स्वस्थ रखता है खिरनी फल

देवताओं और राजाओं द्वारा यौवन को बरकरार रखने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला यह फल कई विशेषताओं से लबरेज है

 
By Chaitanya Chandan
Last Updated: Tuesday 20 June 2017 | 11:05:29 AM
खिरनी की आइसक्रीम। खिरनी शरीर की दुर्बलता दूर करने के साथ ही कई प्रकार के रोगों के उपचार में भी सहायक है (अभिषेक वैष्णव / सीएसई)
खिरनी की आइसक्रीम। खिरनी शरीर की दुर्बलता दूर करने के साथ ही कई प्रकार के रोगों के उपचार में भी सहायक है (अभिषेक वैष्णव / सीएसई) खिरनी की आइसक्रीम। खिरनी शरीर की दुर्बलता दूर करने के साथ ही कई प्रकार के रोगों के उपचार में भी सहायक है (अभिषेक वैष्णव / सीएसई)

इस बार जब मैं छुट्टियों में अपने घर गया तो बाजार में बिक रहे पीले रंग के एक फल ने बचपन की यादें ताजा कर दीं। दरअसल इस फल को खिरनी के नाम से जाना जाता है और बचपन में दादाजी अक्सर हमारे लिए लेकर आते थे। वर्षों बाद फिर से इस फल को देखकर मैं अपने आपको इसे खरीदकर खाने से रोक नहीं पाया।

खिरनी गर्मी के मौसम में पकने वाला निंबोली के आकार का एक फल है। आजकल यह बाजार में कभी-कभी ही दिखता है। इसे संस्कृत में क्षिरिणी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है क्षीर यानि ऐसा फल जिसमें दूध भरा हो। इसके फलों और पत्तों को तोड़ने पर भी दूध निकलता है। गुणों के आधार पर इसे फलों का राजा माना गया है। प्राचीन काल में इसका सेवन राजाओं द्वारा किया जाता था, इसलिए आयुर्वेद में इसे राजदान, राजफल एवं फलाध्यक्ष आदि नामों से भी जाना जाता है।

सपोटेसी कुल के इस वृक्ष का वानस्पतिक नाम मनिलकरा हेक्सान्द्रा है। खिरनी के पेड़ 3-12 मीटर लंबे होते हैं और मुख्यतः जंगलों में पाए जाते हैं। हालांकि इसके फल स्वादिष्ट होने के कारण इसे ऊष्णकटिबंधीय  क्षेत्रों में उगाया जाने लगा। खिरनी का पेड़ भारत में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि जगहों पर पाया जाता है। खिरनी के पेड़ भारत के अलावा चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम में भी पाए जाते हैं।

खिरनी के पेड़ों पर सितंबर से दिसंबर के महीनों में फूल लगते हैं और अप्रैल से जून के महीने में फल पकते हैं। बारिश आने पर इसके फलों में कीड़े लगने लगते हैं। खिरनी के पेड़ की लकड़ी बहुत मजबूत और चिकनी होती है। यदि किसी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाया जाए, तो खिरनी के पेड़ एक हजार साल तक जीवित रहते हैं।

इसके विशाल पेड़ों को मध्य प्रदेश के मांडू क्षेत्रों में बहुतायत में देखा जा सकता है। मांडू को  राजाओं का स्थान माना जाता है। आजकल इसके बीजों को उगाकर जब वह दो से ढाई फुट का हो जाए तब उसे काटकर उसमे चीकू की कलम प्रत्यारोपित की जा रही है, जिससे बहुत स्वादिष्ट चीकू का फल उत्पन्न होता है।

खिरनी का फल मीठा होता है और बड़े शहरों में यह ऊंचे दामों पर बिकता है। इसके पत्तों का इस्तेमाल मवेशियों के लिए चारे के रूप में किया जाता है। खिरनी के पेड़ की छाल से निकालने वाले गोंद का इस्तेमाल चमड़े की सफाई के लिए किया जाता है। इसके छाल का इस्तेमाल शराब बनाने के लिए किया जाता है और छाल का काढ़ा ज्वर नाशक होता है। इसके पके फलों को सुखाने पर वे ड्राईफ्रूट का अच्छा विकल्प हो सकते हैं।

खिरनी का इस्तेमाल आयुर्वेदिक और ज्योतिषीय उपचार के लिए भी किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार इसके फल शरीर में शीतलता लाते हैं, यह मधुर स्निग्ध एवं पचने में भारी होता है। यह फल शरीर को मोटा करने वाले होते हैं, अतः दुबले लोगों के लिए हितकारी है। चरक चिकित्सा के माषपर्णभृतीयं अध्याय में खिरनी को जीवनीय की श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ होता है जीवन देने वाला। ज्योतिष शास्त्र में खिरनी के जड़ को चंद्रमा के प्रतीक रत्न मोती के स्थान पर धारण किए जाने की सलाह दी गई है।



खिरनी के बीजों से पीले रंग का तेल निकलता है। इसका इस्तेमाल खाद्य तेल के रूप में किया जाता है। खिरनी का तेल औषधीय गुणों से भरपूर है। जर्नल ऑफ एथनोफार्माकॉलोजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार देवताओं द्वारा सम्मानित, हमेशा सत्य बोलने वाले और दैवीय वैद्य अश्विनी कुमारों ने एक ऐसे स्वास्थ्यवर्धक तेल का निर्माण किया था, जो किसी भी रोग से लड़ने में सक्षम था। इस तेल का नाम उन्होंने “अमृत तैल” रखा। इस तेल का इस्तेमाल उस जमाने में राजाओं द्वारा किया जाता था। इस तेल के निर्माण में अन्य औषधियों/वनस्पतियों के
साथ ही खिरनी के बीज के तेल का भी इस्तेमाल किया गया था।

माया सभ्यता के दौरान भारत, मेक्सिको  क्षेत्रों और मध्य अमेरिका के लोग परम्परागत रूप से खिरनी से निकलने वाले गोंद का इस्तेमाल च्यूइंग गम के तौर पर करते थे। जिस समय पूर्व-कोलंबियाई एजटेक सभ्यता अपनी बुलंदी पर थी, एजटेक वेश्याएं अपने व्यापार के प्रचार के लिए खिरनी के गोंद से बनी च्यूइंग गम को जोर से काटती थी, जिससे कि ग्राहक उनकी तरफ आकर्षित हो सकें।

औषधीय गुण

मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भील, भिलाला और पटाया आदिवासी समुदाय खिरनी के पेड़ का औषधीय इस्तेमाल पारंपरिक रूप से करते आए हैं।  ये आदिवासी समुदाय शरीर के दर्द का इलाज करने के लिए खिरनी की छाल को उबालकर उस पानी से नहाते हैं। खिरनी के औषधीय गुणों की पुष्टि वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी होती है।

वर्ष 2000 में मेडिसिनल प्लांट्स नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार खिरनी एक औषधि के तौर पर पीलिया, बुखार, जलन, मसूढ़ों में सूजन, अपच आदि रोगों के उपचार में कारगर है। वर्ष 1985 में एनसायक्लोपीडिया ऑफ इंडियन मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि खिरनी खून को साफ करता है और सूजन, पेट दर्द और खाद्य विषाक्तता को दूर करता है। इंडियन मेडिसिनल प्लांट्स नामक जर्नल में वर्ष 2007 में प्रकाशित शोध के अनुसार खिरनी में अनेक प्रकार के ऐसे तत्व होते हैं जो शरीर की अंदरूनी कई जैविक क्रियाओं को नियंत्रित करने में सक्षम हैं।

व्यंजन : खिरनी की आइसक्रीम
 
सामग्री:
  • खिरनी : 300 ग्राम
  • दूध : 1/2 लीटर
  • क्रीम : 200 ग्राम (1 कप)
  • चीनी : 100 ग्राम
  • कंडेंस्ड मिल्क : 100 मिली
विधि: खिरनी को अच्छी तरह धोकर उसके बीज निकाल दें। अब इसे मिक्सी में पीसकर इसकी प्यूरी बनाकर रख लें। इसके बाद एक बड़े कटोरे में क्रीम, दूध, कंडेंस्ड मिल्क और चीनी का मिश्रण बना लें। अब इस मिश्रण को हैंड मिक्सर से हाई मोड पर 15 मिनट तक फेंटिए। जब मिश्रण फूलकर दोगुना हो जाए तो उसमें खिरनी की तैयार प्यूरी डालकर 10 मिनट के लिए फिर फेंटिए। अब आप देखेंगे कि मिश्रण बिलकुल स्मूथ हो गया है। अब इस मिश्रण को एयरटाइट कंटेनर में डालकर फ्रीजर में 6-8 घंटे के लिए रख दीजिए। लीजिए तैयार है खिरनी की ठंडी-ठंडी आइसक्रीम। जब भी आइसक्रीम खानी हो, कंटेनर को फ्रीजर से बाहर निकालकर 5 मिनट के लिए छोड़ दीजिए। अब एक स्कूप से आइसक्रीम के गोले निकालिए और परोसिए।

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