में विकास जितनी तेजी से रफ्तार पकड़ रहा है, उतनी ही तेजी से यहां जमीन की कीमतें बढ़ रही हैं और उसी रफ्तार से भूमि को लेकर लड़ाइयां सामने आ रही हैं। कुमाऊं की अपेक्षा गढ़वाल में जमीन की कीमत ज्यादा बढ़ी है, इसलिए यहां जमीन पर “जंग” से जुड़े मामले भी बढ़े हैं। कुमार का कहना है कि अब तक की जांच से यह पता चलता है कि जहां-जहां सड़कें पहुंच रही हैं, वहां-वहां इस प्रकार के मामलों में इजाफा हो रहा है। उनके मुताबिक, खासतौर पर देहरादून, मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार और इनके आसपास के क्षेत्रों में जमीन के लेनदेन से जुड़ी गतिविधियां बढ़ी हैं। भूमि को लेकर आपस में लड़ाई लगातार बढ़ी है। वह कहते हैं,“पहले गढ़वाल में लूट-चोरी-डकैती होती थी, लेकिन अब जमीन की जालसाजी तेजी से हो रही है क्योंकि ये सफेदपोश अपराध है।”

उत्तराखंड के मैदानी और पर्वतीय इलाकों में जमीनी तकरार पिछले एक दशक में लगातार बढ़ीं हैं। गढ़वाल रेंज में इस प्रकार के मामलों की संख्या हर साल बढ़ रही है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए अक्टूबर, 2014 में भूमि धोखाधड़ी के मामलों की जांच के लिए गढ़वाल और कुमाऊं रेंज के लिए अलग-अलग विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया। इस संबंध में गढ़वाल रेंज के पुलिस उप महानिरीक्षक पुष्पक ज्योति का कहना है कि वर्ष 2014 में जमीन को लेकर होने वाली लड़ाइयांे की संख्या में तेजी आई इसलिए इन्हें हल करने के लिए एसआईटी का गठन किया गया। उनका दावा है कि इसके बाद से फिलहाल राज्य में इस तरह की घटनाओं में हलकी गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि वह राज्य के मैदानी हिस्सों में जमीन के मामलों में टकराव की बढ़ती घटना से इनकार नहीं करते। वह कहते हैं कि एसआईटी की जरूरत महसूस हुई क्योंकि पुलिस स्टेशन पर पुलिस महकमा पर्याप्त संसाधनों से सुसज्जित नहीं था। अधिकांश जमीन को लेकर होने वाली लड़ाइयां देहरादून से हैं। हाल के वर्षों में शहर का तेजी से विकास इसका एक कारण हो सकता है।

एसआईटी के गठन के बाद पांच सालों में गढ़वाल व कुमाऊं में कुल 3,070 मामलों के लिए आवेदन प्राप्त हुए। हालांकि इसमें गढ़वाल क्षेत्र के विवाद ज्यादा हैं। यहां कुल 2,822 लोगों ने अपनी विवादित भूमि के हल के लिए एसआईटी को आवेदन किया। वहीं कुमाऊं क्षेत्र में मात्र 248 विवादों के लिए आवेदन किए गए।

एसआईटी ने गढ़वाल क्षेत्र से पिछले पांच सालों में विवादित भूमि के मामलों में कुल 946 लोगों को गिरफ्तार किया है। एसआईटी ने गढ़वाल में विवादित भूमि के मामले अधिक हैं, लेकिन उसका इन मामलों में निस्तारण का प्रतिशत लगभग 90 से अधिक है, वहीं कुमाऊं क्षेत्र में तो यह लगभग 98 प्रतिशत से अधिक है। झगड़े के मामले में एसआईटी ने समझौते भी कराए हैं। जैसे गढ़वल में 434 व कुमाऊं में 35 मामलों में दोनों पक्षों के बीच समझौते कराए। एसआईटी दोनों क्षेत्रों से आए आवेदनों पत्रों पर सीधे कार्रवाई करने के पूर्व उसकी सत्यता की जांच करके ही मामला आगे बढ़ाती है। उदाहरण के लिए गढ़वाल में पिछले पांच सालों में आवेदनों में से एसआईटी ने 236 मामलों को झूठा पाया वहीं कुमाऊं में 13 मामले झूठे पाए गए।

ध्यान रहे कि देहरादून राज्य की राजधानी (9 नवंबर, 2000) घोषित होने के बाद अचानक अचल संपत्ति बहुत महत्वपूर्ण हो गई। एक पूर्व पुलिस अधिकारी कहते हैं कि 2000 के बाद भूमि मूल्य तेजी से बढ़ा। देहरादून और मसूरी में अधिकांश बड़ी भूमि धोखाधड़ी उस भूमि से संबंधित है जो ब्रिटिश काल में यहां के निवासियों की थी। भूमि की देखभाल करने के लिए उनमें से कइयों ने ट्रस्ट बनाए लेकिन जब ट्रस्ट के सदस्यों की मृत्यु हो गई और ट्रस्ट निष्क्रिय हो गया, तब से इन भूखंडों की देखभाल करने के लिए कोई भी नहीं था। निहित स्वार्थी लोगों ने दस्तावेजों में धोखाधड़ी करके अपने स्वामित्व का दावा करना शुरू कर दिया। वे इतनी आसानी से ऐसा कर सकते थे क्योंकि उनका विरोध करने के लिए कोई भी जीवित नहीं था।

देहरादून में 2000 के पहले तक यहां बड़े-बड़े जमींदार थे लेकिन वे कभी अपनी जमीनों के लिए किसी प्रकार की चिंता नहीं करते थे। पिछले दशक में, यहां नकली और जाली वसियत तैयार करना और आसान हो गया है। ऐसे कई जमीन के स्वामित्व वाले लोग हैं जो वर्षों से देहरादून नहीं आए हैं। ऐसी जमीनों पर भूमाफियाओं ने भूखंडों पर कब्जा कर लिया है। इसके अलावा, चूंकि पुरानी भूमि के रिकॉर्ड सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में राजस्व प्राधिकरण से तैयार होते हैं तो लोगों के लिए जाली दस्तावेजों को तैयार करना और आसान हो गया है। कुमाऊं रेंज के आईजी पूरन सिंह रावत का कहना है कि जमीन से जुड़े विवाद के मामलों के लिए कुमाऊं में भी गढ़वाल रेंज की तर्ज पर एसआईटी गठित की गई। जिसके तहत इस समय 21 मामले विचाराधीन हैं। आईजी का कहना है कि गढ़वाल की तुलना में यहां भूमि विवाद कम है, क्योंकि यहां जमीन की कीमतें भी कम हैं।

ऋषिकेश में खसरा नंबर 276 विवादित भूमि है, यहां के  निवासियों का दावा है कि यह  भूमि ग्राम सभा की है (राजेश दिवाकर)

सामाजिक कारण

राज्य में जमीन को लेकर बढ़ते विवादों की एक बड़ी वजह बताते हुए राज्य में जमीन संघर्ष पर अध्ययन करने वाले रघु तिवारी बताते हैं,“इसकी वजह ये नहीं कि लोगों को अपनी जमीन से कोई मोह नहीं है। बल्कि पिछले डेढ़ सौ साल में जो नीतियां रही हैं और आजादी के बाद भी जिन पर अमल किया जाता रहा, उसने जल-जंगल-जमीन से लोगों को अलग किया है।” वे बताते हैं कि वर्ष 1823 में जब पहली बार अंग्रेजों ने लैंड एग्रीमेंट किया था, उसमें लोगों को उनकी कृषि भूमि दे दी गई, शेष जमीन को सरकारी जमीन में बदल दिया गया। जंगल और पानी पर सरकार का नियंत्रण हो गया। इस तरह लोगों की कुदरत के साथ रहने की प्रक्रिया खत्म हुई और इससे सामाजिक परिस्थितिकी प्रभावित हुई।

यह ध्यान देने वाली बात है कि उत्तराखंड में लोगों के पास जमीनें बेहद कम हैं। ज्यादातर किसानों के पास 0.1 हेक्टेअर से कम जमीन है। इससे उनकी आजीविका पूरी नहीं होती। सिर्फ लगाव के चलते वो जमीनें उनके पास है। तिवारी कहते हैं कि इन जमीनों पर कब्जे के लिए अब भू-माफिया पूरे राज्य में सक्रिय हो चुके हैं। पहाड़ के छोटे-छोटे गांवों तक में ऐसा हो रहा है। इसलिये अब पूरे उत्तराखंड में छोटे-बड़े रिजॉर्ट और होटल बहुत तेजी से खड़े हो रहे हैं। उत्तराखंड की इस स्थिति को नैनीताल उच्च न्यायालय में आए मामले से भी समझा जा सकता है। नैनीताल हाईकोर्ट में 1 जून, 2018 को दाखिल किए गए एक एफिडेविट में राज्य के मुख्य सचिव उत्पल सिंह ने बताया कि कार्बेट टाइगर रिजर्व के पास 44 रिसॉर्ट और होटल ऐसे हैं, जिन्होंने सरकारी जमीन का अतिक्रमण किया है। जबकि 30 संपत्ति ऐसी पाईं गईं जिन्होंने राजस्व भूमि से जुड़े नियमों का उल्लंघन किया है, 14 संपत्तियों ने जंगल की जमीन और कोसी नदी के क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। ये मामले वर्ष 2010 से सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित चल रहे हैं।

इसी प्रकार का एक उदाहरण अल्मोड़ा के नैनीसार में जिंदल ग्रुप को दी गई जमीन का भी है। वर्ष 2015 में पूर्व की हरीश रावत सरकार के कार्यकाल में बिना जमीन ट्रांसफर किए जिंदल ग्रुप को कब्जा दे दिया गया। यहां तक कि तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और बीजेपी नेता मनोज तिवारी ने उस जमीन का उद्घाटन भी किया। ऐतराज जताए जाने पर छह महीने बाद वो जमीन आधिकारिक तौर पर जिंदल ग्रुप को ट्रांसफर की गई। ये उदाहरण बताता है कि देवभूमि में जमीनों पर किस तरह कब्जा हो रहा है।

देहरादून की वरिष्ठ अधिवक्ता अनुपमा ने बताया कि मई, 2018 में उत्तराखंड राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि प्रबंधन अधिनियम, 1950 में संशोधन किया है। राज्य सरकार ने उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश) जमींदारी उन्मूलन अधिनियम में धारा-154 (3,4,5), 129(ब), 152(अ) को शामिल किया है। इसमें यह स्पष्ट किया गया कि 12 सितंबर, 2003 तक जिन लोगों के पास राज्य में जमीन हैं, वे 12.5 एकड़ तक जमीन खरीद सकते। मगर जिनके पास जमीन नहीं है, वह इस तिथि के बाद 250 वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन नहीं खरीद सकते हैं। इससे ज्यादा जमीन खरीदने के लिए राज्य सरकार से इजाजत लेने का प्रावधान किया गया है। वर्ष 2003 या उससे पूर्व जिन्होंने भी राज्य में संपत्ति अर्जित की है, वे अपनी संपत्ति परिवार में ही जैसे पति-पत्नी, बेटे-बेटी, भाई-बहन, सौतेले भाई-बहन, तलाकशुदा बहन को बेच सकते हैं, परिवार से बाहर नहीं। वह बताती हैं कि ये कानून कृषि योग्य भूमि पर लागू है। हालांकि राज्य के बाहर के लोगों ने उत्तराखंड में निवेश की खातिर नया तरीका ढूंढ़ निकाला है। जमीन मूल व्यक्ति के नाम पर ही होती है। वे जमीन के स्वामी से डेवलपर के तौर पर अनुबंध करते हैं। जमीन को विकसित करते हैं। अपने प्रोजेक्ट चलाते हैं। जमीन का स्वामित्व राज्य के व्यक्ति के पास ही होता है।

बड़ी संख्या में पलायन के बाद उत्तराखंड में चकबंदी विधेयक जून, 2016 को विधान सभा में पारित कर दिया गया लेकिन इसे अनिवार्य नहीं किया गया है बल्कि स्वैच्छिक तौर है। इसके अलावा इसके माध्यम से सरकारी सोच है कि आगामी 2022 तक पलायन कर गए लोग वापस अपने जमीन की ओर लौटेंगे। हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि आने वाले समय में राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में भी जमीन विवाद और बढ़ेंगे। क्योंकि कुमाऊ और नेपाल के बीच काली नदी पर बनने वाले बांध के कैच मैंट एरिया के कारण लगभग डेढ़ सौ गांवों की जमीन डूब में आएगी और इसके बनने से स्थानीय लोग इसलिए डरे हुए हैं कि इस तरह के निर्माण से एक बार फिर से जमीन को लेकर संघर्ष तेज होगा।

राज्य महिला सामाख्या की निदेशक रह चुकीं गीता गैरोला बताती हैं कि गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ बेल्ट के पूरे रूट की भूमि को लेकर झगड़े दिन प्रतिदन बढ़ते जा रहे हैं। देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर में जमीन के दाम आसमान छू रहे हैं। इसलिए वहां जमीन का बंटवारा है।

लोग अपना हिस्सा नहीं छोड़ते। इसलिए आज, हरिद्वार, उधम सिंह नगर और देहरादून जिलों में समृद्ध का औसत 1,22,900 रुपए प्रतिवर्ष है जबकि पहाड़ी जिलों में प्रति व्यकित की वार्षिक आय 59,791 रुपए है।

स्रोत: एसआईटी कुमाऊं-गढ़वाल द्वारा २०१४-२०१8 के बीच उपलब्ध कराए गए आंकड़े

खाली होते गांव

आखिर क्या वहज है कि एक तरफ तो उत्तराखंड में भुतहा होते गांवों की संख्या बढ़ रही है और दूसरी तरफ जमीनों के झगड़े भी बढ़ रहे हैं। इस संबंध में देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ठ कहते हैं कि राज्य में जमीन से जुड़े संघर्षों को विश्लेषण करें तो इस तरह के मामले उन क्षेत्रों में अधिक हैं, जहां सड़कें पहुंच चुकी हैं या जिन क्षेत्रों के निकट भविष्य में पर्यटन सर्किट के रूप में उभरने की संभावना है। आमतौर इन झगड़ों को मुआवजे के लालच के रूप में देखा जा रहा है। जहां तक खाली होते गांव की बात है तो ये राज्य के दूर-दराज इलाकों में बसे गांव का हाल है, न कि मैदानी इलाकों में बसे गांवों का। राज्य के जन आंदोलन से जुड़े पुरुषोत्तम असनोड़ा कहते हैं कि जमीन संबंधी झगड़ों के बढ़ने की मुख्य वजह मुआवजे का लालच ही है। नैनीताल के सामाजिक कार्यकर्ता राजीव लोचन शाह कहते हैं कि कुछ सालों से सरकार ग्रामीण पर्यटन की बातें कर रही है। सरकार के इस प्रचार के बाद गांव छोड़ चुके लोगों को लगता है कि यदि उनका गांव भी ग्रामीण पर्यटन के दायरे में आया तो आर्थिक लाभ हो सकता है। ऐसे में वे फिर से गांवों के चक्कर लगाने लगे हैं।

जाहिर है कई लोगों की जमीन पर दूसरे लोग काबिज हो गए हैं, ऐसे में झगड़े बढ़ने ही हैं। गोपेश्वर के क्रांति भट्ट बढ़ते झगड़ों की एक वजह प्राचीन परम्पराओं को त्याग कर देना मानते हैं। पहाड़ों में प्रचीन काल से जमीन का बंटवारा होने पर सीमांकन के रूप में खेत के बीच में एक बड़ा पत्थर गाड़ दिया जाता है। इसे पहाड़ों में ओडा या जूला कहा जाता है। पहाड़ों में ओडा पत्थर को देवतुल्य मानने की परम्परा है। एक बार ओडा गाढ़ दिए जाने के बाद इसे खिसकाने की बात सोचना भी पाप माना जाता था, लेकिन ग्रामीणों ने उन प्राचीन परम्पराओं को मानने से इनकार कर दिया है। देवतुल्य माना जाने वाला ओडा अब सिर्फ एक पत्थर है और इंच-इंच जमीन के लालच में लोग अक्सर ओडा खिसकाने से बाज नहीं आ रहे हैं। उनका कहना है कि अपनी एक इंच जमीन भी न छोड़ने की सैन्य परम्परा भी पहाड़ में गहरी पैठ चुकी है। यहां के लोग देश की ही नहीं अपनी निजी सरहद पर भी एक इंच जमीन तक छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते।

देहरादून में वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत का मानना है कि पहाड़ों में बंजर पड़ी जमीन को अब नेपाली नागरिक आबाद कर रहे हैं। इन खेतों पर कड़ी मेहनत करके वे अच्छी पैदावार भी ले रहे हैं। कुछ दिन के लिए गांव आने वाले लोग इन खेतों में लहलहाती फसल देखते हैं तो उन्हें लालच आ जाता है। हालांकि दूसरी ओर उत्तराखंड से दिल्ली आ बसे उमाकांत लखेडा भुतहा गांव की बात का कारण राजनीति बताते हैं। वह बताते हैं,”जानबूझ कर राजनीतिक स्तर पर राज्य में गांव के गांव भुतहा घोषित कर उस गांव की जमीन पर अपनी पैठ बनाने की एक सोची समझी साजिश है। यह सौ फीसदी सही है कि रोजगार के लिए उत्तराखंड में तेजी से पलायन हो रहा है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं और सरकारी तौर पर भुतहा घोषित किए जा रहे हैं। लोगों ने अपनी जमीनें बेची नहीं, बस छोड़ दीं हैं। लड़ाई के मुआवजे पर टिकी है।”

दिल्ली में उगे कंक्रीट के जंगल का दायरा उत्तराखंड की ओर भी तेजी से सरक रहा है। जिसने यहां जमीनी विवादों को और तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वक्त रहते यदि इसे पर रोक नहीं लगाई गई तो भविष्य में उत्तराखंड में जमीनी विवाद और बढ़ने से इंनकार नहीं किया जा सकता।

(साथ में देहरादून से वर्षा सिंह)

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