रास नहीं आया पुनर्वास

नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी ने 16 जून को सरदार सरोवर बांध परियोजना के पूर्ण होने की आधिकारिक घोषणा कर दी। इससे प्रभावितों के सामने अब डूब का संकट बढ़ गया है

 
By Jitendra
Last Updated: Thursday 13 July 2017
उच्चतम न्यायालय का निर्देश नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) को झटका है। यह आंदोलन 1985 से चल रहा है (सौजन्य: नर्मदा बचाओ आंदोलन)
उच्चतम न्यायालय का निर्देश नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) को झटका है। यह आंदोलन 1985 से चल रहा है (सौजन्य: नर्मदा बचाओ आंदोलन) उच्चतम न्यायालय का निर्देश नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) को झटका है। यह आंदोलन 1985 से चल रहा है (सौजन्य: नर्मदा बचाओ आंदोलन)

नर्मदा नदी पर बन रहे सरदार सरोवर बांध के पूर्ण होने पर सरकार भले ही जश्न मना रही हो लेकिन इससे उन लोगों के माथे पर फिर से चिंता की लकीरें दिखाई दे रही हैं, जो इसकी जद में आ रहे हैं। बांध को पूर्ण क्षमता (138.68 मीटर) में भरने से बहुत से गांव और घर जलमग्न हो जाएंगे।

मध्य प्रदेश के 176 गांव और धरमपुरी कस्बा इसी चिंता में डूबा हुआ है। रोज राजस्व अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति और पुलिस के दलबल के साथ मध्य प्रदेश के बड़वानी और धार जिलों के अंतर्गत आने वाले इन क्षेत्रों का मुआयना करते हैं। वे लोगों से कहते हैं कि घर, दुकान, खेत, पशुचर भूमि और पूजा स्थल 31 जुलाई तक खाली कर दें।

धार जिले के नासिरपुर निवासी विजय मरोला का कहना है, “कुछ अधिकारियों ने धमकी दी है कि यदि उक्त तारीख तक हमने यह जगह नहीं छोड़ी तो हमारे गांव पर सरदार सरोवर बांध का पानी छोड़ दिया जाएगा।” मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 2016 दायर किए गए ताजा शपथपत्र में कहा है कि मरोला, उनके वृद्ध मां-बाप, उनका नवजात शिशु, पत्नी और छोटी बहन उन 1,10,000 हजार (21,808 परिवार) लोगों में शामिल हैं, जिनके घर और जमीन बांध के 30 से अधिक फाटक बंद कर दिए जाने के बाद जलमग्न होने की स्थिति में आ जाएंगे। बांध के जलस्तर को 121.92 मीटर से 138.68 मीटर तक बढ़ाने के लिए इन फाटकों को बंद किया जाएगा।
 
8 फरवरी को शीर्ष अदालत ने बांध को उच्च भराव क्षमता पर संचालित करने की अनुमति दे दी और केंद्र सरकार व राज्य सरकार को निर्देश दिया कि 31 जुलाई तक परियोजना प्रभावित परिवारों को विस्थापित और पुनर्वासित किया जाए।

उच्चतम न्यायालय का यह निर्देश नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) को झटका था। यह आंदोलन 1985 से चल रहा है। एनबीए की मांग थी कि विभिन्न चरणों में विस्थापित किए गए सभी परिवारों को उचित मुआवजा मिले। एनबीए की मांग है कि नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (एनडब्ल्यूटीए) ने पुनर्वास के लिए निर्धारित दिशा-निर्देश के तहत विस्थापित परिवारों, जिनकी इस परियोजना की वजह से 25 प्रतिशत जमीन गई है, उन्हें 2 हेक्टेयर सिंचित भूमि दी जाए। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश हुए सभी मामलों में 681 विस्थापित परिवारों की पहचान की गई है। जिनको इस परियोजना की वजह से भू-सम्पत्ति का नुकसान हुआ है और बदले में मुआवजा व जमीन नहीं मिली है, उन्हें 60-60 लाख रुपए प्रति परिवार दिए जाएं।

 इसके अलावा 1,358 परिवारों, जिनको गलत भूमि आवंटन पत्र या स्तरहीन जमीन आवंटित की गई है, उन्हें प्रति परिवार 15 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि क्षतिपूर्ति हासिल करने की अर्हता रखने वाले परिवारों की संख्या अधिक हो सकती है।

धरमपुरी के दिहाड़ी श्रमिक इकबाल रियाज कहते हैं, “2003 में मुझे बतौर मुआवजा 40 हजार रुपए और खुज नदी (नर्मदा की सहायक नदी) के बाढ़ आशंकित मैदानी क्षेत्र में एक प्लॉट दिया गया।” पांच साल बाद रियाज पुनर्वासित कॉलोनी धरमपुरी बसाहट में विस्थापित हुए। वह पहले शख्स थे जिन्होंने यहां घर बनाया। लेकिन घर 2013 की बाढ़ में डूब गया। रियाज का कहना है कि किसी ने भी बाढ़ की वजह से उनके नए घर को हुए नुकसान की भरपाई नहीं की। उन्हें पुराने घर लौटना पड़ा।

सुनकी बाई (55) भी नई बसाई गई कॉलोनी में होने वाली समस्याओं से पूरी तरह वाकिफ थीं। उनकी इस कॉलोनी का नाम भी उनके गांव के आधार पर तय हुआ है। चिकालदा बसाहट एक दूरस्थ क्षेत्र है जो पहाड़ियों से घिरा है। इस कॉलोनी के चारों ओर परिष्कृत सरकारी भवन और कंटीली वनस्पतियां हैं। 

वह बताती हैं, “मुझे और मेरे बेटे को 2003 में यहां दो प्लॉट दिए गए। चार साल बाद परिवार बढ़ने की वजह से बेटा नई कॉलोनी में शिफ्ट हुआ। मैं वहां जाने में असहज महसूस कर रही थी क्योंकि वहां न तो पेयजल की सुविधा है, न ही बिजली, सड़क या अस्पताल। मेरे पड़ोसी भी उस सूने क्षेत्र में बसने को तैयार नहीं है।” चिकालदा बसाहट में सभी बुनियादी सुविधाएं अभी सपने की तरह हैं। सुनकी बाई को पिछले साल नई कॉलोनी में आना पड़ा क्योंकि उनके बेटे के घर में चोरी हो गई और उसका परिवार भी दिहाड़ी मजदूर होने की वजह से बाहर चला गया था। उन्हें फिलहाल सबसे बड़ी चिंता अपने पोते-पोतियों की है जिन्होंने नई कॉलोनी में आने के बाद पढ़ाई छोड़ दी। पांच साल पहले ही यहां सरकारी स्कूल का निर्माण हुआ था, जो क्षतिग्रस्त हो चुका है। दूसरा स्कूल प्राइवेट है और नई कॉलोनी से 7 किमी है।

परियोजना से प्रभावित लोगों को बसाने के लिए बना एक पुनर्वास स्थल। इसकी हालत देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि आखिर लोग यहां आने से क्यों कतरा रहे हैं (जितेंद्र / सीएसई)

अनिल गणपत, खाखरपेड़ा गांव के रहने वाले हैं। उन्हें भी चिकालदा बसाहट के पास ही नया प्लॉट आवंटित हुआ है। वह नर्मदा घाटी के लोगों के विस्थापित नहीं होने की कुछ अलग ही वजह बताते हैं। उनके अनुसार “मेरे गांव में 3000 से अधिक गाय और भैंस हैं। रोजी के लिए 500 से भी अधिक परिवार इन पर आश्रित हैं। सरकार ने हमें प्लाट आवंटित किए हैं। लेकिन हमारी पशु सम्पदा के लिए सरकार ने एक टुकड़ा जमीन भी नहीं दी। ऐसे में जीवन यापन कैसे संभव है”?

प्राधिकारी ही पुनर्समझौते और पुनर्वास (आरएंडआर) के लिए उत्तरदायी हैं लेकिन गणपत के इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं है। उनका मानना है कि मौलिक सुविधाओं के अभाव में लोग नई कॉलोनी में जाने के अनिच्छुक हैं।

नर्मदा जल विवाद पंचाट के आदेश की अनुपालना की जिम्मेदार नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण के निदेशक (आरएंडआर) एस. आर. यादव का कहना है, “हम सड़कें बना रहे हैं और 88 स्थानों (जहां गांवों को फिर से बसाया जाना है) पर केबल लाइन बिछाई जा रही है और कार्य पूरी गति से हो रहा है।”
यदि नर्मदा न्यायाधिकरण के फैसले पर गौर किया जाए तो प्रभावित परिवारों को हटाने से पहले नई कॉलोनी में प्रति 100 परिवार पर प्रशासन को एक प्राइमरी स्कूल बनाना है, प्रति 50 परिवार पर एक पेयजल कुआं, 500 परिवारों के बीच बीज केंद्र की व्यवस्था देनी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने में एक महीने से कम समय है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रशासन न्यायाधिकरण के दिशा-निर्देशों की अनुपालना कर पाएगा?

बड़वानी के जिला कलेक्टर तेजस्वी नाइक ने डाउन टू अर्थ को बताया कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना कर रहे हैं जिसके तहत प्रभावित गांवों को 31 जुलाई तक विस्थापित करना है। जब उनसे पूछा गया कि उन परिवारों के साथ सरकार क्या करने वाली है जो पलायन नहीं करना चाहते तो नाइक ने कहा, निर्धारित तारीख निकट आने के साथ उनके पास विस्थापन के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचेगा।

लोगों ने 28 मई को केंद्रीय सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत से भेंट की लेकिन उन्होंने कोई आश्वासन नहीं दिया।

संख्या में सीमित हुए लोग

25 मई को राज्य सरकार ने गजट अधिसूचना जारी की, जिसमें विस्थापित परिवारों की संशोधित सूची थी। गजट के अनुसार, 18,346 परिवारों का पुनर्वास होना है। आदेश से 3,462 परिवारों को राहत मिलनी चाहिए जिनके नाम विस्थापन सूची से हट गए हैं लेकिन वह बेहद चिंतित हैं। ऐसा ही परिवार रामेश्वर भोलाजी पाटीदार (52) का है जो धार जिले के निसारपुर के रहने वाला है। वह 1542 परिवार वाले गांव के उन 345 परिवारों में से एक हैं जिनको संशोधित सूची में प्रभावित परिवार के रूप में नहीं दिखाया गया है। पाटीदार का दावा है कि संशोधित सूची से गलत तरीके से उनका नाम हटाया गया है। उनके पड़ोसी का घर 1.5 मीटर दूर है। यह घर संशोधित सूची में है जबकि उनका नदारद है। उन्होंने पूछा, क्या ऐसे में उनका घर जलमग्न होने से बच जाएगा? यदि पानी घर में नहीं भी घुसे तो घर के दरवाजे पर पानी के होने पर क्या हम पानी के साथ गुजर-बसर कर सकेंगे?

खापरखेड़ा के रहने वाले एनबीए के नेता देवराम ने एक अन्य समस्या का हवाला दिया जो संशोधित सूची से पैदा होगी। भले ही संशोधित सूची में छोड़े गए घर नहीं डूबेंगे लेकिन वे टापू की भांति नजर आएंगे। क्या सरकार ने इन लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के बारे में सोचा है? सुरेश प्रधान जिनका नाम संशोधित सूची से निकाला गया है, उन्हें सरकारी कर्मचारियों द्वारा कही गई बातों पर विश्वास है कि वे मुख्य भूमि से सभी घरों को जोड़ने के लिए पुल बनाएंगे।

ग्राफिक: राज कुमार सिंह / सीएसई

धरमपुरी में कमलेश ठाकुर को यह जानकर राहत मिली कि उसे अपना घर व कपड़े की दुकान खाली करने की जरूरत नहीं है। ठाकुर का कहना है कि सरकार ने आश्वासन दिया है कि 88 आवासों को छोड़कर पहले जिन शेष 1,378 घरों की पहचान यहां से हटाने के लिए की गई थी, वे खतरे से बाहर हैं। वे इस बात से खुश दिखे कि बतौर मुआवजा सरकार से मिले 50,000 रुपए एवं निकट के देवपुरा गांव में 1,800 वर्ग फीट की जमीन जो उनको मिली थी, उसके बारे में उनसे कुछ नहीं पूछा गया है। वास्तव में धरमपुरी के सभी 1,299 परिवार जिनका नाम संशोधित सूची में नहीं है, उनको 40,000 से 70,000 रुपए का मुआवजा मिला है।

1990 से नर्मदा बचाओ आंदोलन चला रहीं मेधा पाटकर ने इस बारे में कहा कि यह गलती है या सरकारी अंशदान? यह प्रभावित परिवारों की संख्या को कम करने का श्रेष्ठ उदाहरण हैं ताकि परियोजना की लागत को कम किया जा सके और प्रभावित परिवारों की ओर से भविष्य में याचिका से बचा जा सकेगा। वरना सरकार क्यों सभी को मुआवजे का भुगतान करेगी। एनबीए का दावा है कि एक बार बांध के पूरी क्षमता के साथ शुरू होते ही एक नगर और 192 गांवों के सभी 45,000 परिवार प्रभावित होंगे। गांधी भवन ट्रस्ट भोपाल के दयाराम न्यास का कहना है कि सरकार परियोजना से प्रभावित परिवारों की सही संख्या के बारे में नहीं जानती।

डाउन टू अर्थ का विश्लेषण भी न्यास के विचारों की पुष्टि करता है। इस साल के राज्य गजट में परियोजना से प्रभावित परिवारों की संख्या को संशोधित करने से पहले, 2003 में सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में सरकार ने दावा किया था कि 192 गांव और एक शहर प्रभावित होगा। कम से कम 37,754 परिवारों को स्थानांतरित करना होगा। इसके 13 साल बाद दायर दूसरे शपथपत्र में संख्या बदलकर 176 गांवों एवं 21,808  परिवार कर दी गई।  ऐसी स्थिति 2008 में बैक वाटर (एक बार पानी निकालने के बाद फाटकों के बंद होने के बाद नदी के ऊपर बांध के जल स्तर में वृद्धि) के विस्तार के आकलन के दौरान केंद्रीय जल आयोग (सीडब्लयूसी) द्वारा त्रुटिपूर्ण गणना के कारण बनी है। 2015 में सिविल सोसाइटी की एक स्वतंत्र टीम द्वारा इस त्रुटि का पता लगाया गया। सीडब्लयूसी के अनुमानों के अनुसार पूर्ण जलाशय या भयंकर बाढ़ (100 साल में एक बार) की स्थिति में बैक वाटर स्तर अपने ऊपरी धारा (प्रवाह) में कभी भी 144.9 मीटर से अधिक नहीं होगा, यदि बांध की ऊंचाई 138.64 मीटर तक कर दी जाती है। इस अनुमान के आधार पर सरकार ने प्रभावित परिवारों की संख्या 37,754 से 21,808 तक कर दी। लेकिन सीआईएल सोसाइटी टीम ने पाया कि कालघाट जो डूबने वाले क्षेत्र के अंतिम हिस्से में है, वहां बाढ़ का स्तर 2013 में 146.64 मीटर तक पहुंच गया। जबकि उस वक्त बांध की ऊंचाई 121.92 मीटर थी। 1994 में जब इसकी ऊंचाई 90 मीटर थी, कालघाट में बाढ़ का स्तर 148.80 मीटर पहुंच गया था।

पाटकर ने कहा कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने बैक वाटर स्तर की गणना को अस्वीकार कर दिया था। लेकिन प्रतीत होता है कि सरकार परियोजना प्रभावित परिवारों की संख्या पर विचार नहीं करना चाहती। राज्य सरकार द्वारा गजट को अधिसूचित करने से केवल 10 दिन पहले नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की निदेशक रेणु पंत ने संवाददाताओं का बताया कि एक बार बांध के अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य करना शुरू करने से 112 गांवों के 5,000 परिवार प्रभावित होंगे।

ऊहापोह की स्थिति के बीच जिला प्रशासन ने भी सरकारी कर्मचारियों जैसे शिक्षकों, आंगनवाड़ी कर्मचारियों, आशा कर्मचारियों को निर्देश दिया है कि वे पुनर्वास और विस्थापन के लिए अधिसूचित किए गए गांवों के किसी भी संस्थान में नहीं जाएं।

सरोकार पर मीडिया की जलसमाधि
 
अनिल अश्विनी शर्मा

छह अगस्त 1993 को नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर सहित सात आंदोलनकारियों ने जल समाधि की घोषणा की थी। आंदोलनकारी केंद्र सरकार से मांग कर रहे थे कि वह बांध पर बनी समीक्षा रिपोर्ट को लागू करे। सरकार ने आंदोलनकारियों की आवाज अनसुनी कर दी तो जल समाधि की इस घोषणा का असर बिजली की तरह हुआ। दिल्ली से लेकर न्यूयार्क और लंदन तक का मीडिया नर्मदा के किनारे आ जुटा। मीडिया का जमघट देखकर केंद्र पर दबाव बना और उसने इस जल समाधि के पहले ही घोषणा कर दी कि वह रिपोर्ट को लागू करेगी। तो क्या यह आंदोलनकारियों नहीं मीडिया की जीत थी?
एक समय देश की राजधानी के बड़े मीडिया समूह नर्मदा आंदोलन से जुड़ी छोटी सी भी खबर छापने से परहेज करते थे। भ्रम फैलाया गया कि यह विकास विरोधी आंदोलन है। इसका दूसरा पक्ष यह भी था कि अखबारों में नर्मदा आंदोलन से जुड़ी खबरें तो नहीं छपती थीं लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से मेधा पाटकर द्वारा बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार पहुंचते थे। यह अलग बात है कि वे इसकी रिपोर्ट नहीं करते थे या उनकी रिपोर्ट को छापा नहीं जाता था। आंदोलन को नैतिक समर्थन देने में पत्रकार पीछे नहीं रहे।

पत्रकारों के जुड़े रहने का असर यह रहा कि धीरे-धीरे नर्मदा आंदोलन को अखबारों में जगह मिलने लगी। और, इसके असर को नीचे से ऊपर की तरफ से देखा जा सकता है। मीडिया का कोई भी माध्यम निजी पूंजी से ही चलता है, और इसके सबसे बड़े स्रोत विज्ञापन हैं। बड़ी कंपनियों के विज्ञापनों के कारण मीडिया का प्रबंधकीय ढांचा नर्मदा आंदोलन को विकास विरोधी बताता है। लेकिन पत्रकारों का एक बड़ा तबका उस जल, जंगल और जमीन से जुड़ा हुआ है जिसे बांध के पानी में डुबोया जा रहा था। आप भले शहर के अखबार में नौकरी कर रहे हों, आपके कोई दोस्त या रिश्तेदार तो जीविका के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। जमीन के डूबने का और विस्थापित होने का खौफ उनकी आंखों में देखकर यह तो समझ आ जाता होगा कि निर्बाध नर्मदा ही सबका साथ और सबका विकास कर सकती है।

जब मीडिया को लगने लगता है कि किसी मुद्दे को खारिज करने का मतलब खुद को खारिज करना होगा तब वह उसे खारिज नहीं कर सकता। और, इसी खारिज होने के खौफ से मीडिया मालिकों ने नर्मदा आंदोलन को जगह देनी शुरू कर दी। लेकिन मीडिया की यह मजबूरी है कि उसे आंदोलन को भी खबर की तरह दिखाना है। उसका नयापन कुछ हफ्तों या महीनों तक हो सकता है लेकिन उसे सालों तक बरकरार नहीं रखा जा सकता है। उसे लगता है कि दर्शक एक आंदोलन से ऊब गए हैं और वह दूसरे आंदोलन की तरफ भागता है। मीडिया का संचालन तंत्र ही सरोकारी नहीं है तो फिर वह सरोकार वाली खबरों को लंबे समय तक कैसे खींच सकता है। जब आपको बांध बनाने वाली कंपनी का विज्ञापन लेना है तो फिर आप बांधों के खिलाफ खबरें कैसे चला सकते हैं। जिस सीमेंट कंपनी का करार वहां निर्माण के लिए हुआ है, खबरों के बीच में व्यावसायिक विराम में उसी सीमेंट कंपनी का विज्ञापन भी चलना है। फिर वह सीमेंट कंपनी तो प्रचारित करेगी ही कि बांध विकास विरोधी नहीं है।

“अमेरिका फर्स्ट” का नारा देते हुए डोनल्ड ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से हाथ खींच लिए। जलवायु संकट के ऊपर शुद्ध कारोबारी लाभ को तरजीह दी गई। खनन और अन्य व्यावसायिक कंपनियों के दबाव से जब अमेरिका देश पेरिस समझौते से हट सकता है तो हम नर्मदा आंदोलन के बारे में कैसे उम्मीद करें कि मुख्यधारा का कारोबारी मीडिया यह चाहे कि  नर्मदा बांधी न जाए। इसलिए नर्मदा आंदोलन को विकास विरोधी बताने का खेल चलता गया। विकास की राह में डूब गए लोगों का अस्तित्व उसके लिए बहस की चीज नहीं है। कारोबारी हितों की लाई बाढ़ ही उसके लिए विकास है। जो विकास के दायरे से विस्थापित हैं उनकी खबरें विकास विरोधी हैं। नर्मदा आंदोलन एक बार मीडिया में जगह पा चुका है तो अब वह मीडिया के लिए काठ की हांडी है जो विज्ञापन की आंच नहीं झेल पाएगी। पर्यावरण का कोई पर्याय नहीं, विकास और पर्यावरण अलग-अलग नहीं चल सकते, इस चेतना को मुख्यधारा का मीडिया अपने कारोबारी मोतियाबिंद के कारण नहीं देख पा रहा है।

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