Governance

भारतनेट परियोजना ने आधा लक्ष्य भी प्राप्त नहीं किया

एक लाख गांवों को ब्रॉडबैंड कनेक्शन से जोड़ दिया गया और मार्च 2019 तक देश के 2.50 लाख ग्राम पंचायतों में इंटरनेट सेवा शुरू हो जाएगी

 
By Anil Ashwani Sharma
Last Updated: Wednesday 20 March 2019

तारिक अजीज / सीएसई

देश की राजधानी दिल्ली में सरकार योजनाएं बनाती हैं, उस पर अमल किस तरह होता है, इसका अंदाजा राजधानी से मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव भतोला (हरियाणा) को देखकर लगाया जा सकता है। 25 अक्टूबर, 2011 को तत्कालीन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल फैसला लेता है कि दो साल के भीतर देश की सभी ग्राम पंचायतों को इंटरनेट सेवा पहुंचाने के लिए ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछा कर ब्रॉडबैंड सेवा से जोड़ा जाएगा। दो साल तो नहीं, लेकिन चार साल बाद अगस्त, 2015 में हरियाणा के उसी भतोला गांव के सरकारी स्कूल की छत पर सोलर पैनल लगाया गया और दो-तीन उपकरण भी रख दिए गए, लेकिन अब तक यहां इंटरनेट सेवा शुरू नहीं हो पाई। भतोला ही जैसा हाल लगभग 10 किलोमीटर दूर गांव बहादुरपुर का है। यहां भी 28 माह पहले ब्रॉडबैंड कनेक्शन पहुंच गया था, लेकिन अब तक सेवा शुरू नहीं हुई। सरकार का दावा है कि पहले चरण के तहत एक लाख गांवों को ब्रॉडबैंड कनेक्शन से जोड़ दिया गया और मार्च 2019 तक देश के सभी 2.50 लाख ग्राम पंचायतों में इंटरनेट सेवा शुरू हो जाएगी।

भारतनेट परियोजना, जिसे पहले राष्ट्रीय ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क (एनओएफएन) कहा जाता था, ने 2011 में कैबिनेट की मंजूरी प्राप्त की थी। अड़चनों के चलते यह योजना अधर में लटक गई और यूपीए सरकार ने सितंबर 2015 तक स्थगित कर दिया। साल 2014 में सरकार बदली और एनडीए सरकार ने परियोजना की स्थिति की फिर से जांच की और इसे भारतनेट के नाम से शुरू करने का फैसला लिया। मंत्रिमंडल ने 19 जुलाई, 2017 को इस पूरी परियोजना के लिए 42,068 करोड़ रुपए की मंजूरी दी थी। पहले चरण के लिए लगभग 11,500 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा, यह पूरा हो चुका है और दूसरे चरण पर तेजी से काम चल रहा है। भारतनेट परियोजना को विश्व का सबसे बड़ा ग्रामीण ब्रॉडबैंड संपर्क का कार्यक्रम बताया गया।

दरअसल, इस लक्ष्य को हासिल करने की दौड़ में सरकार पीछे छूटती जा रही है। देर से ही सही, लेकिन इस बात का अहसास दूरसंचार मंत्रालय को हो गया है। यही वजह है दिसंबर, 2018 के अंत में दूरसंचार सचिव अरुणा सुंदरराजन ने भारतनेट परियोजना के तहत गैर-कार्यकारी ब्रॉडबैंड उपकरणों को ठीक करने में असफल रहने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए। उनके पास शिकायत पहुंची थी कि 50 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में ब्रॉडबैंड उपकरण ठप हैं। 4 जनवरी, 2019 को राज्य सभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा ने बताया कि भारतनेट परियोजना के तहत 1,16,618 ग्राम पंचायतों में वाईफाई सेवा तैयार है। इनमें उत्तर प्रदेश की 27,964 पंचायतें भी शामिल हैं, जिनके बारे में दूरसंचार सचिव पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कह चुकी हैं कि उत्तर प्रदेश में केवल 151 गांवों में ही ब्रॉडबैंड सेवा उपलब्ध है।

दिल्ली से ही सटे गांवों में भारतनेट परियोजना के पहले चरण का कोई फायदा नहीं दिख रहा। बल्लभगढ़ के गांव सागरपुर में अपना इंटरनेट कैफे चला रहे जिले सिंह बताते हैं कि कई बार बीएसएनएल से ब्रॉडबैंड कनेक्शन के लिए कहा, लेकिन वे टाल देते हैं। इसलिए वह बीएसएनएल के डोंगल से सेंटर चला रहे हैं। बहादुरपुर के पूर्व सरपंच रविंद्र बांकुरा कहते हैं कि गांव में 8 जगह वाई-फाई कनेक्शन दिए गए, लेकिन वे एक दिन भी नहीं चले। सरकार का दावा है कि ग्रामीणों को सस्ती दर पर इंटरनेट सेवा देना भारतनेट परियोजना का मकसद है, लेकिन सिंह कहते हैं कि प्राइवेट कंपनियां जितना सस्ता इंटरनेट दे रही हैं, उतना बीएसएनएल दे ही नहीं सकता, इसलिए सरकार चाहे भी तो लोग ये कनेक्शन नहीं लेंगे। दरअसल, इस परियोजना की सबसे बड़ी दिक्कत आखिरी छोर तक कनेक्टविटी पहुंचाने की है। टेलीकॉम इंजीनियरिंग सेक्टर के डायरेक्टर अब्दुल कयूम ने पिछले वर्ष भारतनेट परियोजना पर एक अध्ययन रिपोर्ट जारी की, जिसमें कहा गया परियोजना की शुरुआत में 59 ग्राम पंचायतों में पायलट परियोजना शुरू की, इसमें दिक्कत थी कि अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी कैसे रखी जाए। रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना का पहला चरण खत्म हो चुका है और दूसरे पर तेजी से काम किया जा रहा है, लेकिन अब तक अंतिम छोर तक कनेक्टविटी का हल नहीं ढूंढ़ा जा सका है।

स्त्रोत : 4 जनवरी, 2019 को राज्यसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्र सरकार के उत्तर पर पर आधारित

भारतनेट परियोजना पर नजर रख रही संस्था डिजिटल इम्पावरमेंट फाउंडेशन की रीतू श्रीवास्तव ने बताया, इस परियोजना की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसमें यह नहीं बताया गया है कि अंतिम छोर तक कनेक्टविटी किसे कहा जाएगा। सरकार का पूरा ध्यान ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाने तक सीमित है। बीएसएनएल के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि परियोजना 7-8 साल पहले तक ठीक थी, क्योंकि तब लोगों को इंटरनेट का नहीं पता था। घर-घर तक स्मार्टफोन नहीं पहुंचे थे, लेकिन अब इस पर बेकार पैसा खर्च किया जा रहा। वह कहते हैं, ऑप्टिकल फाइबर केबल के रखरखाव में दिक्कत आती है। एक बार केबल कटी तो ब्रॉडबैंड की स्पीड कम होती जाएगी। इसकी बजाय यदि माइक्रोवेव तकनीक या वायरलेस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता तो ज्यादा ठीक था। बीएसएनएल कर्मचारी यूनियन, हरियाणा के वरिष्ठ पदाधिकारी एलएल निर्वाल भी उनकी इस बात से सहमत दिखते हैं।

वह बताते हैं कि नियमानुसार ऑप्टिकल फाइबर केबल को जमीन के 6 फुट नीचे बिछाया जाना चाहिए, लेकिन हरियाणा में केबल बिछाने में काफी अनियमितताएं बरती गईं, जिसकी शिकायत भी हुई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। यही वजह है कि कई जगह केबल कट चुकी है। 31 दिसंबर, 2018 को संसद में यह मामला उठा। राज्यसभा सांसद राम विचार नेताम ने सरकार से पूछा कि क्या छत्तीसगढ़ में सभी ग्राम पंचायतों को कम्प्यूटरीकृत किया जा चुका है तो पंचायत राज्य मंत्री ने जवाब दिया कि छतीसगढ़ में 10,978 गांवों में से 5,492 ग्राम पंचायतों में कम्प्यूटर नहीं हैं। सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय स्थायी समिति 2018 की रिपोर्ट में कहा गया, “परियोजना के हर पहलू पर कमियों को नोट किया गया, जैसे कि योजना, कुशल श्रम, राज्यों की गैर-भागीदारी, परियोजना व्यवहार्यता के मूल्यांकन की कमी आदि।” इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतनेट परियोजना आगे चल कर कितना फायदेमंद साबित होगी।

(साथ में राजू सजवान)

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