खसरे की खुराक बनते नौनिहाल

खसरे के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए 2020 तक मुश्किल लगता है दुनिया से इसका उन्मूलन

 
By Kundan Pandey
Last Updated: Thursday 08 June 2017 | 10:53:22 AM
3 मई को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के नारायणपुर कन्हौली गांव में हदीसू की छह वर्षीय बेटी टुबा, जिसका खसरे से निधन हो गया (श्रीकांत चौधरी)
3 मई को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के नारायणपुर कन्हौली गांव में हदीसू की छह वर्षीय बेटी टुबा, जिसका खसरे से निधन हो गया (श्रीकांत चौधरी) 3 मई को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के नारायणपुर कन्हौली गांव में हदीसू की छह वर्षीय बेटी टुबा, जिसका खसरे से निधन हो गया (श्रीकांत चौधरी)

नारायणपुर कन्हौली, पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गांव इन दिनों एक संक्रामक रोग की चपेट में है, जिसके कारण बच्चों की लगातार मौत हो रही है। हसन मोहम्मद की ढाई साल की बेटी लकी उन पीड़ित बच्चों में से एक थी जिसकी मौत खसरे से हो गई। हसन मोहम्मद का परिवार इस उम्मीद में था कि पुराने परंपरागत उपचार से लकी की यह बीमारी ठीक हो जाएगी, लेकिन गत 16 अप्रैल को लकी की सांसों ने उसका साथ छोड़ दिया। परिवार के लोग उस नुकसान या सदमे से बाहर आने की कोशिश कर ही रहे थे कि इसी बीच लकी की चचेरी बहन और रशीद मोहम्मद की डेढ़ वर्षीय बेटी खुशी में भी खसरे के लक्षण सामने आने लगे। परिवार के लोग खुशी को लेकर जिला अस्पताल पहुंचे, जहां 18 अप्रैल को उसे भी मौत ने अपनी आगोश में ले लिया।

इस बीमारी की अगली शिकार हसन मोहम्मद के भाई जान मोहम्मद की 2 साल की बेटी बनी। पिछले महीने इस संयुक्त परिवार में कम से कम आठ बच्चे इस बीमारी से प्रभावित हुए। लेकिन यह एकलौता परिवार नहीं है जो इस बीमारी की चपेट में आया हो। अन्य लोगों में असीम मोहम्मद की 6 साल की बच्ची टुबा जो इस समुदाय में चहकने के लिए जानी जाती थी, उसे भी इस रोग ने घेर लिया। 30 अप्रैल को जब डाउन टू अर्थ की टीम नारायणपुर पहुंची तो उस वक्त टुबा चुपचाप विस्तर पर बीमारी की पीड़ा झेल रही थी। उसकी मां हदीसू ने बताया कि बच्ची न कुछ खा रही है न कुछ पी रही है।

परिवार के लोग जब टुबा को जिला अस्पताल लेकर पहुंचे तो डाॅक्टरों ने बीमारी की गंभीरता को देखते हुए उसे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय अस्पताल रेफर कर दिया। आखिरकार 3 मई को टुबा की भी मौत हो गई। ये बच्चे नट मुस्लिम समुदाय से संबंध रखते थे। क्षेत्र के शक्तिशाली यादव जाति के करीब पांच बच्चे भी इस बीमारी की चपेट में आए, लेकिन उनकी जान बच गई।

क्षेत्र के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) रविंद्र कुमार ने बताया कि क्षेत्र में फैल रहा रोग खसरा है। ग्रामीणों से जब टीकाकरण के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि बच्चों के टीकाकरण के लिए अभी तक यहां कोई नहीं आया। हालांकि स्थानीय स्वास्थ्य कर्मचारी भगवंती यादव का कहना है कि चिकित्साकर्मियों के प्रयासों के बाद भी कोई भी परिवार बच्चों को टीका लगाने की अनुमति नहीं देता। जब हम टीकाकरण के लिए जाते हैं तो लोग अपने बच्चों को छुपा लेते हैं। जब राशिद मोहम्मद से बच्चों को टीका नहीं दिलवाने का कारण जानने की कोशिश की गई तो उसने कहा कि टीका बच्चों को बीमार और नपुंसक बना देगा। सीएमओ कुमार ने कहा कि लोगों में टीकाकरण के प्रति अनिच्छा के कारण ही जौनपुर और उत्तर प्रदेश में खसरे की बीमारी आम है।

उत्तर प्रदेश भारत के उन राज्यों में से एक है जहां खसरा उन्मूलन के लिए सबसे ज्यादा फोकस किया जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्ल्यू) द्वारा वर्ष 2016-17 में किए गए आकलन से पता चलता है कि एक साल से कम उम्र के बच्चों के टीकाकरण का लक्ष्य महज 77.1 प्रतिशत ही प्राप्त किया जा सका है जो राष्ट्रीय औसत 83.7 से कम है।



वैश्विक परिदृश्य

खसरा के मामले वाले देशों में भारत अकेला नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक दस्तावेज से पता चलता है कि इस साल लगभग 77 देशों ने इस मामले की सूचना दी है। यूरोपीय देशों में इटली और रोमानिया इससे बुरी तरह प्रभावित हैं। रोमानिया ने 11 अप्रैल तक खसरे के 317 मामलों की पुष्टि की है जबकि इटली में 684 मामले दर्ज किए गए हैं। वर्तमान समय में जिस तरह से खसरा के मामले बढ़े हैं, उसे देखकर लगता है कि यूरोप में 2016 में जितने मामले सामने आए थे उसकी तुलना में इस वर्ष 850 मामले बढ़ जाएंगे। वर्ष 2000 में संयुक्त राज्य से खसरे का उन्मूलन हो गया था। इसके बावजूद 1 जनवरी से 22 अप्रैल 2017 तक संयुक्त राज्य अमेरिका के दस राज्यों में 61 लोगों के खसरे से पीड़ित होने की पुष्टि की गई।

आॅस्ट्रेलिया के सिडनी के पश्चिमी उपनगरों ने भी अप्रैल के मध्य तक स्थानीय स्तर पर 16 मामले दर्ज किए। सिडनी के न्यू साउथ वेल्स में इस वर्ष खसरे के 23 मामले सामने आए हैं। इन विकसित देशों के विपरीत अफ्रीका और एशिया से इस मामले की कोई गंभीर खबर सामने नहीं आई है। ऐसे सभी क्षेत्र जहां खसरे के मामले सामने आए हैं, वहां टीकाकरण की कमी को इसका सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।

यह अचरज की बात नहीं है, क्योंकि सामान्य तौर पर टीके के खिलाफ अभियान चल रहा है। अक्सर यह बात उभरकर सामने आती रही है कि टीकों के अस्तित्व में आने से पहले खसरा और रूबैला जैसे रोग घातक नहीं थे। खसरा के बारे में ऐसा माना जाता था कि यह एक बार होगा और जिंदगी भर इससे मुक्ति मिल जाएगी। वायरस का संपर्क लगातार बूस्टर डोज की तरह काम करेगा और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाएगा। यह प्रतिरक्षा मां से बच्चे तक भी जाएगा। एक डाॅक्टर ने नाम नहीं छापने के अनुरोध पर बताया कि वैक्सीन लाॅबी के दबाव के कारण टीके के आने से यह प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली अब कमजोर पड़ गई है। उनका मानना है कि इस वजह से न सिर्फ भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर 2020 तक खसरा उन्मूलन के लक्ष्य को पूरा कर पाना असंभव होगा। विश्व में खसरा से होने वाली मौतों में 37 फीसदी हिस्सेदारी अकेले भारत की है। इसलिए इसके उन्मूलन का लक्ष्य पूरा करना देश के लिए और भी मुश्किल होगा। इस वर्ष देश में अब तक खसरे के 5,064 मामलों की पुष्टि हो चुकी है।

सरकार टीकाकरण की पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने मार्च में राज्यसभा सत्र के दौरान बताया कि सरकार माता-पिता की आशंका दूर करने के प्रयास करने के लिए भारतीय बाल चिकित्सा अकादमी, भारतीय चिकित्सा संघ, लायंस क्लब तथा अन्य संगठनों के माध्यम से जागरुकता पैदा करने का प्रयास कर रही है।

1985 में भारत में सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी। शुरू में 12 माह की उम्र में केवल एक ही खुराक निर्धारित की गई थी। लेकिन खसरे के बोझ को तेजी से घटाने के लिए वर्ष 2010 में दूसरी खुराक पेश की गई। इसके अलावा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने फरवरी 2017 में खसरा और रूबैला (एमआर) के लिए एक संयुक्त टीका पेश किया है। इस अभियान के तहत पांच राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में 3.6 करोड़ बच्चों का टीकाकारण किया जाएगा। इस टीके को नियमित प्रतिरक्षण के तौर पर शामिल किया जाएगा और यह खसरे के टीके के दो खुराकों की जगह लेगा।

लेकिन जौनपुर में यह टीका उपलब्ध नहीं है। यदि उपलब्ध होता भी तो लोग शायद इसका इस्तेमाल नहीं करते।

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