जीवंत लड़ाई

अगर आपको किसी ऐसी जगह पर रहना पड़े जो देश के गिने चुने अधिकतम सूखे क्षेत्र में आता हो, तो आप किस तरह के जीवन की कल्पना करेंगे

 
By Karnika Bahuguna
Last Updated: Friday 12 May 2017 | 04:57:40 AM

राज कुमार सिंह / सीएसई

थार रेगिस्तान के बीचोंबीच खड़ी मैं पसोपेश में हूं कि क्या बयान करना अधिक मुश्किल हैÐतपती धूप में छांव के लिए मौजूद गिने-चुने पेड़ों के सहारे फिसलते रेत पर चलना या फिर मेरे मूर्खतापूर्ण प्रश्नों के जवाब में ग्रामीण महिलाओं का मेरा मजाक उड़ाना। इस गांव का नाम है खदेरो की धानी जो जैसलमेर जिले में पड़ता है। पूरे राजस्थान में सबसे कम वर्षा इसी जिले में होती है।

“क्या आपलोग रोज बेरी के कई चक्कर लगाने से थक नहीं जाते?” मैंने 75 साल की नकता देवी से पूछा, जो पानी के एकमात्र स्रोत से बार-बार बाल्टी में पानी निकाल रही थीं। गांव से एक किलोमीटर दूर, यह बेरी पारंपरिक कुएं जैसा ही है, जिसमें बारिश का पानी जमा होता है। इसका ऊपरी सिरा थोड़ा पतला होता है।

“हां, सुबह से यह मेरा सातवां चक्कर है। लेकिन इससे बचने का कोई और तरीका भी तो नहीं। जीने के लिए पानी तो चाहिए ही। एक जानवर को भी प्यास बुझाने के लिए पानी की जरूरत पड़ती है,” बगल में बने पत्थर के आकार जैसे बर्तन में पानी उड़ेलती हुए नकता कहती हैं। लेकिन उनकी आवाज में दुःख से अधिक मस्ती का पुट है।


बेरी के इर्द-गिर्द खड़ी गायों और बकरियों के झुंड में हलचल होती है और कुछ ही पल में ये पूरा पानी पी जाते हैं। अभी दिन के ग्यारह बजे हैं और सूरज मेरे सिर के ठीक ऊपर पहुंच चुका है। गांव में अंदर जाने के लिए एक कच्ची सड़क है लेकिन उस रास्ते पर गाड़ी नहीं जा सकती। इसलिए मुझे कुछ दूर पहले ही उतरकर पैदल चलना पड़ा। इस चिलचिलाती धूप में कुछ ही दूर चलने पर मेरा गला सूख गया था। मैंने नकता से पानी मांगकर अपना गला तर किया।

मैं यह जानकार चकित थी कि इस झुंड की मात्र चार गायें ही नकता की हैं। मैंने उनसे पूछ ही लिया कि बाकी के जानवरों के लिए फिर आप इतनी मशक्कत क्यों कर रही हैं। नकता कहती हैं, “यहां ऐसे ही होता है। इस समय में जो भी यहां आता है वो जितने जानवर यहां मौजूद होते हैं, उन सबको पानी पिलाता है।” समुदाय के लोगों के बीच जिस तरह के तालमेल को नकता बता रही थीं वह इस सूखे क्षेत्र में काफी सामान्य बात है।


कुछ ही देर में गांव की अन्य महिलाएं भी आ गईं। सबके पास पानी भरने के लिए बर्तन था। “क्या मर्द भी बेरी पर पानी भरने आते हैं?” मेरे इस प्रश्न को सुनते ही सभी महिलाएं जोर से हंस पड़ीं। अठारह साल की मोनू कंवर, जो एक मां भी है, ने जवाब दियाГनहीं, सिर्फ हमलोग ही आते हैं।”

हमारी गाड़ी के ड्राईवर कानू सिंह जो मुझे स्थानीय मारवाड़ी भाषा समझने में मदद भी कर रहे थे, ने हस्तक्षेप किया। कानू पुरुषों का बचाव करते हुए कहते हैं, “उन्हें काम पर भी जाना पड़ता है। इस क्षेत्र के अधिकतर पुरुष आसपास के गांव या कस्बों में मजदूरी करते हैं।”

मोनू ने धीरे से अपना सर हिलाया, ऐसे कि मेरी नजर उनपर चली गई। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि इस गांव के पुरुष खाली रहने पर भी कभी पानी भरने नहीं आते।

मैं फिर हंसी का पात्र बनी जब मैंने पूछा, “जब वो लोग घर पर होते हैं, तब आपलोग उनसे पानी भरने को क्यों नहीं कहते।” जवाब में तीस वर्षीय उत्साही महिला किसना कंवर कहती हैं, “मेरे पति कहते हैं कि पानी चाहिए तो खुद भरो।” हंसते हुए आगे कहती है कि जब मैं ब्याह कर इस गांव में आई थी तो काफी मोटी थी, पर बार-बार पानी भरने की वजह से सूख गई हूं। ऐसा लगता है कि इस तपाऊ रेगिस्तान ने बस इस गांव का पानी ही सुखाया है। लोगों के चुहलबाजी पर इसका कोई असर नहीं है।


खदेरो की धानी के इर्द-गिर्द पांच बेरी और एक कुआं है। लेकिन सिर्फ इसी बेरी से पानी निकलता है। गर्मी बढ़ने के साथ इसमें भी पानी का स्तर नीचे चला जाएगा। आपलोग मार्च से जून तक चलने वाली इस लंबी गर्मी से कैसे निपटते हैं? इसके जवाब में 55 साल की धूरी देवी कहती हैं, “हमलोग 10-15 दिन नहाते नहीं है और करीब 20 दिन तक कपड़ा नहीं धोते।” मोनू के अनुसार पानी का टैंकर आता है। “चूंकि इसकी लागत 800 रुपये से 1000 रुपये तक आती है तो हमलोग 10 दिन में एक ही बार टैंकर बुलाते हैं। जानवरों को भी पीने के लिए कम पानी देते हैं। गर्मी की वजह से कई जानवर मर चुके हैं।”

इस रेतीले इलाके में जीवन वाकई मुश्किल है। ऐसा लगता है कि गांव वालों का मजाकिया लहजा और सहनशीलता ही वह मूलमंत्र है जिससे ये लोग अपना जीवन आसान बना रहे हैं। युवा जहां पानी की पाईप द्वारा सप्लाई जैसी सुविधा की मांग करते हैं, वहीं बुजुर्ग महिलाएं नकता और सीरिया संतुष्ट हैं कि आजकल उन्हें पानी भरने के लिए महज एक किलोमीटर ही जाना पड़ता है। नकता बताती हैं, “जब हमलोग इस गांव में दुल्हन बनकर आए थे तो पानी लाने के लिए बीस-बीस किलोमीटर दूर जाना पड़ता था।” इनके अनुसार उनके जीवन में यह अंतर करीब तीस साल पहले आया जब गांव के लोगों ने रेत से ढंके इस बेरी को देखा। उनलोगों ने इसकी सफाई की और इसके किनारे पत्थर का चबूतरा बना दिया, ताकि फिरसे यह रेत से भर न जाए। आज इस बेरी से पच्चीस घरों के इस गांव के जीवनयापन में अच्छी-खासी मदद हो जाती है।

यह पूछे जाने पर कि यहां साल में कितने दिन बारिश होती है, गांववाले बताते हैं, “बहुत कम।” इस जिले में पूरे राज्य में सबसे कम 164 मिमी बरसात होती है। देश में सबसे अधिक बारिश मेघालय के मासिनराम में होती है वह भी करीब 11.87 मीटर।

जैसलमेर के रहने वाले जेतु सिंह भाटी कहते हैं, “प्रकृति एक सार्वजनिक वितरण प्रणाली नहीं है।” भाटी एक गैर-लाभकारी संस्था थार इंटीग्रेटेड सोशल डेवलपमेंट सोसाइटी से जुड़े हैं। “संसाधनों के बांटने का तरीका प्रकृति का अपना है और इसमें हमलोग कोई बदलाव नहीं ला सकते। हमें खुद को और अपनी आदतों को इसके हिसाब से ढालना पड़ता है। मैं ग्यारह साल का था जब मैं पहली और आखिरी बार दो बाल्टी पानी से नहाया था। मेरे दादा जी ने मुझे एक थप्पड़ मारा और कहा कि मैं इश्वर की दृष्टि में पापी हूं,” भाटी ने बताया। वे कहते हैं, “इन्ही सारे तरीकों से हमलोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाना पड़ता है। आजकल यह भी लुप्त होता जा रहा है।”

यह चकित करने वाला है कि पानी के प्रति लोगों का नजरिया कैसे बदल जाता है। खासकर तब जब लोग पानी को एक वस्तु या चीज न मानकर प्राकृतिक संसाधन मानते हैं। सुविधा और पैसे के नशे में लोग जल का दुरुपयोग करते हैं जबकि इसकी कमी और कठिनाई में लोग इसका विवेकपूर्ण उपयोग करने लगते हैं।

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