दंतहीन कानून, अंतहीन दर्द

छत्तीसगढ़ में एससी-एसटी कानून में संशोधन से लोग नाराज हैं क्योंकि जबरन जमीन अधिग्रहण के खिलाफ पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने में आनाकानी कर रही है। 

 
By Ishan Kukreti
Last Updated: Tuesday 24 April 2018 | 09:25:48 AM
ग्रामीणों का आरोप है कि टीआरएन एनर्जी छत्तीसगढ़ के कटांगडीह गांव में उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश के बावजूद ऐश पिट साइट पर निर्माण करा रही है (फोटो : ईशान कुकरेती / सीएसई)
ग्रामीणों का आरोप है कि टीआरएन एनर्जी छत्तीसगढ़ के कटांगडीह गांव में उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश के बावजूद ऐश पिट साइट पर निर्माण करा रही है (फोटो : ईशान कुकरेती / सीएसई) ग्रामीणों का आरोप है कि टीआरएन एनर्जी छत्तीसगढ़ के कटांगडीह गांव में उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश के बावजूद ऐश पिट साइट पर निर्माण करा रही है (फोटो : ईशान कुकरेती / सीएसई)

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के घारघोडा ब्लॉक में लगभग सभी चीजें धूल की परत से ढंकी हैं। यहां आदिवासियों के बीच व्यापक तौर पर असंतोष का भाव है। इसकी वजह है दो निजी कंपनियों-टीआरएन एनर्जी लिमिटेड और महावीर एनर्जी कोल बेनिफिफिकेशन लिमिटेड द्वारा जमीन अधिग्रहण। असंतोष विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2016 (पीओए) को लेकर है। इस कानून से उन्हें उम्मीद थी कि कंपनियों पर जीत हासिल करने में मदद मिलेगी।  

14 जून, 2017 को घारघोडा ब्लॉक के 4 गांवों कटांगडीह, खोखारोमा, नवापारा भेंगारी और टेंडा के 98 आदिवासी परिवारों ने पीओए के तहत अपनी जमीन गलत तरीके से हथियाने के लिए निजी कंपनियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। जनजातीय अधिकारों की वकील और आदिवासी मामलों के मंत्रालय की पूर्व कानूनी सलाहकार, शोमोना खन्ना ने कहा, “अतीत में भूमि हथियाने के इतने सारे मामले एक साथ पीओए के तहत कभी दर्ज नहीं किए गए हैं।”

कुल मिलाकर, इन दो कंपनियों ने चार गांवों के लगभग 200 जनजातीय परिवारों को 200 हेक्टेयर क्षेत्र से बेदखल कर दिया है। टीआरएन एनर्जी अपने 600 मेगावाट की कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट के लिए एश पिट बनाने के लिए जमीन का उपयोग कर रही है जबकि महावीर एनर्जी एक बायोमास पावर प्लांट की स्थापना कर रही है।  

शिकायत के आठ महीने बाद भी पुलिस ने अब तक एक भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की है। खन्ना कहती हैं, “इस तथ्य के बावजूद कि जमीन हथियाना संज्ञेय अपराध है और पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ती है और पीओए के तहत पुलिस के लिए साठ दिनों के अंदर चार्जशीट दाखिल करना अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में कुछ नहीं हुआ।” इस देरी का मतलब है कि 2016 पीओए संशोधन का उद्देश्य असफल हो चुका है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय संबंधी स्थायी समिति ने पीओए 1989 में संशोधन की आवश्यकता पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। 19 दिसंबर, 2014 को इस कमेटी ने संसद को बताया था कि ये संशोधन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार एक बड़े स्तर पर जारी हैं। साथ ही, आरोपी के छूटने का दर, सजा मिलने का दर बहुत ही कम है। इस कमेटी ने बताया था कि राज्य और जिला स्तर पर कानून लागू करने वाले निकायों के बीच समन्वय बहुत ही खराब है।  

खन्ना कहती है, “संशोधित अधिनियम ने भूमि के मामलों से निपटने के लिए “गलत” शब्द को परिभाषित किया है। यह एक महत्वपूर्ण संशोधन है, क्योंकि हाशिए पर रहने वाले समुदाय पर ही अपने ऊपर हुए अत्याचार को साबित करने की जिम्मेदारी होती है।”  पुलिस का दावा है कि ये केस पीओए के तहत दर्ज नहीं किए जा सकते है, क्योंकि अधिनियम का इस्तेमाल केवल तभी किया जा सकता है जब एसटी के स्वामित्व वाली भूमि गैर-एसटीस द्वारा गलत तरीके से हथिया ली जाती है। इन सभी मामलों में कंपनियों ने सेल्स डीड (जमीन बिक्री के दस्तावेज) पर एसटी का नाम दे दिया है। डीएसपी, इंचार्ज, वीरेन्द्र शर्मा कहते हैं, “इन मामलों में पीओए के प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते, क्योंकि यह एसटी समुदायों के बीच का मामला है। हमने यही सूचना राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (पीओए को लागू करने वाली नोडल एजेंसी) को भेज दी है।”

रायगढ़ में डीपी चौहान वकील हैं और वह गैर-लाभकारी आदिवासी दलित मजदूर किसान संघर्ष से जुड़े हैं। उन्होंने लोगों को ये केस दर्ज कराने में मदद दी थी। डीपी चौहान के अनुसार, “निजी कंपनियों द्वारा कब्जे वाली जमीन पर विशाल ढांचे बनाए जा रहे हैं, लेकिन पुलिस का मानना ​​है कि एससी/एसटी लोगों के बीच यह भूमि लेनदेन हुआ है।”

वह बताते हैं कि पीओए संशोधन से पहले दर्ज किए गए सिविल मामलों में भी एमपी (छत्तीसगढ़) भूमि राजस्व संहिता के तहत निजी कंपनियों पर मुकदमा चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया, “सिविल मामलों में, अदालत ने एससी/एसटी लोगों, जिनके नाम नए मालिकों के रूप में दिए गए हैं, को 23 जून, 2017 को पेश होने के लिए कहा था, लेकिन कोई नहीं आया।”   

घारघोडा की सब डिविजनल मजिस्ट्रेट निशा नेताम इस बात की पुष्टि करती हैं कि टीआरएन एनर्जी एंड महावीर एनर्जी जैसी कंपनियों के खिलाफ एमपी (छत्तीसगढ़) लैंड रेवेन्यू कोड के तहत 186 मामले दर्ज किए गए हैं। वह आगे बताती हैं कि इन मामलों में कोई प्रगति नहीं हुई है, क्योंकि शिकायतकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए अभी तक सरकारी वकील नियुक्त नहीं किए गए हैं। इस बीच, टीआरएन एनर्जी का कहना है कि उनके खिलाफ भूमि हथियाने के मामलों की कोई जानकारी नहीं है।  

एक बड़ी धोखाधड़ी

एक तरफ जहां प्रशासन कानूनी कमियों की आड़ में निष्क्रिय है, वहीं इन चार गांवों के लोग पीड़ित बने हुए हैं। कटांगड़ी निवासी सिदार कावर अपनी पूरी जमीन टीआरएन एनर्जी के हाथों गंवा चुके हैं। कावर कहते हैं “11 सितंबर 2009 को कंपनी के एजेंट आए और हमें बताया कि सरकार पहले ही हमारी जमीन उन्हें दे चुकी है और अगर हम इसे नहीं बेचते हैं तो कंपनी इसका अधिग्रहण कर लेगी। इसके बाद वे मुझे और दो अन्य स्थानीय लोगों को लेकर टीआरएन एनर्जी के अधिकारी सच्चिदानन्द पटनायक के घर ले गए, जहां हमसे एक सादे कागज पर हस्ताक्षर करवा लिया गया।” कावर आगे बताते हैं कि बिक्री के बाद जो दस्तावेज (सेल डीड) उन्हें दिया गया, उसमें एक ऐसे खरीदार का नाम था, जिससे वे कभी नहीं मिले और उन्हें कोई पैसा भी नहीं मिला। जमीन से बेदखल होने के बाद कावर आज अपने रिश्तेदारों के साथ रहते हैं।  

कटांगड़ी के हरिचरन रथिया का कहना है, “कंपनी के अधिकारियों ने धमकी दी कि अगर हमने अपनी जमीन उन्हें नहीं बेची, तो वे हमें गांव के चारों ओर अधिग्रहीत जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे।” वह कहते हैं कि दबाव में आकर वह कंपनी को अपने 20 हेक्टेयर भूमि में से 2 हेक्टेयर जमीन देने के लिए सहमत हो गए।

रथिया कहते हैं, “जब उनके पास अंतिम रजिस्ट्री के कागज आए तो उसमें लिखा था कि मैंने पूरी 20 हेक्टेयर जमीन को बेच दिया है।” वह कहते हैं कि अंतिम कागजी कार्रवाई के लिए उन्हें भूमि रजिस्ट्रार कार्यालय के बजाय एजेंट के घर बुलाया गया था। वह पूछते हैं कि कुछ रजिस्ट्रियां रविवार को भी हुईं, आखिर ये कैसे संभव है?

पास के भंगेरी गांव की सरपंच पावित्री माझी उत्तेजित हैं। उनके घर के पीछे खाली जमीन थी, जिसे टीआरएन एनर्जी ने हथिया लिया है। माझी कहती है, “कंपनी के एजेंट देर रात हमारे घर आते थे और फिर जाने से इनकार करते थे। कई बार वे लोगों को दारू पिला कर उनके हस्ताक्षर ले लेते थे।” वह कहती हैं कि जब उन्होंने जिला के अधिकारियों से शिकायत करने की कोशिश की तो कंपनी ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी और पुलिस ने प्राथमिकी तक दर्ज करने से इनकार कर दिया।  

माझी कहती हैं कि प्रशासन और कंपनी मिलकर काम कर रहे हैं। माझी ने कहा, “इस वर्ष जनवरी में टीआरएन एनर्जी द्वारा एश पिट निर्माण कार्य पर उच्च न्यायालय से हमें स्टे ऑर्डर मिला था, फिर भी काम निरंतर जारी है।” स्टे ऑर्डर स्पष्ट रूप से निर्माण रोकने की बात करता है, लेकिन नेताम का कहना है कि यह आदेश केवल पेड़ कटाव रोकने के बारे में बात करता है। अगस्त 2017 में यहां के निवासियों ने फौजदारी प्रक्रिया संहिता 156 (3) के तहत एफआईआर दर्ज न करने के लिए, पुलिस के खिलाफ पीओए के तहत एक अलग एफआईआर दर्ज करवाई थी।
 
अपनी जमीन फिर से पाने के लिए किए गए तीन केस के बावजूद, लोग तेजी से विश्वास खो रहे हैं और कंपनियां अपने प्रोजेक्ट पर धड़ल्ले से काम कर रही हैं।

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IEP Resources:

The legal regime and political economy of land rights of Scheduled Tribes in the Scheduled Areas of India

The legal regime and political economy of land rights in the Scheduled Areas of India

The legal face of corporate land grab in Chhattisgarh

Judgement of the Supreme Court of India regarding acquisition of agricultural lands belonging to poor agriculturalists by a housing society, Karnataka, 15/09/2016

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