मांस का फांस

आजकल बूचड़खाने विभिन्न आस्थाओं और कानून की वजह से विवाद का घर बने हुए हैं।

 
By Ishan Kukreti, Jitendra
Last Updated: Tuesday 30 May 2017 | 11:53:36 AM
फोटो: विकास चौधरी
फोटो: विकास चौधरी फोटो: विकास चौधरी

 

देश में पर्यावरण और खाद्य संबंधी कानून जिस अराजक तरीके से लागू किया जा रहा है, उसमें देश की बड़ी सच्चाईयां नजरंदाज हो जा रही हैं। देश में 70 प्रतिशत से अधिक लोग मांसाहारी हैं और मांस की इस मांग को पूरा करने के लिए पशुओं की हत्या तो करनी ही पड़ेगी। इशान कुकरेती बूचड़खानों को लेकर कानूनी पेचीदगियों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। जितेन्द्र ने उत्तर प्रदेश में घूमकर जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश की। दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह व्यवसाय छोटे किसानों और व्यापारियों के लिए बेहद अहम है और इसका प्रबंधन काफी संवेदनशीलता से करना होगा

उत्तर प्रदेश प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद पहला बड़ा फैसला लेते हुए 22 मार्च को सभी अवैध बूचड़खानो को बंद करने के आदेश दे दिए। आदित्यनाथ गौहत्या विरोधी एवं शाकाहार के समर्थक के तौर पर जाने जाते हैं। पर उन्होंने अपने इस फैसले के लिए अपने वैचारिक झुकाव की जगह नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के एक फैसले का हवाला दिया। एनजीटी का यह आदेश 12 मई 2015 को आया था। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ही एक नेता कृष्णकांत सिंह हूण ने 2013 में एनजीटी से, सरकारी नियमों को ताक पर रख कर चल रहे अवैध बूचड़खानों को बंद करने की अपील की थी। एनजीटी ने अपने आदेश में कहा, “उत्तर प्रदेश सरकार, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, तीन जिलों (गाजियाबाद, मेरठ और हापुड़) की नगर पालिकाएं, निगम तथा अन्य संबंधित सरकारी विभागों को यह सुनिश्चित करना होगा कि अवैध या अनधिकृत बूचड़खाना यहां चलने न पाए।” एनजीटी ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एक समिति गठित करने का आदेश दिया था जो स्थानीय मांस की जरूरत के हिसाब से छोटे दुकानदारों को सीमित संख्या में पशुओं की हत्या और मांस की बिक्री का अधिकार देगा। इस आदेश के अनुसार बोर्ड को यह हर तिमाही में करना था।

एनजीटी के आदेश में तीन मांस निर्यातकों का नाम भी लिया गया था। ये तीन निर्यातक मेसर्स रेबैन फूड्स प्राइवेट लिमिटेड, अल नफीस फ्रोजेन फूड एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड और अल नजीर एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड था। एनजीटी ने कहा कि उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इन तीनों कंपनियों को सीमित संख्या में पशुओं की हत्या करने की अनुमति देगा।

उन दिशा-निर्देशों का क्या हुआ शायद कोई नहीं जानता। यह भी कि उनका पालन संभव है भी या नहीं। लेकिन दो साल बाद, एनजीटी के उस फैसले ने देशभर में बखेड़ा खड़ा कर दिया है। बहस पूरी तरह से गायों के संरक्षण पर आकर टिक गई है। इस उन्माद में अच्छे मांस के लिए बूचड़खानों की सही तरीके से प्रबंधन की बात दब सी गई है। 

उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के एक सप्ताह के भीतर ही बूचड़खाने सबके निशाने पर आ गए। वो चाहे नेता हो, नीति निर्माता या पुलिस। आदित्यनाथ की इस धडपकड़ ने अन्य राज्यों की सरकार पर भी डोमिनो प्रभाव डाला। खासकर देश के अन्य छह राज्यों झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और हरियाणा पर। मांस व्यापार में उत्तर प्रदेश सहित इन राज्यों की बड़ी हिस्सेदारी है। डाउन टू अर्थ ने मीडिया में छपी खबरों के अध्ययन से पाया कि इन सात राज्यों के बूचड़खानों पर मार्च 23 से लेकर अप्रैल 7 के बीच महज 14 दिन में करीब 327 छापे पड़ चुके हैं। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार ये राज्य पूरे देश के कुल मांस उत्पादन का 32 प्रतिशत उत्पादन करते हैं। अब तक इस पूरे मामलों के केंद्र, उत्तर प्रदेश में 26 बूचड़खाने बंद हो चुके हैं।

उत्तर प्रदेश में बूचड़खानों पर शिकंजा कसने के मात्र पांच दिन बाद ही झारखंड और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने मांस व्यापार पर नकेल कसना शुरू कर दिया। झारखंड के प्रमुख सचिव ने राज्य के उपायुक्त, पुलिस और नगर पालिकाओं को पत्र लिखकर उन्हें अवैध बूचड़खाने बंद करवाने के निर्देश दिए। छत्तीसगढ़ ने मांस की 11 दुकानों को बंद करने के आदेश दिए। अगला नंबर मध्य प्रदेश का था। इंदौर के नगर निगम ने 29 मार्च को अवैध तरीके से चल रहे एक बूचड़खाने, जहां मांस की बिक्री भी होती थी, को बंद करवा दिया।

‘अवैध’ बूचड़खानों के खिलाफ चल रही यह मुहिम अब गौहत्या के खिलाफ आंदोलन का रूप ले चुकी है। खासकर तब, जब इन सातों राज्यों में गौहत्या के खिलाफ पहले से ही कड़े कानून हैं। फिर भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह ने गौहत्या के लिए मृत्युदंड का प्रावधान की घोषणा करने में कोई देरी नहीं की। यहां गौहत्या, उनके परिवहन और तस्करी पर तीन साल तक की कैद और/या 10,000 रुपये तक का जुर्माना लगाने का कानून पहले से ही था। सिंह की इस घोषणा के ठीक एक दिन बाद गुजरात सरकार ने अपने पशु संरक्षण विधेयक में संशोधन कर गौहत्या की वर्तमान सजा को बढ़ाकर उम्रकैद कर दिया। 

हरियाणा में पशुपालन विभाग के अंतर्गत गौसेवा आयोग नामक संस्था बनाई गई है। यहां अवैध बूचड़खानों को बंद करवाने का जिम्मा इसी संस्था ने लिया है। इस निकाय के अध्यक्ष, भनी राम मंगला ने डाउन टू अर्थ को बताया कि अब राज्य नए लाइसेंस जारी नहीं करेगा और राज्य के दो मौजूदा बूचड़खानों की कड़ी निगरानी रखी जाएगी। ये बूचड़खाने मेवात जिले में स्थित हैं।

आजकल राज्य सरकारों में बूचड़खानों को बंद करवाने का जुनून सा छाया है। इस जुनून को गौरक्षा से जोड़कर कुछ स्वघोषित गौरक्षक समूह कानून अपने हाथों में लेने लगे हैं। यह खतरनाक है। राजस्थान के अलवर जिले में 31 मार्च को एक दूधिये को महज इस शक के बिनह पर लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला कि वह बूचड़खानों को गाय उपलब्ध कराता है। बता दें कि राजस्थान उन राज्यों में से है जो बूचड़खानों को बंद करवाने का पुरजोर समर्थन करता है।

वैसे इस घटना के बाद सर्वोच्च न्यायालय हरकत में आई और 7 अप्रैल को केंद्र और छः राज्यों—राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और झारखंड—को नोटिस भेजा। न्यायालय ने इन राज्यों से पूछा है कि इन गौरक्षकों पर प्रतिबंध क्यों न लगा दिया जाए। वर्ष 2016 के एक मामले की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह नोटिस जारी किया था। गौरक्षक समूहों पर प्रतिबंध लगाने के लिए कांग्रेसी नेता तहसीन पूनावाला ने यह याचिका दायर की थी।



ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि सरकारी अधिकारी भी इस बंदी को लागू करने में कुछ अधिक ही सख्ती बरत रहे हैं। डाउन टू अर्थ ने पूरे उत्तर प्रदेश में यात्रा की और पाया कि जमीनी हकीकत बिलकुल अलग है। दूर से देखने में अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध जितना सामान्य लग रहा है, जमीन पर वैसा नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के बाद नगर निगम अधिकारियों ने बांदा जिले के मांस की सभी 128 दुकानों को बुलडोजर से गिरवा दिया। इनमें से कई लोगों के पास तो इसी नगर निगम द्वारा जारी किए गए लाइसेंस तक मौजूद थे। सेना से वर्ष 2003 में सेवानिवृत्त होने के बाद मांस की दूकान खोलने वाले एक व्यापारी ने बताया, “मेरा लाइसेंस वर्ष 2020 तक वैध है। फिर भी अधिकारियों ने मेरी दूकान ढहा दी।” इनके अनुसार, “सरकार को हमारी दुकान गिराने से पहले कम से कम एक अनिवार्य नोटिस तो देना चाहिए था।” ऐसी ही कुछ कहानी फतेहपुर जिले के एक मांस विक्रेता की भी थी। उन्होंने बताया, “नगर निगम के एक अधिकारी मेरे घर आए और सलाह दी कि मैं तब तक दूकान न खोलूं जबतक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती।” इस बिगड़ती स्थिति को समझने के लिए हमें कुछ रहस्यों की पड़ताल करनी होगी।

रहस्यमयी मांस 


पहला रहस्य तो यही है कि आखिर ‘बीफ’ क्या है? हालांकि इसका इस्तेमाल गाय और भैंस- दोनों के मांस के लिए किया जाता है, पर जिस कानूनी प्रावधान (देखें: गाय पर बवाल) के तहत इन बूचड़खानों को बंद किया जा रहा है उसमें इस शब्द का जिक्र तक नहीं है। बीफ की स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं होने से न केवल गाय के सरंक्षण संबंधित कानून अजीब लगता है बल्कि स्वघोषित गौ सरंक्षक भी कानून की इस कमी का नाजायज फायदा उठा रहे हैं।

देश के छह राज्यों में गाय काटने की छूट स्थिति को और जटिल बनाती है। ये राज्य हैं केरल, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, लक्षद्वीप और पश्चिम बंगाल। अन्य पांच राज्य—गोवा, दमन और दीव, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा—में शोध कार्यों के लिए या बीमार होने की स्थिति में गाय काटने की छूट है। वहीं दो राज्य छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में गाय या भैंस काटने पर कड़ा प्रतिबंध है। राजस्थान के कानून में बोवाइन शब्द का जिक्र है जिसमें सिर्फ गाय और उसके वंशज ही शामिल हैं।

दूसरा रहस्य है कि आखिर यह देश (भारत) खाता क्या है? यहां विभिन्न पशुओं के मांस के उत्पादन और निर्यात के आंकड़े तो हैं पर स्थानीय खपत का कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है। ऐसे में देश में मांस की खपत का अंदाजा लगाना मुश्किल है।

पर सामान्य जोड़-घटाव किया जाए तो कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। जैसे कुल उत्पाद में से कुल निर्यात को घटाया जाए तो कहा जा सकता है कि एक भारतीय सालभर में लगभग 4 किलो या प्रतिदिन 11 ग्राम मांस खाता है। यह आंकड़ा मांस आधारित भोजन के लिए तय मानक से काफी कम है। मानक के अनुसार एक व्यक्ति पर रोज 100 ग्राम मांस की खपत होनी चाहिए। देश में मांस के उपभोग से संबंधित दो तरह के सरकारी आंकड़े मौजूद हैं। ये आंकड़े बताते कम छिपाते अधिक हैं। वर्ष 2011-12 में आए 68वें दौर के राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वे में प्रति परिवार प्रतिदिन प्रोटीन के स्रोत के तौर पर ‘अंडे, मछली और मांस’ के उपभोग का जिक्र है। इस रिपोर्ट के अनुसार कुल प्रोटीन के स्रोत में मांस, अंडे, मछली का हिस्सा ग्रामीण इलाकों में 7 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 9 प्रतिशत है।

भारत के सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे 2014 की जनगणना से शाकाहारी और मांसाहारी लोगों की संख्या का पता चलता है। पंद्रह साल के उम्र के लोगों में कुल 71 प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं। इस सर्वेक्षण में देश के कुल 8,858 घरों को शामिल किया गया था। यह सर्वेक्षण इतने छोटे स्तर पर था कि इससे पूरे देश के बारे में सटीक कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

निर्यात संबंधी आंकड़ों पर नजर डालें तो भैंस के मांस से देश को बहुत अधिक राजस्व आता है। वर्ष 2016 में देश से भैंस के कुल 14.7 लाख टन मांस का निर्यात हुआ था। इससे देश को कुल 26,000 करोड़ रुपए का राजस्व आया था। यह राजस्व बासमती चावल के निर्यात से प्राप्त मुनाफे से काफी अधिक है। ये सारे आंकड़े कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकार (एपीईडीए) से लिए गए हैं जो निर्यात आधारित मांस के लिए बूचड़खानों को लाइसेंस देता है। कुल मांस निर्यात में भैंस के मांस का हिस्सा करीब 25 प्रतिशत है और कुल कृषि उत्पादों में सबसे अधिक राजस्व इसी से आता है। उत्तर प्रदेश ने वर्ष 2016 में भैंस के मांस निर्यात से करीब 11,000 करोड़ रुपए की कमाई की थी।

नियमों का रहस्य: आखिर वैध क्या है?

मांस व्यापार में अगले बड़े भ्रम की वजह बूचड़खाना है। मवेशियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, कहां और कैसे काटा जाए, निर्यात किए जाने वाले मांस के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग)-सबके लिए ढेरों नियम-कानून हैं। इन सभी कानूनों का पालन सरकार के हर स्तर—केंद्र, राज्य और स्थानीय—पर होना है। बूचड़खानों से संबंधित नियम को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है।

हालांकि कई सारे दिशानिर्देश एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं, पशुओं से संबंधित मामलों के लिए दो नियम हैं। पहला, पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम 2001, जिसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी स्थानीय सरकारी तंत्र की है—जैसे नगर निगम, नगर पालिका और पंचायत। दूसरा, खाद्य सुरक्षा और उसके मानक (खाद्य व्यवसाय और उसके पंजीकरण) अधिनियम, जिसके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण या (एफएसएसएआई) की है। पर्यावरण संबंधित मानकों के लिए पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 है, जिसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पहले दो मानक बनाए जिसके तहत इन बूचड़खानों से निकलने वाले कचरे का निवारण होता था। यह काटे गए पशुओं की संख्या पर आधारित था। इसके तहत, वैसे बूचड़खाने जहां रोज 70 टन मांस तैयार होता है, मतलब 466 बड़े जानवर कटते हों को कम कचरा निकासी की छूट थी। खासकर उन बूचड़खानों के मुकाबले जहां कम संख्या में जानवर कटते हों।

अप्रैल 10, 2017 को मंत्रालय ने कचरा निपटारे के नए नियम के लिए नई अधिसूचना जारी की। अब बड़े और छोटे बूचड़खानों के बीच का अंतर खत्म हो गया है। अब छोटी-बड़ी सभी इकाइयों को इस नियम का सख्ती से पालन करना है। नए नियम के मुताबिक बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा 500 और 100 से घटाकर 30 मिग्रा/लीटर कर दी गई है। इसके अतिरिक्त केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) के नए मानक 250 मिग्रा/लीटर और सस्पेंडेड सॉलिड 50 ग्राम/लीटर तक निर्धारित किए गए हैं। चर्बी की मात्रा 10 मिग्रा/लीटर तय  की गई है।

इतने सख्त नियम के बाद इनके क्रियान्वयन की बारी आती है जो पूरे देश के बूचड़खानों और मीट प्रोसेसिंग इकाईयों पर समान तरीके से लागू होने चाहिए।

उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के दो दिन बाद बांदा जिले में प्रशासन ने मांस की 128 दुकानों को ढहा दिया

इन नियम-कानूनों का बारीकी से अध्ययन करने पर इनमें अन्तर्निहित विरोधाभास का पता चलता है। इसकी शुरुआत बूचड़खाना की परिभाषा से हो जाती है। वर्ष 2011 के एफएसएसएआई के नियम के अनुसार इन्हें खाद्य व्यवसाय संचालक के तौर पर परिभाषित किया गया है, जिसके अंतर्गत एक खास क्षेत्र में बड़े और छोटे पशुओं को काटा जाता है। इनमें भेड़, बकरी और विभिन्न प्रकार के पक्षी भी शामिल हैं। इसके अनुसार इस जगह पर मांस का उत्पादन, विक्रय इत्यादि सब होता है। इस परिभाषा के अनुसार गली-मोहल्लों के मुर्गे की दूकान भी बूचड़खाना कहलाएगा। पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम के अनुसार, “एक ऐसा बूचड़खाना जहां 10 या अधिक जानवर रोज कटते हों” को बूचड़खाने के तौर पर परिभाषित किया जा सकता है।

जैसे ही जानवर खरीदे जाते हैं, पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम की भूमिका शुरू हो जाती है। इस नियम में कई तरह के जानवर के काटे जाने पर प्रतिबंध है—जैसे अगर पशु गर्भ से है, तीन महीने से छोटे जानवर, जिसका तीन महीने से छोटा बछड़ा हो या पशुओं के डॉक्टर द्वारा काटे जाने के लिए पूर्ण रूप से फिट होने का सर्टिफिकेट न दिया गया हो।

जानवर के काटे जाने के इन नियमों के सुनिश्चित हो जाने के बाद बूचड़खाने संबंधित नियम की भूमिका शुरू होती है। जैसे बूचड़खाने में आने वाले पशुओं के लिए रिसेप्शन क्षेत्र होना चाहिए। पशुओं के आराम करने के लिए जगह होनी चाहिए। इसके तहत एक बड़े जानवर को कम से कम 2.8 वर्ग मीटर और छोटे जानवर को 1.6 वर्ग मीटर जगह दी जानी चाहिए। इसका स्पष्ट उल्लेख सेक्शन 5 (3) में है। इसके अतिरिक्त सेक्शन 5 (4) के अनुसार यह विश्राम गृह ऐसे बना होना चाहिए जहां जानवर गर्मी, सर्दी और बरसात में सुरक्षित रहें।

इस कानून में बूचड़खाने में रोशनी से लेकर हवा के आने-जाने तक, सबके लिए प्रावधान है। “आतंरिक दीवारें चिकनी और सपाट होनी चाहिए। ये दीवारें मजबूत चीजों से बनी होनी चाहिए जैसे ईंट, टाईल्स, सीमेंट या प्लास्टर इत्यादि।”

इसमें आगे यहां तक कहा गया है, “कोई व्यक्ति जो संक्रामक या अन्य फैलने वाले रोग से ग्रसित है, तो उसे जानवर काटने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।” अगर इसको सामान्य भाषा में समझा जाए तो जिसको सर्दी हुई होगी उसे नुक्कड़ की दूकानों में मुर्गा काटने की इजाजत नहीं होगी।

जब पंचायत, जिला परिषद या नगर निगम पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम संबंधी अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) जारी कर दे, तब एफएसएसएआई की जिम्मेदारी शुरू होती है। इसके अनुसार बूचड़खाने तीन श्रेणी में बंटे हैं। पहला वह मांस उत्पादक जो दो बड़े और करीब 10 छोटे जानवर या 50 चिड़िया (मुर्गे इत्यादि) काटता है। दूसरा वह जो 50 बड़े जानवर और 150 छोटे जानवर या 1,000 चिड़िया रोज काटता हो और तीसरा वो जो इससे भी अधिक जानवर काटता हो। इस नियम के अनुसार छोटे उत्पादक को राज्य खाद्य सुरक्षा आयुक्त के तौर पर नियुक्त/अधिसूचित पंजीकरण प्राधिकारी—जो पंचायत या नगर निगम का अधिकारी हो सकता है—से पंजीकरण प्रमाणपत्र और फोटो पहचानपत्र लेना होता है। दूसरी श्रेणी में आता है मांस उत्पादक, जिसे राज्य या केंद्र शासित राज्य के अधिकारी से लाइसेंस लेना पड़ता है। वह अधिकारी राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्त द्वारा नियुक्त किया जाता है। तीसरी श्रेणी में आने वाले उत्पादक को केंद्र लाइसेंसिंग प्राधिकरण से लाइसेंस लेना होता है। इस प्राधिकरण की नियुक्ति एफएसएसएआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा किया जाता है। सबसे छोटे उत्पादक को एक महीने के भीतर लाइसेंस मिल जाना चाहिए और पंजीकरण करने वाले अधिकारी को एक साल में कम से कम एक बार बूचड़खाने का निरीक्षण करना चाहिए। अन्य दो श्रेणियों के लिए मांस उत्पादक एक से पांच साल के लिए लाइसेंस ले सकता है। पर इन उत्पादकों को प्रत्येक वर्ष रिटर्न फाइल करना होता है, जिसमें व्यवसाय संबंधित सारी जानकारी होनी चाहिए। तीसरी श्रेणी पर लागू होने वाले नियम उन प्रसंस्करण इकाईयों पर भी लागू होते हैं जो रोज 500 किलो या एक साल में 1.5 करोड़ टन मांस का उत्पादन करते हैं। यही नियम उनपर भी लागू होता है जो अपना 100 प्रतिशत उत्पाद निर्यात करते हैं या जिनकी इकाईयां दो या दो से अधिक राज्यों में कार्य कर रहीं हैं। एफएसएसआई के नियम के अनुसार पशुओं को काटने से पहले सुन्न करना होता है ताकि “पशुओंको किसी प्रकार के डर, तनाव या दर्द से मुक्त किया जा सके।”

इन नियम के साथ सबसे बड़ी समस्या निगरानी की है। क्योंकि इनमें कुछ की परिभाषा व्यक्तिपरक है तो कुछ की एकदम खास। उदाहरण के तौर पर सबसे छोटे मांस उत्पादक को “ऐसी जगह पर स्थित होना चाहिए जो साफ-सुथरा हो” और अगर इस स्थान का इस्तेमाल खाद्य पदार्थों के विक्रय या व्यापार के लिए किया जा रहा है तो इस स्थान को समग्र रूप में स्वच्छ होने के साथ ही मांस उत्पादन और भंडारण के लिए पर्याप्त जगह होना चाहिए, जल निकासी की उचित व्यस्था होनी चाहिए। इस नियम के अनुसार, “जानवर ले जा रहे ट्रक की गति सीमा 40 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए ताकि इन्हें झटके से बचाया जा सके। उस ट्रक में कुछ और नहीं लादा जाना चाहिए। साथ ही उस ट्रक को गैर जरूरी जगहों पर नहीं रुकना चाहिए। इस नियम में लोगों को तेज आवाज निकालने, जैसे सीटी बजाना इत्यादि से बचने को कहा गया है, जिससे कि पशुओं को कोई तनाव न हो।”

एफएसएसएआई से सहमति लेने के बाद एक बूचड़खाने को अपशिष्टों के निस्तारन संबंधित मानकों के आधार पर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमोदन प्राप्त करना होता है। उत्सर्जन के ये मानक पर्यावरण सरंक्षण अधिनियम (1986) में उल्लिखित है। बूचड़खाने जो निर्यात करना चाहते हैं, उनको इसके अतिरिक्त एपीईडीए से प्रमाण पत्र भी लेना पड़ता है।

यह स्पष्ट है कि मांस उत्पादन संबंधी ढेरों कानून हैं। उन्हें सलीके से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने से लेकर, काटने में मानवीयता बरतने, साफ-सफाई और निकलने वाले कचरे के निपटारे तक। पर समस्या इन नियमों के क्रियान्वयन में है। जिन संस्थाओं को इन बूचड़खानों की निगरानी करनी है, उनके पास स्टाफ की भारी किल्लत है। दूसरे किसी ने इन नियमों को उस नजर से नहीं देखा कि इनका क्रियान्वयन हो भी सकता है कि नहीं। जबकि स्थानीय किसान और छोटे दूकानदार मांस का उत्पादन स्थानीय लोगों के लिए करते हैं। इसके मद्देनजर मांस सस्ता भी होना चाहिए। तब प्रश्न उठता है कि क्या स्थानीय स्तर पर होने वाला यह व्यवसाय वर्तमान से बेहतर तरीके से कैसे हो सकता है? बहस इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द होना चाहिए था, पर दुर्भाग्य से 2017 की इस गर्मी में यह सवाल दूर-दूर तक नहीं दीखता। सरकारी अधिकारी सतही वजहों को आधार बनाकर अवैध’ बूचड़खानों को बंद कर रहे हैं। आल इंडिया मीट एंड लाइवस्टॉक एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के सदस्य कहते हैं कि ये लोग राजनीतिक दबाव में काम कर रहे हैं। जैसे 25 मार्च को संभल जिले में तीन बूचड़खानों को सिर्फ इसलिए बंद कर दिया गया, क्योंकि उनका सीसीटीवी खराब था। उनका कहना है कि कभी-कभी सरकार प्रदूषण संबंधित नया सर्टिफिकेट देने से ही मना कर देती है।

इस व्यवसाय की प्रकृति ही ‘अवैध’ है

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी)के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि यहां हर स्तर पर गैरकानूनी काम हो रहा है। पर असल में यह अवैध प्रकृति ही मांस व्यापार को टिकाऊ और लाभदायक बनाती है। एक वैध बूचड़खाने के निर्माण में बहुत अधिक लागत आएगी। प्रसंस्करण इकाईयां सस्ता मांस लेना पसंद करती हैं जो सिर्फ अवैध बूचड़खानों से ही मिल सकता है। अभी एक बूचड़खाना खड़ा करने में लगभग 6-7 करोड़ रुपए का खर्च आता है। अगर सभी नियम-कानून का सही तरीके से पालन किया जाए तो उसकी लागत काफी बढ़ जाएगी। सीपीसीबी के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “अगर 2 हेक्टेयर में एक बूचड़खाना बनाया जाए तो कम से कम 12.5 करोड़ रुपए की लागत आ जाएगी।” (देखें पेज 32: महंगा प्रस्ताव)

देश में 79 अपेडा-स्वीकृत बूचड़खाना-सह-मांस प्रसंस्करण संयत्र और 34 मांस प्रसंस्करण इकाईयां हैं। नियम से सभी प्रसंस्करण इकाईयों को अपेडा-स्वीकृत बूचड़खानों से ही मांस खरीदना चाहिए। पर सच्चाई यह है कि ये सभी इकाईयां अपना कच्चा माल, छोटे-छोटे अवैध बूचड़खानों और नगर निगम द्वारा संचालित इकाईयों से खरीदते हैं, जो अपेडा-स्वीकृत नहीं हैं। सीपीसीबी अधिकारी ने बताया, “ये प्रसंस्करण इकाईयां इन बूचड़खानों पर और दबाव बनाती हैं। इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए ये बूचड़खाने और अधिक पशुओं को अवैध रूप से काटते हैं।”



एक अपेडा-स्वीकृत मांस प्रसंस्करण इकाई के मालिक ने डाउन टू अर्थ को बताया कि वे उत्तर प्रदेश के तीन नगर पालिका संचालित बूचड़खानों से मांस खरीदते हैं, क्योंकि सभी अपेडा-स्वीकृत बूचड़खानों के पास अपनी-अपनी प्रसंस्करण इकाईयां है। उन्होंने बताया, “हमने पांच साल पहले बूचड़खाने के लाइसेंस के लिए अर्जी दी थी जो आज तक जिला कलेक्टर के पास पड़ी है। जबकि हम 11 विभागों से पहले ही अनापत्ति प्रमाण पत्र ले चुके हैं।”

अपेडा और केंद्रीय पशुपालन विभाग के पास मौजूद आंकड़े निर्यात क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध कामों पर प्रकाश डालते हैं। वर्ष 2015-16 में भारत का कुल मांस निर्यात 18 लाख टन था। इसका मतलब है कि उस वर्ष 79 अपेडा-स्वीकृत बूचड़खानो में से प्रत्येक ने 23,000 टन मांस का उत्पादन किया था। डाउन टू अर्थ ने इसका हिसाब लगाया, जिससे पता चला कि इन बूचड़खानों में प्रतिदिन 63 टन मांस का उत्पादन हो रहा था। या यूं कह लें कि प्रतिदिन लगभग 1,260 पशु काटे गए। सीपीसीबी के अनुसार एक पशु को काटने पर उसके असल भार का मात्र 35 प्रतिशत ही मांस निकल पाता है। वैसे अपेडा की वेबसाइट पर बूचड़खानों की क्षमता के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन लंबी प्रक्रिया होने की वजह से इतने सारे पशु काटना संभव नहीं है।

एफएसएसएआई के 2011 के नियमों के अनुसार पशुओं को काटने से 12 घंटे पहले ही उन्हें बूचड़खाने में बने आरामगाह में रखा जाना चाहिए। इन 12 घंटों में पशुओं को केवल पानी देना चाहिए ताकि उनके अंदर से बीमारी पैदा करनेवाले सूक्ष्मजीवों को खत्म किया जा सके। उसके बाद पशुओं के डॉक्टर को आकर हर जानवर का कत्ल से पहले और बाद में अलग-अलग परीक्षण करना चाहिए। उत्तर प्रदेश के शहरी विकास विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि इस प्रक्रिया में पांच मिनट लगते हैं। इसका मतलब है कि 1,260 पशुओं का परीक्षण करने में 105 घंटे लगेंगे। लेकिन दिन में सिर्फ 24 घंटे होते हैं और श्रम कानूनों के अनुसार काम करने की अधिकतम समय सीमा 8 घंटे ही तय है।

इसके अलावा देश में पशु चिकित्सकों की भारी कमी है। उत्तर प्रदेश के पशुपालन विभाग के निदेशक अमरेंद्र नाथ सिंह ने बताया, “उत्तर प्रदेश में पशु चिकित्सकों के 25 प्रतिशत से अधिक पद रिक्त हैं। बूचड़खानों के पास ये परीक्षण करने के लिए उनके अपने डॉक्टरों की टीम है। सरकारी डॉक्टर इन टीमों पर बराबर नजर रखते हैं।”

मांस संबंधित बाजार क्यों अवैध प्रकृति का है इसे समझना कठिन नहीं है। लाइसेंसी बूचड़खाने इतनी बड़ी घरेलू मांग की आपूर्ति नहीं कर पाते। यही वजह है कि देश में अवैध मांस का बाजार इतना फल-फूल रहा है। तकरीबन दो वर्ष पहले, 3 मार्च 2015 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने राज्य सभा को बताया था कि देश में इस समय मात्र 62 एफएसएसएआई प्रमाणित बूचड़खाने हैं। इस सूची के अनुसार 36 राज्य और केंद्र-शासित प्रदेशों में से 21 में एक भी वैध बूचड़खाना नहीं था।

वर्ष 2008 में, दिल्ली ने जामा मस्जिद इलाके के सभी अवैध बूचड़खानों पर धड़-पकड़ तेज की और इन सबों को गाजीपुर के आधुनिक बूचड़खाने में स्थानांतरित कर दिया गया। गाजीपुर स्थानांतरित होने वाले एक बूचड़खाने के मालिक बताते हैं कि गाजीपुर का बूचड़खाना शहर के 25 प्रतिशत मांग की आपूर्ति भी नहीं कर पाता। उनके अनुसार, “पहले तो लोग जामा मस्जिद में बड़े ही गैर-जिम्मेदाराना तरीके से पशुओं को मार रहे थे। लेकिन अब स्थिति काफी सुधरी है। अभी भी हमें घरेलू मांग की आपूर्ति  के लिए कम से कम तीन और इतने बड़े-बड़े बूचड़खानों की आवश्यकता है।”

आधुनिक बूचड़खाने पर आने वाली लागत भी एक समस्या है। गाजीपुर बूचड़खाना फिलहाल पूर्वी दिल्ली नगर निगम और मांस निर्यात गृह (अलानासंस प्राइवेट लिमिटेड) के बीच पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर चलता है। इस समझौते के अनुसार, अलानासंस दो पालियों में चलता है। ऐसा अपने जानवर यहां लेकर आने वाले स्थानीय व्यापारियों की सहूलियत को देखते हुए किया जाता है। इस संयंत्र की क्षमता प्रतिदिन 1,500 बड़े जानवरों—भैंसों—की है।

पशुओं की कटाई के लिए स्थानीय व्यापारियों को इन बूचड़खानों को पैसे देने होते हैं। चार सौ पचास रुपए प्रति भैंस के हिसाब से (बकरियों के लिए यह रकम और भी कम है)। पर स्थानीय नगर निगम अधिकारी कहते हैं कि यहां अर्थशास्त्र काम नहीं करता। यहां लगभग 1,000 कर्मचारी काम करते हैं और मासिक बिजली बिल 50 लाख रुपए से ज्यादा आता है। लेकिन ऐसा माना जाता है कि प्राइवेट पार्टनर एक शिफ्ट में बेचने या निर्यात करने के लिए पशुओं की कटाई करके इस अतिरिक्त खर्च का वहन कर लेगा। सवाल यह है कि क्या इस मॉडल को अन्य जगहों पर लागू किया जा सकता है? 

एक विचार यह है कि इतने बड़े बूचड़खानों की बजाय शहरों को छोटे-छोटे बूचड़खाने बनाने चाहिए जो मांस बाजार से दूर हों। इसका खर्च सभी व्यापारियों को मिलकर उठाना चाहिए। शिमला में ऐसा ही एक मॉडल मुर्गी पालन के लिए अपनाया जा रहा है। यहां के बूचड़खाने मुर्गों को काटकर शहर के सारे मांस व्यापारियों की जरूरतों को पूरा करते हैं। 

चमड़ा उद्योग में काम करने वाले मजदूर डरे हुए
हैं कि बूचड़खानों पर प्रतिबंध से उद्योग और उनकी रोजी-रोटी पर भी असर पड़ेगा

दूसरा विचार यह है कि सभी मांस प्रसंस्करण इकाईयों के पास बूचड़खाने होने चाहिए। पर इस बात से सभी सहमत हैं कि वर्तमान उन्माद से फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो रहा है। यहां तक कि न्यायालय को भी माहौल सुधारने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 5 अप्रैल 2017 को कहा, “कानून के पालन से लोगों के लिए अभाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए।” यह आदेश उत्तर प्रदेश के एक मांस विक्रेता सईद अहमद की रिट याचिका पर आया था। अहमद का कहना था कि सरकार अवैध बूचड़खानों के खिलाफ चल रहे मुहिम की वजह से उनके लाइसेंस की वैधता बढ़ाने से मना कर रही है। लाइसेंस की वैधता 31 मार्च को समाप्त हो रही थी। राज्य सरकार ने कहा था कि अवैध बूचड़खानों पर यह छापे सुप्रीम कोर्ट के 2014 के एक आदेश के अनुसार मारे गए थे। उच्च न्यायालय ने सरकार की इस दलील को भी ख़ारिज कर दिया।

वर्ष 2014 में, लक्ष्मी नारायण मोदी और भारत सरकार के एक मामले में उच्चतम न्यायालय ने राज्यस्तरीय कमेटियों के गठन का आदेश दिया था। इन कमेटियों का मुख्य उद्देश्य अपने क्षेत्र से जुड़े दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन की निगरानी करना था। उत्तर प्रदेश में इस कमिटी का गठन किया जा चुका है, लेकिन दूसरे राज्यों की तरह ही यहां की कमिटी भी राज्य की व्यस्था को सुचारू करने में असफल रही है।

उच्च न्यायालय ने कहा, “पूर्व में राज्य सरकारों की इस अनदेखी की आड़ में पूरे व्यवसाय को बंद नहीं किया जाना चाहिए।”

आमदनी ठप

आजकल अवैध बूचड़खानों पर चल रही धड़-पकड़ और स्वघोषित गौरक्षक समूहों द्वारा तोड़फोड़ की घटनाओं से किसानों को भी बहुत नुकसान हुआ है। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के एक 60 वर्षीय गरीब किसान की बातों से ये दर्द साफ झलक रहा था। इस किसान ने डाउन टू अर्थ को बताया कि उनकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी। उनके पास अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे। पैसे के इंतजाम के लिए हारकर उन्होंने अपनी भैंस एक बूचड़खाने को बेचना चाहा। लेकिन अपने गांव में तो क्या गांव से 12 किमी दूर के मवेशी बाजार में भी उनको कोई खरीदार नहीं मिला। असल में सरकार के हालिया कार्यवाही ने जानवरों की कटाई और मांस की खरीद-फरोख्त में लगे लोगों के मन में खौफ पैदा कर दिया है। लोग खुद को इस व्यवसाय से दूर ही रख रहे हैं।

लगातार दो वर्षों (2014 और 2015) के सूखे के बाद 2016 के मानसून से इस किसान को बड़ी उम्मीद थी। उन्हें लगा था कि इस साल की अच्छी फसल से वह अपने पुराने कर्जे उतार पायेंगे। उनके पास मुश्किल से आधा हेक्टेयर जमीन है। बड़े पैमाने पर खेती करने के लिए उन्होंने एक हेक्टेयर और जमीन लीज पर ले ली। इन खेतों में उन्होंने गेहूं और दलहन की फसल लगाई। पर इसी साल फरवरी माह में आवारा जानवरों का एक झुंड उनके खेतों में घुस आया और आधी फसल बर्बाद कर दी। अपना दुख बताते हुए वह कहते हैं, “मेरी पत्नी इस साल अच्छी फसल और अच्छे मुनाफे की उम्मीद कर रही थी। बीमार होने के बावजूद वह खेतों में मेरी मदद करने जाती थी। वह अपने इलाज के खर्चे से परिवार पर आर्थिक बोझ नहीं डालना चाहती थी। लेकिन फसल के नुकसान ने उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।”

आवारा मवेशियों का खौफ यहां के किसानों में इस कदर हावी है कि इस इलाके के किसान रात में जागकर खेतों की रखवाली करते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अकेले बांदा प्रभाग के चार जिलों में तकरीबन 3.5 लाख आवारा और बीमार मवेशी (गाय और बैल) हैं। उन्नीसवीं पशुधन जनगणना के मुताबिक, उत्तर प्रदेश आवारा मवेशियों के मामले में उड़ीसा के बाद दूसरे नंबर पर आता है। यहां आवारा मवेशियों की संख्या पांच लाख से ऊपर है। राज्य में वर्ष 1955 में गौ हत्या पर प्रतिबंध लगने के बाद से इनकी संख्या बढ़ी है। इन मवेशियों के मालिक मवेशियों के अनुत्पादक होने के बाद सस्ते चारे के अभाव में इन्हें खूंटे से खोल देते हैं। इसी गांव के एक अन्य किसान ने बताया कि मवेशी एक बार में 40-50 के समूह में आते हैं। 

दांव पर रोजी-रोटी 

गांव की अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न अंग है पशुपालन। बड़े-छोटे सभी किसान अपनी आय के पूरक के तौर पर मवेशी रखते हैं। यह खुद को आकस्मिक समस्याओं—जैसे फसल नुकसान इत्यादि से सुरक्षित रखने का एक तरीका है। किसानों पर हुए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय की वर्ष 2014 में आई रिपोर्ट के मुताबिक किसानों की आय का 12 प्रतिशत पशुपालन से आता है। यह रकम औसतन 6,421 रुपए होती है। 

अपने भैंसे के लिए अब कोई खरीददार न ढूंढ पाने की वजह से उस किसान (जिनकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी) के पास अब उस जानवर को आवारा छोड़ने के सिवाय कोई चारा नहीं है। गाय या भैंस को खिलाने-पिलाने में काफी खर्च आता है। इसके लिए हर रोज कम से कम 50 रुपए में आनेवाला 5 किलो सूखा भूसा चाहिए। शारीरिक मेहनत को छोड़ दिया जाए तब भी एक भैंस को रखने का वार्षिक खर्च लगभग 30,200 रुपए आता है। यह रकम एक किसान की सालाना आय का आधा है। किसानों की सालाना आय औसतन 77,112 रुपए होती है।

किसानों का मानना है कि सरकार के मौजूदा रवैये की वजह से भविष्य में मवेशियों को बेचना और भी मुश्किल हो जाएगा। इस डर से दूसरे किसान अपने पशुओं को जल्दी से जल्दी औने-पौने दाम में बेचना चाह रहे हैं। बांदा जिले के एक 70 वर्षीय सीमांत किसान 7 किमी चलकर साप्ताहिक बाजार गए। पर बाजार बिलकुल सूना पड़ा था। वह अपनी गाय और बछड़े को महज 2,500 रुपए में बेचने आए थे। उनका कहना था, “अब फसल उगाने का समय आ गया है। हमें मजदूरी और अनाज के परिवहन के लिए नकदी की आवश्यकता है। पर अब कोई खरीददार नहीं है।”

पशुपालन गांव की अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न अंग है। सभी छोटे-बड़े किसान अपनी आय के पूरक के तौर पर मवेशी रखते हैं

 

किसान के घर से निकलने के बाद एक मवेशी हमारे खाने की थाली तक पहुंचने के पहले कई हाथों से गुजरता है। मांस व्यापार में काम करने वाले लोगों में सबसे बड़ा समूह व्यापारियों और बिचौलियों का है। ये बिचौलिए जानवरों को किसानों से खरीदकर बूचड़खानों को बेचते हैं। वैसे उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार का कहना है कि वह न्यायालय के आदेशों का पालन कर रही है। पर स्थानीय मीडिया की खबरों पर भरोसा करें तो इस प्रतिबंध से न सिर्फ अवैध बल्कि वैध बूचड़खानों में भी भैंसों, बकरों और मुर्गों की कटाई प्रभावित हुई है।

बांदा शहर के रविवार बाजार में सन्नाटा छाया है। यह वह बाजार है, जहां हर हफ्ते लगभग 150-200 भैंसों और कुछ दुधारू पशुओं की खरीद-फरोख्त से करीब 20 लाख रुपए का व्यापार होता है। आजकल व्यापारी समूह में बैठ कर पशु-व्यापार पर हो रही हिंसा के खबरों की चर्चा करते हैं। इस बाजार के मालिक बताते हैं, “जब नई सरकार आई तो व्यापार थोड़ा धीमा हुआ और फिर धीरे-धीरे बंद हो गया।” फतेहपुर जिले के बाकरगंज का भी साप्ताहिक पशु बाजार शुक्रवार के दिन खाली पड़ा था। इस बाजार में हर हफ्ते, 800 से अधिक जानवरों की खरीद-फरोख्त होती है और कुल व्यापार लगभग 2 करोड़ रुपए का होता है। जिले के एक 32 वर्षीय व्यापारी ने बताया, “मैंने हिम्मतनगर गांव के एक किसान से एक भैंस खरीदी और इसे बेचने के लिए 20 किलोमीटर पैदल चलकर बाजार गया, पर वहां कोई खरीददार ही नहीं था। मैंने उस किसान को जाकर उसकी भैंस लौटा दी और हालात में सुधार होने तक इंतजार करने की सलाह दी।”

भारतीय जाति व्यवस्था के सबसे गरीब और दबे-कुचले समुदाय को इस प्रतिबंध ने सबसे अधिक प्रभावित किया है। उदहारण के लिए कपरिया समुदाय के पुरुष, जिनका पारंपरिक व्यवसाय झाड़ू बनाना था, अब ज्यादातर पशु व्यवसाय में लगे हैं। इसी समुदाय के व्यक्ति ने 24 मार्च को यह दावा किया कि पुलिस ने उनकी भैसों को जब्त कर 40,000 रुपए भी ले लिए। इसके बाद भी उनके जानवरों को नहीं लौटाया। अब बांदा जिले के ही एक गांव में दूसरे समुदाय के लोगों ने यह तय किया है कि वे मवेशी बाजारों से दूर रहेंगे। कपरिया समुदाय के एक मवेशी व्यापारी का कहना है, “हमारे पास पुलिस को देने के लिए पैसे नहीं हैं। वो हमें जेल भेज देंगे।”

ज्यादातर समुदायों के छोड़े जाने के बाद सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर बैठे लोगों ने पशु हत्या का यह काम अपने हाथों में ले लिया है। मुसलमान समाज के कुरैशी समुदाय के एक कसाई कुछ समय पहले तक हफ्ते में लगभग 4-6 भैंसें काटते थे। इन्हें प्रति जानवर 500 रुपए मिलते थे। पर अब उन्हें डर है कि कहीं पुलिस उन्हें पकड़ न ले। उन्होंने बताया, “24 मार्च को जब मैं बाजार से वापस आ रहा था तो बजरंग दल के गुंडों ने मुझे लूट लिया। वे चिल्ला-चिल्लाकर मुझपर गौहत्या का इल्जाम लगा रहे थे।”

इस गांव में कुरैशी समुदाय के 25 लोगों का घर है। गांव के मुखिया ने डाउन टू अर्थ को यह कहते हुए गांव में घुसने से मना कर दिया कि सारे कुरैशी घर छोड़कर भाग गए हैं। वे कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि निकट भविष्य में हालात सुधरने वाले हैं। इसीलिए मैं इन लोगों को रोजी-रोटी का दूसरा स्रोत ढूंढने की सलाह दे रहा हूँ।” फिर भी उन्होंने माना कि भैंस का मांस यहां के भोजन का एक मुख्य हिस्सा है। “यह बकरे, मुर्गे या मछली के मांस से सस्ता पड़ता है। हम अपने घर में शादी ब्याह में और कोई मांस नहीं लेते क्योंकि वे महंगे होते हैं।”

हिंदू समुदाय के कई लोग भी पशु हत्या व्यवसाय में लगे हैं। एक खटिक कसाई और मांस दूकान के मालिक ने बताया, “मेरे पास लाइसेंस होने के बावजूद मेरी दूकान बंद करवा दी गई। ऐसी अफवाहें उड़ाई जा रही हैं कि मैं गाय और भैंस का भी मांस बेचता हूं। जबकि मैं सिर्फ और सिर्फ बकरे का मांस बेचता हूं।” चिकवा समुदाय के लोग भी अपनी आजीविका के लिए भेड़ और बकरों की कटाई करते हैं। भारत की विशिष्ट जाति व्यवस्था को देखते हुए चिकवा हिंदू या मुसलमान कुछ भी हो सकते हैं। एक हिंदू चिकवा कसाई ने बताया, “छह माह पहले आवेदन करने के बावजूद मेरे लाइसेंस की वैधता अब तक नहीं बढ़ाई गई है।” वहीं एक मुसलमान चिकवा कसाई ने बताया कि प्रतिबंध के बाद से उनका व्यवसाय लगभग ठप हो गया है। पहले हम बकरों की कटाई से 500 रुपए प्रतिदिन कमा लेते थे। पर अब हमारी यह आमदनी भी बंद हो गई है।”

ऑल इंडिया मीट एंड लाइवस्टॉक एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के मुताबिक मांस व्यवसाय कुल मिलाकर 25 लाख से अधिक लोगों को रोजगार देता है। परोक्ष रूप से इस प्रतिबंध से प्रभावित होनेवाले लोगों की संख्या इससे कहीं अधिक है।

गो रक्षकों के डर से पशु बाजारों में विक्रेता नहीं आ रहे हैं, जिससे कि लगभग सभी पशु बजारों में सन्नाटा पसरा है

दुर्व्यवहार और उत्पीड़न की घटनाओं ने दुधारू मवेशियों के व्यवसाय में लगे लोगों को भी प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए, गौरक्षकों ने 26 दुधारू भैंसों से भरे दो ट्रक जब्त कर लिए। इन पशुओं को फिर बांदा शहर के बाहरी इलाके की एक गौशाला में भेज दिया गया। इन भैंसों की देखरेख करने वाले कर्मचारी ने बताया, “यहां पशुओं के लिए चारे और पानी तक का इंतजाम नहीं है। इससे इनके दूध देने की क्षमता पर पर भी असर पड़ेगा और इनकी कीमत घट जाएगी।” ये जानवर 12 लाख रुपए से अधिक में बेचे गए होते।

बूचड़खाने पर लगे प्रतिबंध से चमड़ा उद्योग भी अछूते नहीं रहे। कानपुर के एक चमड़ा कारखाने में काम करने वाला एक व्यक्ति प्रतिदिन साईकिल चलाकर उन्नाव से आने-जाने में करीब 120 किमी की दूरी तय करता है। वह कहता है, “उन्नाव में कोई काम नहीं मिलता और मेरे घर में खाने वाले छह लोग हैं।” उसके गांव के सभी 50 घर कानपुर के कुछ सबसे पुराने और बड़े चमड़ा कारखानों पर आश्रित हैं। स्मॉल टैनरीज एसोसिएशन का अनुमान है कि अवैध बूचड़खाने छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए लगभग 40 प्रतिशत चमड़े उपलब्ध कराते हैं। वहीं बड़े उद्योगों की जरूरत का 10-20 प्रतिशत इन अवैध बूचड़खानों से आता है। चमड़ा उद्योग केवल कानपुर में ही 5 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मुहैया करा रहा है।

वास्तविकता की जांच

सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मांस उद्योग खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संबंधित सभी मानदंडों का पालन करे। साथ ही गलत सूचनाओं के प्रति सावधानी भी बरती जानी चाहिए। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 के दौरान जारी भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में कहा गया था कि अवैध बूचड़खानों की वजह से उत्तर प्रदेश में पालतू जानवरों की संख्या कम हो गई है। लेकिन 2012 की 19वीं पशुधन जनगणना से कुछ और ही पता चलता है। उत्तर प्रदेश में 2007 की तुलना में मवेशियों की आबादी 2.4 प्रतिशत और भैंस की आबादी 16 प्रतिशत बढ़ गई है।

पशुधन राज्य के गरीबों के लिए आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और इसके व्यापार पर प्रतिबंध ग्रामीण आबादी की आय पर असर डालेगा। बांदा के एक किसान का कहना है, “जब जानवर किसी उपयोग के नहीं रह जाते तो किसान उन्हें बेचकर उपयोगी जानवर खरीद लेते हैं। यदि ऐसे ही डर का माहौल बना रहा तो पूरे राज्य में आवारा जानवरों की बढ़ती संख्या एक नई समस्या खड़ी कर देगी। किसान दुधारू पशुओं को रखने से परहेज करने लगेंगे। इससे राज्य के दूध उत्पादन में भी कमी आएगी।” योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार अगले पांच वर्षों में किसानों की आय को दोगुना करने का वादा करती है। इस लक्ष्य को पाने में मवेशियों से जुड़ी यह अर्थव्यवस्था मदद कर सकती है।

(डाउन टू अर्थ ने इस मुद्दे की संवेदनशील प्रकृति को ध्यान में रखते हुए उद्धृत कई लोगों के नाम प्रकट नहीं किए हैं।)

साक्षात्कार
“गौमांस खाने या न खाने को लेकर कानून बनाना गलत है”
 

द्विजेन्द्र नारायण झा  एक प्रतिष्ठित इतिहासकार और शिक्षाविद् हैं। इन्होने होली काउ: बीफ इन इंडियन डाइटरी कंडीशन नाम से एक किताब भी लिखी है। रजत घई  से हुई बातचीत में झा, भारत में गोमांस खाने के इतिहास और इससे जुड़ी तात्कालिक राजनीतिक उथल-पुथल पर चर्चा कर रहे हैं। सारांश:

भारत में गोमांस को भोजन से अधिक विश्वास से जोड़कर क्यों देखा जाता है?

आज भारत में गोमांस का मतलब है सांप्रदायिक राजनीति। हाल में हुई कुछ घटनाएं इस बात की पुष्टि करती हैं—जैसे दादरी, मैनपुरी, नाहन और उधमपुरी, जहां मुस्लिमों को गोमांस के नाम पर भीड़ ने पीटकर मार डाला। 

क्या भारत में गोहत्या का संवैधानिक आधार है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 में गायों और बछड़ों और अन्य दुधारू मवेशियों की हत्या की मनाही का प्रावधान है। लेकिन यह केवल देश में पशुधन को बचाने एवं बनाए रखने के उद्देश्य से है। क्योंकि ये पशु कृषि और अन्य आर्थिक मामलों के लिए काफी महत्व रखते हैं। लेकिन यह अनुच्छेद यह नहीं कहता कि गाय को मत मारो। चूंकि यह अनुच्छेद राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है, इसलिए राज्य सरकारों ने अलग-अलग कानून बना लिए हैं।  

कुछ राज्यों में, आप  एक प्रमाण पत्र के साथ मवेशी की हत्या कर सकते हैं। उस प्रमाण पत्र के अनुसार मवेशी हत्या के लिए उपयुक्त होना चाहिए। हालांकि कई अन्य राज्यों में इसके खिलाफ सख्त प्रावधान हैं। केरल और पूर्वोत्तर राज्यों गौ हत्या पर कोई पाबंदी नहीं है।  मुझे नहीं लगता कि लोगों को अनुच्छेद 48 में कुछ ज्यादा दिमाग लगाना चाहिए।

तो फिर गौमांस खाने जैसी सामान्य बात को सांप्रदायिकता के चश्मे से क्यों देखा जा रहा है?

मैं आपको गोमांस भोजन के इतिहास से थोड़ा अवगत करना चाहूंगा। हमारे पास वैदिक काल और उसके अंत तक ब्राह्मणों के गोमांस खाने के पर्याप्त प्रमाण हैं। लेकिन समय के साथ उन्होंने गौमांस खाना छोड़ दिया और इसे दलितों से जोड़ना शुरू कर दिया।

मध्ययुगीन काल में इस्लाम के आगमन के साथ ब्राह्मणों ने गौमांस खाने को मुसलमानों के साथ जोड़ना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह बात ब्राह्मणों के दिमाग से मिटा दी गई कि उनके पूर्वज भी गौमांस खाते थे और मुसलमानों को गौमांस खाने वाली जाति की तरह स्थापित कर दिया गया। अब हिंदुत्व एजेंडा वाली संस्थाएं इस बात का खूब फायदा उठा रही हैं।

बौद्ध और जैन धर्म में गौमांस खाने वालों का क्या स्थान है?

दोनों ही धर्म पशु हत्या के इस वैदिक रीति की आलोचना करते हैं।  इस मामले में जैन धर्म अधिक सख्त है, क्योंकि यह किसी भी प्रकार की जीव हत्या को सही नहीं मानता है। वहीं बौद्ध धर्म के अनुसार, एक व्यक्ति किसी भी प्रकार का मांस खा सकता है अगर उसे जानकारी न हो कि उसे क्या परोसा गया है। इस प्रकार से दोनों धर्मों के रवैये में थोड़ा सा फर्क है। ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों ने 10-11वीं शताब्दी में गौमांस खाना छोड़ा, तब भारत में बौद्ध धर्म काफी कमजोर हो रहा था।

गौहत्या एक राजनैतिक मुद्दा बनकर पहली बार स्वामी दयानंद सरस्वती के समय में उभरा था। आर्य समाज जैसे विवेकपूर्ण आंदोलन का गौहत्या पर ऐसा रुख क्यों था?

आर्य समाज के गठन का समय प्राचीन काल के महिमामंडन का भी काल था। दयानंद सरस्वती वेदों के महान रक्षक और ज्ञाता थे। वैसे आर्य समाज के बहुत सारे सकारात्मक पहलू भी हैं, क्योंकि इसने हिंदू समाज के सुधार में एक अहम भूमिका निभाई। पर वेदों के इस प्रकार के महिमामंडन की वजह से गौमांस खाने को लेकर हिंदुओं में नकारात्मकता आई क्योंकि आर्य समाज भी मुस्लिम-विरोधी था। जिस प्रकार से रुढ़िवादी हिंदू मवेशियों के साथ पेश आते हैं वह बहुत ही दुखद है। जब तक गाय का उपयोग किया जा सकता है, वो इसे पूजते हैं और इसका सम्मान करते हैं, पर जैसे ही गाय अनुत्पादक होती है, लोग इसे लावारिस छोड़ देते हैं। यह जानवर फिर प्लास्टिक खाकर पेट भरने के लिए मजबूर हो जाता है और फिर इसकी मौत हो जाती है। अगर मवेशियों को अच्छे से न रखा जाए तो वो बहुत दर्दनाक मौत मरते हैं। साथ ही एक बार जब ये जानवर अनुत्पादक हो जाते हैं तो वो अर्थव्यवस्था पर बोझ बन भी जाते हैं। मुझे यह नहीं समझ आता कि इन दोनों समस्याओं के बीच सामंजस्य कैसे बैठाया जाए।

भारत में गौमांस पर वर्त्तमान में चल रही बहस पर आपका क्या कहना है? 

भाजपा के शासन में समाज बहुत ही असहिष्णु हो गया है। हिंदू सगठनों का गौमांस समस्या से निपटने का तरीका असहिष्णुता और अलोकतांत्रिक होने का स्पष्ट उदहारण है। गौमांस खाने या न खाने को लेकर कानून बनाना गलत है और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसकी कोई जगह नहीं है।

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