एमपी अजब है

मध्य प्रदेश के श्योपुर में कुपोषण ने दो बच्चों की जिंदगी खत्म कर दी। प्रदेश में कुपोषण से पिछले साल 100 से अधिक बच्चों को जान गंवानी पड़ी थी। 

 
By Kundan Pandey
Last Updated: Wednesday 04 October 2017 | 09:57:46 AM
नाम:बेबी,
उम्र: ११ महीने,
वजन:3.4 किलो
नाम:बेबी,
उम्र: ११ महीने,
वजन:3.4 किलो नाम:बेबी, उम्र: ११ महीने, वजन:3.4 किलो

मध्य प्रदेश के श्योपुर में कुपोषण की वजह से दो बच्चों के मरने की खबर आ रही है। पिछली साल इसी समय ऐसी ही खबरें छाई हुईं थीं जिसमें करीब 100 से अधिक बच्चों को इसकी वजह से जान गंवानी पड़ी थी। उस समय डाउन टू अर्थ ने श्योपुर और आसपास के जिलों का दौरा कर जमीनी हकीकत पता करने की कोशिश की थी। क्या पता चला था, पढ़िए...

जब तक मैंने मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों की अपनी तीन दिन कि यात्रा पूरी की तब तक मुझे इतने बच्चे कुपोषण का शिकार दिखे जो मेरी डायरी में लिखे शब्दों से कहीं अधिक थे। गांव के गांव, घर के घर और परिवार के परिवार कुपोषित! बेहद बेचैन कर देने वाली तस्वीर! जिससे भी बात करो यही बताता कि जन्म के बाद से ही बच्चा सूखने लगता है और साल भर का होते-होते मरने की स्थिति में आ जाता है। मुझे ये सारी बातें लिखने की जरूरत नहीं थी। पर कई बड़े सवाल मुझे परेशान करते रहे। आखिर इतनी बड़ी तादाद में बच्चों की लंबाई कम क्यों हैं? आदिवासियों में ऐसे बच्चों की संख्या इतनी अधिक क्यों हैं? खाने-पीने की चीजों के मामले में संपन्न जंगलों के आसपास कुपोषण का ऐसा साया? भूख से हुई मौतों के बाद मीडिया में कुपोषण को लेकर हंगामा मचना तय है लेकिन इस बहस में एक महत्वपूर्ण पहलू नजरअंदाज हो रहा है। वह है जंगल, खाद्य पदार्थ की उपलब्धता और आजकल आदिवासी बच्चों की लंबाई कम होने के बीच गहरा संबंध।

अक्टूबर महीने के हिसाब से गर्मी अधिक थी, उमस भी। श्योपुर जिले की आदिवासी बहुल तहसील कराहल से करीब पांच किलोमीटर दूर जंगलों से घिरे गांव सोनीपुरा का आंगनबाड़ी केंद्र बेहद व्यवस्थित दिख रहा था। अमूमन ऐसा नहीं होता। बाहर सफेद दीवार पर लाल रंग के मोटे अक्षरों में कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों की संख्या लिखी हुई थी। अंदर गया तो कोई नहीं मिला पर खिलौने वगैरह काफी थे। साफ कालीन बिछी थी। किसी के आने की भनक लगते ही आंगनबाड़ी सहायिका मिसरों आदिवासी आ गई। उसने बताया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कांता शर्मा कराहल गईं हुई हैं। ग्यारह बजे चुके थे और पूछने पर पता चला कि अभी तक बच्चों को सुबह का नाश्ता नहीं मिला है। सहायिका ने बताया कि रोज इस समय तक नाश्ता मिल जाता है। यहां से गांव की तरफ निकला तो एक बच्ची पर नजर पड़ी। शिवानी नाम की इस बच्ची की उम्र करीब एक साल थी लेकिन वजन मात्र पांच किलो! अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से करीब चार किलो कम। जब उसकी मां रूपवती से पूछा कि क्या आपकी बेटी को आंगनबाड़ी से खाना मिलता है तो उनका जवाब था, “हर मंगलवार को घर लाने के लिए दलिया मिलता है।” जब वह गर्भवती थी तब भी कुछ नहीं मिलता था। गांव वालों ने बताया कि आजकल बहुत सारे अधिकारी इधर दौरे पर आ रहे हैं इसलिए आंगनबाड़ी का रंगरोगन किया गया है। जबकि अंदर की स्थिति यह है कि रसोईये को पिछले चार महीने से वेतन नहीं मिला है।

श्योपुर का कराहल स्थित एनआरसी इन दिनों चर्चा में है। बीस बिस्तरों वाले इस पोषण पुनर्वास केंद्र में सितंबर माह में डेढ़ सौ अति कुपोषित बच्चे इलाज के लिए लाए जा चुके हैं। बच्चों की तादाद अधिक हुई तो मजबूरी में जमीन पर ही बिस्तर लगाना पड़ा


श्योपुर जिले में पिछले दो-तीन महीनों में करीब 116 बच्चे कुपोषण के चलते मौत के मुंह में जा चुके हैं, जिनमें से लगभग सभी आदिवासी हैं। इस जिले में अधिकतर सहरिया आदिवासी हैं। इन मौतों को लेकर सितंबर के आखिरी में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मध्य प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने जिले में कुपोषण से होने वाली मौतों की खबरों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे “चिंताजनक” बताया। यही वजह है कि अधिकारियों और मीडिया का इस इलाके में तांता लगा हुआ है। कुपोषण के पैमानों पर श्योपुर की हालत किसी से छिपी नहीं है। वर्ष 2015 में आए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनफएचएस-4) के अनुसार, श्योपुर जिले में पांच साल की उम्र तक के करीब 55 प्रतिशत बच्चों का वजन कम है। मध्य प्रदेश के कुल 42 प्रतिशत बच्चे इस श्रेणी में आते हैं। इसी सर्वे में बच्चों की लंबाई में कम रहने की बात भी उजागर होती है। सर्वेक्षण के अनुसार, श्योपुर जिले के हर दूसरे (52.2 प्रतिशत) बच्चे की लंबाई उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही है। मध्य प्रदेश के कुल 42 प्रतिशत बच्चे इस तरह वृद्धि बाधित कुपोषण यानी कद में कमी के शिकार हैं।

‘पोषण कार्यक्रमों की स्थि‍ति काफी खराब’
 
अभय बांग

हमारे एक अध्ययन, जो गत जुलाई में लैंसेट जर्नल में छपा था, में हमने पाया कि 51.1 प्रतिशत आदिवासी बच्चे कुपोषित हैं। यह सामान्य (43.1) से करीब आठ प्रतिशत अधिक है। कुपोषण आदिवासियों में अधिक हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। कुपोषण का अधिक होना कई चीजों पर निर्भर करता है जैसे सामाजिक व आर्थिक स्थिति, शिक्षा का स्तर, मां का स्वास्थ्य और इलाज की सुविधा इत्यादि।

पिछले 150 सालों में विज्ञान ने काफी प्रगति की है और इसका फायदा लोगों को मिला है। लेकिन आदिवासी इस ज्ञान से एकदम अछूते हैं। दूसरे कुपोषण दूर करने के लिए जितने भी कार्यक्रम हैं, उनकी स्थिति काफी खराब है। समकेत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) और पोषण कार्यक्रम पर कुल 30 हजार करोड़ रुपया खर्च होता है। लेकिन जमीन पर इसका कितना फायदा पहुंचा, यह पता लगना बाकी है। जब तक आईसीडीएस का फायदा मिलना शुरू होता है, बच्चा कुपोषण का शिकार हो चुका होता है। शुरुआती दो साल में ही कुपोषण का असली प्रभाव पड़ता है।

भोजन से इंसान को मुख्य रूप से दो तरह की चीजे मिलती हैं। विटामिन-मिनरल और प्रोटीन। वनों से विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ मिलते रहे हैं और यह आदिवासी समाज में विटामिन की जरूरत पूरी कर देता था। इससे इनकी पोषण सुरक्षा सुनिश्चित होती थी। वहीं जंगली जानवर के मांस से प्रोटीन भी खूब मिल जाता था। अब जंगली जानवरों की संख्या कम हुई है। लेकिन यह कह पाना मुश्किल है कि वनों से मिलने वाले भोजन से आदिवासी समाज की साल भर की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो पाती थी या नहीं।

सामाधान के तौर पर तो सुझाव यह है कि सरकार को आदिवासियों की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति में सुधार पर पूरा ध्यान देना चाहिए। महिलाओं के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इससे न सिर्फ महिलाओं का स्वास्थ्य सुधरेगा बल्कि बच्चों के स्वास्थय पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। पूरे आदिवासी समाज में वैज्ञानिक जानकारी को जोर-शोर से पहुंचाया जाए। इस समाज में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की जरूरत है। हम अपनी एक रिपोर्ट आने वाले महीनों में सरकार को सौपेंगे, जिसमे हम लोगों का सुझाव है कि स्वास्थ्य सुविधाओं को व्यापक कैसे बनाया जा सकता है। पीडीएस खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है इसलिए इसे सुनिश्चित करते हुए जंगलों पर आदिवासियों का अधिकार सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

लेखक गढ़चिरौली की संस्था ‘सर्च’ के निदेशक और आदिवासियों में स्वास्थ्य सुधार को लेकर बनी सरकारी समिति के अध्यक्ष हैं। लेख उनसे हुई बातचीत पर आधारित है।

आश्चर्य की बात है कि पूरे मध्य प्रदेश में 42 फीसदी बच्चों की लंबाई कम है फिर भी यह समस्या गंभीर मुद्दे के तौर पर सामने नहीं आई। स्थानीय लोगों के लिए यह आम बात है, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार भी लंबाई में कमी यानी स्टंटिंग को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं है। जबकि दुनिया भर में स्टंटिंग को कुपोषण के गंभीर परिणाम के तौर पर देखा जा रहा है।

दरअसल, कुपोषण ऐसी स्थिति है जब शरीर में पौषक तत्वों की कमी हो जाती है। आमतौर पर ऐसा तब होता है जब या तो पर्याप्त भोजन उपलब्ध न हो या फिर भोजन में शरीर के लिए आवश्यक पौष्टिकता की कमी हो। इसकी वजह से बच्चों का वजन कम होने लगता है, उनमें तमाम बीमारियों से लड़ने की क्षमता कम होने लगती है और बच्चों का विकास प्रभावित होता है। अगर ऐसा लगातार चलता रहा तो कुपोषण से बच्चों की लंबाई में बढ़ोतरी भी धीमी पड़ सकती है। कुपोषण को प्रभाव को समझने के लिए आजकल वैज्ञानिक लंबाई पर पड़ रहे असर पर विशेष ध्यान देते हैं। श्योपुर में यह आसानी से देखा जा सकता है। लेकिन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने बताया कि वह बच्चों की लंबाई तो मापती ही नहीं है। कुपोषण की स्थिति जानने के लिए बस वजन और हाथ की मोटाई देखी जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता अजय बांग भी पोषण कार्यक्रमों में इस तरह की खामियों की ओर इशारा करते हैं।

जंगल में करीब दो-तीन किलोमीटर अंदर भैरोपुरा गांव में शिवराज से मुलाकात हुई। उनका एक साल का बच्चा गत अगस्त में मर गया था। शिवराज बताते हैं कि उनका बच्चा बहुत दिनों से ‘सूख’ रहा था। इन इलाकों में यह सामान्य बात है। इस अवस्था में बच्चों का विकास थम-सा जाता है और वे बेहद कमजोर, दुबले होने लगते हैं। इन गांवों में बच्चों को ‘सूखने’ से बचाने के लिए गले में फटे कपडे को लपेट कर उसमें ताबीज लगाकर पहनाते हैं। शिवराज बताते हैं कि बच्चे की हालत बिगड़ती देख जून महीने में मिनी आंगनबाड़ी सहायिका ने उन्हें सलाह दी कि बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया जाए। शिवराज ने बात मानी और बच्चे को भर्ती कराया। करीब दो हफ्ते भर्ती रहने के बाद बच्चे को वापस लाया गया, कुछ दिनों बाद तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां भी सप्ताह भर इलाज चला। सुधार न होता देख वह बच्चे को घर ले आया, जहां कुछ दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई।

जंगलों के करीब रहने वाले लोग रहेंगे गरीब

जंगलों के करीब रहने वाले लोग रहेंगे गरीब

तीस वर्षीय अध्ययन से पता चलता है कि एेसे लोग जो या तो आदिवासी हैं या फिर जंगलों के करीब रहते हैं, उनकी आने वाली पीढ़ि‍यां भी अत्यंत गरीबी में रहेंगी। भारत के इन क्षेत्रों में मध्य प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। यह महज सयोंग नहीं है कि यहां कुपोषण का सबसे भीषण रूप देखने को मिल रहा है


 

खुद शिवराज भी अपने पिता मनीराम से देखने में कमजोर और कद में छोटे हैं जबकि जिम्मेदारियों का बोझ उन पर अपने पिता से भी ज्यादा है। ऐसे कई उदाहरण इस इलाके में मिल जाएंगे। मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय के साथ काम करने वाले कई लोगों का मानना है कि आदिवासियों की औसत लंबाई घट रही है। सवाल उठता है कि जंगल के इतने करीब रहने वाले आदिवासियों में कुपोषण और लंबाई में कमी की समस्या ने इतना विकराल रूप कैसे धारण कर लिया?

सहरिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाले शिवराज बताते हैं कि जीवन यापन करने के लिए पिताजी को जंगल से काफी मदद मिल जाया करती थी। खाने-पीने की बहुत-सी चीजें जंगल से जुटाना आसान था। लेकिन समय के साथ जंगल से दूरी बढ़ती गई। अब शिवराज के पास पेट भरने के लिए मजदूरी करने के सिवा कोई चारा नहीं है। मजदूरी के जरिये उसे अपने पिता, पत्नी और छह बच्चों का पेट भरना होता है। काम नहीं मिलने पर खाली पेट सोना इस परिवार के लिए सामान्य बात है। ऐसी स्थिति में उसने छह बच्चे क्यों पैदा किए? इस पर शिवराज का जवाब है कि सभी बच्चे सही सलामत बड़े हो जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इनमें से अगर दो-तीन बच जाएं तो गनीमत होगी। इन गांवों में दस्त और बुखार जैसी बीमारियां बच्चों के लिए जानलेवा साबित होती हैं। पचास-पचपन घरों वाले इस गांव में हर साल तीन-चार बच्चे तो मर ही जाते हैं। इसी साल इस गांव में इस साल अगस्त-सितंबर के दौरान चार बच्चों की मौत हो चुकी है, जिसकी वजह निमोनिया, दस्त, बुखार आदि बताई गई है। आंगनबाड़ी के रिकॉर्ड के अनुसार, अभी इस गांव में कुल 40 लड़कियां और 42 लड़के हैं, जिनमें से 6 अतिकुपोषित और 10 कुपोषित हैं।

भैरोपुरा अकेला गांव नहीं है जहां ऐसी स्थिति है। अधिकारियों और मीडिया में थोड़ी जागरूकता का परिणाम यह निकला कि सितंबर में कुल 155 बच्चे स्थानीय एनआरसी में इलाज के लिए लाए गए। यह एनआरसी बीस विस्तरों का है और ज्यादा बच्चों को संभालने के लिए किराए पर बिस्तर मंगाने पड़े। ये विस्तर जमीन पर बिछाए गए। आपात स्थिति को देखते हुए 30 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को यहां लगाया गया। खंड चिकित्सा अधिकारी महेश व्यास ने यह कहकर इसे सामान्य घटना बताया कि हर साल इन महीनों में ऐसा होता है। लेकिन आंकड़े इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। वर्ष 2015 में यहां सबसे अधिक 39 बच्चे जून महीने में लाए गए थे। पिछले साल सितंबर में सिर्फ 23 बच्चे भर्ती हुए थे। जबकि वर्ष 2014 में सितंबर में सबसे ज्यादा 48 बच्चे यहां लाए गए थे।

इसी तरह शिवपुरी जिले के पोहरी ब्लाक में गांव के गांव कुपोषित हैं। टपरपूरा गांव के रमदान की बेटी संगीता पिछले महीने गुजर गई। दो साल की यह बच्ची करीब एक साल से ‘सूख’ रही थी। रमदान बताते हैं कि संगीता को अचानक दस्त लगे, तेज बुखार भी था। इलाज के लिए अस्पताल ले जाने से पहले ही बच्ची की मौत हो गई। अगस्त से अब तक इस गांव में तीन बच्चे इसी तरह मरे चुके हैं।

इसी ब्लाॅक के अहेरा गांव की तो स्थिति और भी खराब है। यहां रहने वाली चमेली आदिवासी की ग्यारह महीने की बच्ची सिर्फ 3.4 किलो की है जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से उसका वजन करीब 9 किलो होना चाहिए। इस उम्र के छह किलो से कम के वजन के बच्चे अतिकुपोषित की श्रेणी में आ जाते हैं। जब हम चमेली के घर गए तो उनके घर में खाने को कुछ भी नहीं था। उनके पति दाम सिंह को काम मिलेगा तो परिवार को आज का खाना नसीब होगा। एक दिन पहले भी रोटी और हरी मिर्च से ही काम चलाना पड़ा था। इनकी बच्ची की स्थिति इतनी चिंताजनक होते हुए भी इन्हें आंगनबाड़ी से बस मंगलवार को एक पंजीरी की थैली मिलती है। चमेली बताती हैं कि पंद्रह दिन पहले वह बच्ची को एनआरसी में भर्ती कराने ले गई थी। वहां से उसे अस्पताल जाने को कहा गया लेकिन वह बच्ची को अस्पताल नहीं ले जा पाई। इस गांव में गत सितंबर में तीन बच्चे कुपोषण की वजह से मर चुके हैं। गांववालों ने बताया कि पिछले साल पांच या छह बच्चे दस्त और बुखार जैसी सामान्य बीमारियों से मौत का शिकार चुके हैं। दरअसल, बच्चों के विकास का रोकने वाला यह कुपोषण एक दुष्चक्र की तरह से जो मां के पेट से ही शुरू हो जाता है। (ऊपर चार्ट)

कुपोषण और लंबाई में कमी
मध्य प्रदेश में कुपोषण का सिलसिला काफी पुराना है। वर्ष 1992 में जब पहली बार राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण हुआ था तब मध्य प्रदेश कम वजन वाले 57 फीसदी बच्चों के साथ उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद तीसरे नंबर पर था। वर्ष 2005-06 में हुए तीसरे सर्वेक्षण में तकरीबन यही स्थिति सामने आई। मध्य प्रदेश में तब 46.5 फीसदी बच्चे उम्र के हिसाब से कद में छोटे और 57.9 फीसदी बच्चे कम वजन वाले थे।

बच्चों से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था सेव द चिल्ड्रेन ने विश्व बैंक की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए जून, 2016 में अपने एक आलेख में बताया कि मध्य प्रदेश में कुपोषित बच्चों की संख्या देश के किसी भी अन्य राज्य से अधिक है। यहां छह साल तक के करीब 74.1 प्रतिशत बच्चाें में खून की कमी है और 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। मध्य प्रदेश जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर राज्य में कुपोषण की यह तस्वीर और भी भयावह है। खासकर वनों के आसपास रहने वाले आदिवासी लोगों में भयंकर कुपोषण एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करती है।

मध्य प्रदेश प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर राज्य है। देश की कुल भूमि का 9.4 प्रतिशत मध्य प्रदेश में है। विभिन्न प्रकार के वन से जुड़े संसाधन भी यहां भरपूर हैं। राज्य में कुल वन क्षेत्र 77,522 वर्ग किलोमीटर है जो कुल क्षेत्रफल का चौथाई हिस्सा है। हाल के वर्षों में मध्य प्रदेश ने 10 प्रतिशत से अधिक की विकास दर हासिल की है। जबकि इस दौरान देश की आर्थिक विकास दर बमुश्किल पांच फीसदी रही। मसलन, वित्त वर्ष 2013-14 में देश की आर्थिक वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत था वहीं मध्य प्रदेश में 11.1 प्रतिशत। कृषि के क्षेत्र में भी राज्य की उपलब्धियों की खूब चर्चा हुई है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान गत पांच-छह वर्षों में 14 प्रतिशत से ऊपर रहा है।


विकास के इन पैमानों पर मध्य प्रदेश के शानदार प्रदर्शन के बावजूद राज्य में कुपोषण की स्थिति खासकर बच्चों की लंबाई में कमी की समस्या चिंताजनक है। वर्ष 2015 की शुरुआत में आए महिला एंव बाल विकास मंत्रालय के रैपिड सर्वे ऑन चिल्ड्रेन के नतीजों को देखें तो पता चलता है कि भारत में 38.8 प्रतिशत बच्चे उम्र के हिसाब से कद में नहीं बढ़ रहे हैं जबकि मध्य प्रदेश में ऐसे बच्चों की तादाद 41.6 प्रतिशत है। मतलब प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद मध्य प्रदेश की आदिवासी जनता भूखमरी और वृद्धि बाधित कुपोषण की मार झेल रही है।

देश में कुपोषित आबादी, आदिवासी समुदायों और प्राकृतिक संसाधनों के भूगोल के बीच गहरा संबंध देखने को मिलता है। ‘डाउन टू अर्थ’ के विश्लेषण में सामने आया कि जिन जिलों में आदिवासियों के संख्या अधिक है वहां कुपोषण भी ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर, मध्य प्रदेश के अलीराजपुर, धार, डिंडोरी, झाबुआ आदि जिलों में कुपोषण की वजह से करीब 50 फीसदी बच्चों का कद उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रहा है। श्योपुर में भी करीब 52 प्रतिशत बच्चे वृद्धि बाधित कुपोषण से पीड़ित हैं। (पेज 34 पर नक्शा देखें) महाराष्ट्र के आदिवासियों के साथ काम करने वाले डॉक्टर आशीष साटव कहते हैं, “यूं तो पूरे भारत में कुपोषण की समस्या बहुत गंभीर है लेकिन आदिवासियों में यह विकराल रूप धारण कर चुकी है। खासतौर, वृद्धि बाधित कुपोषण या स्टंटिंग जिसमें शुरुआती पांच साल में बच्चों का उतना विकास (लंबाई) नहीं हो पाता जितना होना चाहिए।” यह बच्चों में लंबे समय तक पोषण की कमी और इसके प्रभाव को दर्शाता है।

वृद्धि बाधित कुपोषण की मार सिर्फ बचपन में ही नहीं बल्कि जिंदगी भर पड़ती है। जैसे शिवराज लंबाई में अपने पिता से छोटा है। हालांकि, कुपोषण से बच्चों की लंबाई पर पड़ने वाले असर को लेकर मध्य प्रदेश में कोई अध्ययन नहीं हुआ है लेकिन अन्य राज्यों में आदिवासियों के साथ काम करने वाले विशेषज्ञ बताते हैं कि पिछली एक सदी में आदिवासियों की लंबाई घटी है।

झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता सौमिक बैनर्जी ने एक अध्ययन में पाया कि पहरिया समुदाय के वयस्कों की औसत लंबाई 157.7 सेमी से घटकर 149.7 सेमी हो गई है। अपने अध्ययन के लिए उन्होंने हर्बर्ट रिसले की सन 1915 में प्रकाशित पुस्तक का सहारा लिया और पाया कि पिछले सौ साल में इस समुदाय की औसत लंबाई 8 सेमी. घटी है। सौमिक ने अपने अध्ययन में जो अधिकतम लंबाई पाई वह 165 सेमी. थी जबकि रिसले के अध्ययन में यह 170.8 सेमी. थी। हैरानी की बात यह है कि रिसले के अध्ययन में जो निम्नतम लंबाई थी, वही अभी की औसत लंबाई के आसपास है। रिसले के अध्ययन में सबसे छोटा व्यक्ति 147 सेमी था। बैनर्जी ने 109 लोगों पर यह अध्ययन किया जबकि रिसले ने 100 लोगों पर अध्ययन किया था। इन दोनों अध्ययन में 21 वर्ष से अधिक के पुरुष और 18 वर्ष से अधिक की महिलाओं को शामिल किया गया। सौमिक के मुताबिक, “पिछले सौ साल में झारखण्ड के कोरवा समुदाय के लोगों की लंबाई में पांच सेमी. की कमी देखी गई है।”

छत्तीसगढ़ में पिछले दो दशक से आदिवासियों को चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने में जुटे जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था के योगेश जैन भी आदिवासी लोगों की लंबाई घटने की बात को स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि अब आदिवासी बच्चों की औसत उम्र पिछली पीढ़ी के मुकाबले कम हो गई लगती है। जैन बताते है,“बहुत से आदिवासी युवक ऐसे हैं जिनकी लंबाई सामान्य थी लेकिन उनके बच्चों की लंबाई उनसे काफी कम है।” यह बताता है कि उनके घर में खाने की उपलब्धता कालांतर में कम हुई है। अंदाजा लगा सकते हैं कि मध्य प्रदेश में आदिवासियों की स्थिति किसी भी तरह से छत्तीसगढ़ और झारखण्ड से बेहतर तो नहीं ही होगी।

भैरोपुरा गांव के शिवराज का एक साल का बेटा अगस्त में कुपोषण के चलते मौत के मुंह में चला गया। वह बताते हैं कि उनकी आर्थिक हालत बिगड़ती जा रही है। परिवार का पेट पालना मुश्किल हो गया है। ऊपर से सरकार ने जंगल में घुसने पर भी पाबंदी लगा रखी है

आदिवासियों में बच्चों की लंबाई पर कुपोषण के प्रभाव का यह तकरीबन अनदेखा-सा पहलू है। जिस दौर में आम भारतीयों की लंबाई बढ़ रही है, आदिवासियों की लंबाई घटने के संकेत मिल रहे हैं। गत जुलाई में प्रकाशित एक अध्ययन में इस बात की पुष्टि होती है कि पिछले सौ वर्षों के दौरान भारतीय लोगों की औसत लंबाई साढ़े चार सेमी. बढ़ी है। यह अध्ययन ‘eLIFE’ नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ था। इस शोध में करीब 800 वैज्ञानिकों ने भाग लिया था। यह बात अलग है कि भारतीयों की औसत लंबाई अन्य देशों के मुकाबले काफी कम बढ़ी है।

2015 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री ऐंगस डीटन ने भारत में लोगों की लंबाई को लेकर सन 2008 में एक अध्ययन किया था। इस अध्ययन में उन्होंने 2005-06 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2001 की जनगणना और कई अध्ययनों के आधार पर निष्कर्ष निकाला था कि भारतीयों की औसत लंबाई बढ़ी है।

योगेश जैन कहते हैं कि जंगलों के आसपास रहने वाले शिवराज और उनके जैसे युवक जो लंबाई में अपने पिताओं से छोटे हैं, एक गंभीर समस्या का संकेत हैं। इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो डेरेक हेडी का कहना है कि आजकल शोधकर्ता कुपोषण की स्थिति जानने के लिए मुख्यतः वृद्धि बाधित कुपोषण यानी स्टंटिंग पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। स्टंटिंग पौष्टिक भोजन की लगातार कमी को दर्शाता है। कुपोषण को समझने के अन्य तरीके जैसे कम वजन होना तात्कालिक समस्या को दिखाता है, जिसे तात्कालिक प्रयासों से सुलझाया जा सकता है। लेकिन लंबाई रोकने वाले कुपोषण से उबरना इतना आसान नहीं है। कई अध्ययन बताते हैं कि इस तरह का कुपोषण मां के पेट से ही शुरू हो जाता है और शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास को भी अवरुद्ध कर सकता है।

वर्ष 2014 में दक्षिण अफ्रीकी बच्चों पर हुए एक शोध के अनुसार, वृद्धि बाधित कुपोषण का असर बच्चों के मानसिक विकास पर पड़ता है। भारत में हुए तमाम अध्ययन भी इसकी पुष्टि करते हैं। मानसिक विकास का अवरुद्ध होना, लंबाई रोकने वाले कुपोषण के कई गंभीर परिणामों में से एक है। जब बच्चे को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता तो उसका शरीर कई अन्य गतिविधियों और संज्ञानात्मक विकास को रोककर ऊर्जा बचाता है। इससे बच्चे शांत, उदासीन और जिज्ञासाहीन होने लगते हैं। शोध बताते हैं कि ऐसे बच्चों की सीखने और खेलने-कूदने की क्षमता भी प्रभावित होती है।

जंगल से दूर होते आदिवासी
योगेश जैन का कहना है कि अगर वाकई आदिवासियों की लंबाई घट रही है तो यह चिंता का विषय है। मध्यान्ह भोजन और बच्चों व गर्भवती महिलाओं के लिए आंगनबाड़ी में मिलने वाले भोजन में पौष्टिकता की कमी है। मांस-मछली और अंडा तो दूर, दूध तक नहीं मिलता। इन्हीं सारी चीजों से तो शरीर को पोषण मिलता है। सरकार ने इन कार्यक्रमों को शुद्ध शाकाहारी तक सीमित कर दिया है। दूसरी तरफ आदिवासी भी जंगल से कट गए हैं। मांस खरीदना इनके लिए आसान नहीं जबकि ये दूध के कभी शौकीन नहीं रहे।

‘वाकई! आदिवासियों की लंबाई घटी है’
 
सौमिक बैनर्जी

आदिवासियों के बदले भोजन व्यवहार ने उनके स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया है। मुझे हर्बर्ट होप रिसले की किताब ‘दी पीपुल ऑफ इंडिया’ पढ़ने का मौका मिला था। यह किताब वर्ष 1915 में प्रकाशित हुई थी। मानव विज्ञान के माध्यम से नस्लीय श्रेष्ठता को समझने के लिए रिसले ने कई समुदायों के वयस्कों की लंबाई का माप लिया था। इसमें संथाल और पहरिया समुदाय भी शामिल था। जब मैंने इस समुदाय के आज के व्यस्कों से रिसले की बताई लंबाई की तुलना की तो कई आश्चर्यजनक बातें पता चलीं। पिछले 100 साल में पहरिया समुदाय के लोगों की लंबाई में आठ सेमी और संथाल व कोरवा समुदाय की लंबाई में पांच सेमी का अंतर मिला। रिसले की किताब में पहरिया वयस्कों की औसत लंबाई 157.7 सेमी थी, जबकि मेरे अध्ययन में यह 149.7 सेमी आया। रैंडम सैंपलिंग के माध्यम से मैंने 107 पहरिया व्यस्कों का अध्ययन किया। इसमें अधिकतम लंबाई 165 सेमी तथा निम्नतम लंबाई 139 सेमी आई। हालांकि, रिसले ने सौ लोगों का अध्ययन किया गया था और अधिकतम लंबाई 170.8 सेमी तथा निम्नतम 147 सेमी पाई थी। इस प्रकार रिसले के अध्ययन में निम्नतम लंबाई आज की औसत लंबाई के आसपास पहुंच गई है।

मैं झारखंड के गोड्डा जिले के सुंदरपहारी ब्लाक में काम करता रहा हूं। यहां मूलतः पहरिया और संथाल आदिवासी रहते हैं। ऐतिहासिक तथ्य और समुदाय के लोगों से बातचीत के आधार पर मैंने 300 भोज्य पदार्थो कि सूची तैयार की है, जो आदिवासी वनों से प्राप्त कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त ये लोग कई तरह के देसी अनाज जैसे- धान, मक्का, बाजरा, दाल, तिलहन और सब्जियों की खेती भी करते हैं, जिससे इन लोगों की पौष्टिक भोजन की जरूरत पूरी होती रही है।

यद्यपि, इनमें से बहुत सारे भोज्य पदार्थ आज भी उपलब्ध हैं। लेकिन हरित क्रांति और पीडीएस के आने के बाद आदिवासियों का रुझान चावल की तरफ बढ़ा है। चावल को आदिवासी लोग संपन्न और पढ़े-लिखे लोगों का भोजन मानते हैं। जबकि छोटे दाने के भोजन को ये लोग पिछड़े और गरीब लोगों का भोजन समझते हैं। पीडीएस से सस्ता या मुफ्त मिलने वाले चावल की वजह से बाजरा और दूसरे अनाजों की खेती पर कम ध्यान दिया जाने लगा है। लेकिन पीडीएस से मिलने वाला चावल चमकदार होता है और यह उर्वरकों से पैदा होता है। बाजरा जैसे अनाजों के पौष्टिक गुणों के मुकाबले पीडीएस से मिलने वाले चावल से पूरा पोषण नहीं मिल पाता है। परंपरागत अनाज, जंगली फल-सब्जियां और जानवरों के शिकार से मिलने वाली खुराक ही तो आदिवासी समाज की पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करती थी।

आदिवासियों में व्याप्त कुपोषण की एक वजह यह भी है कि नई पीढ़ी को पारंपरिक भोजन की बहुत कम जानकारी है और वे इसे खुद भी त्याग रहे हैं। बाजरा जैसे अनाज से इनके दूर होने की एक वजह इसे तैयार करने में लगने वाला समय भी है। जबकि चावल जल्द तैयार हो जाता है। भोज्य पदार्थों के सरकारी वितरण या नकदी फसल को बढ़ावा मिलने यह समस्या और बढ़ेगी।

सौमिक झारखंड के आदिवासी समुदायों के बीच काम करते हैं।

परंपरागत रूप से आदिवासी समाज रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जंगलों पर निर्भर रहा है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में सरकारी नीतियों और कई दूसरी वजहों से भी आदिवासी समुदाय जंगलों से कटते जा रहे हैं। जंगलों में प्रवेश वर्जित कर दिया गया है। केंद्र सरकार की 2013 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 72 प्रतिशत आदिवासी महिला सप्ताह में एक भी फल नहीं खाती हैं। यह स्थिति तब है जबकि अधिकतर आदिवासी जंगलों के आसपास रहते हैं।

उम्मेद आदिवासी जो पोहरी तहसील के टपरपूरा गांव में रहते है और दो साल से टीबी की बीमारी से पीड़ित हैं। इन्हें याद भी नहीं कि आखिरी बार मांस कब खाया था। इनके घर में आलम यह था कि उनके घर में एक दिन पहले किसी तरह से रोटी की व्यवस्था हो पाई थी। इसी गांव के 45 वर्षीय श्रवण आदिवासी का कहना है कि अब उन्हें जंगल में जाने से रोका जाता है, हथियार वगैहर लेकर तो बिल्कुल नहीं जा सकते हैं। पहले जब इच्छा हो खरगोश, सुवर, चीतल का मांस मिल जाता था। वे बड़ी मुश्किल से याद करके बताते हैं कि दस महीने पहले मुर्गे का मांस खाया था। बायलर!

सयुंक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने भील समुदाय के बारे में वर्ष 2009 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें उनके बदलते खाद्य स्रोत का अध्ययन किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, भील आदिवासियों के पारंपरिक भोजन को कुल 95 श्रेणी में रखा गया। इसमें से 60 से अधिक खाने की चीजों का स्रोत जंगल था। सहरिया और अन्य आदिवासी समूह की स्थिति भी भील से अलग नहीं है। माना जाता है कि आदिवासी लोग जंगल से करीब 150 तरह की खाने की चीजें प्राप्त करते रहे हैं। जिससे साल भर इनकी पोषण सुरक्षा सुनिश्चित होती थी। आजकल सरकारी सस्ते राशन से इन्हें खाद्य सुरक्षा तो मिल सकती है लेकिन पोषण सुरक्षा का सवाल बना रहेगा।

एक साल की शिवानी का वजन पांच किलो है और इसका नाम आंगनबाड़ी में कुपोषित बच्चे के तौर पर दर्ज है। इसकी मां रूपवती का कहना है कि बच्चों को खिलाने के लिए आंगनबाड़ी से मंगलवार को सिर्फ एक पैकेट मिलता है। जब वह गर्भावस्था में भी तब भी उसे आंगनबाड़ी से खाने को कुछ नहीं मिलता था  
लेकिन एफएओ की रिपोर्ट में समाने आया कि आदिवास समाज अपनी आमदनी का 50 प्रतिशत भोजन खरीदने पर खर्च कर रहा है। जबकि दिल्ली जैसे महानगरों में रहने वाले लोग भी भोजन पर अपनी कमाई का इतना हिस्सा खर्च नहीं करते हैं। वर्ष 2012 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, दिल्ली में रहने वाला परिवार अपने खर्च का औसतन 39.22 प्रतिशत खाने पर करता है। यह सर्वे दिल्ली सरकार के द्वारा किया गया था।

पहले आदिवासियों को जंगल से मांस के अलावा ज्वार, बाजरा, संवा, महुआ, हरी सब्जियां और कई तरफ के फल मिल जाया करते थे। लेकिन हालात बदल चुके हैं। एक तो जंगलों में जानवरों की तादाद भी घट रही है जबकि दूसरी तरफ वन विभाग ने आदिवासियों के जंगल में जाने पर रोक लगा रखी है। कुछ लोगों ने धार्मिक कारणों से या फिर शाकाहार के बढ़ते प्रभाव के चलते भी मीट-मछली खाना छोड़ दिया है।

अहेरा गांव के एक बुजुर्ग रंगलाल बताते हैं कि पहले जंगल में आना-जाना दिनचर्या का हिस्सा था। इससे खाने की बहुत सारी चीजें मिलती थी जैसे चिरौंजी, गोंद, चिड, तेंदू, आवंला इत्यादि। अब सेंचुरी बन गई है इसलिए वन विभाग वाले एक पत्ता भी नहीं तोड़ने देते। इसी गांव के नजदीक खूनोपालपुुर अभयारण्य बना है। सरकार की योजना के मुताबिक यहां सफेद शेर लाया जाना है। इस अभयारण्य की वजह से 28 गांव विस्थापित हुए हैं।

मोहंटा खुर्द के खेमचंद ने भी यही बात दोहराई कि उन लोगों का खाना पहले ज्वार, बाजरा, तिल, गोंद, सूअर, सांवर, खरगोश, तितर, शहद, मछली इत्यादि था। अब अगर दो जून की रोटी भी रोज मिल जाए तो बड़ी बात है। मछली 180 रुपये किलो मिलती है इसलिए गांव के गांव शाकाहारी हो गए हैं। खेमचंद कहते हैं, “वन विभाग के लोग तो हमें जंगल से जड़ी-बूटी तक नहीं लाने देते, मीट-मछली तो दूर की बात। ये सारे जड़ीबूटी हमलोग पहले खूब इस्तेमाल करते थे और अस्पताल जाने की जरूरत बहुत कम पड़ती थी।” पन्ना जिले की रहने वाली सिरिया बाई जो सौर समुदाय से है, हंसते हुए कहती है, “अगर मैं मजाक में भी यह कह दूं कि मैंने मांस खाया है तो मुझे वन विभाग वाले तुरंत पकड़ लेंगे। इसकी जांच पड़ताल बाद में होगी।”

भोजन के अधिकार से जुड़े मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट कमिश्नर के राज्य सलाहकार सचिन जैन कहते हैं कि भूमंडलीकरण के बाद जब भारतीय अर्थव्यस्था को विश्व के लिए खोला गया तभी से इस तरह की सख्ती बढ़ी है। सन 1927 में पहली बार भारत वन अधिनियम आया था जिसने सरकार को वनों का मालिक बना दिया। फिर वर्ष 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम आया और वर्ष 1980 में पर्यावरण सरंक्षण अधिनियम। इन कानूनों के जरिये धीरे-धीरे आदिवासियों को उन जंगलों से दूर कर दिया गया जिन पर वे सदियों से आश्रित थे। कुछ लोग तो इसे खनिज संपदा पर कब्जे की सुनियोजित साजिश तक करार देते हैं।

वन कानूनों की आड़ में आदिवासियों को जंगल से दूर करने के आरोपों को इस बात से भी बल मिलता है कि पहले खुद सरकारें जंगली जानवरों के शिकार को बढ़ावा देती रही हैं। ‘डाउन टू अर्थ’ के पास उपलब्ध सन 1968 में प्रकाशित एक सरकारी दस्तावेज के अनुसार, खुद मध्य प्रदेश सरकार लोगों को जानवरों के शिकार की छूट देती रही। लेकिन बाद में जब जानवर खत्म होने लगे इसके लिए आदिवासियों को भी दोषी ठहराया गया।

जंगल और खाद्य सुरक्षा
प्राकृतिक रूप से संपन्न इलाकों में रहने वाले आदिवासियों में कुपोषण की समस्या को समझने के लिए कुछ वर्षों पहले हुए एक अध्ययन पर गौर करना जरूरी है। तीन दशक तक चलने वाला यह अध्ययन बताता है कि आदिवासी समुदाय और जंगल के करीब रहने वाले लोग अत्यंत गरीबी की मार पीढ़ियों तक झेलते रहेंगे क्योंकि इन्हें जगलों से काट दिया गया है। क्रोनिक पोवर्टी रिर्सच सेंटर द्वारा वर्ष 2011 में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, देश में गरीबी कुछ लोगों के लिए वंशानुगत-सी हो गई है।

अत्यंत गरीब लोगों की संख्या मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, उड़ीसा, और उत्तर प्रदेश में बढ़ी है। देश की अत्यंत गरीब आबादी में इन राज्यों की हिस्सेदारी सन 1983 में 57.5 प्रतिशत थी, जो 1993-94 में 66.8 प्रतिशत और वर्ष 2004-05 में बढ़कर 70.6 प्रतिशत हो गई है। यह इसलिए भी डरवाना है क्योंकि इन लोगों की अगली पीढ़ियां भी गरीब रहने वाली हैं। यानी जिन राज्यों में अत्यंत गरीब लोगों की तादाद सबसे ज्यादा है, कुपोषण के मामले खासतौर पर बच्चों की लंबाई रोकने वाला कुपोषण के मामले भी अधिक हैं। और संयोग देखिए, यह समस्या ज्यादातर प्राकृतिक संसाधनों के नजदीक रहने वाले आदिवासी समूहों में सबसे ज्यादा दिखाई पड़ रही है। इस प्रकार पीढ़ियों तक चलने वाली गरीबी, भुखमरी और गंभीर कुपोषण के बीच गहरा संबंध पुष्ट होता है।

‘कोरकू जनजाति की बदलती खाद्य सुरक्षा’
 
 रूबी सरकार

कोरकू जनजाति मध्यप्रदेश में सतपुड़ा के वनांचलों में निवास करने वाली प्रमुख जनजाति हैं। ये लोग 19वीं सदी के अंत तक जंगलों में झूम खेती करती थी। 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में कुछ लोगों ने गेहूं उगाना शुरू कर दिया था। सन 1927 में बने वन कानून के चलते शिकार पर तो प्रतिबंध लगा ही साथ ही जंगल से मिलने वाले अनेक कंद-मूल से भी ये लोग वंचित हो गए।
क्षेत्र का प्रमुख भोजन ज्वार था। साथ ही कोदा, कुटकी, सांवा, उड़द, मूंग और वाचल भी उगाये और खाये जाते थे। स्थिर जीवन के दौरान कोरकू अधिकतर कृषि मजदूर ही रहे और 2001 की जनगणना में आधे से भी अधिक यानी करीब 55 फीसदी कोरकू परिवारों को कृषि मजदूर दर्शाया गया है।

21वीं सदी आते-आते ज्वार की पैदावार इस क्षेत्र में केवल सात फीसदी रह गई और कोदो, कुटकी महज दो फीसदी। उड़द सिर्फ दो फीसदी तक सीमित रह गई है। इनकी जगह सोयाबीन और गेहूं ने ले ली। आज 60 फीसदी रकबे में सोयाबीन और 62 फीसदी रकबे में गेहूं उगाया जा रहा है। यह त्रासदी है कि कोरकू किसानों ने भी इसे अपनाया। हालांकि, सोयाबीन उनकी खाद्य संस्कृति का हिस्सा नहीं है और गेहूं भी खाने से ज्यादा बेचते हैं। इसी प्रकार क्षेत्र में तिल का रकबा घटकर एक फीसदी से भी कम रह गया है।

कोरकू समुदाय का मुख्य भोजन जंगली फल-फूल और अनेक प्रकार का मांस रहा है। सब्जियों में अमाड़ी, चेन का पाला, गिलकी, तोरवा, कडू, ककड़ी, लौकी आदि मिल जाते हैं। ये लोग महुआ, गोंद, चिरौंजी, बेर, मकई, गूलर, इमली के पत्ते, फूल या कुछ पेड़ों की छाल भी उबालकर खाते रहे हैं।

नागपुर विश्वविद्यालय की शोधकर्ता अमित कौर पुरी ने महाराष्ट्र के यवतमाल में कोरकू पर एक अध्ययन में पाया कि ये लोग पहले पेड़ की पत्तियों से लेकर तना और जड़ तक खाते थे। फिलहाल उनके आहार में कार्बोहाइड्रेट, मिनरल्स और विटामिन तो हैं, पर प्रोटीन नहीं। ग्वालियर विश्वविद्यालय के अशोक के. जैन और प्रीति के. तिवारी के अध्ययन से यह सामने आया है कि सूखे या अकाल के समय मध्य क्षेत्र के आदिवासी 28 तरह की जंगली वनस्पतियां खाते थे। लेकिन अब ये आधुनिक खेती या सरकारी राशन पर आश्रित हो चुके हैं।

आजादी से पहले और बाद कई महामारियों ने कोरकुओं की जान भले ली हो, लेकिन कुपोषण जैसी समस्या इनके सामने कभी नहीं रही। इसका सबसे प्रमुख कारण यही था कि वे लोग जंगलों पर आश्रित रहे। लेकिन अब ये भी कुपोषण के शिकार हैं।

रूबी सरकार, भोपाल में रहने
वाली वरिष्ठ पत्रकार हैं।

पूरे देश और मध्य प्रदेश में कुपोषण की जो भयानक स्थिति है उसे जस का तस बने रहने देना किसी अपराध से कम नहीं होगा। सबसे पहले सरकार को कम से कम यह तो मानना पड़ेगा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के जरिये लोगों को सस्ता अनाज मुहैया कराने मात्र से यह समस्या हल होने वाली नहीं है। इससे खाद्य सुरक्षा तो मिलेगी लेकिन वृद्धि बाधित कुपोषण से प्रभावित बच्चों को पोषण की जरूरत है। जैसा कि एफएओ ने भी माना है, आदिवासी समुदायों की पोषण सुरक्षा उनके पारंपरिक भोजन से ही सुनिश्चित हो सकेगी। इसके लिए उन्हें पारंपरिक भोजन के स्रोत यानी जंगलों पर फिर से अधिकार देने होंगे। इस मुद्दे पर ‘डाउन टू अर्थ’ ने राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस की राय जाननी चाही तो उन्होंने यह माना कि श्योपुर और अन्य आदिवासी जिलों में कुपोषण की स्थिति काफी खराब है और इस दिशा में काम करने की जरूरत है। अब उन्हें यह पहल करनी चाहिए कि आदिवासियों को न सिर्फ जंगलों से खाने की चीजें लाने की छूट दी जाए बल्कि आंगनबाड़ी केंद्रों में भी स्थानीय भोजन दिया जाए। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि सामुदायिक रसोईघरों में स्थानीय भोजन मिलना चाहिए। अगर ऐसा हो पाया तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को वृद्धि बाधित कुपोषण जैसा असहनीय बोझ नहीं उठाना पड़ेगा।

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