प्लास्टिक की सनक

वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक के गंभीर खतरे बताएं हैं फिर भी हम इस पर निर्भर होते जा रहे हैं। क्या इस खतरनाक लगाव से बचने का कोई उपाय है?

 
By Rakesh Kalshian
Last Updated: Wednesday 11 October 2017 | 07:34:09 AM

तारिक अजीज / सीएसई

स्टेला मैककार्टनी इंग्लिश फैशन डिजाइनर हैं जो पशु अधिकारों के समर्थन के लिए जानी जाती हैं। वह फर या चमड़े से बचने की सलाह देती हैं। जून में उन्होंने फैशन उत्पादों की एक ऐसी श्रृंखला शुरू की है जिसमें समुद्र से निकाले गए प्लास्टिक के कचरे का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि नुकसान पहुंचानी वाली वस्तु को विलासिता से युक्त किया जा रहा है। क्या ऐसा नहीं किया जा सकता?

स्टेला की चमक की दुनिया से मीलों दूर मंदिरों के नगर तंजावुर में पिछले साल सितंबर में 19 साल के पर्यावरण कार्यकर्ता जवाहर ने एक नहर में कूदकर अपनी जिंदगी समाप्त कर ली। स्यूसाइड नोट के रूप में उन्होंने एक वीडियो अपने पीछे छोड़ा। उसके मुताबिक, “मैं अपनी जिंदगी इस उम्मीद के साथ खत्म कर रहा हूं कि इससे भारत में प्लास्टिक के  गंभीर खतरे के प्रति लोगों का ध्यान जाएगा। जब शांतिपूर्ण विरोध के सभी प्रयास विफल हो गए तो मुझे आत्महत्या करनी पड़ रही है।”

प्लास्टिक के विश्वव्यापी प्रदूषण पर ये दो प्रतिक्रियाएं हैं। एक जूझने की है जबकि दूसरी अंत की। लेकिन दोनों में जो बात सामान्य वह है विषाक्त प्लास्टिक से हमारा प्रेम संबंध दर्शाना। सस्ता, टिकाऊ और सुविधाजनक होने के कारण दुनियाभर में इसकी पहुंच है। इस वक्त हम पिछले 50 साल की तुलना में 20 गुणा अधिक प्लास्टिक का उत्पादन कर रहे हैं। अगले 20 साल में इसके दोगुना होने की संभावना है।

हम प्लास्टिक की एक कृत्रिम दुनिया में रह रहे हैं। हम इसे उस वक्त गलत मानते हैं जब खुले सीवरों, भरावक्षेत्र, नदी या समुद्र के तटों पर इसका ढेर देखते हैं। इसका एक दर्दनाक पहलू भी है। यह पहलू तस्वीरों और वीडियो के माध्यम उस वक्त दिखाई देता है जब हम किसी गरीब को खतरनाक परिस्थितियों में प्लास्टिक का कूड़ा बीनते देखते हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि इसके सेहत के लिए खतरनाक और नुकसानदेह नतीजों को देखते हुए भी हम इसे बर्दाश्त कर रहे हैं। संरक्षण भी दे रहे हैं।

शायद मैककार्टनी दुनिया भर में बढ़ते प्लास्टिक के कूड़े से चिंतित हैं। हाल ही में प्लास्टिक पर एक वैश्विक रिपोर्ट जारी की गई है जो चिंता को बढ़ा देती है। रिपोर्ट बताती है कि प्लास्टिक प्राकृतिक पर्यावरण में प्रदूषण को स्थायी कर रही है। धरती के दूरस्थ इलाकों जैसे आर्कटिक और पैसिफिक आइलैंड में भी प्लास्टिक की पहुंच बढ़ गई है। हर साल समुद्रों में 80 लाख टन प्लास्टिक मिलता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रति मिनट एक ट्रक प्लास्टिक कचरा समुद्र में जा रहा है। अगर यह ऐसे चलता रहा तो 2050 तक प्रति मिनट 4 ट्रक कूड़ा समुद्र में जाने लगेगा। प्लास्टिक के प्रति प्रेम की ही नतीजा है कि दुनिया में 10 लाख प्लास्टिक की बोतल प्रति मिनट खरीदी जाती है।

प्लास्टिक के साथ सबसे बड़ी समस्या है कि यह  नष्ट नहीं होती। इसका मतलब है कि अब तक ऐसा जीवाणु विकसित नहीं हुआ है जो इसे खत्म कर सके। ऐसे में समुद्र में जाने वाला प्लास्टिक बिना परिवर्तित हुए सैकड़ों साल तक पड़ा रहेगा। वैज्ञानिकों का  अनुमान है कि अभी समुद्रों में 15 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा मौजूद है। अगर यह क्रम ऐसे ही जारी रहा तो 2050 तक यह कचरा समुद्र से मछलियों से अधिक होगा। इससे मनुष्यों की खाद्य श्रृंखला भी प्रभावित होने का अंदेशा है।

नष्ट न होने के कारण प्लास्टिक पूर्ण रूप से निष्क्रिय भी नहीं होता। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि बहुत से खतरनाक रसायन जैसे पैथलेट्स और बिसफिनोल ए उच्च तापमान पर बाहर निकल जाते हैं। यह शरीर का संतुलन बिगाड़ने का काम करते हैं। इससे तमाम तरह का विकार जैसे बांझपन, पैदायशी दिक्कत, एलर्जी और कैंसर तक का खतरा रहता है। यह बेहद गंभीर है।

हालांकि ऐसा भी नहीं कि प्लास्टिक के हमेशा खराब नतीजे ही निकले हैं। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विलासिता की वस्तुओं की लालसा में बड़े पैमाने पर जानवरों को मारा गया। बिलियार्ड्स बॉल के लिए हाथी के दांत की जरूरत को पूरा करने के लिए हाथी और कंघे की जरूरत पूरा करने के लिए कछुए मारे गए। 1870 में जॉन वेस्ले हयात ने सेलुलॉयड बनाने की प्रक्रिया को पेटेंट कराया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि पेट्रोलियम व्हेल के लिए राहत लाया है। इसी तरह सेलुलॉयड ने हाथी, कछुए और समुद्र की कोरल प्रजातियों को राहत दी है।

सेलुलॉयड ने डिजाइनर्स को विलासिता से पूर्ण कपड़ों के प्रतिरूप बनाने के लिए भी प्रेरित किया है। ये इतने सस्ते होते हैं कि इनकी पहुंच गरीब तक होती है। सेलुलॉयड की प्रक्रिया ने विभिन्न प्रकार की प्लास्टिक जैसे बैकलाइट बनाने की प्रेरणा दी। यह पहली ऐसी प्लास्टिक है जो प्रयोगशाला में बनी थी। स्टाइरोफोम, पीवीसी, पॉली कारबोनेट, पेट, नाइलोन, केवलर और टेफलोन का अस्तित्व भी इसकी बदौलत संभव हो सका।

सुजेन फ्रेंकेल ने अपनी किताब प्लास्टिक : ए टॉक्सिक लव स्टोरी में लिखा है “प्लास्टिक इतनी सस्ती है कि इसका आसानी से उत्पादन हो जाता है। इसने प्राकृतिक संसाधनों का इतना बेतरतीब वितरण कर दिया है कि बहुत से देश अमीर बन गए हैं, जबकि अन्य दरिद्रता से जूझ रहे हैं। इसने देशों का विनाशकारी युद्ध में धकेल दिया है। प्लास्टिक ने आदर्श लोक का वादा किया है जो सबके लिए उपलब्ध हो।”

विडंबना यह है कि प्लास्टिक के दुष्परिणामों से परिचित होने के बाद भी हम इससे बच नहीं पा रहे हैं। 2013 में एक अमेरिकन औसतन 109 किलोग्राम प्लास्टिक का उपभोग कर रहा था, चीन में उपभोग की दर 45 किलोग्राम थी। भारत इस मामले में थोड़ा बेहतर था। यहां प्रति व्यक्ति 9.7 किलोग्राम प्लास्टिक का उपभोग किया जा रहा था। लेकिन इसमें सालाना 10 प्रतिशत का इजाफा भी हो रहा है। अटलांटा स्थित सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के मुताबिक, कम से कम 80 प्रतिशत अमेरिकन के शरीर में प्लास्टिक पाया गया है। किसी ने ठीक ही कहा है कि हम सभी थोड़ा-थोड़ा प्लास्टिक हो गए हैं।

यह साफ है कि इससे मुक्ति आसान नहीं है। अब बहुत से समुदाय और व्यक्ति अपनी जिंदगी में प्लास्टिक के कुछ हिस्से जैसे खिलौने या माइक्रोवेव प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बारे में सोच सकते हैं। वे उद्योगों पर खतरनाक रसायनों के नियंत्रित करने का दबाव बना सकते हैं। अमेरिका में विनाइल क्लोराइड के मामले में ऐसा हुआ है। लेकिन ये तमाम प्रयास ऊंट के मुंह में जीरा जैसे हैं।

कचरा प्रबंधन के मद्देनजर रिड्यूस, रीयूज और रीसाइकल दर्शन कामयाब नहीं हुआ है। कचरा शून्य होना सर्वोत्तम उपाय है। पुन:उपयोग कुछ हद तक प्रभावी हो सकता है। 50 के दशक में यह काफी हद तक कामयाब था।

फ्रेंच कंपनी बीआईसी एक दिन में 50 लाख डिस्पोजल लाइटर बेचती है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि चीन में इससे बहुत ज्यादा बिक्री होती है। सिरिंज के पुन:उपयोग का विचार कतई अच्छा नहीं हो सकता। यह भी असंभव नहीं है कि लाइटर को रिचार्ज करने वाले दिनों में हम लौट जाएं।
 
बिजनेस और पर्यावरण के लिहाज से रीसाइक्लिंग अच्छा उपाय है। विश्व में प्लास्टिक का करीब दस प्रतिशत से कम हिस्सा ही रिसाइकल किया जाता है। करीब 12 प्रतिशत प्लास्टिक कचरा जलाया जाता है। जबकि 79 प्रतिशत या तो भराव क्षेत्रों पर रहता है या समुद्र में समा जाता है। जिन कारखानों में प्लास्टिक को रीसाइकल किया जाता है, वहां कर्मचारियों के लिए खतरनाक परिस्थितियां होती हैं।

पिछले साल जनवरी में ब्रिटेन के एलन मैकअर्थर फाउंडेशन ने केमिकल इंडस्ट्री के सहयोग से द न्यू प्लास्टिक इकॉनोमी, रीथिंकिंग द फ्यूचर ऑफ प्लास्टिक नाम से रिपोर्ट जारी की थी। इसमें तीन सुझाव दिए गए थे। पहला सभी प्लास्टिक को रिसाइकल योग्य बनाया जाए। दूसरा, पर्यावरण में इसके रिसाव को रोका जाए और तीसरा पेट्रोलियम निर्मित प्लास्टिक के कच्चे माल को प्राकृतिक माल से बदला जाए।

ये अहम सुझाव हैं लेकिन बहुत से लोगों को यह असुविधाजनक लग सकते हैं। वे इसके विरोध में तमाम दलीलें दे सकते हैं। प्लास्टिक नामक सर्प दुनिया के सामने अपने फन फैलाए खड़ा है। यह कहना मुश्किल है कि इसे नियंत्रित करने के लिए कब योजना बनेगी। हालांकि बहुत से आशावादी लोग हाल में खोजे गए प्लास्टिक खाने वाले एक कीड़े से उम्मीद लगाए बैठें हैं लेकिन हम यह भली भांति जानते हैं कि सबसे भूखा और असली कीड़ा कौन है।  

(इस कॉलम में विज्ञान और पर्यावरण की आधुनिक उलझी गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास रहेगा)

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