मई 2071

जिंदगी अब पहले जैसी परेशानी भरी भी नहीं रह गई थी कि लोगों को एक दूसरे की जरूरत पड़े। 

 
By Sorit Gupto
Last Updated: Tuesday 13 June 2017 | 06:11:20 AM

सोरित/सीएसई

शहर में आज किसी त्योहार जैसा माहौल था। सड़कों पर भीड़, दुकानों में खरीद-फरोख्त करते लोग। बरसों से बेरोजगार रिक्शेवालों के मुरझाये चेहेरों पर रोजगार मिलने की रौनक थी। कुछ लोगों ने जाने कब सड़कों को सस्ते चाइनीज झालरों और उससे भी सस्ती प्लास्टिक की पन्नियों के रंग-बिरंगे पताकों से सजा दिया था। लोगों के चेहरों को देखकर लगता था मानो वे बड़े दिनों बाद एकदूसरे से मिल रहे थे। दरसल यह सही भी था, क्योंकि बरसों से लोगबाग एकदूसरे के घरों पर आना-जाना, मिलना-मिलाना छोड़ चुके थे। जिंदगी अब पहले जैसी परेशानी भरी भी नहीं रह गई थी कि लोगों को एक दूसरे की जरूरत पड़े, जहां तक बातचीत का सवाल था वह अब मुफ्त के फोन पर या अपने कंप्यूटर के जरिये बात कर लेते थे।

बच्चों ने पार्कों में खेलना कब का छोड़ दिया था, क्योंकि अब वह कंप्यूटर पर ही सभी खेल आराम से खेल लेते। “फिरि-होम- डिलेवरी” के युग में लोग कंप्यूटर के जरिये ही खरीदते और अपने घर का कबाड़ भी कंप्यूटर के जरिये बेचते। अलबत्ता अब लोगों ने एकदूसरे से किसी के घर का पता भी पूछना छोड़ दिया था, क्योंकि वह भी कंप्यूटर ही बता देता था और वह भी एकदम सटीक। सबकुछ उपलब्ध था अब हाथों हाथ। जन्मदिन के फूल /केक से लेकर मय्यत का रिप ( RIP) और नए वर्ष की बधाई से लेकर मियां-बीबी के जोक्स से लेकर “व्हाटसापी-सद्वचन” तक सब कुछ। अब ऐसे में भला लोग एकदूसरे से मिलें भी तो क्यों?

कुछ ऐसा ही हाल घर-परिवारों में भी था। साथ रहते हुए भी एकदूसरे की जरूरत खत्म हो गई थी, बातचीत  तो दूर की बात है। जो कभी आमने-सामने गलती से टकरा गए तो एक दूसरे को अंगूठा दिखाकर “लाइक” के सहारे काम चला लेते थे।

ऐसे में आज बहुत वर्षों के बाद एक बार फिर लोगबाग सड़कों पर दिख रहे थे। सड़कों पर वही बरसों पुराना माहौल था। ट्रैफिक की चें-चें-पें-पें, फेरीवालों का तेज आवाज में चीखना, लोगों की धक्कामुक्की। आज बरसों बाद एक बार फिर लोग नकद पैसे देकर खरीदारी कर रहे थे। और तो और, लोगों ने देखा कि उन्हीं में से कुछ एक तो इतने बरसों बाद भी दुकानदारों से जमकर मोल-तोल कर रहे थे। वरना आजकल मोल-तोल “आउटडेटेड” हो गया था। उसकी जगह अब “छूट के कूपनों” ने ले ली थी। इन्हें आज के युग का “दिल्ली के लड्डू” कहा जाता था कि जिसे मिला वह पछताया और जिसे नहीं मिला वह भी पछताया।

उधर पार्कों में बच्चों का हुजूम इकठ्ठा हो गया था जो कहीं पर क्रिकेट खेल रहे थे तो कहीं पर फुटबॉल का मैच चल रहा था। पार्कों के किनारे पड़ी धूल खाती और जंग लगी बेंचों पर आज बरसों बाद कहीं बुजुर्ग गप्प मार रहे थे तो  कहीं महिलाओं का झुंड आपस में बतिया रहा था। आज बहुत दिनों के बाद घरों में सभी लोग एक साथ खाने की मेज पर बैठकर एक-दूसरे से बातें करते हुए खाना खा रहे थे। बहुत दिनों बाद पहली बार उन्होंने एक-दूसरे के चेहरे की ओर देखा और पाया कि बीते हुए बरस सभी के चेहरों पर अपनी छाप छोड़ गए थे। जो कल तक बच्चे थे वे तरुण और युवा हो गए थे। जो कल तक युवा थे वे आज प्रौढ़ हो चले थे। और हां, पहली बार लोगों को यह महसूस हुआ कि उनके आसपास कई नए चेहरे आ गए थे। जब उन्होंने अपने परिचित पुराने चहेरों को तलाशना चाहा तब उन्हें पता चला कि कई पुराने चेहेरे जाने कब उन्हें छोड़कर जा चुके थे।

पर, शहर में आज किसी त्योहार जैसा माहौल था। किसी ने सामने से आते एक सज्जन से पूछा, “भाईसाब! आज कौन सा त्योहार है?”

 “यह तो मुझे भी नहीं पता, बस इतना मालूम है कि किसी इंटरनेट  वायरस के हमले के चलते आज नेट डाउन है”, अगले ने जवाब दिया और आगे बढ़ गया।

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