दो कदम स्वच्छता की ओर

सम्पूर्ण स्वच्छता वाला पहला बड़ा राज्य बन जाने के बाद अब हिमाचल प्रदेश ने साफ़-सफाई बनाए रखने के लिए कचरा प्रबंधन की भी समुचित व्यवस्था कर ली है। लेकिन बड़ी संख्या में पर्यटकों के आवागमन से ये प्रयास पटरी से उतर सकते हैं

 
By Rashmi Verma
Last Updated: Friday 21 April 2017 | 09:40:25 AM
मंडी जिले में एक स्कूल की पानी की टंकी की जांच करतीं महिला मंडल की सदस्य (फोटो: विकास चौधरी)
मंडी जिले में एक स्कूल की पानी की टंकी की जांच करतीं महिला मंडल की सदस्य (फोटो: विकास चौधरी) मंडी जिले में एक स्कूल की पानी की टंकी की जांच करतीं महिला मंडल की सदस्य (फोटो: विकास चौधरी)

एक ऐसे राज्य में जहां 70 प्रतिशत आबादी हिमालय की पहाड़ियों में फैली छोटी-छोटी ढाणियों में निवास करती हो और पांच वर्ष पहले केवल  30 प्रतिशत घरों में शौचालय हो, वहां सम्पूर्ण स्वच्छता हासिल करना आसान नहीं है। लेकिन अक्टूबर 2016 में, केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के तहत खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) होकर हिमाचल प्रदेश न केवल सम्पूर्ण स्वच्छता वाला पहला बड़ा और सिक्किम के बाद दूसरा राज्य बना, बल्कि उसने लक्ष्य से 6 माह पहले ही यह उपलब्धि हासिल कर ली है। और अब प्रदेश पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता।

शिमला जिले के अतिरिक्त जिला उपायुक्त राकेश कुमार प्रजापति कहते हैं, “अब हम खुले में शौच से मुक्त होकर अगली श्रेणी, यानि ओडीएफ प्लस की तरफ बढ़ रहे हैं, जिसमें हम टॉयलेट के कचरे और बाथरूम तथा रसोई के बेकार पानी को री-साइकिल करके फिर से उपयोग में लाते हैं। हम यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि कोई भी टॉयलेट अवरुद्ध और पेयजल के स्रोत दूषित न हों।” इसके लिए जिले के अधिकारियों ने प्रत्येक उपखंड से ग्राम पंचायतों का चयन किया है। इन गांवों को ठोस तथा तरल कचरे के प्रभावी प्रबंधन के मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है।

उदाहरण के लिए, मशोबरा उपखंड की कोटी ग्राम पंचायत में अधिकारियों ने प्रत्येक घर के लिए दो पात्र उपलब्ध कराएं हैं, एक जैविक तरीके से विघटित हो जाने वाले कचरे के लिए और दूसरा विघटित नहीं होने वाले कचरे के लिए। उपखंड विकास अधिकारी कल्याणी गुप्ता कहती हैं, “अलग-अलग संग्रहण के बाद लोग विघटित नहीं होने वाली बेकार चीजों को कबाड़ी को बेच देते हैं। जैविक रूप से विघटित होने वाले कचरे से खाद बनाकर और बेकार पानी को गड्ढे में एकत्रित कर इनका खेतों या बगीचे में उपयोग किया जाता है।”

इस सबके परिणामस्वरूप कोटी और उसके आस-पास के स्थान अब साफ दिखने लगे हैं, क्योंकि अब कोई भी व्यक्ति कचरा इधर-उधर या पहाड़ियों पर नहीं फेंकता। कोटी में आए इस बदलाव ने आस-पड़ोस की 13 दूसरी ग्राम पंचायतों को भी प्रभावित किया है, जहां के निवासियों ने स्वयं ही बेकार पानी और कचरे से खाद बनाने के लिए गड्ढे खोद लिए हैं।

गुप्ता कहती हैं, “शौचालय या सेप्टिक टैंक से ओवरफ्लो की शिकायत मिलते ही उपखंड कार्यालय से तकनीशियन तत्काल ही मौके पर पहुंच जाते हैं और डिजाइन में बदलाव आदि का सुझाव देते हैं। भविष्य में भी सम्पूर्ण स्वच्छता बनी रहे, इसके लिए हम नए परिवारों को उनके घर में शौचालय होने पर ही राशन कार्ड जारी करते हैं।”

अभियान की अगुवा महिलाएं

मंडी, जिसे वर्ष 2016 में केंद्र सरकार द्वारा देशभर में किये गए स्वच्छता सर्वेक्षण में सबसे साफ-सुथरा पहाड़ी जिला घोषित किया गया था, में अधिकारी 50 ग्राम पंचायतों को स्वच्छ ग्राम के रूप में विकसित कर रहे हैं। गैर-लाभकारी संस्था मंडी साक्षरता एवं जन विकास समिति के जिला समन्वयक सेवक सिंह कहते हैं, “जिला प्रशासन के फ्लैगशिप कार्यक्रम, मंडी विकास अभियान के तहत सम्पूर्ण स्वच्छता से लेकर महिला सशक्तिकरण और बालिका शिक्षा सहित जिले के सर्वांगीण विकास के लिए इन ग्राम पंचायतों को विकसित किया जा रहा है।” जिले में साफ-सफाई सुनिश्चित करने की दिशा में यह एक सफल कार्यक्रम है।

वर्तमान में मंडी जिले में लगभग 70,000 सदस्यों वाले 4,490 महिला मंडल हैं, जो गांवों में सफाई सुनिश्चित करने के साथ-साथ लोगों को सम्पूर्ण स्वच्छता और जल संरक्षण का महत्त्व समझाते हैं। सल्वाहन ग्राम पंचायत के चार महिला मंडलों में से एक की मुखिया नीता कुमारी कहती हैं, “सार्वजनिक स्थलों, सड़कों, विद्यालयों और आंगनबाड़ियों में शौचालयों, पानी की टंकियों, परंपरागत जलस्रोतों और नालियों की सफाई और शौचालयों या कचरे के लिए गड्ढों या वर्मी कंपोस्ट के लिए गड्ढों की खुदाई सहित स्वच्छता गतिविधियों के लिए प्रत्येक सदस्य एक सप्ताह में कम से कम दो घंटे का समय देते हैं।” भायरता ग्राम पंचायत के एक महिला मंडल की अध्यक्ष गीता देवी कहती हैं, “अब लोग कचरा फैलाने से पहले दो बार सोचेंगे, क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनके घरवालों में से ही किसी को यह कचरा उठाना होगा।”

बरसाती पानी के निकास के लिए अपने गांव में नाले का निर्माण करतीं भयारता ग्राम पंचायत की महिला मंडल की सदस्य

कोठी ग्राम पंचायत के महिला मंडल ने कचरा प्रबंधन के लिए एक नवाचार भी किया है। ये लोग घरों से पॉलिथीन इकट्ठा करते हैं और उनसे एक शीट तैयार करते हैं, जिसका उपयोग खाद बनाने के गड्ढे में नमी नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। प्लास्टिक कचरे का उपयोग करके कचरा उठाने के लिए बैग तैयार किये जाते हैं, जिन्हें सड़कों के किनारे पेड़ों पर टांग दिया जाता है, ताकि लोग सड़कों पर गंदगी करने से बचें।

मंडी के जिला उपायुक्त संदीप कदम कहते हैं, “स्वच्छता में समुदायों की भागीदारी बढ़ाने के लिए हमने ग्राम पंचायत स्तर पर विकास निधि स्थापित की है, जिसमें घरों की संख्या के हिसाब से 7 से 20 लाख रुपए तक की राशि इकट्ठी हो गई है।” उनका कहना है, “हम गांवों में शौचालय, खाद बनाने, वर्मी कंपोस्ट के गड्ढे या बारिश के पानी के लिए नालियां विकसित करने के लिए इस निधि का प्रयोग करते हैं। हमने महिला मंडलों और ग्राम पंचायतों के लिए कई तरह के वार्षिक अवार्ड भी शुरू किये हैं।” वर्ष 2016 में खद्दर ग्राम पंचायत को स्वच्छ ग्राम घोषित कर 5 लाख रुपए का अवार्ड दिया गया था।
हालांकि अधिकारी तथा स्थानीय लोग आश्वस्त हैं कि वे अक्टूबर 2019 के लिए लक्षित ओडीएफ प्लस का तमगा समय से पहले ही हासिल कर लेंगे, लेकिन हकीकत में पहाड़ी पर्यटन केंद्रों और तीर्थ स्थानों के लिए विख्यात यह प्रदेश पर्यटकों द्वारा खुले में शौच करने और कचरा फैलाने की समस्या से जूझता रहा है।

पर्यटन से खतरा

अकेले शिमला जिले में ही यहां की जनसंख्या से लगभग चार गुना (35 लाख से अधिक) पर्यटक प्रतिवर्ष आते हैं। पर्यटकों की इतनी बड़ी संख्या के लिए पानी और शौचालय जैसी सुविधाओं की सख्त जरूरत है। हालांकि राज्य सरकार ज्यादा से ज्यादा सामुदायिक शौचालय स्थापित कर इस मांग को पूरा करने का प्रयास कर रही है, फिर भी यह नाकाफी लगता है। शिमला शहर में माल रोड के एक बड़े प्रवेश स्थल पर सामुदायिक शौचालय की देखरेख करने वाले राजेश शर्मा कहते हैं, “यहां छह शौचालय हैं, लेकिन पानी का नल केवल एक है और उसमें पानी है ही नहीं। इसके परिणामस्वरूप ये शौचालय हमेशा अवरुद्ध रहते हैं।” कुफरी पर्यटन केंद्र से लगभग 10 किलोमीटर दूर मशोबरा उपखंड में पर्यटकों द्वारा खुले में शौच करने और कचरा फैलाने की समस्या अत्यंत गंभीर है।

अतिरिक्त जिला उपायुक्त प्रजापति कहते हैं कि शिमला में राष्ट्रीय राजमार्गों पर 26 सामुदायिक शौचालय बनाए गए हैं तथा 15 और शौचालय बनाने की योजना है। वह कहते हैं, “पर्यटकों की जरूरत पूरी करने के लिए और शौचालय बनने चाहिए।” लोगों का मानना है कि नवंबर से जून तक पर्यटन सीजन में शौचालय बमुश्किल ही काम करते हैं। क्योंकि राजमार्गों के दोनों ओर वन विभाग की जमीन है, जिला प्रशासन ने उठाऊ शौचालय या ई-टॉयलेट बनाए हैं। इनका प्रतिदिन 30-35 लोग उपयोग कर सकते हैं।

कोलकाता की गैर-लाभकारी संस्था कम्युनिटी-लेड टोटल सैनिटेशन फाउंडेशन के निदेशक कमल कार कहते हैं, “पर्यटन केंद्रों, राष्ट्रीय या राज्य राजमार्गों आदि के पास बसे गांवों में हालत बहुत खराब है। यहां बड़े पैमाने पर पर्यटकों का आवागमन होता है, लेकिन सामुदायिक शौचालय तथा कचरा प्रबंधन व्यवस्था नहीं है।” वह कहते हैं, “पर्यटन राज्य सरकार के राजस्व का बड़ा स्रोत है। इसलिए स्थानीय प्रशासन को पर्यटकों की सुविधा के लिए स्वच्छता और पानी की जरूरतें पूरी करनी ही चाहिए।”

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