बीमारियां हैं खुदकुशी का बड़ा कारण!

15 वर्षों के दौरान देश में 3.85 लाख लोग विभिन्न बीमािरयों के चलते खुदकुशी कर चुके हैं

 
By Sachin Kumar Jain
Published: Wednesday 15 February 2017
उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में परिजन की खुदकुशी  के शोक में डूबा परिवार (फोटो: सायंतोनी पालचौधुरी / सीएसई)
उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में परिजन की खुदकुशी  के शोक में डूबा परिवार (फोटो: सायंतोनी पालचौधुरी / सीएसई) उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में परिजन की खुदकुशी के शोक में डूबा परिवार (फोटो: सायंतोनी पालचौधुरी / सीएसई)

अक्टूबर, 2016 का एक दिन था। दिल्ली में प्रेम कुमार घर से घूमने के लिए निकले और अलग-अलग स्टेशनों पर गए। एक जगह सुरक्षाकर्मियों ने उनके व्यवहार को भांपा और उन्हें अपनी सुरक्षा में ले लिया। अपराध के नजरिए से जब कुछ संदिग्ध नहीं लगा, तो छोड़ भी दिया। एक घंटे बाद प्रेम कुमार ने मेट्रो ट्रेन के सामने कूदकर अपनी जान दे दी। उनका कई सालों से एम्स में मानसिक रोग का इलाज चल रहा था।

महाराष्ट्र के सतारा में सुलक्षणा के पेट में ट्यूमर के कारण बहुत दर्द रहता था। इलाज से दर्द ठीक नहीं हो रहा था। अपने पोते से उन्होंने चूहा मारने की दवा मंगवाई और दूसरे दिन उसे खाकर खुदकुशी कर ली। उत्तर प्रदेश में सीताराम को अक्सर सिर में असहनीय दर्द होता था। वह दर्द कितना असहनीय रहा होगा कि सीताराम ने फांसी लगाकर आत्महत्या करना ज्यादा बेहतर समझा।

इसी तरह मध्य प्रदेश के सिरोंज क्षेत्र में एक किशोर ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे लगता था कि उसे कोई गंभीर यौन रोग है। उसने विज्ञापनों से मिली जानकारी के आधार पर चुपचाप खुद के इलाज की कोशिश की, क्योंकि कोई उससे संवाद तो कर ही नहीं रहा था। एक समय उसे लगा कि अब वह अच्छा जीवन नहीं जी सकता है, और उसने आत्महत्या कर ली।

ये कुछ उदाहरण हैं, जिनसे समझा जा सकता है कि कैसे भारत में वर्ष 2001 से 2015 के दाैरान 3.85 लाख आत्महत्याओं का कारण बीमारियां रहीं!

खुदकुशी और बीमारियां

लंबी, गंभीर या पीड़ादायक बीमारी व्यक्ति को कभी-कभी निराशा की ऐसी चरम स्थिति में ले जाती है, जब वह स्वयं का अंत कर लेना चाहते है। हकीकत यह है कि व्यक्ति को हमेशा बीमारी मृत्य तक लेकर नहीं जाती। कई मर्तबा बीमारी से पहले व्यक्ति खुद को मृत्यु तक ले जाता है और आत्महत्या कर लेता है। भारत में वर्ष 2015 में 1,33,623 लोगों ने खुदकुशी कर ली। लोगों की आत्महत्या में दो सबसे बड़े ज्ञात कारण थे–पारिवारिक समस्याएं और बीमारियां। अब जरा स्वास्थ्य के नजरिए से इस व्यवहार को देखने-महसूस करने की कोशिश करते हैं। वर्ष 2015 में भारत में 21178 लोगों ने बीमारियों के कारण आत्महत्या कर ली। यह एक साल की संख्या है, हम इसे जरा लंबी अवधि में देखने की कोशिश करते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के वर्षवार प्रतिवेदनों का अध्ययन करने से पता चलता है कि वर्ष 2001 से 2015 के बीच भारत में कुल 18.41 लाख लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 3.85 लाख लोगों (लगभग 21 प्रतिशत) ने विभिन्न बीमारियों के कारण आत्महत्या की। इसका मतलब है कि भारत में हर एक घंटे में 4 लोग बीमारी से तंग आकार आत्महत्या करते हैं। हर पांच में से एक आत्महत्या बीमारी के कारण होती है। इसलिए इस मसले को स्वास्थ्य मंत्रालय को स्वास्थ्य के अधिकार के नजरिए से देखना होगा।

इनमें से 1.18 लाख लोगों ने मानसिक रोगों के प्रभाव में और 2.37 लाख लोगों ने लंबी बीमारियों से परेशान होकर आत्महत्या की थी। इनमें अवसाद, बायपोलर डिसआर्डर, डिमेंशिया और स्कीजोफ्रीनियां के रोगियों की संख्या सबसे ज्यादा दिखी। ये ऐसे रोग हैं, जिनमें व्यक्ति अपने आप को और अपने व्यवहार को ही नियंत्रित नहीं कर पाता है।

भारत में इन 15 सालों में बीमारी के कारण सबसे ज्यादा आत्महत्याएं महाराष्ट्र (63,013), आंध्रप्रदेश (48,376), तमिलनाडु (50,178), कर्नाटक (48,053) और केरल (37,465) में हुईं। इस कारण देश में हुई कुल आत्महत्याओं में से 2,47,085 यानि 64 फीसदी मामले इन पांच राज्यों में दर्ज हुए। हमें इस पहलू पर भी नजर डालनी होगी कि देश में पक्षाघात (9,036), कैंसर (11,099) और एचआईवी (9,415) के कारण भी बहुत आत्महत्याएं हुई हैं।

वैश्विक अध्ययन बताते हैं कि सामाजिक और सांस्कृतिक कारक भी इस व्यवहार को प्रभावित करते हैं। जिन समुदायों या समूहों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित रखी जाती है और जिन्हें स्वास्थ्य सेवा का सहयोग लेने से हतोत्साहित किया जाता है, उनमें आत्महत्या की भावना ज्यादा गहरी होती है।

बीमारी में आत्महत्या क्यों?

बहरहाल किताबों में तो यही लिखा है कि निराशाजनक स्थितियों, भय की भावना, उन्माद, नाउम्मीदी और भविष्य के प्रति असुरक्षा के कारण व्यक्ति जीवन से बचने की कोशिश करता है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य की व्यवस्थाएं बेहद कमजोर हैं, लेकिन समाज के स्तर पर तो भारतीय समाज मानसिक रोगों से निपटने में अपनी व्यवस्था का संचालन करता रहा है। वह व्यवस्था है परिवार और रिश्तों की व्यवस्था; जहां परिवार या संबंधियों की देखभाल, सुरक्षा और उपचार में सहायता की परंपरा रही है। जैसे-जैसे हमने आर्थिक बदलाव की ऐसी सोच को लागू करना शुरू किया, जिसमें “व्यक्ति और व्यक्ति के हित समाज और परिवार से ऊपर” होते हैं, तो उसका असर जीवन के दूसरे पक्षों पर भी पड़ा। क्या बीमार होना या किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित होना, अपने आप में “आत्महत्या का सामान्य” कारण माना जा सकता है?

मुझे लगता है कि नहीं! लेकिन हम इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते हैं कि बदलते सामाजिक ताने बाने में “गंभीर बीमारियों से पीड़ित” व्यक्ति को बोझ माना जाने लगा है। पीड़ित व्यक्ति को बार-बार यह अहसास करवाया जाता है कि उनकी स्थिति के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति पर गहरा असर पड़ रहा है और अन्य परिजनों की “स्वतंत्रता” बाधित हो रही है। भारतीय समाज में विकलांगों और बुजुर्गों की समाज में स्वीकार्यता कम हुई है। उनकी मौजूदगी को लेकर समाज के एक हिस्से का व्यवहार सामान्य नहीं होता। जबकि लंबी बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति भी पूरी तरह से सजग और चेतनशील होता है। उसे जब यह दिखाई देता है कि उसका परिवार, उसके इलाज पर इतना खर्च कर रहा है कि वह कर्जे में आ जाएगा और इसके बाद भी पूरे उपचार की गुंजाइश नहीं है, तब वह खुदकुशी को बेहतर विकल्प मान लेता है। इस तरह की कोशिश करके सुरक्षित बच गए लोग बताते हैं कि वे वास्तव में मारना नहीं चाहते थे, बल्कि अपना दर्द खत्म करना चाहते थे। इसलिए ऐसी कोशिश की।

हमें यह समझना होगा कि जो लोग आत्महत्या की कोशिश करते हैं, उनमें से ज्यादातर मानसिक विकार से ग्रस्त होते हैं या फिर नशीले-अचेतना को बढ़ावा देने वाली चीजों का सेवन करते हैं। यदि समाज में मानसिक विकारों के बारे में लोक शिक्षण का काम हो, तो इस तरह के व्यवहार की संभावना को संकेतों से समझा जा सकता है।

श्रोत : राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के वािर्षक प्रतिवेदन

सामाजिक संरचना का टूटना

कुछ महत्वपूर्ण सवाल हमें अपने आप से पूछने चाहिए। क्या वास्तव में जीवन को खत्म कर लेना इतना आसान है? अध्ययन बताते हैं कि जब निराशा, नाउम्मीदी और असफलता का अहसास अपने चरम पर पंहुच जाता है और व्यक्ति को लगता है कि अब जीवन में बेहतरी आना संभव नहीं है, तब वह अपना जीवन खत्म करने के विकल्प पर विचार करता है। भारत में आत्महत्या की घटनाएं पिछले 5 दशकों में बढ़ती गई हैं। संभवतः सामाजिक और आर्थिक संरचना में आये बदलावों ने व्यक्ति को आत्मिक रूप से बहुत कमजोर किया है। हमारे समाज में ऐसा क्या है कि व्यक्ति अपने मन की दुविधाओं, दुखों और पीड़ा को किसी से साझा नहीं करता? यदि वह ऐसा करे, तो शायद उसके दबाव को कम किया जा सकता है।

आत्महत्याओं को केवल एक कानूनी प्रकरण मानकर खत्म नहीं कर देना चाहिए। समाज में वस्तुतः आत्महत्या पर चर्चा करना अच्छा नहीं माना जाता है, इसलिए जब किसी व्यक्ति के मन में यह कृत्य करने का ख्याल आता भी है, तो वह इसके बारे में किसी से चर्चा नहीं करता है। यदि चर्चा हो, तो उसे आत्महत्या के मनोभावों से निकालने का जतन किया जा सकता है।

स्वास्थ्य सेवाओं में मानवीय व्यवहार का अभाव

एक सवाल स्वास्थ्य सेवाओं में काम करने वाले लोगों के मानवीय होने का भी है। भारत में चिकित्सा शिक्षा की व्यवस्था अच्छे डाक्टर तैयार करती होगी, किंतु वे डाक्टर मरीजों से उनके परिजनों से कोई मानवीय भावनात्मक रिश्ता नहीं रखते। वे उनसे संवाद करके उन्हें यह भी नहीं बताते कि बीमारी क्या है? क्यों होती है? मरीज की वर्तमान स्थिति क्या है? उसका इलाज किस तरह होगा? यदि कोई समस्या हो तो मरीज उनसे बात कर सकता है या सवाल भी पूछ सकता है! एक व्यक्ति डाक्टर बन कर सबसे दूर हो जाता है। उसे लगता है कि मरीज की शारीरिक समस्या के बारे में उसनें जान लिया है, और अब वह कोई बात नहीं करेगा।

यह भी एक सच्चाई है कि लोक स्वास्थ्य सेवाओं में पदस्थ डाक्टरों की संख्या बहुत कम होने से उन पर दबाव बहुत बढ़ा है। इसका असर उनके व्यवहार पर पड़ता है। वे कुछ क्षणों में एक व्यक्ति की पड़ताल करने के लिए मजबूर होते हैं। कहा जाता है कि खुदकुशी की कोशिश करने वाले सभी लोग मरना नहीं चाहते और सभी मरने की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति खुदकुशी नहीं करते हैं। किन्हीं खास परिस्थितियों में शायद यह भावना ज्यादातर लोगों के मन में आती होगी कि जीवन खत्म कर िलया जाए, तो समस्यायों से छुटकारा मिल जाएगा। पर लोग उस भावना को वयस्क नहीं होने देते। शायद जीवटता के अहसास और सामाजिकता की वजह से यह भावना “आत्महत्या” के विचार में तब्दील नहीं हो पाती।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जब स्वास्थ्य सेवाओं की बात आती है, तब सकारात्मक-संवेदनशील-सामान्य व्यवहार को अहमियत क्यों नहीं दी जाती है? स्वास्थ्य नीति बनाने वाले विशेषज्ञ “मरीजों से साथ अच्छे व्यवहार और सकारात्मक परामर्श” को इतना नजरंदाज क्यों करते हैं? सबके लिए स्वास्थ्य के वायदे में केवल दवाओं या उपचार ही नहीं बल्कि स्वस्थ जीवन जीने के लिए बेहतर परिस्थितियां बनाया जाना भी शामिल होता है। स्वास्थ्य के अधिकार को तकनीकी व्यवस्था के नजरिए से नहीं, मानवीय संवेदनाओं के नजरिए से स्थापित किये जाने की जरूरत है।

बीमारियों के कारण बढ़ती आत्महत्याएं स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव और सामाजिक ताने-बाने में उत्पन्न खामियों को भी उजागर करती हैं

उपचार और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति

एक अन्य बिंदु है जो स्वास्थ्य सेवाओं, उपचार और उसकी अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। भारत में स्वास्थ्य पर होने वाले कुल व्यय में से लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा लोगों की जेब से आता है। केवल 20 फीसदी व्यय ही सरकार के खाते से आता है। हर साल लगभग 4 प्रतिशत लोग केवल इसलिए गरीब हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी बीमारी के इलाज के लिए “बहुत ज्यादा खर्च” करना पड़ता है। भारत में 1 से 2 करोड़ लोग गंभीर मानसिक विकारों की गिरफ्त में हैं, 5 करोड़ लोग गंभीर अवसाद के शिकार हैं, फिर भी हम अपने कुल स्वास्थ्य बजट का केवल 0.06 प्रतिशत हिस्सा मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं। भारत में दस लाख की जनसंख्या पर केवल तीन मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जबकि मानकों के मुताबिक 56 मनोचिकित्सक होने चाहिए। भारत में करीब 66,200 मनोचिकित्सकों की जरूरत है। ऐसे में हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था ही लोगों को महंगे और नियमनों से बाहर खड़ी निजी स्वास्थ्य व्यवस्था की तरफ जाने को मजबूर करती है, जिसका परिणाम होता है गरीबी‍!

यह तो मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति है, लेिकन सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं का क्या? सरकार उसे पूरी तरह से निजी क्षेत्र को सौंप देना चाहती है। सेंटर फॉर इंश्योरेंस एंड रिस्क मेनेजमेंट और इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च ने मध्यप्रदेश के दो जिलों में एक अध्ययन किया, जिससे पता चला कि ग्रामीण इलाकों में 40 प्रतिशत परिवारों में किसी सदस्य के बीमार पडने के कारण परिवार की आय पर गहरा आघात पड़ता है। इस अध्ययन के मुताबिक गांव के हर परिवार पर औसतन 78,828 रुपए का कर्ज है; इसमें से 17 से 18 प्रतिशत कर्ज 29 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर बीमारी के इलाज के लिए लिया गया।

आज हम एक ऐसे देश के रूप में जाने जाते हैं जहां दुनिया में सबसे ज्यादा बच्चे अपना पहला जन्मदिन मनाने से पहले मर जाते हैं, सबसे ज्यादा मातृत्व मौतें यहां होती हैं। दुनिया के आधे कुष्ठ रोगी (130 हजार) और 21 प्रतिशत तपेदिक-टीबी के रोगी (19 लाख) भारत में रहते हैं। यह एक दुखद तथ्य है कि भारत सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में बेहद गैर-जिम्मेदार रवैया अपनाया है। भारत में वर्ष 2011 की स्थिति में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति लगभग 2,500 रुपए का कुल खर्च हो रहा है। इसमें से सरकार केवल 675 रुपए खर्च कर रही है और बाकी 1,825 रुपए लोगों की जेब से खर्च हो रहे हैं। यह लोगों को कर्जदार बनाने में अहम भूमिका निभा रहा है। बेहद दुखद है कि भारत में वर्ष 2011 की स्थिति में दवाओं के लिए प्रति व्यक्ति केवल 43 रुपए वार्षिक आवंटन किया जा रहा था और केवल 5.4 प्रतिशत लोगों को ही मुफ्त दवाइयां मिल पा रही हैं।

12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए बने विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट के मुताबिक भारत को स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए 6.26 लाख चिकित्सक सहित 49.69 लाख स्वास्थ्य कर्मचारियों की जरूरत है। इसके साथ ही हमें 187 मेडिकल कालेजों, 383 नर्सिंग स्कूल्स और 232 एएनएम स्कूल्स की जरूरत है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए भारत सरकार तैयार नहीं है और योजना आयोग ऐसे में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की शर्त लादता है। पिछले 35 सालों में नीति के स्तर पर सरकार की प्राथमिकता की सूची में से स्वास्थ्य क्षेत्र बाहर होता गया है।

ये परिस्थितियां हमें गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पंहुच और समाज में मानसिक रोगों के प्रति एक सघन पहल करने के लिए प्रेरित करती हैं। यह वक्त की जरूरत है कि लंबी, असाध्य और पीड़ादायक रोगों से प्रभावित व्यक्तियों की सही और सकारात्मक देखरेख की सामाजिक व्यवस्था को पुनःस्थापित किया जाए।

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