बंजर होते हिमालय

ओक के वनों के मुकाबले चीड़ के वनों की रीचार्ज क्षमता एक तिहाई ही है। चीड़ के वनों के कारण ही शुद्ध रीचार्ज दर में काफी हद तक गिरावट दर्ज की गई है।   

 
By D P Agarwal, Kailash Rautela
Last Updated: Thursday 30 November 2017 | 06:05:28 AM

तारिक अजीज / सीएसई

जाने माने जलविज्ञानी जेएस रावत ने हाल ही में चेतावनी दी है कि हिमालय क्षेत्र के बंजर होने की दिशा में बढ़ने की शुरुआत हो चुकी है। इससे पहाड़ी क्षेत्रों की पारिस्थितिकी को खतरा पैदा हो गया है। लंबे समय से इसके लक्षण दिखाई दे रहे हैं। मसलन, ग्लेशियर आश्रित नदियां धीरे-धीरे कम हो रही हैं, पहाड़ के ढलान बढ़ रहे हैं, भूमिगत जलस्तर तेजी से कम हो रहा है, प्राकृतिक झरने खत्म हो रहे हैं, नदियों की धारा क्षीण हो रही हैं, बारहमासी नदियां अपना यह वजूद खो रही हैं और झीलें भी सूखती जा रही हैं।

पहाड़ों में हो रहे इस बदलाव पर बहुत कम शोध हुए हैं। उत्तराखंड में वनों के परिदृश्य में हम इस बदलाव के एक कारण की समीक्षा कर सकते हैं। यहां चीड़ के पेड़ों का तेजी से विस्तार हो रहा है। चौड़े पत्तों वाले ओक, बुरुंश, काफल को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। वन विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि अल्मोड़ा के वन डिवीजन में 81 प्रतिशत क्षेत्र चीड़ पेड़ों से आच्छादित है। जबकि ओक के वन महज 2 प्रतिशत क्षेत्र तक ही सीमित हैं।

चंपावत जिले में चीड़ के पेड़ 27,292 हेक्टेयर क्षेत्र में व्याप्त हैं जबकि ओक के पेड़  5,747 हेक्टेयर तक ही सीमित हैं। इसी तरह बागेश्वर में ओक के पेड़ों की हिस्सेदारी दो प्रतिशत ही है जबकि चीड़ के पेड़ 75 प्रतिशत क्षेत्र तक पहुंच रखते हैं। फिलहाल चीड़ के पेड़ 80 प्रतिशत वन क्षेत्र तक फैले हुए हैं।

चीड़ के खतरे  

चीड़ के जंगल भूमिगत जल को नीचे पहुंचाने में सबसे बड़े कारक माने जाते हैं। अल्मोड़ा स्थित कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग का हाल में किया गया अध्ययन बताता है कि ओक के वनों में भूमिगत जल के रीचार्ज की दर 23 प्रतिशत है। चीड़ के वनों में यह दर आठ प्रतिशत ही है। कहने की जरूरत नहीं है कि कृषि भूमि और शहरी क्षेत्रों में जल के रीचार्ज की यह दर काफी निम्न है।

ओक के वनों के मुकाबले चीड़ के वनों की रीचार्ज क्षमता एक तिहाई ही है। चीड़ के वनों के कारण ही शुद्ध रीचार्ज दर में काफी हद तक गिरावट दर्ज की गई है। साफ है कि भूमिगत जलस्तर की इस स्थिति के जिम्मेदार चीड़ के पेड़ हैं।

चीड़ के पेड़ों से बड़ी मात्रा में नुकाली पत्तियां गिरती हैं। विषाक्त होने के कारण न तो पशु इन्हें खाते हैं न ही खाद बनकर इनका क्षय होता है। साल दर साल प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने के कारण इन नुकाली पत्तियों का ढेर लगता रहता है। ये नुकीली पत्तियां प्लास्टिक की परत जैसा काम करती हैं और बरसात के पानी को ठहरने नहीं देतीं।

चीड़ पेड़ों की एक घातक प्रजाति है। उगने के लिए इसे ज्यादा मिट्टी की जरूरत नहीं होती। प्राकृतिक रूप से इसका विस्तार होता रहता है। ओक के वनों के पास लगने वाली आग मिट्टी से नमी सोख लेती है। इससे चीड़ के पेड़ों को पनपने में मदद मिलती है क्योंकि ये पेड़ कम नमी वाली जगह में भी आसानी से उग जाते हैं।

चीड़ के पेड़ों को उगाने ने वन विभाग ने सक्रिय भूमिका निभाई है। तारपीन का तेल हासिल करने क लिए ब्रिटिश काल और उसके बाद के समय में भी इसे उगाया जा रहा है। तारपीन का इस्तेमाल पेंट उद्योग में जमकर होता है। भूमिगत जलस्तर में गिरावट के बाद 1993 में स्थानीय लोगों के विरोध के बाद इसे प्रोत्साहन देना बंद किया गया था।

कैसे हो स्थिति में सुधार  

रावत जैसे जलविज्ञानी जल स्रोतों को संरक्षित करने और स्थिति में बदलाव के लिए मशीनी और जैविक सुझाव देते हैं। मसलन, हमें ओक और चीड़ के पेड़ों के अनुपात को उलटने की जरूरत है। चीड़ के पेड़ों से जलस्रोतों को हुई क्षति की भरपाई के लिए जरूरी है कि चीड़ को उगाना बंद किया जाए। साथ ही वनों से इसकी नुकाली पत्तियों को व्यवस्थित तरीके से हटाया जाए। इसकी भरपाई के लिए चौड़े पत्तों वाले ओक, काफल और बुरुंस जैसे पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा उगाए जाने की जरूरत है।

इसके अलावा, सरकारी एजेंसियों को चीड़ की नुकीली पत्तियों का इस्तेमाल चारकोल और गद्दे बनाने के लिए करना चाहिए। इस काम में ग्रामीणों का सहयोग अपेक्षित है। सरकारी एजेंसी को पत्ते बेचने पर ग्रामीणों को उचित हिस्सेदारी देनी होगी। चीड़ के वनों को काटने के लिए एक व्यवस्थित योजना की जरूरत है। फर्नीचर उद्योग का इसमें उपयोग किया जा सकता है।  

प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाने के लिए ये दीर्घकालिक उपाय हैं। चीड़ के वनों को  नियंत्रित करने में देरी के दुष्परिणाम ही निकलेंगे। पारिस्थितिकी और स्थानीय लोगों की जिंदगी पर देरी का गहरा असर पड़ेगा। अगर हम चीड़ पेड़ों को नियंत्रित कर पाए तो शायद हम हिमालय को बंजर होने की प्रक्रिया से बचा सकते हैं।

(लेखक लोक विज्ञान केंद्र,अल्मोड़ा में कार्यरत हैं)

Subscribe to Weekly Newsletter :
We are a voice to you; you have been a support to us. Together we build journalism that is independent, credible and fearless. You can further help us by making a donation. This will mean a lot for our ability to bring you news, perspectives and analysis from the ground so that we can make change together.

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.