डीपी हो तो डीपी जैसी

डीपी का मानना था कि हरा रंग देश-द्रोहियों का रंग है। उन्होंने “इमरती अपनाओ-देश बचाओ” का नारा बुलंद किया। 

 
By Sorit Gupto
Last Updated: Thursday 05 October 2017 | 11:00:22 AM

सोरित/सीएसई

कभी उनका भी कुछ नाम हुआ करता था, दया प्रकाश, देवी प्रसाद... या ऐसा ही कुछ। पर जैसे हमारे महान नेता जयप्रकाश नारायण एक दिन रातों रात “जेपी” बन गए थे,  कुछ उसी तर्ज पर वह अचानक “डीपी” बन गए।  

जानकारों का मानना है कि एक दिन अलसुबह उठकर डीपी को महसूस हुआ कि उन्हें “कुछ-कुछ” हो रहा है। एक अजीब सी गुदगुदी, एक सिहरन को उन्होंने अपनी रगों में दौड़ता पाया। दोस्तों के साथ रहते हुए भी वह अकेलेपन का शिकार थे। उनके दोस्तों ने तड़ से उनके इस रोग को पहचान लिया और उन्होंने घोषणा की कि, यह सारे सिम्पटम “कहो न प्यार है” के हैं।  

दरअसल डीपी को अपने देश से प्रेम हो गया था। डीपी अब अपने इस नए अवतार में “देश-प्रेमी” के रूप में मशहूर हो गए। कुछ ही दिनों में उन्हें वह सारे फ़िल्मी गाने जुबानी रट गए जो कभी पाषाण -युग़ीन  विविधभारती में हिट थे और जिनको अब बस पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी के मोहल्ला छाप प्रोग्राम या चुनाव प्रचार के दौरान बजाने की परंपरा थी।  

अब हमारे नव-प्रेमी डीपी कभी किसी मॉल के बाहर व्हाट्सपीय-बच्चों को “हिन्दोस्तान की झांकी” दिखाते पाए जाते तो कभी, मेट्रो-रेल बनाने के चलते काटे गए इलाके के आखिरी पेड़ की सूख चुकी डालों पर किसी “सोने की चिड़िया” को खोजते पाए जाते।  

इसी बीच लोगों ने पाया कि डीपी के इस “हमें-तुमसे प्यार कितना /ये हम नहीं जानते” ने उनके डायेट-हैबिट पर भी गहरा असर छोड़ा है।  उन्होंने घोषणा की,कि , सच्चे देश-प्रेमी को अपने भोजन का चुनाव, उसके स्वाद नहीं बल्कि उसके रंग के आधार पर करना चाहिए क्योंकि हर रंग कुछ कहता है।

उन्होंने सब्जियों में कोहड़ा , मिठाइयों में इमरती और जलेबी को देशप्रेम के समानार्थक कहा। उन्होंने उन सभी फलों और सब्जियों को वर्जित किया जो हरे रंग के थे। उन्होंने घोषणा की , कि हरा रंग “देश-द्रोहियों” का रंग है। उन्होंने “ इमरती अपनाओ-देश बचाओ ” का नारा बुलंद किया। अपनी टेढ़ी-मेढ़ी  लिखावट से उन्होंने मोहल्ले की एक-दो दीवारों पर यह नारा लिखने की कोशिश भी की।  

लोग उन पर हंसते पर डीपी आजकल बहुत खुश थे... पर जाने क्यों कहीं कुछ था जो उनको साल रहा था। वह दुख कुछ ऐसा था मानो किसी ने उनके इस खुशी के महासागर की पेंदी में कोई सुराख कर दिया हो और  जिससे सारा का सारा पानी निकला जा रहा था। आख़िर क्या था उनका गम?

एक दिन अपने  खुशी और दुख के इस “नो-मैन्स-लैंड” में खड़े डीपी ने देखा कि मुहल्ले के धूल-धूसरित पार्क में कुछ बच्चे पौधे लगा रहे थे। इन बच्चों ने टी शर्ट पहनी हुई थी जिस पर “गो-ग्रीन” लिखा हुआ था।  अचानक डीपी के दिमाग की बत्ती जली। वह दौड़ कर पार्क में गए और बच्चों को ललकारते हुए बोले, “ पेड़ लगाना देश द्रोह है!”

एक  बच्चे ने  डरते हुए कहा, “पर हमारी स्कूल की मैडम तो कहती हैं कि हमें हमारे वातावरण को हरा-भरा बनाना चाहिए।”

“गलत पढ़ाती हैं तुम्हारी मैडम!” डीपी गरजे, “मत भूलो कि हर रंग कुछ कहता है और हरा रंग हमारे दुश्मनों का है। कुछ पता भी है कि क्या कहती है हमारी सेन्सस रिपोर्ट? सेन्सस रिपोर्ट कहती है कि हरा रंग बढ़ता ही जा रहा है। जल्द ही वह दिन आएगा जब हमारा रंग अल्पसंख्यक हो जायेगा!”

सारे बच्चे भाग खड़े हुए। उधर डीपी जल्दी से अपने घर गए और एक पेंट के डिब्बे और ब्रश को लेकर पार्क में लौटे। उन्होंने एक नन्हे से पौधे को उठाया और बड़े प्यार से उसकी नन्ही पत्तियों को रंगने लगे।  डीपी  गुनगुनाने लगे , “दुनिया भुला के तुमसे मिला हूं/निकली है दिल से ये दुआ रंग दे तू मोहे गेरुआ।”

उन्होंने अपनी एक सेल्फी भी ले डाली और उसे अपना  डिस्प्ले पिक्चर बना दिया और मन ही मन बोले, “डीपी हो तो डीपी जैसी....”

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