Water

मरघट में गंगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा की सफाई को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए इसके लिए 2,000 करोड़ रुपए आबंटित किए

 
By Banjot Kaur
Last Updated: Wednesday 17 October 2018
Ganga pollution
Credit: Avikal Somvanshi Credit: Avikal Somvanshi

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने गंगा की सफाई को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए गंगा सफाई के तमाम कार्यक्रमों को बदल दिया। अपने पहले ही बजट में इसके लिए 2,000 करोड़ रुपए आबंटित किए। इसके बाद मंत्रिमंडल ने 13 मई 2015 को नमामि गंगे कार्यक्रम को मंजूरी दी और पांच वर्षों के लिए 20 हजार करोड़ रुपए देने की बात कही। यह 1985 से शुरू हुए गंगा एक्शन प्लान का लगभग पांच गुणा था। 7 अक्टूबर 2016 को राजपत्र अधिसूचना निकाली गई जिसके तहत नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी को भंग कर नेशनल गंगा काउंसिल का गठन किया गया और नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) को अथॉरिटी के रूप में मान्यता मिली। इतना ही नहीं गंगा के लिए अलग मंत्रालय का भी गठन हुआ। 2017 में मोदी के एक होनहार कहे जाने वाले मंत्री नितिन गडकरी ने उमा भारती के बाद इस मंत्रालय का पदभार संभाला पर योजनाएं पटरी पर नहीं आईं तो गडकरी ने हाल ही में यह ऐलान किया कि गंगा दिसंबर 2020 में स्वच्छ होगी। जबकि मोदी ने गंगा सफाई का लक्ष्य 2019 रखा था। गंगा की सफाई हो पाएगी या नहीं यह तो समय बताएगा लेकिन अब तक के प्रयास बता रहे हैं कि गंगा सफाई कार्यक्रमों में पुरानी गलतियों को दोहराया जा रहा है।

एक नदी मुख्य रूप से एक ऐसा बड़ा चैनल है, जो बड़े क्षेत्र (जिसे कैचमेंट भी कहा जाता है) से पानी निकालती है और सैकड़ों सहायक और छोटे जल स्त्रोत द्वारा समर्थित होती है। इसलिए, यदि कोई गंगा जैसी नदी को साफ करने के बारे में सोचता है तो उसे न सिर्फ नदी में फैले प्रदूषण को साफ करना है बल्कि इसकी कई सहायक नदियों और अन्य जल स्त्रोतों की सफाई पर भी ध्यान देना होगा। इसलिए, यह मौजूदा बहस खत्म हो गई है कि क्या गंगा मिशन को केवल नदी पर केन्द्रित होना है या विशाल कैचमेंट एरिया या इसके बेसिन पर भी ध्यान देना चाहिए। आईआईटी के एक संघ ने नमामी गंगे के लिए गंगा बेसिन दृष्टिकोण की सिफारिश की है। इसका मतलब है कि न केवल 2,525 किमी लंबी गंगा बल्कि इसकी सहायक नदियों की सफाई भी होनी चाहिए। दूसरे शब्दोें में कहें तो गंगा के तटीय हिस्से में यहां-वहां कुछ परियोजनाएं स्थापित करने की बजाय, पूरे नदी बेसिन यानी गंगा के तहत आने वाले सभी राज्य और इसकी सहायक नदियों को कार्यक्रम के दायरे में लाना चाहिए। गंगा की सफाई के लिए सरकार का वर्तमान सिद्धांत इसे स्वीकार करता है। इसकी कई गतिविधियां आईआईटी संघ के एक अध्ययन “गंगा कायाकल्प बेसिन प्रबंधन कार्यक्रम” (जीआरबीएमपी) से प्रेरित हैं।

हालांकि, यह केवल दस्तावेजों तक ही सीमित रहा। पिछले साल दिसंबर में आई भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) रिपोर्ट में लिखा था, “एनएमसीजी ने न तो परामर्श के लिए विभिन्न मंत्रालयों/विभागों के बीच जीआरबीएमपी प्रसारित किया और उनकी राय मांगी, न ही गंगा पर दीर्घकालिक हस्तक्षेप शुरू करने के लिए जीआरबीएमपी को अंतिम रूप दिया।” एनएमसीजी वेबसाइट पर मौजूद दस्तावेज जिन विचाराधीन शहरों के बारे में बात करता है, वे मुख्य रूप से गंगा के तटीय क्षेत्र में स्थित हैं, जैसे उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल। इसमें गंगा की सहायक नदियों पर स्थित शहरों की बात नहीं है। सरकार नमामी गंगे के तहत योजनाबद्ध परियोजनाओं को पूरा करने में भी पीछे है। इसने 200 से अधिक परियोजनाओं के साथ कई अवसरों पर बताया है कि नमामि गंगे एक विशाल कार्यक्रम है। हालांकि, परियोजनाओं की स्थिति पर नजर डालें तो, तो संदेह उत्पन होता है कि क्या सरकार 2020 की संशोधित समयसीमा के भीतर लक्ष्य हासिल कर सकेगी। 31 अगस्त, 2018 तक 236 परियोजनाएं मंजूर की गईं, जिनमें से केवल 63 ही पूरी हो पाई हैं।

जहां तक सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की बात है, 13 मई 2015 को केंद्रीय कैबिनेट द्वारा नमामि गंगे को मंजूरी मिलने के बाद 68 परियोजनाएं मंजूर की गई थीं। केवल छह परियोजनाएं 31 अगस्त 2018 तक पूरी हुई हैं। नमामि गंगे के गठन से पहले स्वीकृत 46 लंबित परियोजनाओं में से केवल 21 पूरी हो पाई हैं। गौरतलब है कि नमामि गंगे से पहले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (एनआरजीबीए) अस्तित्व में थी और इसी के तहत गंगा सफाई कार्यक्रम चल रहा था। नमामि गंगे के आने के बाद, एनआरजीबीए की सभी परियोजनाओं को नमामि गंगे कार्यक्रम में स्थानांतरित कर दिया गया था।

सीवेज उपचार संयंत्र (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अथवा एसटीपी) गंगा प्रदूषण खत्म करने के केंद्र में हैं। नमामी गंगे लक्ष्यों के मुताबिक, 2,000 मिलियन लीटर/दिन (एमएलडी) क्षमता के एसटीपी विकसित किए जाने हैं, जिसमें से केवल 328 एमएलडी क्षमता के एसटीपी ही विकसित हो पाए हैं। इस कार्यक्रम में पुराने और मौजूदा एसटीपी के पुनिर्विकास की भी परिकल्पना की गई है। पुनिर्विकास के माध्यम से 887 एमएलडी को नव निर्मित किया जाना था जिसमें से 92 एमएलडी किया गया। सरकार ने बार-बार कहा है कि नई परियोजनाओं में देरी हो रही है क्योंकि भूमि अधिग्रहण और अन्य संबंधित गतिविधियों में काफी समय लग रहा है। हालांकि, पुराने एसटीपी के पुनिर्विकास के काम में खराब प्रदर्शन के लिए लॉजिस्टिकल मुद्दों की कमी का तर्क समझ में नहीं आता है।

हालांकि, यह मुद्दा सिर्फ एसटीपी के निर्माण या पुनर्वास के साथ नहीं बल्कि उनके प्रदर्शन के साथ भी जुड़ा है। प्रत्येक स्थापित एसटीपी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और टोटल सस्पेंडेड सॉलिड (टीएसएस) के लिए डिजाइन मानक है। कानपुर के जाजमऊ में 5 एमएलडी घरेलू अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र में बीओडी का स्तर 65 मिलीग्राम/लीटर (30 के डिजाइन मानक के मुकाबले) और टीएसएस का स्तर 92 मिलीग्राम/लीटर (50 के डिजाइन मानक के मुकाबले) का प्रदूषण था। यह कानपुर जल निगम की अप्रैल-मई 2018 की रिपोर्ट के अनुसार है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीओडी और टीएसएस प्रदूषण मानदंडों से अधिक है, क्योंकि औद्योगिक अपशिष्ट और रसायनों को इस प्लांट में अवैध तरीके से मिश्रित किया जाता है जो औद्योगिक प्रदूषण के ट्रीटमेंट के लिए नहीं है। एनएमसीजी के मुताबिक, बिहार का भागलपुर 46.6 एमएलडी अपशिष्ट पैदा करता है। वहां िसर्फ 11 एमएलडी का एक प्लांट है। वह भी अपने मानकों को पूरा नहीं करता। पश्चिम बंगाल का हावड़ा 131 एमएलडी अपशिष्ट पैदा करता है और 45 एमएलडी का एक अकेला संयंत्र मानकों को पूरा नहीं कर पाता। कोलकाता में 130 एमएलडी अपशिष्ट का उपचार करने के लिए चार ट्रीटमेंट प्लांट हैं। एनएमसीजी के मुताबिक, उनमें से कोई मानकों का पालन नहीं कर रहा है।

एसटीपी के साथ एक और समस्या है उनका कम उपयोग। नतीजतन, वे उतने प्रदूषकों का उपचार नहीं कर पाते, जितने की जरूरत है। इसका कारण शहरों में सीवेज नेटवर्क की कमी है। अगर नए एसटीपी बनते भी हैं, तो सीवेज नेटवर्क के बिना इस उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकेंगे। गौरतलब है कि नमामि गंगे के बाद 2,071 किलोमीटर नई सीवर लाइन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी जो अभी सिर्फ 66.85 किमी ही बनी है। बिहार के गंगा बेसिन शहरों में 1,723 किमी सीवर लाइन बिछाई जानी थी। इसमें नमामि गंगे के पहले और बाद के लक्ष्य को शामिल किया गया है। हालांकि, अगस्त के अंत तक केवल 206 किमी की दूरी तक ही सीवर लाइन बिछाई जा सकी है।

इसने स्पष्ट रूप से एसटीपी की उपयोगिता को कम किया है। कानपुर के जाजमऊ में घरेलू अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र की क्षमता 130 एमएलडी है। लेकिन अप्रैल-मार्च का औसत केवल 60.5 एमएलडी था। एनएमसीजी के मुताबिक, कानपुर के सभी मौजूदा संयंत्रों में 414 एमएलडी की क्षमता है लेकिन केवल 230 एमएलडी ही उपचारित हो पाता है। उत्तर प्रदेश स्टेट एन्युअल एक्शन प्लान 2017-20 के मुताबिक, कानपुर के केवल 40 प्रतिशत क्षेत्र ही सीवर लाइन से जुड़ा है। पटना में 109 एमएलडी के चार उपचार संयंत्र हैं, लेकिन केवल 32 एमएलडी क्षमता का ही काम हो रहा है।

किसी भी शहर के लिए, एसटीपी को उसके सीवेज से निकलने वाले अपशिष्ट के अनुसार डिजाइन किया जा रहा है। 2016 में इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में रघु दयाल द्वारा लिखे गए एक पेपर का कहना है कि “सीवेज से निकलने वाले अपशिष्ट का आकलन इस धारणा पर आधारित है कि आपूर्ति किए गए पानी का 80 प्रतिशत अपशिष्ट जल के रूप में वापस आ जाता है। सीपीसीबी द्वारा संकलित कुछ हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि गंगा में अपशिष्ट जल का वास्तविक निर्वहन 6,087 एमएलडी है, जो अपशिष्ट पानी के अनुमानित निर्वहन से 123 प्रतिशत अधिक है।” वाराणसी के संकटमोचन फाउंडेशन (एसएमएफ) के अध्यक्ष वीके मिश्रा कहते हैं कि गणना की पद्धति दोषपूर्ण है। एसएमएफ को 2010 में अस्सी क्षेत्र में 35 एमएलडी के एसटीपी निर्माण का कार्य दिया गया था। मिश्रा, जो आईआईटी-बीएचयू में प्रोफेसर भी हैं, कहते हैं, “हमने अस्सी नाली का तीन दिवसीय अध्ययन किया और हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। हमने पाया कि अपशिष्ट जल का निर्वहन 63.5 एमएलडी था। यह 2010 की बात है।” मिश्रा का कहना है कि जब पूरे शहर में पाइप से पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है, तो सीवेज से निकलने वाले अपशिष्ट की गणना के लिए मानदंड कैसे बन सकता है। मिश्रा के तर्क को यूपी राज्य वार्षिक कार्य योजना 2017-2020 से भी समर्थन मिलता है, जो कहता है कि वाराणसी में पाइप जल आपूर्ति का कवरेज 60 प्रतिशत से कम है। वास्तव में कानपुर और इलाहाबाद में यह क्रमश: 60 प्रतिशत और 40 प्रतिशत से भी कम है। कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी पूरे गंगा बेसिन प्रदूषण के हॉट स्पॉट हैं।

लेकिन घरेलू सीवेज ही सिर्फ चिंता का कारण नहीं है। उद्योग, विशेष रूप से, कानपुर के जाजमऊ क्षेत्र के टैनरीज (चर्म उद्योग) को लेकर सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कई बार गुस्सा प्रदर्शित किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 30 मार्च, 2017 को एनजीटी से कहा कि सैद्धांतिक रूप से, उसने जाजमऊ से टैनेरी उद्योगों को स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है और जिस स्थान पर उन्हें स्थानांतरित किया जाना है, उस पर प्रभावी तरीके से विचार किया जा रहा है। यह अनिवार्य है कि टैनरीज क्रोमियम का उपचार अपने स्वयं के छोटे प्लांट या क्लस्टर में बने प्लांट के जरिए करें और फिर अपशिष्ट को सरकार द्वारा संचालित कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) में स्थानांतरित करे, परंतु ऐसा हो नहीं रहा। इस बात की पुष्टि एनजीटी ने अपने 13 जुलाई 2017 के आदेश में की है।

अप्रैल-मई 2018 की कानपुर जल निगम की रिपोर्ट, एनजीटी के अवलोकनों से मेल खाती है। यह कहती है कि सीईटीपी में आने वाला टैनरीज के अपशिष्ट में क्रोमियम की सान्द्रता प्रति लीटर 110.2 मिलीग्राम है। डाउन टू अर्थ टीम ने सीईटीपी का दौरा किया, जहां विशेषज्ञों ने टीम को दिखाया कि कैसे क्रोमियम ने अपशिष्ट जल पर एक अलग परत बना ली थी और इसे नंगी आंखों से देखा जा सकता था। प्लांट में कई अन्य प्रकार के कचरे आ रहे थे, जिसे टैनरीज को खुद ही उपचारित करना था। प्रति 100 मिलीलीटर 175 बीओडी के डिजाइन पैरामीटर और टीएसएस 200 मिलीग्राम/लीटर के मुकाबले इनमें प्रदूषक की मात्रा क्रमश: 203 मिलीग्राम/लीटर और 253 मिलीग्राम/लीटर थी।

जाजमाऊ और पास के गांवों की यात्रा डरावनी तस्वीर प्रस्तुत करती है। वाजिदपुर गांव में गंगा तट पर चार टैनरीज डाउन टू अर्थ टीम को दिखीं। यहां किसी भी टैनरी के बाहर कोई बोर्ड नहीं था और वे लगभग गुमनाम रूप से चल रही थीं। यह जाजमऊ प्लांट के कुछ किलोमीटर पूर्व में है। देखा जा सकता है कि वे गंगा में अपशिष्ट बहा रही हैं। छोटू निशाद ने अपनी छिद्रित त्वचा को दिखाते हुए कहा, “आउटलेट पाइप धूल फेंकते हैं जिसे हम रोजाना श्वास में भरते हैं।” डाउन टू अर्थ ने जिन भी परिवारों से बात की वहां बाल झड़ने, त्वचा संक्रमण, हृदय समस्याएं, सांस लेने की समस्या आम मिलीं। एक अन्य ग्रामीण जगदीश कहते हैं, “यदि हम ढक कर न रखें तो गिलास में रखा पानी लाल हो जाता है। अधिकारी हमारी सुनते ही नहीं हैं।”

जाजमऊ टैनरीज से कुछ किलोमीटर दूर शेखपुर गांव है। 50 वर्षीय ग्रामीण लक्ष्मी शंकर निषाद अपने बाएं पैर को दिखाते हैं, जिसकी त्वचा लगभग छिल गई है। वह कहते हैं, “हम त्वचा संक्रमण से पीड़ित हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि टैनरीज सीधे अपने अपशिष्ट को नालियों में बहा देती हैं और यह भूजल के साथ मिश्रित हो गया है, जो संक्रमित हो गया है।” डीटीई पास के टैनरी से सीधे जुड़े नालियों में अपशिष्ट जल देख सकता था। रसायनों ने नाली को भर दिया था। टैनरीज से बाहर आने वाली धूल ने क्षेत्र के लगभग सभी खंभे पर जंग लगा दिया था। इस वजह से जाजमऊ के कई दुकानों के लोहे के दरवाजे गल चुके थे। एक अन्य ग्रामीण, 45 वर्षीय श्रीकृष्ण कहते हैं, “गांव के लोग नपुंसक हो रहे हैं और जब वे अस्पताल जा रहे हैं, तो डॉक्टर उन्हें क्षेत्र छोड़ने के लिए कहते हैं। हम यह कैसे कर सकते हैं?” वह कहते हैं कि हमारा घर है, छोटी खेती है, ये सब कैसे छोड़ कर जा सकते हैं। वह पास के खेत में उगाए गए चारा को दिखाते हैं। इस चारे को दो अलग-अलग खेतों में उगाया गया था। एक खेत को भूजल से पानी दिया गया था और दूसरे को वर्षा जल। जो चारा भूजल से उगाया गया था, वह करीब-करीब जल गया था। उन्होंने समझाया कि भूजल में मिले से रसायनों ने इसे जला दिया था। उन्होंने भैंसों को भी दिखाया जिनकी पूंछ सड़ गई थी। भैंस भी भूजल पीती हैं और रसायनों ने उन्हें ऐसा बना दिया है। अगले गांव में भी लोगों के पास ऐसी ही कहानियां थीं। 80 वर्षीय नानू यादव दो किशोर-अंकित और संध्या को दिखाते हैं जिनके सिर पर भूरे रंग की कुछ झुर्रियां हैं। वह कहते हैं, “उनके सभी बाल झड़ गए हैं और कोई नया बाल नहीं आ रहा है। दवाएं भी कुछ काम नहीं करतीं। डॉक्टरों का कहना है कि यह भूजल के संपर्क में आने से हुआ है। स्थिति 10 साल पहले इतनी खराब नहीं थी।” गांव के लोगों ने भी कमजोर नजर, गैस्ट्रिक समस्याओं और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत की।

ऐसा नहीं है कि उनकी समस्याओं का डॉक्युमेंटेशन नहीं हुआ है। एनजीटी के नोटिस में यह लाया गया है कि जाजमऊ, राखीमांडी और खानपुर गांव जैसे अन्य स्थानों पर खुले में क्रोमियम सल्फेट डंप बनाए गए हैं। एनजीटी ने पिछले साल के आदेश में इसे लिखा भी था। सीपीसीबी ने निर्देश के बाद इस साइट का अध्ययन किया। सीपीसीबी की पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक, “अनुमानित 60,000 टन क्रोम अपशिष्ट और 2 लाख टन मिट्टी इस डंप के आसपास फैली है। इसका भूजल और पर्यावरण पर दीर्घकालिक अपरिवर्तनीय प्रभाव पड़ा है।” सीपीसीबी ने 140 करोड़ रुपए की लागत से साइट के उपचार के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक उपायों के सुझाव दिए। इसके लिए वित्त पोषण स्रोत अभी तक पहचाना जाना बाकी है।

गंगा की सफाई लंबी सुनवाई के बाद, एनजीटी ने 13 जुलाई, 2017 को यूपी सरकार को निर्देश दिया कि या तो वह 9 एमएलडी के मौजूदा सीईटीपी के अलावा एक नया सीईटीपी बनाने के लिए योजना तैयार करे या उद्योग को स्थानांतरित करे। इसने सरकार को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि कचरे को सीईटीपी तक पहुंचाने से पहले क्रोमियम का अनिवार्य रूप से ट्रीटमेंट किया जाए। इसके लिए सरकार द्वारा चलाए जा रहे मौजूदा सीआरपी को अपग्रेड किया जाए या टैनरीज का अपना स्वयं का क्रोमियम ट्रीटमेंट प्लांट (सीटीपी) हो। इस पर पिछले महीने एनएमसीजी ने एनजीटी में जवाब दिया कि कानपुर नगर निगम द्वारा सीआरपी उन्नयन की योजना बनाई गई है। यह भी सूचित किया गया कि 20 एमएलडी सीईटीपी को मंजूरी दे दी है। इससे जाजमऊ में कुल सीईटीपी क्षमता 29 एमएलडी तक पहुंच जाएगी जबकि सेंट्रल लेदर रिसर्च इंस्टीट्यूट ने 2010 में कहा था कि जाजमऊ में टैनरीज से 50 एमएलडी अपशिष्ट निकलता है।

टैनरीज से निपटने के अलावा एनजीटी ने अपने पिछले साल के 543 पृष्ठों के फैसले में गंगा, रामगंगा, काली और पांडु नदियों में जाने वाली 86 नालियों से संबंधित 100 से अधिक निर्देश जारी किए थे। 80 के दशक से गंगा बचाने की मुहिम में जुटे उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता एमसी मेहता ने बताया, “सरकारी एजेंसियों ने ज्यादातर निर्देशों के संबंध में अनुपालन रिपोर्ट जमा की, लेकिन मैंने इस क्षेत्र से जो सूचना इकट्ठा की वह सरकार के जवाब से अलग है।” मेहता की ही याचिका पर एनजीटी ने आदेश पारित किया।

आदेश पारित होने के बाद यह देखने के लिए कई सुनवाई हुईं कि आदेशों का अनुपालन किया जा रहा है या नहीं। अंतिम सुनवाई 6 अगस्त 2018 को हुई। अनुपालन की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए एनजीटी ने कहा, “हालांकि ट्रिब्यूनल के 13 जुलाई 2017 के फैसले के आलोक में दिशानिर्देशों के अनुपालन पर प्रगति का दावा किया जा रहा है लेकिन हमें अब भी मीलों आगे जाना है। मौजूदा प्रगति हमारी पूर्ण उम्मीद को पूरा नहीं करती।” एनजीटी ने निगरानी के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश और अन्य लोगों को मिलाकर एक चार सदस्यीय पैनल का गठन किया। एनजीटी ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को सभी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के लिए पत्र लिखा। केस की अगली सुनवाई फरवरी 201 9 में होनी है। डाउन टू अर्थ ने संबंधित हाईकोर्ट न्यायाधीश अशोक टंडन से 19 सितंबर को बात की थी। उन्होंने कहा, “समिति 24 सितंबर को चार्ज लेगी और इसके बाद ही वह कुछ बता सकेंगे।”

गंगा सफाई के अलावा, नमामि गंगे वनीकरण के बारे में भी बात करता है। यह नमामि गंगे की एक महत्वपूर्ण गतिविधि भी है क्योंकि इससे भूजल रिचार्ज में मदद मिलती है। सरकार वनीकरण पर करोड़ों रुपए खर्च कर चुकी है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर प्रमोद शर्मा लगे हुए पौधे दिखाते हुए कहते हैं “सरकार ने कचनार और गुलमोहर जैसे फूलों के पौधे लगाए जबकि जल संचय के लिए हमें पाकड़, गूलर, नीम और पीपल के पेड़ों की जरूरत थी। इन पौधों से केवल सुंदरता बढ़ाई जा सकती है”

कम पानी, अधिक प्रदूषण

नदी का प्राथमिक चरित्र है बहते रहना। यदि नदी सही मात्रा में पानी के साथ नहीं बहती तो यह स्वयं को कभी साफ कर ही नहीं सकती। किसी भी सफाई कार्यक्रम के लिए यह बुनियादी विज्ञान और बुनियादी सिद्धांत भी है। लेकिन गंगा में कम से कम पानी बह रहा है। इसका प्रवाह कई स्थानों पर बाधित हुआ है। गंगा बेसिन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 795 छोटे और बड़े बांध हैं, जो इसके प्रवाह को अवरुद्ध करते हैं। विशेष रूप से उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में स्थित जलविद्युत परियोजनाओं, बैराज और नहरों ने गंगा को बर्बाद कर दिया है। इलाहाबाद स्थित एक कार्यकर्ता विजय द्विवेदी ने गंगा सेना का गठन किया है, जो नियमित रूप से नदी की सफाई करती है। वह कहते हैं कि केवल मॉनसून में ही गंगा में पानी का स्तर काफी अच्छा रहता है। वह कहते हैं, “अप्रैल या मई में तो इसमें घुटने तक पानी भी नहीं होता। लोग यहां गायों को चराते हैं, यह एक ड्राइविंग सीखने का क्षेत्र बन जाता है और बच्चों के लिए यह क्रिकेट मैदान।” वह कहते हैं, “हालांकि, योगी (यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी) ने घोषणा की है कि दिसंबर तक गंगा कुंभ मेला के लिए गंगा साफ हो जाएगी और उस महीने के दौरान अधिक पानी भी जारी किया जा सकता है। यह तब तक केवल कॉस्मेटिक उपाय साबित होगा, जब तक गंगा के प्रवाह को बहाल करने के लिए दीर्घकालिक उपाय नहीं किए जाते।”

संगम पर एक नाविक गोपाल निषाद ने बताया, “पानी की कमी के कारण गर्मी में मछली भी मर जाती है। घाटों पर आने वाले लोग आमतौर पर गर्मी में नाव की सवारी के लिए नहीं जाते हैं और इसका हम पर बुरा प्रभाव होता है।” निषाद पिछले 30 वर्षों से संगम के पास रह रहे हैं। वह कहते हैं, “कुछ साल पहले तक हम दूर से ही गंगा की लहरों की आवाज सुन लेते थे। इसका प्रवाह ही ऐसा था। हालांकि, चीजें अब तेजी से बिगड़ गई हैं।” वाराणसी में भी नाविकों ने ऐसी ही कहानी बताई। यूजीसी के एमेरिटस प्रोफेसर और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के गंगा रिसर्च सेंटर के प्रभारी बीडी त्रिपाठी कहते हैं, “हमें सिर्फ गंगा को साफ करने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे बचाने की भी जरूरत है।” वह कहते हैं, “नदी में पानी का स्तर अभूतपूर्व दर से नीचे जा रहा है। यह नदी के अस्तित्व के लिए एक खतरा है। यदि प्रवाह बनाए रखा जाता है तो नदी अपने-आप 60-80 प्रतिशत कार्बनिक प्रदूषकों को दूर कर सकती है और हमें इस तरह के बड़े कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं होगी।”

वह यह भी कहते हैं कि अन्य नदियों के अलग, गंगा में तीन विशेष गुण होते हैं, जो इसके प्राकृतिक रूप से अपनाए जाने वाले पथ के कारण हैं। वह कहते हैं, “गंगा में औषधीय गुण हैं। ये गुण गंगा के रास्ते में औषधीय पौधों के कारण आते हैं। इसके अलावा गंगा जिस मार्ग से चलती है वह खनिजों समृद्ध है। इसमें बैक्टीरियोफेज है, जो बैक्टीरिया को मारता है। यदि आप गंगा के मार्ग को बैराज और नहर की वजह से मोड़ते हैं तो इसका प्राकृतिक मार्ग बदल जाता है। जाहिर है, इससे गंगा अपने गुणों को खो देगी।” वह कहते हैं कि प्रतिबंधों और प्रवाह में कमी के कारण, पानी की वेग कम हो जाता है और गाद बढ़ जाती है, इसलिए पानी के खनिज नदी तलहटी में जमा हो जाते हैं।

इन सभी सिद्धांतों को आईआईटी-खड़गपुर के अभिजीत मुखर्जी और अन्य द्वारा अगस्त 2018 में प्रकाशित एक पेपर के द्वारा समर्थन मिलता है। यह पेपर कहता है कि 1970 के दशक से शुरू हुए िसंचाई पंपिग युग के मुकाबले 2016 का गंगा का बेसफ्लो अमाउंट लगभग 59 प्रतिशत कम हो गया। गंगा का कम होता जलस्तर घरेलू जल आपूर्ति, सिंचाई आवश्यकताओं, नदी परिवहन और पारिस्थितिकी आदि को खतरे में डाल सकती है। नदी के पानी में कमी का इस क्षेत्र में रहने वाली 10 करोड़ से अधिक आबादी के लिए खाद्य उत्पादन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। 2015-17 की गर्मियों में भी गंगा के जलस्तर और प्रवाह में भारी कमी देखी गई।
मुखर्जी ने कहा कि आने वाले सालों में गंगा के जलस्तर में और गिरावट की आशंका है। नदी को प्रभावित करने के अलावा यह भूगर्भीय प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करेगा और असाधारण वर्षा, भूस्खलन इत्यादि जैसी चीजों का कारण बन सकता है। वह कहते हैं, “पूर्वी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अधिकांश हिस्सों में गंगा की धार सबसे कमजोर है क्योंकि इन क्षेत्रों में अत्यधिक मात्रा में भूजल से सिंचाई हो रही है।” उन्होंने कहा कि पहाड़ी इलाकों और उत्तराखंड का अध्ययन नहीं किया है। लेकिन उच्च पदस्थ लोगों ने उन्हें बताया है कि उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं और नहर प्रणाली भी कहर बरपा रही हैं। इतना ही नहीं, देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की मई 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, इन परियोजनाओं के चलते गंगा डॉल्फिन के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। साथ ही अन्य जलीय जैव विविधता भी खतरे में है।

आईआईटी-दिल्ली के प्रोफेसर एके गोंसाईं कहते हैं, “जलविद्युत परियोजनाओं को इस तरह डिजाइन किया जा सकता है कि वे कम पानी का उपभोग करे। इससे निवेश लागत बढ़ सकती है, लेकिन गंगा की सुरक्षा के लिए ऐसा किया जाना चाहिए। अब सरकार यह तय करे कि क्या इसे एक अनिवार्य नीति बनाया जाए या नहीं।” त्रिपाठी का कहना है कि गंगा पर किसी भी नई बड़ी परियोजनाओं की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि छोटे बांध बनाए जा सकते हैं। पूरे गंगा बेसिन में लिफ्ट चैनलों के जरिए गंगा के पानी से फ्लड इरिगेशन किया जा रहा है। त्रिपाठी के अनुसार, “सिंचाई के इस तरीके के कारण 80% से अधिक पानी बर्बाद हो जाता है। यदि ड्रिप इरिगेशन जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाया जाता है, तो बर्बादी को कम हो सकती है। उल्लेखनीय है कि एनजीटी ने अपने 2017 के आदेश में कहा कि जब तक कोई मानक तय न हो जाए, तब तक इस बात को सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि गंगा का जलस्तर अपने मूल प्रवाह से 20 प्रतिशत रहे।

स्वच्छ भारत से नुकसान?

सरकारी दावों के अनुसार, गंगा तट पर स्थित 99.93 प्रतिशत गांवों को ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) घोषित किया जा चुका है। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) पोर्टल के अनुसार, 17 सितंबर 2018 तक 4,000 से अधिक गांवों में 20.7 लाख से अधिक शौचालयों का निर्माण किया गया है। एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वच्छ भारत मिशन के तहत लक्ष्य उपलब्धि के लिए याद किया जाएगा, वहीं गंगा सफाई के उनके दूसरे सबसे बड़े वादे पर इसका असर पड़ता दिख रहा है। इलाहाबाद मंे गंगा के किनारे बसे छपरी गांव के राशिद अली कहते हैं, “मेरे घर में शौचालय है लेकिन ट्विन पिट के कचरे से ओवरफ्लो हो रहा है। अधिकारी अक्सर शौचालय का उपयोग न करने के लिए मुझे डांटते हैं। लेकिन वे उपयोग करने योग्य नहीं हैं। मैं इसका इस्तेमाल कैसे करूं?” वह और उनके परिवार के सदस्य गंगा के पास शौच के लिए जाते हैं। ट्विन पिट प्रणाली के तहत शौचालय की सीट के नीचे दो गड्ढे बनाए जाते हैं। एक गड्ढे में वेस्ट चार-पांच साल तक रहना चाहिए। उसके बाद जब वह भर जाए उसे बंद कर दिया जाता है। जब तब वह वेस्ट खाद बनता है, तब दूसरे गड्ढे का इस्तेमाल होता है।

सीएसई द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, सर्वेक्षण किए गए अधिकांश शहरों में ट्विन पिट तकनीक थी, जो निचले इलाकों के लिए ठीक नहीं है। उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल के गंगा बेसिन शहर, बनगांव के जुलाई 2017 की एक शिट फ्लो डायग्राम रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी घर जो ऑनसाइट स्वच्छता प्रणाली (ओएसएस) पर निर्भर हैं और जो सीवर नेटवर्क से जुड़े नहीं हैं, वहां सबसे प्रचलित रोकथाम गड्ढा प्रणाली है। आश्चर्य की बात नहीं है कि सीएजी ने दिसंबर 2017 में नमामि गंगे की अपनी ऑडिट रिपोर्ट में ओडीएफ के दावों पर सवाल खड़े किए थे। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में 228 गांवों में से किसी का भी सत्यापन नहीं हुआ था, उत्तर प्रदेश में ओडीएफ घोषित किए गए 1,022 गांवों में से केवल 108 गांवों का सत्यापन किया गया। गंगा में बढ़ता फिकल कोलिफॉर्म का स्तर इस बात द्योतक है कि मानव मल की मात्रा गंगा के पानी में कम नहीं है। गंगा बेसिन के गांव को ओडीएफ बनाने का उद्देश्य गंगा में फिकल कोलिफॉर्म स्तर में सुधार करना था। गंगा बेसिन पर बसे पांच राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों द्वारा प्रदत्त आंकड़ों के मुताबिक, मई 2018 में गंगा बेसिन शहरों में फिकल कॉलिफॉर्म का स्तर 2500 से 2,40,000 प्रति 100 एमएल था जबकि मानक 2,500 प्रति एमएल का है (देखें, मानकों पर खरा नहीं गंगा का पानी, पेज 38-39)। यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल में फिकल कोलिफॉर्म स्तर क्रमश: 2,500-15,000, 6,100-31,000 और 1,10,000-2, 80,000 प्रति 100 एमएल था। इसी प्रकार, यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल में कुल कोलिफ़ॉर्म का स्तर क्रमश: 5, 200-2,80,00; 14,000-22,000 और 17,000-3, 50,000 प्रति 100 एमएल था जबकि 5,000 प्रति 100 एमएल का है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट द्वारा की गई गणना के मुताबिक, अगर गंगा बेसिन के पांच राज्य उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल पूर्ण ओडीएफ बन जाते हैं तो प्रति दिन लगभग 180 मिलियन लीटर मल कचरा उत्पन्न होगा। यदि उचित फिकल कचरा प्रबंधन नहीं होता है, तो यह सब गंगा में जाएगा। आगे चिंता का कारण यह होना चाहिए कि मल (फिकल स्लज), सीवेज से भी अधिक प्रदूषित होगा। जहां सीवेज का बीओडी (देखें चुनौतियां और भी हैं, पेज 42-43) 150-300 मिलीग्राम/लीटर है। वहीं मल कचरा में यह प्रति लीटर 15,000-30,000 मिलीग्राम होगा। लिंड्रा स्ट्रैंड ने अपनी पुस्तक में कहा है कि मल कचरा में कार्बनिक पदार्थ, कुल ठोस और अमोनियम आमतौर पर वेस्ट वाटर की तुलना में 10 या 100 गुना अधिक होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शौचालयों के निर्माण के दौरान शायद ही कभी मल कचरा प्रबंधन पर विचार किया गया था।

फिकल स्लज एंड सेप्टेज मैनेजमेंट (एफएसएसएम) 2017 पर बनी राष्ट्रीय नीति भी उन चुनौतियों की बात करती है, जो अधिक से अधिक शौचालयों के निर्माण से पैदा होंगी।” एसबीएम के तहत अगले कुछ वर्षों में शहरी परिवारों को शौचालय सुविधाएं मिलेंगी, इसलिए संभव है कि कई लोग सीवेज सिस्टम उपलब्ध नहीं होने पर शहरों में ट्विन पिट शौचालयों और सेप्टिक टैंक पर निर्भर होंगे। इस प्रकार, एसबीएम के तहत जब मानव अपशिष्ट की रोकथाम काफी हद तक संभव हो सकेगी, इसका उपचार अभी से एक बड़ी चुनौती बन गया है। पर्याप्त सुरक्षित और टिकाऊ स्वच्छता की अनुपस्थिति में, स्वास्थ्य संबंधी बीमारियां, पानी और मिट्टी के गंभीर प्रदूषण के रूप में कई भारतीय शहर पहले से ही परिणाम भुगत रहे हैं।”

एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी दीपक सानन कहते हैं, “गंगा बेसिन गांवों में फिकल स्लज के लिए केवल शौचालय नहीं बल्कि फिकल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एफएसटीपी) की आवश्यकता थी। अब तक मैंने नहीं सुना है कि ऐसे किसी भी क्षेत्र में एफएसटीपी स्थापित किए गए हैं।”

दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संस्था के साथ काम कर रहे एक स्वच्छता विशेषज्ञ ने कहा, “फिकल स्लज के प्रबंधन के लिए कोई रणनीति नहीं बनाई गई। शौचालयों के निर्माण के साथ-साथ कई हस्तक्षेपों की आवश्यकता थी, जो स्पष्ट रूप से नहीं हुआ।” इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (आईडब्ल्यूएमआई) के फिकल स्लज मैनेजमेंट विभाग के प्रमुख रविशंकर टी कहते हैं, “हमें ब्लॉक स्तर पर या ग्रामीणों के समूह के लिए छोटे एफएसटीपी की आवश्यकता थी। हाई वाटर टेबल वाले क्षेत्रों के लिए, हमें स्लज ड्राइंग बेड की आवश्यकता होती है जो ब्लॉक या ग्राम पंचायतों के समूह के लिए बनाए जा सकते हैं। ये बांग्लादेश, अफ्रीका और भारत के कुछ शहरों में आम हैं।” लापरवाही के कारण भी सेप्टिक टैंक काम नहीं कर रहे हैं। गंगाघाट, मुगलसराय और उन्नाव जैसे तीन गंगा बेसिन शहरों का अध्ययन करने के बाद जनवरी 2017 में प्रकाशित आईडब्ल्यूएमआई पेपर ने कहा, “ज्यादातर घर (गंगाघाट में 97% तक) सेप्टिक टैंक पर भरोसा करते हैं, लेकिन इन्हें ठीक तरह से रखा नहीं जाता। प्रत्येक 10-15 साल में फिकल स्लज एकत्र किया जाता है, भले ही हर 3 साल में ऐसा किया जाना जरूरी हो। नतीजतन, सेप्टिक टैंक जो वेस्ट वाटर से 60 प्रतिशत सस्पेंडेड सॉलिड और 40 प्रतिशत ऑर्गेनिक वेस्ट हटा सकते हैं, नहीं हटा पा रहे।”

यह पेपर एक और समस्या पर प्रकाश डालता है और कहता है कि शहरों का प्रदूषण छोटी और खुली नालियों के नेटवर्क से बहता है, जो अंत में गंगा में मिलता है। उत्तर प्रदेश के बिठूर के पास ब्रहवतघाट पर रहने वाले 80 साल के गोविंद प्रसाद दीक्षित ने दिखाया कि कैसे घाट के पास 100 से ज्यादा घरों से निकलने वाली खुली नाली सीधे गंगा में जा रही है। वह बताते हैं, “अधिकारी यहां कई बार आए हैं। वे सर्वेक्षण करने घाट पर जाते हैं और सौंदर्यीकरण का काम देखते हैं लेकिन इस नाली पर कभी ध्यान नहीं देते।” हालांकि यह पेपर गंगा बेसिन शहरों के फिकल स्लज प्रबंधन के लिए एक समाधान प्रदान करता है। यह कहता है कि सीवर और ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की लागत 17 बिलियन अमरीकी डालर से अधिक हो सकती है और हर साल संचालन और रखरखाव पर सैकड़ों लाख रुपए लगेंगे। यह कहता है, “ऐसी परियोजनाओं के लिए भूमि मिलना भी एक मुद्दा है। यदि सेप्टेज को मशीन से उठाने के बाद उसका ट्रीटमेंट और पुन: उपयोग किया जाए तो यह फायदे का सौदा है। इसकी (250 से 2,000 रुपए/व्यक्ति) लागत पारंपरिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (5,000 रुपए/व्यक्ति) के मुकाबले कम है।

गंगा सफाई का अर्थशास्त्र

गंगा बेसिन नदी प्रबंधन योजना तैयार करने के लिए बने सात आईआईटी के संघ की रिपोर्ट 2013 में आई। अपनी अंतरिम रिपोर्ट में इसने कहा है कि किसी नगरपालिका में उत्पन्न होने वाले वेस्ट वाटर को इस हद तक ट्रीट किया जा सकता है कि वह पुन: उपयोग लायक बनाया जा सके। इसका खर्च एक पैसा प्रति लीटर उस समय बताया गया। नमामि गंगे की पूरी लागत 22,000 करोड़ रुपए है। हालांकि संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना के समय पर पूरे न होने के कारण नमामि गंगे कार्यक्रम की लागत बढ़ जाएगी। कितनी बढ़ेगी, इसका अनुमान दिसंबर 2018 के बाद ही लगाया जा सकेगा।

नमामि गंगे के दायरे में आने के बाद भी 2011 की शुरुआत में स्वीकृत कई परियोजनाएं अपनी समयसीमा पर पूरी नहीं हो सकीं। जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जीका) की सहायता से वाराणसी में एसटीपी का निर्माण किया जाना था। इसे 14 जुलाई, 2010 को 496 करोड़ रुपए की मंजूरी दे दी गई थी और काम 2017-18 में पूरा होने की समयसीमा तय की गई थी। कुछ हिस्सों का काम 2016 में पूरा किया जाना था। डाउन टू अर्थ के पास मौजूद दस्तावेजों से पता चलता है कि इस प्लांट की प्रगति दिसंबर 2014 शून्य थी। जीका से टेक्निकल बिड पर सहमति का इंतजार था। दिसंबर 2015 में स्थिति जस की तस थी। उसके बाद एसटीपी का निर्माण निर्माण शुरू हुआ और दिसंबर 2016 तक 34 प्रतिशत काम पूरा हुआ। अंतोगत्वा सरकार ने इस प्लांट का संशोधित प्लान जारी किया और परियोजना का व्यय 641.19 करोड़ रुपए हो गया। एक बार फिर समयसीमा को जून 2018 तक बढ़ा दिया गया। यह उत्तर प्रदेश का अकेला उदाहरण नहीं है।

गढ़मुक्तेश्वर में 9 एमएलडी क्षमता का एसटीपी अप्रैल 2018 में स्थापित हुआ जबकि समयसीमा 2015-16 निर्धारित थी। इसी तरह की कहानी बुलंदशर एसटीपी की भी है। बिहार में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है। 8 मार्च 2010 को राज्य के बेगूसराय जिले के लिए 2015-16 की समयसीमा के साथ 65 करोड़ रुपए की लागत से 17 एमएलडी का एसटीपी मंजूर किया गया था। परियोजना विश्व बैंक द्वारा सहायता प्राप्त थी। एनएमसीजी दस्तावेजों से पता चलता है कि दिसंबर 2016 तक निर्माण मोर्चे पर कोई प्रगति नहीं हुई। दिसंबर 2017 में, निविदा रद्द कर दी गई थी। संशोधित एए एंड ईएस (एडमिनिस्ट्रेटिव अप्रूवल एंड एक्सपेंडिचर सेंक्शंड) मार्च 2018 में जारी हुआ। 230 करोड़ रुपए की बढ़ी हुई लागत के साथ इसकी समयसीमा भी बढ़ाई गई और अब यह विश्व बैंक की बजाय केंद्र सरकार की परियोजना बन गई। 8 मार्च 2010 को राज्य के हाजीपुर जिले के लिए 2015-16 की समयसीमा और 113 करोड़ रुपए की लागत पर 22 एमएमडी का एसटीपी मंजूर किया गया था। इस पर अभी तक कोई काम नहीं हुआ है। अब जनवरी 2020 की समयसीमा तय की गई है। ताजी निविदा के साथ 305 करोड़ रुपए की लागत से एक संशोधित एए एंड ईएस जारी किया गया है। पटना का करमलीचक एसटीपी अब 2020 तक 77 करोड़ के बदले 227 करोड़ रुपए की लागत से बनाया जाएगा, जबकि इसे 2010 में पांच साल की समयसीमा के साथ बनाया जाना था। बिहार में ऐसे कई उदाहरण और भी हैं।

इसके अलावा सीएजी ने दिसंबर 2017 की रिपोर्ट में नमामि गंगे के खराब वित्तीय प्रबंधन की भी ओर इशारा किया। इसमें कहा गया, “2014-15 से 2016-17 के दौरान केवल आठ से 63 प्रतिशत धन का उपयोग किया गया। केंद्र की नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी), विभिन्न राज्य गंगा समितियां और अन्य कार्यकारी एजेंसियों का क्रमश: 2,133.76 करोड़ रुपए, 422.13 करोड़ रुपए और 59.28 करोड़ रुपए का फंड इस्तेमाल नहीं हुआ।” 31 मार्च 2017 को स्वच्छ गंगा फंड में 198.14 करोड़ रुपए उपलब्ध थे। यह फंड गंगा की सफाई के लिए आम लोगों द्वारा सरकार को दिया गया है। हालांकि, एनएमसीजी इस फंड का एक रुपए भी इस्तेमाल नहीं कर सका और संपूर्ण राशि योजना को अंितम रूप न देने पाने के कारण बैंकों में ही पड़ी रह गई। एनएमसीजी ने अगस्त 2017 को सीएजी को कहा था कि दिसंबर में 2016 में उसके प्राधिकरण के रूप में आने के बाद सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी), इंटरसेप्शन एंड डाइवर्सन (आई एंड डी) के कामकाज और संबंधित परियोजनाओं के स्वीकृति की गति बढ़ गई। एनएमसीजी के मुताबिक, इसका नतीजा न केवल लक्ष्यों बल्कि वर्ष 2017-2018 के अंत तक उच्च व्यय के रूप में मिलने की भी संभावना है। हालांकि, एनएमसीजी के दस्तावेज बताते हैं कि 31 अगस्त, 2018 तक 22,323.37 करोड़ रुपए की परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई है, लेकिन सिर्फ 5,291 करोड़ रुपए का ही इस्तेमाल हुआ। कैग ने पाया, “इस प्रकार, एनएमसीजी का जवाब 2014-17 के दौरान कार्यों के निष्पादन की धीमी गति की ओर इशारा करता है और इसलिए धन का कम उपयोग होता है।”

नमामि गंगे के मीडिया आउटरीच पर अनावश्यक खर्च को लेकर भी सीएजी ने सवाल उठाए। डीएवीपी की नई विज्ञापन नीति के अनुसार, केंद्र सरकार के मंत्रालयों / विभागों / संलग्न और अधीनस्थ कार्यालयों / फील्ड कार्यालयों को केवल डीएवीपी के माध्यम से ही विज्ञापन देने हैं। इसके अलावा, डीएवीपी के माध्यम से किए गए विज्ञापनों के लिए मंत्रालयों / विभागों और अन्य क्लाइंट संगठनों को डीएवीपी 15 प्रतिशत छूट (एजेंसी कमीशन के समतुल्य) प्रदान करता है। सीएजी ने कहा, “हमने पाया कि एनएमसीजी ने देश भर के प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रों में प्रिंट विज्ञापन जारी करने के लिए अन्य विज्ञापन एजेंसियों को किराए पर लिया और 2.46 करोड़ (मार्च 2014 से जून 2016) का व्यय किया। इसमें 36.06 लाख रुपए एजेंसी कमिशन और 5.23 लाख रुपए सेवा कर के रूप में दिया गया था।” सीएजी ने कहा कि प्रिंट विज्ञापनों के लिए निजी एजेंसियों की सेवा सरकारी नीति का उल्लंघन थी और इसके परिणामस्वरूप एजेंसी कमीशन और सेवा कर के कारण 36.06 लाख और 5.23 लाख रुपए बर्बाद हुए।

विभागों और सरकार के बीच समन्वय

जल संसाधन मंत्रालय ने नमामि गंगे के तहत बेहतर कार्यान्वयन के लिए नौ मंत्रालयों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें रेलवे, एचआरडी, युवा, शिपिंग इत्यादि मंत्रालय शामिल थे। हालांकि, आज तक इसका कोई भी विवरण उपलब्ध नहीं है कि ये मंत्रालय कैसे काम कर रहे हैं। उमा भारती के मंत्री रहते मंत्रालय ने जालंधर के बलबीर सिंह सीचेवाल के साथ भी समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। सीचेवाल ने कई वर्षों के प्रयास के बाद जालंधर की कालीबेन नदी को सामुदायिक प्रयासों से पुनर्जीवित किया था जिसके लिए वह विश्व विख्यात हैं। सीचेवाल ने डाउन टू अर्थ से बात करते हुए कहा, “शुरू में हमारे पास कुछ गांवों के मुखिया व अन्य लोग प्रशिक्षण के लिए आए थे। स्वयं उमा भारती भी हमारे प्रयासों को देखने आई थीं पर अब पिछले डेढ़ साल से कोई नहीं आया। हमें नहीं मालूम कि हमारे द्वारा दिए गए प्रशिक्षण का जमीनी स्तर पर क्या इस्तेमाल हुआ। मंत्रालय का कोई भी आदमी लंबे समय से हमारे संपर्क में नहीं है।” नमामि गंगे के बारे में पूछे जाने पर सीचेवाल ने कहा, “हमें नहीं लगता कि एसटीपी और घाट सौंदर्यीकरण तक सिमटी इस कार्यक्रम का कोई दूरगामी परिणाम होगा। जब तक समुदाय को इस कार्यक्रम में सक्रिय रूप से शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक यह कार्यक्रम कभी सफल नहीं होगा।”

आईआईटी-कानपुर के प्रोफेसर विनोद तारे कहते हैं, “गंगा एक्शन प्लान में मंत्रालयों के बीच समन्वय की कमी थी। नमामि गंगे में भी कमी है। यदि विभाग पर्याप्त समन्वय नहीं करते हैं, तो कार्यक्रम वांछित उद्देश्यों को प्राप्त नहीं करेगा।” तारे ने गंगा पर रिपोर्ट्स देने वाले आईआईटीज के कंसोर्टियम का नेतृत्व किया था। इन रिपोर्ट्स को बनाने के लिए सरकार ने आईआईटी के कंसोर्टियम को 16 करोड़ रुपए दिए थे। गंगा महासभा के प्रमुख स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती भी इस बात पर चिंता जाहिर करते हैं। वह एनएमसीजी के डायरेक्टर जनरल (डीजी) को लिख रहे हैं। वह कहते हैं, “जल संसाधन मंत्रालय ने कई मंत्रालयों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर तो कर लिए लेकिन कोई नहीं जानता कि इसके बाद क्या हुआ। मैंने कई बार पूछताछ की कोशिश की, लेकिन कुछ भी नहीं निकला।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा परिषद (एनजीसी) का गठन अक्टूबर 2016 में हुआ। इसके बाद कभी इसकी बैठक नहीं हुई। एनजीसी गंगा नदी में प्रदूषण को रोकने, संरक्षित करने और नियंत्रित करने के लिए गठित किया गया था।

7 अक्टूबर, 2016 को जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचना कहती है, “राष्ट्रीय गंगा परिषद हर साल कम से कम एक बार बैठक करेगी या जरूरत पड़ने पर उससे अधिक बार भी।” इसी अधिसूचना के अनुसार, राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (एनजीआरबीए), जिसका नेतृत्व मौजूदा प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है, एनजीसी के अस्तित्व में आने के साथ भंग हो गई। इसलिए, एनजीसी को एनजीआरबीए की जिम्मेदारियों का निर्वहन करना है। पीएम मोदी की अध्यक्षता में एनजीआरबीए की एक बैठक 4 जुलाई 2016 को हुई थी। इसके बाद, एनजीसी का गठन हुआ था। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुष्टि की कि तब से एनजीसी की एक भी बैठक नहीं हुई है। प्रोफेसर तारे यह भी कहते हैं कि अगर प्रशासन में सुधार किया जाता है तो कार्यक्रम को विकेन्द्रीकृत किया जाना चाहिए। शीर्ष पर बैठी सरकार अत्यधिक केंद्रीकृत है और उसे अब सोचना है कि क्या करना है। वैसे लोगों को भारी संख्या में शामिल किया जाना चाहिए जो गंगा बेसिन क्षेत्र में रह रहे हैं।

क्या गंगा साफ हो जाएगी और क्या कोई समयसीमा संभव है? इस प्रश्न के जवाब में प्रोफेसर तारे का कहना है कि इसके लिए 2019 या 2020 की समयसीमा देना अवैज्ञानिक है। वह कहते हैं, “यह इतना आसान काम नहीं है कि कोई ऐसी छोटी समयसीमा दी जा सके। ऐसा करना राजनीतिक रूप से सही हो सकता है लेकिन वैज्ञानिक रूप से नहीं। वास्तव में, यह एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है और मुझे नहीं लगता कि वर्तमान परिस्थितियों में कोई समयसीमा तय की जा सकती है।”

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