परिवर्तन की गणना

एट्रीब्यूशन स्टडीज के जरिए पता लगाया जाता है कि जलवायु परिवर्तन मौसम की चरम घटनाओं जैसे चेन्नई की बारिश के लिए किस हद तक जिम्मेदार है।

 
By Rakesh Kalshian
Last Updated: Tuesday 05 September 2017

सोरित / सीएसई

साल 2015 में चेन्नई में आई बारिश ने पिछली शताब्दी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इस बारिश में शहर कई दिन तक डूबा रहा। लोग हैरत में थे कि ये बादलों को अचानक क्या हुआ? भारत के मौसम विज्ञान विभाग के अधिकारियों को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था। वे इस बारिश के लिए विभिन्न कारणों का हवाला दे रहे थे। बहुत से लोग ऐसे भी थे जो शर्तिया यह कहने को तैयार थे कि यह घटना जलवायु परिवर्तन की वजह से हुई है।

इसके बाद वातावरण में जो कुछ हुआ वह बादलों की अबूझ पहेली में उलझकर रह गया। जलवायु वैज्ञानिकों ने तूफान, बाढ़ और सूखे जैसी चरम घटनाओं को जलवायु  परिवर्तन से जोड़कर देखा। हालांकि बहुत से ऐसे भी हैं जो अब भी मूकदर्शक ही बने हुए हैं। जलवायु परिवर्तन की गणना अब तक जलवायु प्रारूपों के भरोसे रही है जो सुपर कंप्यूटर पर आधारित हैं। इसकी गणना के लिए काफी ज्यादा और परिष्कृत आंकड़ों की जरूरत होती है। इसे देखते हुए वैज्ञानिक अब दूसरे विकल्पों पर गौर करने लगे हैं।

ऐसा ही एक विकल्प है एट्रीब्यूशन स्टडीज। इसके जरिए पता लगाया जाता है कि जलवायु परिवर्तन मौसम की चरम घटनाओं जैसे चेन्नई की बारिश के लिए किस हद तक जिम्मेदार है। आमतौर पर ऐसे विश्लेषणों में निष्कर्ष तक पहुंचने में महीनों लग जाते हैं। कंप्यूटर के बेहिसाब मौसम के आंकड़ों की पड़ताल के बाद किसी नतीजे पर पहुंचा जाता है। लेकिन अमेरिका के प्रिंसटाउन में स्थित जलवायु परिवर्तन पर शोध करने वाले वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन (डब्ल्यूडब्ल्यूए) ने इस मामले में काफी तेजी दिखाई है। इसने दो हफ्तों से कम समय में बता दिया कि पिछले साल फ्रांस में आई बाढ़ जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा थी।

शोध की प्रक्रिया में दो तरह के भविष्य की कल्पना की गई। एक जलवायु परिवर्तन के साथ और दूसरी जलवायु परिवर्तन के बिना। इस आधार पर वैज्ञानिक मौसम की चरम घटनाओं का अध्ययन कर सकते हैं।

जलवायु वैज्ञानिक सालों से दावा कर रहे हैं कि धरती के गर्म होने से गर्म हवा और तूफान जैसी मौसम की चरम घटनाओं में इजाफा होगा लेकिन किसी खास घटना के लिए महज जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराना आसान नहीं है। मौसम का अपना एक प्राकृतिक चक्र होता है। जलवायु परिवर्तन इसका एक पहलू भर है। बहुत सी घटनाओं का अध्ययन भी मुश्किल होता है क्योंकि जरूरी आंकड़े दुनिया के बहुत से हिस्सों में या तो उपलब्ध नहीं होते, या पहुंच के बाहर होते हैं। कुछ घटनाओं जैसे 2005 में हुई मुंबई की बारिश को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर नहीं देखा जा सकता क्योंकि हम अब भी बादलों की कार्यप्रणाली को समझ नहीं सके हैं।

इन सब कारणों से एट्रीब्यूशन स्टडीज में चरम घटनाओं के सूक्ष्म अध्ययन की जरूरत होती है। लू चलने को आमतौर पर जलवायु परिवर्तन से जोड़ दिया जाता है लेकिन विश्लेषण में अक्सर इसकी पुष्टि नहीं हो पाती। उदाहरण के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूए ने पिछले साल भारत की लू का अध्ययन किया। दावे के साथ नहीं कहा जा सकता था कि इसके लिए जलवायु परिवर्तन उत्तरदायी है। आंकड़ों ने साबित कर दिया कि तापमान में असामान्य वृद्धि तो हुई है लेकिन यह खतरे से ऊपर नहीं गया। दूरदर्शी वैज्ञानिकों ने पाया कि यह ग्रीनहाउस का प्रभाव है।

तमाम दिक्कतों के बावजूद एट्रीब्यूशन स्टडीज 2004 में पहले अध्ययन के बाद से लोकप्रिय हो रही है। पिछले साल अमेरिकन मेट्रिओलॉजिकल सोसाइटी ने दुनियाभर में 28 घटनाओं के 32 अध्ययनों की सूची बनाई है।

एट्रीब्यूशन स्टडीज वैज्ञानिकों के उस दावे को बल देती है जो जलवायु परिवर्तन को स्पष्ट और वर्तमान खतरा मानते हैं। यह सिर्फ भविष्य का खतरा नहीं है। ये स्टडी उन लोगों को भी जलवायु परिवर्तन की सच्चाई से रूबरू कराने का प्रयास करती है जिनका इस पर भरोसा नहीं है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता फ्रेडरिक ओट्टो ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि कुछ न कहने के बजाय इस समय जो हो रहा है उसका वैज्ञानिक प्रमाण देना जरूरी है। इस समय आधी दुनिया जलवायु परिवर्तन से अनभिज्ञ है। ऐसे में एट्रीब्यूशन स्टडीज पर दाव लगाना जरूरी हो जाता है।

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