Governance

रेशम के राजमार्ग पर हक की आवाज

अंसारी कहते हैं कि अब हमारी मजदूरी की हकमारी नहीं हो रही। अपने उत्पाद के मालिक हम खुद हैं और आज हम अपने लिए मजदूरी कर रहे हैं

 
By Anil Ashwani Sharma
Last Updated: Friday 01 March 2019

कोकिला वीवर्स कलेक्टिव प्राइवेट लिमिटेड के तीन निदेशकों में से एक महमूद अंसारी (तारिक अजीज / सीएसई)

एक मुलायम रेशमी साड़ी की शान के पीछे बुनकर समुदाय के पूरे परिवार की मेहनत का पसीना लगा रहता है। सिल्क की साड़ी की जितनी पूछ है, इसे बनाने वाले उतने ही उपेक्षित। हजारों और लाखों में बिकने वाली सिल्क की साड़ी के कारीगरों को इतनी भी मजदूरी नहीं मिल पाती कि ये अपने इस हुनर के सहारे आराम से अपनी जिंदगी गुजर बसर कर सकें। बुनकरों की इस बदहाली की वजह है ग्राहक और बुनकरों के बीच बाजार के बिचौलिए। भारत की सिल्क नगरी कहे जाने वाले भागलपुर में बुनकर आज अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। महाजनों के चंगुल में फंसे इस समुदाय के 65 साल के बुनकर ने इस बदहाली से निकलने के लिए कदम उठाए और अपने स्तर पर ही ग्राहकों के बीच पहुंचने का फैसला किया। इसके लिए अपने साथियों के साथ मिल कर कंपनी बनाई। सिल्क साड़ी के बुनकर और कोकिला वीवर्स कलेक्टिव प्राइवेट लिमिटेड के तीन निदेशकों में से एक महमूद अंसारी से अनिल अश्विनी शर्मा ने बातचीत की। अंसारी कहते हैं कि अब हमारी मजदूरी की हकमारी नहीं हो रही। अपने उत्पाद के मालिक हम खुद हैं और आज हम अपने लिए मजदूरी कर रहे हैं। अंसारी और उनके साथी आज भागलपुर क्षेत्र में मिसाल बन चुके हैं

आपने कब से बतौर बुनकर काम शुरू किया?

हमारे समुदाय में होश संभालते ही कारीगरी सिखा दी जाती है। बचपन तो परिवार की मदद करते ही बीतता है। हमारा तो खेल ही कोकून और रेशम के धागे थे। बचपन से ही बुनकर मजदूरी का काम शुरू कर दिया था। आज 65 साल का हो गया हूं और आज भी बुनकर मजदूर हूं।

यह बात कब समझ आई कि आपकी हकमारी की जा रही है। वाजिब मजदूरी पाने की कोशिश कब से शुरू की?

जब से काम शुरू किया और सालों पहले जब बाजार की हकीकत से दो-चार हुआ तो लगा हमें तो कुछ मिलता ही नहीं। यह समझ तो पीढ़ियों से थी कि हमें हमारा हक नहीं मिलता। बचपन में मां-बाप के साथ काम करता था। मेहनत पूरे परिवार की और मजदूरी सिर्फ पिता को, वो भी मामूली सी। लेकिन पहले इसे किस्मत समझ चुप था। जब लगा कि यह किस्मत नहीं बाजार का उत्पीड़न है तो इसके खिलाफ काम करने का सोचा। ऐसे लोग मिले जिन्होंने रास्ता दिखाया।

बाजार की हकीकत जानने के बाद क्या किया?

सच जान लेना ही काफी नहीं होता है। हम जान रहे थे कि हमारा शोषण हो रहा है। बचपन से जान रहे थे कि हम महाजनों के कुचक्र में फंस चुके हैं। हम इसे अपनी नियति मान बैठे थे कि ऐसा ही होता आया है। दूसरों के शरीर के लिए महंगी रेशमी साड़ी बुनने वालों को आधा पेट ही खाना नसीब होता है। लेकिन इसके साथ ही धीमे ही सही, लेिकन हमारा समुदाय एकजुट भी हो रहा था।

तो अपने साथियों को किस प्रकार से महाजनी के कुचक्र से निकाला?

देखिए सिल्क का जो कीड़ा होता है वह कोकून (कोकून से सिल्क धागा निकाला जाता है) को बुनते-बुनते स्वयं अंदर ही अंदर अपने को खत्म कर लेता है। हमारी जिंदगी भी पिछले कई सालों से महाजनी नामक कोकून की तरह उसके जालों में जकड़ी हुई थी। अब इस जाल का तोड़ तैयार कर लिया है। इस जाल से निकलने के लिए मैंने सालों से हाथ-पैर मारे। चूंकि मैं बहुत पढ़ा-लिखा नहीं हूं तो बाजार की कहें या यों कहे कि सिल्क साड़ी से जुड़ी व्यापारिक बातें मेरे सिर से ऊपर जा रहीं थीं। ऐसे में मुझे एक साथी जफर भाई मिले। उन्होंने मुझे बाजार की असलियत से वाकिफ कराया। जफर भाई ने हमें सोचने से लेकर करने की हालत में पहुंचाया। उन्होंने रास्ता दिखाया कि खुद ग्राहक के पास पहुंचो। अपने माल के मालिक खुद बनो।

आपने एक कंपनी बनाई है? आपने सहकारी समिति बनाने का विकल्प क्यों नहीं चुना?

कोशिश तो सहकारी समिति बनाने की ही थी। लेकिन यहां कई सहकारी घोटाले होने के कारण राज्य सरकार ने इसके पंजीकरण पर रोक लगा रखी है। ऐसे में हम तीन साथियों ने मिल कर एक कंपनी बनाई है। हमने इस कंपनी का नाम रखा है, “कोकीला वीवर्स कलेक्टिव प्राइवेट लिमिटेड”। आप जरा इस नाम पर गौर कीजिए। अक्सर इस प्रकार की निजी कंपनी में “कलेक्टिव” शब्द का उपयोग नहीं किया जाता है। इसका अर्थ होता है “सामूहिक”। हम तो सहकारिता के भाव से ही चल रहे हैं। हमारा मकसद सामूहिक उन्नति है।

इस निजी कंपनी को बनाने के बाद किस तरह का बदलाव आया है?

इसके माध्यम से अपने पुरैनी गांव (भागलपुर, बिहार) के बुनकरों द्वारा तैयार माल (साड़ी) को अब हम सीधे ग्राहक तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे उन्हें पहले के मुकाबले अधिक लाभ मिल पा रहा है। हम खुद ग्राहकों की रुचि के बारे में जान पा रहे हैं। हमें पता चल रहा है कि लोग नया क्या चाहते हैं। हम आज बिचौलियों से मुक्त हैं। हालांकि अब भी बहुत आदर्श स्थिति नहीं है, लेकिन पहले से बहुत बेहतर है। आगे और बेहतर होने की उम्मीद में जिए जा रहे हैं।

बुनकर को कितना लाभ आप दिला पा रहे हैं?

देखिए पहले तो महाजन हमें एक साड़ी की मजदूरी अधिक से अधिक 500 रुपए ही देता था। और वह उसे बेचता था पांच हजार रुपए से ऊपर में। हम दिन के उजाले में भी आंखों से दिखाई न पड़ सकने वाले सिल्क के महीन धागे पर बीस-बीस घंटे तक नजर गड़ाकर साड़ी बुनते हैं। तैयार साड़ी के पीछे कितनी मेहनत होती है इसका अहसास बाहरी दुनिया में रहने वाले किसी शख्स को हो ही नहीं सकता। लेकिन इस मेहनत को सीधे ग्राहक तक पहुंचाया जाता है तो बिचौलिया का मुनाफा हमारी मजदूरी में आता है। इसलिए हम बुनकर की तैयार साड़ी को अपने साथियों के माध्यम से पटना से लेकर दिल्ली तक सीधे ग्राहक के हाथों में ही पहुंचाने की कोशिश करते हैं। अब हमें हक की मजदूरी मिलने लगी है।

क्या आपको बड़ा ऑर्डर मिल जाता है?

हमारे पास पूंजी की सीमित मात्रा है। ऐसे में हम अभी उतना ही आर्डर लेते हैं जितना पूरा कर सकें।

एक सिल्क की साड़ी तैयार होने में कितना वक्त लगता है?

देखिए यह एक लंबी प्रक्रिया है। यदि तैयार धागा बुनकर को मिलता है तो एक से दो दिन में एक साड़ी बुन देता है। लेकिन आपको बताऊं, पहले हमें मध्य प्रदेश के जगदलपुर और ओडिशा से कोकून खरीदने जाना पड़ता है। यह काेकून उसी इलाके के जंगलों में होता है। इस फल को खरीदने के बाद हम इसे अपने घर लाकर उबाल कर उसे मुलायम करते हैं और इसके बाद इससे धागे निकालने की प्रक्रिया शुरू होती है। इससे निकलने वाला धागा इतना महीन होता है कि दिन के उजाले में भी आप ठीक से देख नहीं सकते हैं। ऐसे में इन धागों को कई अन्य कोकून के धागों के साथ मिलाकर इस लायक बनाया जाता है कि उसे बुनकर अपने हाथों से कपड़ा बुन सकें।

इस प्रकार के कार्य में आपके परिवार के कितने सदस्य जुटे रहते हैं?

यों समझ लीजिए कि एक बुनकर का परिवार सुबह होते ही इस काम में जुट जाता है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक। सभी के लिए कुछ न कुछ काम होता है। ऐसे में हम सबके पास कोकून उबालने से लेकर उसके धागे से साड़ी बुनने तक काम-ही-काम होता है। ।

क्या अब आप अपने साथियों के साथ कंपनी बना कर पूरी तरह से संतुष्ट हैं?

पूरी तरह से तो नहीं कह सकता हूं। लेकिन इस बात की बहुत हद तक दिल में तसल्ली हैै कि पहले हम किसी और के लिए मजदूरी करते थे। अब हम अपने स्वयं के लिए मजदूरी कर रहे हैं। यही बात मुझे और मेरी साथियों को थोड़ी राहत देती है। आज हम अपनी मेहनत के मालिक हैं। हमारा हक बीच में नहीं मारा जा रहा। लेकिन अब भी बहुत मुश्किल है जिससे लड़ना बाकी है। मेहनत का हक मिलना आसान नहीं होता। यह लड़ाई तो लंबी है। हम अपने बुनक्र साथियों के हिस्से की लड़ाई लड़ रहे हैं और उम्मीद है कि हम इसमें सफल होंगे।

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