Waste

व्यवस्था का मारा ई-कचरा

ई-कचरा उत्पादक देशों में भारत पांचवें स्थान पर है, लेकिन देश में पैदा हाेने वाले इस कचरे को लेकर कोई सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

By Banjot Kaur
Last Updated: Thursday 19 July 2018
भारत में ई-कचरे के रीसाइक्लिंग के लिए उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद जिला एक महत्वपूर्ण केंद्रों में से है (फोटो: विकास चौधरी / सीएसई)
भारत में ई-कचरे के रीसाइक्लिंग के लिए उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद जिला एक महत्वपूर्ण केंद्रों में से है (फोटो: विकास चौधरी / सीएसई) भारत में ई-कचरे के रीसाइक्लिंग के लिए उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद जिला एक महत्वपूर्ण केंद्रों में से है (फोटो: विकास चौधरी / सीएसई)

हम में से अधिकांश अपने मोबाइल फोन या टेलीविजन सेट का निपटान कैसे करते हैं? आमतौर पर हम इसे कबाड़ी को बेच देते हैं लेकिन अक्टूबर 2016 में अधिसूचित ई-कचरा प्रबंधन नियमों के अनुसार, बिजली और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण निर्माताओं को कलेक्शन सुविधा प्रदान अनिवार्य करना है। इसके बाद कचरा जमा करने वाले अधिकृत रिसाइक्लर्स को देने का प्रावधान है। हालांकि, कानून पारित होने के बाद अब तक (2018) इस बात के एक भी सबूत नहीं दिखाई पड़ता कि क्या यह कानून सही मायने में लागू हो पा रहा है।

मार्च 2018 में यह मामला तब प्रकाश में आया, जब दिल्ली उच्च न्यायालय ठोस कचरा प्रबंधन पर दायर एक याचिका की सुनवाई कर रहा था। अदालत ने दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की महानिदेशक सुनीता नारायण को देश में ई-कचरे की स्थिति पर एक रिपोर्ट जमा करने के लिए कहा। जब अदालत 22 मई को अंतरिम आदेश दे रही थी, उसी दौरान, अदालत ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को एक निर्देश दिया कि, “समयबद्ध तरीके से ई-कचरा निपटान के उचित प्रबंधन के तरीके निकालें व इसके लिए एक रणनीति बनाएं।” मंत्रालय को अब 22 जुलाई के भीतर इस पर स्टेटस रिपोर्ट जमा करनी है।

भारत दुनिया में ई-कचरे के सबसे बड़े उत्पादक देशाें में से एक है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2017 में कहा गया है कि भारत सालाना लगभग 20 लाख टन ई-कचरा पैदा करता है और अमेरिका, चीन, जापान व जर्मनी के बाद इसका पांचवां स्थान है। हालांकि, देश में पैदा होने वाले ई-कचरे को लेकर कोई सरकारी आंकड़े नहीं हैं। 23 मार्च, 2017 को राज्यसभा में पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे द्वारा दिए गए जवाब के मुताबिक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 2005 में अनुमान लगाया था कि 2010 तक भारत 8 लाख टन ई-कचरा पैदा करेगा। उसके बाद से कोई अनुमान नहीं लगाया गया। 2016 के कानून ने अनुमान लगाने का काम राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) को सौंपा। लेकिन अभी तक किसी भी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने यह काम नहीं किया है।

कानून कहता है कि इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के उत्पादकों को वेबसाइट और बुकलेट के जरिए अपने ग्राहकों को डाक पता, ई-मेल और संग्रह केंद्रों (कलेक्शन सेंटर्स) के टोल-फ्री नंबर देने चाहिए, ताकि उपभोक्ता ई-कचरे की वापसी कर सकें। कानून ई-कचरा एकत्र करने और रीसाइकल करने के लिए विभिन्न उपायों का विवरण देता है। इसमें जमा वापसी योजना (डिपोजिट रिटर्न स्कीम, जहां निर्माता बिक्री के समय ग्राहक से एक शुल्क लेता है और जब ग्राहक उत्पाद लौटाता है तो उसे वह धन वापस कर देता है) और एक्सचेंज स्कीम शामिल है।

इसमें सभी हितधारकों, जैसे उत्पादक (सभी ब्रांड मालिक, निर्माता और आयातक), विनिर्माता (इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली सभी पंजीकृत कंपनियां), विघटन और पुनर्चक्रण करने वाले, सभी को अपने परिचालन के लिए अनुमति प्राप्त करनी होती है। उत्पादकों को सीपीसीबी से एक विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी)अनुमति प्राप्त करना होगा जो सुनिश्चित करेगा कि वे ई-कचरे को रीसाइक्लर तक पहुंचाएं और वार्षिक कलेक्शन लक्ष्य को पूरा करें।

उत्पादकों को ये लक्ष्य पूरा करना होता है, जो उनकी बिक्री से उत्पन्न कचरे का 20 प्रतिशत होना चाहिए। अगले पांच वर्षों में यह सालाना 10 फीसदी बढ़ता जाएगा। रीसाइक्लर व विघटनकर्ता, दोनों को एसपीसीबी के पास रिपोर्ट देनी होगी कि उन्होंने अपने परिचालन में वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग किया है।

इसके कार्यान्वयन के पहले वर्ष (2017) में, हालांकि सभी कंपनियों ने लक्ष्य पूरा करने का दावा किया। लेकिन, उनके दावों को सत्यापित करने का कोई तंत्र नहीं है। कानून कहता है कि सीपीसीबी और एसपीसीबी को उन लोगों की आकस्मिक जांच करनी चाहिए जिन्हें यह जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन अब तक किए गए ऐसे जांच की संख्या के बारे में डाउन टू अर्थ द्वारा पूछे जाने पर सीपीसीबी ने कोई जवाब नहीं दिया है। कानून यह भी कहता है कि उत्पादकों की जिम्मेदारी सिर्फ कचरे के संग्रह तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसे यह सुनिश्चित करना है कि कचरा अधिकृत रीसाइक्लर व विघटनकर्ता तक पहुंच जाए।

लेकिन उत्पादकों द्वारा दायर वार्षिक रिटर्न इस बारे में कुछ नहीं बताता। चूंकि कोई निगरानी प्रणाली नहीं है, इसलिए कोई गारंटी नहीं है कि उत्पादकों द्वारा एकत्रित कचरा अनाधिकृत रीसाइक्लिंग में नहीं जाता है। सीपीसीबी के मुताबिक, भारत में 214 अधिकृत रीसाइकलर व डिस्मेंटलर्स हैं। 2016-17 में, उन्होंने भारत के 20 लाख टन ई-कचरे में से केवल 36 हजार टन कचरे को ही उपचारित किया।

कई अध्ययनों के मुताबिक, भारत के ई-कचरे का लगभग 95 प्रतिशत कचरे का पुनर्नवीनीकरण अनौपचारिक क्षेत्र में गलत तरीके से किया जाता है। ई-कचरे को हाथ से विघटित किया जाता है, सोल्डर को असुरक्षित तरीके से गर्म कर के अलग किया जाता है, प्लास्टिक को हटाने के लिए कचरे को जलाया जाता है। ये सब हवा, पानी और मिट्टी के लिए गंभीर प्रदूषण का कारण बनते हैं। इसमें काम करने वालों का स्वास्थ्य भी गंभीर रूप से प्रभावित होता है (देखें “अनौपचारिक और अदृश्य”)।

आयातित मुसीबत

भारत की समस्या तब और बढ़ जाती है, जब अवैध रूप से ई-कचरा आयात किया जाता है। इसे लेकर भी सरकार के पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन मन्यूफैक्चरर्स असोसिएशन फॉर इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाला एक संगठन) के मुताबिक 2007 में देश में लगभग 50 हजार टन ई-कचरा दूसरे देशों से आयातित हुआ। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की 2015 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया में चीन, भारत, मलेशिया और पाकिस्तान ई-कचरा सहित खतरनाक अपशिष्टों के लिए सबसे मुफीद जगह बन गए हैं। ई-कचरे को यहीं पर लाकर ठिकाने लगाया जाता है।

विडंबना यह है कि, खतरनाक और अन्य अपशिष्ट (मैनेजमेंट एंड ट्रांसबाउंडरी) नियम, 2016 के अनुसार, भारत में निपटान के लिए ई-कचरा आयात करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

राज्यसभा में दिए जवाब में दवे ने कहा था कि रीसाइक्लिंग के लिए सरकार से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता है और पिछले पांच सालों में सरकार ने ऐसी कोई अनुमति नहीं दी है। यह केवल सेकेंड हैंड उत्पादों के नवीनीकरण के लिए अनुमति देता है। केन्द्रीय उत्पाद शुल्क व सीमा शुल्क बोर्ड जैसी नोडल एजेंसी में मानव संसाधन व बुनियादी ढांचे की कमी है, जिससे वह सेकेंड हैंड उत्पाद व ई-कचरा के बीच अंतर का पता लगाने में असमर्थ है।

भले ही कानून नवीनीकरण के लिए सेकेंड हैंड उत्पादों के आयात की अनुमति देता है, लेकिन साथ ही कई नियम और शर्तें शामिल हैं। ऐसे उत्पादकों को 1 से 3 साल के भीतर उत्पाद को फिर से मूल देश के लिए निर्यात करना होता है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, यह जांचने के लिए कोई तंत्र नहीं है कि उन्हें फिर से निर्यात किया गया है या नहीं।

यही नहीं यदि धोखाधड़ी का पता भी चल जाए तो कानून दंड को लेकर कुछ नहीं कहता। दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था टॉक्सिक्स लिंक की मुख्य कार्यक्रम समन्वयक प्रीति महेश कहती हैं, “कानून कागज पर अच्छा दिखता है। निगरानी की कमी और खराब कार्यान्वयन ने कानून का मजाक बना दिया है।”

अनौपचारिक और अदृश्य
 

95 प्रतिशत से अधिक ई-कचरे की रीसाइक्लिंग अनौपचारिक क्षेत्र में की जाती है। उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद, भारत के प्रमुख केंद्रों में से एक है। हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जिला मैजिस्ट्रेट व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर जुर्माना लगाया, क्योंकि रामगंगा नदी के किनारे फैले ब्लैक पाउडर कचरे से निपटने में वे सक्षम नहीं थे।

जब डाउन टू अर्थ ने मुरादाबाद का दौरा किया, तो अधिकांश अनौपचारिक रीसाइक्लिंग यूनिट्स बंद मिले। जिला क्षेत्रीय प्रदूषण बोर्ड अधिकारी आर.के. सिंह ने कहा कि ई-कचरे का निपटान करने के लिए 2.2 हेक्टेयर जमीन की पहचान की गई है, ताकि नदी स्वच्छ रह सके। लेकिन ई-कचरे के अनौपचारिक रीसाइक्लिंग में शामिल लोग गुस्से में हैं। इसी काम में लगे जमशेद अख्तर कहते हैं कि प्रशासन के अभियान ने करीब 2 लाख लोगों को बेरोजगार बना दिया है। उनके अनुसार, “हम मानते हैं कि हम ई-कचरे को रीसाइकल अवैज्ञानिक तरीके से करते हैं। लेकिन सीपीसीबी ने जिला अधिकारियों से हमारे पुनर्वास के लिए कहा था।”

वास्तव में एनजीटी आदेश में कहा गया था, “सभी अनाधिकृत यूनिट्स को ई-कचरा संसाधित करने के लिए पर्यावरणीय रूप से अच्छी तकनीक वाली प्रसंस्करण सुविधा प्रदान कर, ऐसी यूनिट्स को औपचारिक रूप दिया जाएगा। जिला प्रशासन इस उद्देश्य के लिए भूमि प्रदान कर सकता है।” एक तरफ जहां सिंह ने इस तरह के किसी भी आदेश के बारे में जानकारी से इनकार किया, वहीं मुरादाबाद के डीएम राजेश कुमार सिंह ने डाउन टू अर्थ के कॉल का जवाब ही नहीं दिया।

अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक क्षेत्र के साथ एकीकृत करने के लिए काम कर रहे संगठन “करो संभव” के संस्थापक प्रांशु सिंघल कहते हैं कि यहां तक ​​कि अधिकृत रीसाइक्लिंग यूनिट्स भी अनौपचारिक क्षेत्र को अपना ई-कचरा आउटसोर्सिंग कर रहे हैं। पर्यावरण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि बड़े उत्पादक के लिए अपने लक्ष्य को पूरा करना मुश्किल हो रहा। क्योंकि ज्यादातर उपभोक्ता ई-कचरे की अनौपचारिक क्षेत्र में नीलामी कर देते हैं, क्योंकि इससे उन्हें अधिक पैसा मिल जाता है।

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