Water

बाढ़ के लिए कौन जिम्मेदार?

सूखे के बाद भीषण बाढ़ की चपेट में आए कई राज्य। बारिश नहीं बल्कि वायु प्रदूषण की वजह से मची है भारी तबाही

 
By Jigyasa Watwani, Shreeshan Venkatesh, Kundan Pandey
Last Updated: Friday 18 August 2017
बिहार की राजधानी पटना में कंगन घाट के निकट गंगा का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई। इससे निकटवर्ती इलाकों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। फोटो : सचिन कुमार
बिहार की राजधानी पटना में कंगन घाट के निकट गंगा का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई। इससे निकटवर्ती इलाकों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। फोटो : सचिन कुमार बिहार की राजधानी पटना में कंगन घाट के निकट गंगा का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई। इससे निकटवर्ती इलाकों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। फोटो : सचिन कुमार

पिछले साल अप्रैल महीने में जब असम में बाढ़ आई तो सबने यही सोचा कि बूढ़ीदिहिंग और देसांग नदियों का उफनता जलस्तर जल्दी ही नीचे चला जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह बाढ़ अगस्त के अंत तक खिंच गई। इससे राज्य का करीब 90 प्रतिशत क्षेत्र और 40 लाख लोग प्रभावित हुए।

गुवाहाटी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख डी.सी. गोस्वामी ने बताया, “कुल बरसात और भौगोलिक क्षेत्र दोनों लिहाज से मानसून से पहले होने वाली वर्षा इस साल काफी अधिक हुई है।” हैदराबाद के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के मुताबिक, अप्रैल के चौथे सप्ताह में भारी बारिश इस साल असम में पहली बाढ़ का कारण बनी। बूढ़ीदिहिंग और देसांग नदियां 25 अप्रैल को इस साल पहली बार खतरे के निशान को पार कर गई और छह जिलों-डिब्रूगढ़, शिवसागर, जोरहाट, तिनसुकिया, काछार और सोरायदेवो को अपनी चपेट में ले लिया। विशेषज्ञों के अनुसार मानसून के पहले होने वाली भारी वर्षा ने पश्चिमी विक्षोभ की बढ़ती आवृत्ति से संबंधित ठोस प्रमाण उपलब्ध कराए हैं। अधिक बारिश की यह भी एक वजह है। गुवाहाटी के क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार, राज्य में होने वाली बारिश मार्च-अप्रैल में सामान्य से 21 फीसदी अधिक थी।

विडंबना यह है कि असम एक तरफ जहां भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है, वहीं राज्य में एक जून से 16 अगस्त के बीच औसत से 25 प्रतिशत कम बारिश हुई है। कम बारिश के बावजूद आखिर यह बाढ़ क्यों? आंकड़ों के मुताबिक, प्रत्येक बाढ़ अत्यधिक वर्षा के बाद ही आती है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) अत्यधिक वर्षा की घटना को दो श्रेणियों में बांटता है। इसके अनुसार, 24 घंटे में अगर 124.5-244.4 मिमी वर्षा हुई तो इसे ‘बहुत भारी’ वर्षा और अगर इससे भी अधिक बारिश हुई तो उसको ‘अत्यंत भारी’ की श्रेणी में रखा जाएगा। इस साल अकेले जुलाई के महीने में असम में ‘बहुत भारी’ ‍वर्षा की घटनाएं दर्ज की गईं। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) ने 25 जुलाई तक ही तीन जिलों में सामान्य बाढ़ की घोषणा कर दी थी। ये वही जिले थे जहां बेकी, संकोश और ब्रह्मपुत्र तीनों नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही थीं।

सूखा झेल रहे राज्यों में बाढ़ का क़हर
असम के अलावा 19 राज्यों में करीब एक करोड़ लोग अगस्त के तीसरे सप्ताह तक बाढ़ से प्रभावित हो चुके थे। इनमें से अधिकतर मानसून की पहली बारिश से ही इस बाढ़ की चपेट में आ चुके थे। उल्लेखनीय है कि इनमें से कुछ राज्य बाढ़ से पहले सूखे की मार झेल रहे थे। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में बाढ़ अप्रैल-मई के सूखे के बाद आई। यहां आठ जून तक मानसून शायद ही पूरे राज्य में पहुंचा था और आईएमडी के अनुसार तो कुछ हिस्से तेज गर्मी और लू की चपेट में थे। 12 जुलाई को बुरहानपुर और बैतूल जिलों में करीब 24 घंटे में सामान्य से क्रमशः 1,135 और 1,235 फीसदी ज्यादा बारिश हुई। 18 जुलाई आते-आते राज्य के 23 जिलों में बाढ़ आ चुकी थी। इससे 35 से अधिक लोगों की मौत हो गई और नौ लोग लापता हो गए। फिर 20-21 अगस्त को 12 जिलों में भीषण बारिश हुई। बीस अगस्त को खुरई मौसम स्टेशन ने सागर में 187.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज की। पन्ना और रीवा जिले में केन और तमसा नदियां भारी बारिश के कारण खतरे के निशान से ऊपर बहने लगीं।

मानसून की शुरुआत से 22 अगस्त तक बारिश से जुड़ी दुर्घटनाओं के कारण राज्य में मरने वालों की संख्या 87 तक पहुंच गई। इसी तरह बिहार में एक जून से 22 अगस्त के बीच कुल वर्षा सामान्य से 15 फीसदी कम रही। लेकिन 21 अगस्त तक बिहार के पटना सहित 23 जिलों में कुल 38 लाख लोग बाढ़ का सामना कर रहे थे। गंगा नदी बक्सर, मुंगेर, खगड़िया, सीवान और कटिहार सहित कई जिलों में खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके पीछे पश्चिम बंगाल में फरक्का बांध के निर्माण के बाद नदी में गाद के जमाव को जलस्तर में वृद्धि का कारण बताया।

हालांकि, बिहार स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘बाढ़ मुक्ति अभियान’ के निदेशक डी.के. मिश्रा का कहना है, “वर्ष 2007 के बाद से राज्य में कुल मौसमी वर्षा असामान्य रूप से कम रही है। इस साल नेपाल में हुई भारी वर्षा के कारण बाढ़ ने राज्य में विकराल रूप धारण कर लिया था।” उत्तर प्रदेश में भी मिर्जापुर, बलिया और वाराणसी सहित कई जिलों में गंगा खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी। वहीं इलाहाबाद के कुछ हिस्से 21 अगस्त को बाढ़ से जलमग्न रहे। 

जयपुर स्थित मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर वाई.पी. माथुर ने बताया कि राजस्थान में इस बार जुलाई तक सब कुछ सामान्य था। लेकिन अगस्त में इतनी तेज बारिश हुई, जितनी पहले कभी नहीं हुई थी। ग्यारह अगस्त को राज्य के अधिकतर हिस्सों में सामान्य से 100 फीसदी अधिक बारिश हुई। पाली और सीकर जिलों में सामान्य से करीब 1,059 और 1100 फीसदी तक अधिक बारिश हुई।

स्थानीय समाचारपत्रों के अनुसार, जोधपुर में उस दिन पिछले 90 वर्षों के इतिहास में सबसे अधिक बारिश हुई। टोंक जिले में बाढ़ को रोकने के लिए बिलासपुर बांध के फाटक खोलने पड़े। ऐसा करने से अतिरिक्त पानी बनास नदी में निकल जाता है। अगस्त 20-21 को प्रदेश के 16 मौसम विज्ञान केंद्रों ने एक बार फिर भारी बारिश की घटनाओं को दर्ज किया। जलवायु परिवर्तन पर राजस्थान सरकार के वर्ष 2010 में बने कार्ययोजना मसौदे के अनुसार, राज्य में चरम वर्षा की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में साल 2017 से 2100 के दौरान 20 मिमी वृद्धि होने की संभावना है।

अध्ययनों से पता चलता है कि मानसून से संबंधित बारिश कम होने के बावजूद देश में विशेष रूप से जुलाई-अगस्त में चरम वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। नेचर क्लाईमेट चेंज नामक जर्नल में वर्ष 2014 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, दक्षिण एशियाई मानसून के दौरान अत्यंत वर्षा और बहुत शुष्क दौर की आवृत्ति 1980 के बाद बढ़ी है।

विश्वव्यापी है यह कहर
हालांकि, मानसून के दौरान बिजली गिरने से होने वाली मौतें आम बात हैं, लेकिन इस बार 31 जुलाई से तीन अगस्त के बीच इस तरह की घटनाएं बहुत अधिक देखी गईं। इन चार दिनों में उड़ीसा में बिजली गिरने से कम से कम 56 लोगों की मौत हो गई। इस साल मानसून की शुरुआत में ही बिजली गिरने से आठ राज्यों में कम से कम 400 लोगों की मौत हुई है। चीन में भी इस साल तेज बारिश और बाढ़ से करीब 400 लोगों की मौत हो गई और जुलाई के महीने में तकरीबन एक लाख लोग विस्थापित हो गए। अगस्त की शुरुआत में भारी बरसात ने अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी कहर बरपाया।

तूफान, बादल फटना और बाढ़ जैसी घटनाएं दुनियाभर में तबाही मचा रही हैं। तमाम उपग्रह तकनीक और उपायों के बावजूद वैज्ञानिकों के लिए इन घटनाओं की भविष्यवाणी करना मुश्किल होता जा रहा है। वैज्ञानिकों के बीच इस बात पर आम सहमति बनती दिख रही है कि भविष्यवाणी में अनिश्चितता की वजह बादल हैं।

पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रोपिकल मेटेरोलोजी में भौतिकी एवं उष्णदेशीय मेघ कार्यक्रम की मुख्य परियोजना वैज्ञानिक थारा प्रभाकरन के मुताबिक,“यह सब जानते हैं कि बादल ही मौसम के वाहक हैं। वे जल चक्र को सक्रिय करते हैं जिसकी वजह से बारिश होती है।” ये बादल वैश्विक जलवायु प्रणालियों और उनके स्थानीय प्रभाव के बीच मध्यस्थ के तौर पर भी काम करते हैं। फिर भी वैज्ञानिकों में बादलों को लेकर काफी कम समझ है।

बाढ़ के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार!
जैसे-जैसे मौसम से संबंधित चरम घटनाओं की आवृत्ति बढ़ रही है, वैज्ञानिक भी बादलों के पीछे का रहस्य सुलझाने को बेचैन हो रहे हैं। अब ज्यादातर वैज्ञानिकों ने बादल के एक विशेष पहलू की पहचान कर ली है, जो बादल के निर्माण और विकास में अहम भूमिका निभाता है और जाहिर तौर पर मौसम को प्रभावित करता है। यह है एरोसाेल।

एरोसॉल ऐसे कार्बनिक और अकार्बनिक कण हैं जो वातावरण में लगातार उत्सर्जित किए जा रहे हैं। ये प्राकृतिक भी हो सकते हैं जैसे धूल, ज्वालामुखी से निकली राख और पौधों से उत्सर्जित वाष्प। या फिर कृत्रिम जैसे खेती से निकली धूल, वाहनों से निकला धुआं, खानों से उत्सर्जन और ताप विद्युत संयंत्रों से निकली कालिख भी एरोसोल उत्सर्जन के लिए जि‍म्मेदार है। यही सूक्ष्म प्रदूषक (कण) उस जगह का निर्माण करते हैं, जहां वाष्प संघटित होकर वर्षा की बूंदों को तैयार करती है।

प्रभाकरन कहती हैं, “माना जाता है कि बादलों का मौसम पर पड़ने वाला प्रभाव इसी सूक्ष्म स्तर से शुरू होता है।” उदाहरण के लिए वातावरण में एरोसोल के प्रकार और उनकी बहुतायत बादलों के व्यवहार को नियंत्रित करती है। आसमान में निचले बादल सौर विकिरण को रोकते हैं जिससे पृथ्वी ठंडी रहती है। जबकि अपेक्षाकृत ऊंचे बादल धरती से वापस विकिरण को रोक लेते हैं जिससे धरती का तापमान बढ़ जाता है। ये दोनों प्रक्रियाएं न हो तो पृथ्वी सात डिग्री गर्म रहेगी।

यरूशलेम में हिब्रू विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ अर्थ साइंस के प्रोफेसर डेनियल रोज़ेन्फ़ेल्ड ने बताया कि एरोसोल की संख्या जितनी अधिक होगी, बादल में बूंदों की संख्या उतनी ही ज्यादा रहेगी। हालांकि, बादल में अधिक बूंदों से जरूरी नहीं कि वर्षा भी अधिक ही हो। कई बार पानी की बूंदे बहुत छोटी-छोटी बनती है जिनसे बारिश नहीं हो पाती। बड़ी बूंदें ही बरसात कराती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रदूषित हवा बरसात नहीं होने देती।

वाटर रिसोर्स रिसर्च जर्नल में वर्ष 2008 में प्रकाशित एक अध्ययन रोज़ेन्फ़ेल्ड के अवलोकन की पुष्टि करता है। धूल और वर्षा आपस में किस प्रकार संबंधित है, इसे समझने के लिए अमेरिका के वर्जीनिया विश्वविद्यालय और नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज के शोधकर्ताओं ने एरोसोल सूचकांक, बहने वाली हवा की दिशा और मध्य व उत्तरी अफ्रीका के साहेलियन विस्तार का 1996 से 2005 तक विश्लेषण किया। उनके विश्लेषण से पता चलता है कि छोटे-छोटे धूल कणों ने तमाम छोटी बूंदों के लिए जगह बनाईं, जिससे बरसात के लिए जरूरी बड़ी बूंदें नहीं बन पाईं। रोज़ेन्फ़ेल्ड का कहना है कि हल्के बादलों के लिए यह सामान्यतः सही है, लेकिन प्रदूषित बादल बड़ी तबाही लाने में सक्षम हैं।

बिजली चमकने और बादल फटने में भी है इसकी भूमिका
रोज़ेन्फ़ेल्ड का कहना है कि संवहन के कारण कभी-कभी प्रदूषित बादल काफी ऊंचाई तक चले जाते हैं। ऊंचाई पर जाकर बादल की बूंदों का व्यवहार बदल जाता है। वहां वे आपस में मिलकर पर्याप्त बड़ा आकार पाने में सक्षम हो जाती हैं और फिर ये बूंदें वर्षा के रूप में गिरती हैं।

नई दिल्ली स्थित भारतीय मौसम विज्ञान केंद्र में क्षेत्रीय मौसम विभाग के प्रमुख एम. माेहपात्रा के मुताबिक, इन बादलों को ‘क्यूमूलोनिम्बस’ के तौर पर जाना जाता है, जो बवंडर, ओलावृष्टि, तूफान और बादल फटने जैसी मौसम की चरम घटनाओं के लिए जिम्मेदार है।

एरोसोल का मौसम के उतार-चढ़ाव पर अच्छा-ख़ासा प्रभाव पड़ सकता है। बादल में पानी की मात्रा को एक बार में बरस पड़ने के लिए मात्र एक ट्रिगर या सक्रिया बिंदु ही चाहिए। यही वजह है कि ऊंचे बादल जब हिमालय घाटी कि तरफ बढ़ते हैं तो अक्सर बादल फटने की घटना हो जाती हैं।

आईआईटी दिल्ली के वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र में सहायक प्रोफेसर साग्निक डे कहते हैं, “यह सच है कि आज के समय में बादलों के गुण को लेकर आंकड़ों की भारी कमी है।” बेहतर और विस्तृत उपग्रह चित्रण की वजह से जैसे-जैसे सही और अधिक आंकड़े उपलब्ध हो रहे हैं, वैज्ञानिकों का रुझान भी बादलों के बदलते स्वरूप और इसके परिणामस्वरूप मौसम की असामान्य घटनाओं को समझने की तरफ बढ़ रहा है।

Subscribe to Weekly Newsletter :

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.