भेंट: अकाल का भोजन

धार्मिक महत्व होने के साथ ही भेंट के पौधे के सभी हिस्से स्वास्थ्य के रक्षक हैं। मेघालय में हो रहा है इसे विलुप्ति से बचाने का उपाय

 
By Chaitanya Chandan
Last Updated: Wednesday 04 October 2017 | 09:25:44 AM
भेंट के फूल के पकोड़े (चैतन्य चंदन / सीएसई )
भेंट के फूल के पकोड़े (चैतन्य चंदन / सीएसई ) भेंट के फूल के पकोड़े (चैतन्य चंदन / सीएसई )

ठंड के मौसम की शुरुआत में बिहार में सफेद रंग के कमल का फूल बाजारों में बिकने आता है जिसे वहां की आम बोलचाल में भेंट का फूल कहा जाता है। भेंट के फूल को अंग्रेजी में व्हाइट इजिप्शियन लोटस कहा जाता है और इसका वैज्ञानिक नाम निम्फिया लोटस है। इसकी भारतीय प्रजाति का वैज्ञानिक नाम निम्फिया टेट्रागोना है और हिंदी में इसे सफेद कमल या कुमुदिनी के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे पिग्मी वाटर लिली कहा जाता है। यह पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के कई हिस्सों में पाया जाता है।

सफेद कुमुदिनी का जिक्र वेदों में मिलता है। हिंदू मान्यता के अनुसार सफेद कमल पर विद्या की देवी सरस्वती विराजमान होती हैं। इसलिए उनकी पूजा में सफेद कुमुदिनी का इस्तेमाल किया जाता है। एक मान्यता के अनुसार इसका नाम भेंट का फूल इसलिए पड़ा क्योंकि इसका इस्तेमाल पूजा के समय देवी- देवताओं को भेंट के रूप में अर्पण करने के लिए किया जाता था।

कुमुदिनी को पहली बार वर्ष 1802 में ब्रिटेन के लॉडिजेस नर्सरी में उगाया गया था। लॉडिजेस नर्सरी 18वीं शताब्दी में जोचिम कौनराड लॉडिजेस द्वारा स्थापित ऐसी नर्सरी थी, जिसमें मुख्य रूप से अनोखे व असाधारण पौधे, झाड़ियां, फर्न और आर्किड उगाए और बेचे जाते थे। भेंट के फूल का इस्तेमाल अक्सर साफ पानी के एक्वेरियम प्लांट के तौर पर किया जाता है। कमल की अन्य प्रजातियों की तरह ही भेंट के पत्ते भी पानी के ऊपर तैरते हैं और फूल पानी से ऊपर खिलते हैं। भेंट के पौधे की ऊंचाई 45 सेमी तक होती है। यह मुख्यतः ऐसे तालाबों में पनपता है जिसका पानी साफ, गर्म, ठहरा हुआ और थोड़ा अम्लीय हो।

प्राचीन काल में मिस्र में भेंट के फूल की पूजा की जाती थी। वहां इसे सृष्टि के प्रतीक के तौर पर देखा जाता था। प्राचीन ग्रीस में इसे निष्कपटता और विनम्रता का प्रतीक माना जाता था। भेंट का फूल मिस्र का राष्ट्रीय फूल है और मिस्र के कॉप्टिक इसाई समुदाय के ध्वज का एक अहम हिस्सा भी है। प्राचीन मिस्रवासी भेंट का फूल तालाबों और दलदलों में उगाते थे। प्राचीन मिस्र में इस फूल का इस्तेमाल अक्सर सजावट के लिए भी किया जाता था। उनकी मान्यता थी कि भेंट का फूल उन्हें ताकत और मजबूती प्रदान करता है। प्राचीन मिस्र के नविन राज्य के उन्नीसवें वंश के तीसरे फैरो रामासेस द्वितीय की कब्र में भी इस फूल के  अवशेष मिले हैं।

भेंट के पौधे की जड़ में अत्यधिक मात्रा में स्टार्च पाए जाने के कारण अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इसे उबालकर, भूनकर या आटे की तरह पीसकर खाया जाता है। इसके बीज को भी भोजन में शामिल किया जाता है। भारत में भेंट का फूल, बीज और जड़ का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाने के लिए किया जाता है। इसे भारत में अकाल के भोजन के रूप में भी जाना जाता है।

दिल्ली स्थित बहाई प्रार्थना स्थल “लोटस टेम्पल” सफेद कमल के आकार का बनाया गया है। बहाई कमल मंदिर का डिजाइन ईरानियन आर्किटेक्ट फरिबोर्ज सहबा ने किया था। दरअसल जब इस उपासना स्थल के निर्माण की योजना बनाई जा रही थी, तो इसका आकार ऐसा चुनने की बात की गई जो ज्यादातर धर्मों में स्वीकार्य हो। सफेद कमल की स्वीकार्यता हिंदू और बौद्ध धर्मों के अलावा भी कई संस्कृतियों में है। इसलिए आखिरकार यह उपासना स्थल सफेद कमल के आकार का बनाने का निर्णय किया गया।

बांग्लादेश के राष्ट्रीय प्रतीक में सफेद कुमुदिनी को शामिल किया गया, क्योंकि यह बांग्लादेश का राष्ट्रीय पुष्प भी है। इसे वहां शाप्ला के नाम से संबोधित किया जाता है।

बौद्ध धर्म की मान्यता के अनुसार सफेद कुमुदिनी आध्यात्मिक सिद्धि और मानसिक पवित्रता की स्थिति को दर्शाता है। वर्ष 2016 में प्रकाशित एडवर्ड हेजटेल शेफर की किताब “द गोल्डन पीचेस ऑफ समरकंद: अ स्टडी ऑफ त’अंग एग्जोटिक्स” के अनुसार सफेद कुमुदिनी हिंदुओं की देवी लक्ष्मी का आसन होने के साथ ही अवलोकितेश्वर का भी आसन है। अवलोकितेश्वर महायान बौद्ध संप्रदाय के सबसे लोकप्रिय बोधिसत्वों में से एक हैं। चीन के दुन हुआंग नामक शहर में 10वीं शताब्दी में मिली एक चित्रकारी में भी अवलोकितेश्वर को सफेद कुमुदिनी पर विराजमान दिखाया गया है। पुस्तक के अनुसार चंद्रमा सफेद कुमुदिनी का देवता है, इसलिए चंद्रमा को कुमुदपति के नाम से भी जाना जाता है। सफेद कुमुदिनी रात के समय खिलता है और सूरज निकलने पर मुरझा जाता है।

लखनऊ स्थित बायोटेक पार्क के सीईओ प्रमोद टंडन द्वारा वर्ष 2010 में मेघालय में किए गए अध्ययन के अनुसार सफेद कुमुदिनी की यह प्रजाति विलुप्ति के कगार पर है। टंडन ने बताया कि इसके लिए अनियोजित मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार है, जिसने इसके प्राकृतिक उत्पत्तिस्थान को काफी नुकसान पहुंचाया है। टंडन ने बताया कि शिलॉन्ग स्थित नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्लांट बायोटेक्नॉलॉजी ग्रुप द्वारा कुमुदिनी की इस प्रजाति के संरक्षण और संवर्धन के प्रयास किए जा रहे हैं।
 
औषधीय गुण

सफेद कुमुदिनी का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के रोगों के इलाज के लिए प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है। वर्ष 2014 में बायोमेड रिसर्च इंटरनेशनल नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार निम्फिया टेट्रागोना का सत्व दवा-प्रतिरोधी सालमोनेला जीवाणु के संक्रमण को दूर करने में कारगर है।

सालमोनेला जीवाणु खाद्य विषाक्तता के लिए जिम्मेदार होता है। बांग्लादेश जर्नल ऑफ मेडिकल साइंस नामक जर्नल में जनवरी 2015 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार निम्फिया टेट्रागोना पौधे के सभी हिस्सों का इस्तेमाल साइबेरिया और चीन में पारंपरिक औषधि के तौर पर किया जाता है। गुर्दे की बीमारी में कुमुदिनी के पत्ते और डंठल का  काढ़ा पीना फायदेमंद होता है। कुमुदिनी की पंखुड़ियां ज्वरनाशक हैं और राईजोम दमा और फेफड़े के रोगों के उपचार में उपयोगी हैं। फरवरी 2016 में फार्माकोलोजी नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार निम्फिया टेट्रागोना त्वचा क्षय (झुर्रियां) को दूर रखने में भी कारगर है।

व्यंजन
 

भेंट के फूल के पकोड़े
सामग्री:

  • भेंट के फूल की पंखुड़ियां : 200 ग्राम
  • बेसन :  300 ग्राम
  • नमक : स्वादानुसार
  • हरी मिर्च : 2-4 (बारीक कटी हुई)
  • लाल मिर्च पाउडर : 1/4 चम्मच
  • कसूरी मेथी : एक चम्मच
  • अजवाइन : 1/2 छोटी चम्मच
  • तेल : पकोड़े तलने के लिए


विधि:  बेसन को किसी बर्तन में छान लें और इसमें पानी मिलाकर गाढ़ा घोल बना लें। इसके बाद भेंट के फूल की सफेद पंखुड़ियों को डंठल से अलग कर लें। इन्हें पानी से साफ करके बेसन के तैयार घोल में अच्छी तरह मिलाएं। इसमें नमक, लाल मिर्च, हरी मिर्च, अजवाइन और कसूरी मेथी मिलाएं। अब एक कड़ाही में तेल डालकर अच्छी तरह से गर्म होने दें। तेल जब गर्म हो जाए तो तैयार मिश्रण के मध्यम आकार के गोले बनाकर उसे तेल में छोड़ें। पकोड़ों को थोड़ी-थोड़ी देर में पलटते रहें। सुनहरा होने पर तेल से निकाल लें। टमाटर की चटनी के साथ गर्मागर्म परोसें।

Subscribe to Weekly Newsletter :
We are a voice to you; you have been a support to us. Together we build journalism that is independent, credible and fearless. You can further help us by making a donation. This will mean a lot for our ability to bring you news, perspectives and analysis from the ground so that we can make change together.

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.