सही साबित हुआ सौर कोरोना पर भारतीय वैज्ञानिकों का पूर्वानुमान

इस सफलता के बाद भविष्य में सौर तूफानों से प्रभावित होने वाले अंतरिक्ष के मौसम के बारे में और अधिक पूर्वानुमान लगाए जा सकेंगे

 
By TV VENKATESWARAN
Last Updated: Friday 25 August 2017
अनुमानित सौर कोरोना की संरचना
अनुमानित सौर कोरोना की संरचना अनुमानित सौर कोरोना की संरचना

भारतीय खगोल-वैज्ञानिकों द्वारा 21 अगस्त को पूर्ण सूर्य-ग्रहण के मौके पर सौर कोरोना की संरचना के बारे में लगाया गया पूर्वानुमान सही पाया गया है।

खगोल वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन तकनीक और अपने विकसित किए गए सौर मॉडल की मदद से पहली बार सूर्य-ग्रहण से पहले ही सूर्य की अदृश्य चुंबकीय संरचना और सौर कोरोना के स्‍वरूप का अनुमान लगा लिया था। यह सफलता महत्वपूर्ण है क्योंकि सौर कोरोना को सूर्य के तेज के कारण सामान्य स्थिति में देख पाना संभव नहीं होता और सूर्य ग्रहण के दौरान ही उसे देखा जा सकता है। माना जा रहा है कि इस सफलता के बाद भविष्य में सौर तूफानों से प्रभावित होने वाले अंतरिक्ष के मौसम के बारे में और अधिक पूर्वानुमान लगाए जा सकेंगे।

वास्तविक सौर कोरोना वैज्ञानिकों ने सूर्य के दक्षिणी गोलार्ध के पूर्वी एवं पश्चिमी हिस्‍से में हेलमेट स्ट्रीमर्स नामक कमल की पत्तियों के आकार की दो संरचनाओं के साथ-साथ सूर्य के दक्षिणी गोलार्ध के पश्चिमी हिस्‍से में विकसित हो रहे संभावित नैरो स्‍ट्रीमर और उत्‍तरी गोलार्ध में भी इसी तरह की दो संरचनाएं होने का अनुमान लगाया था। दक्षिण-पूर्वी किनारे पर सूर्य के कम सक्रिय होने की भविष्यवाणी भी सही पाई गई है। 

अध्ययनकर्ताओं की टीम के प्रमुख डॉ. दिब्येंदु नंदी ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “कुछेक बातों को छोड़कर हमारा पूर्वानुमान काफी हद तक सही पाया गया है।” डॉ. नंदी कोलकाता के इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर) में स्‍थापित सेंटर ऑफ एक्‍सीलेंस इन स्‍पेस साइंसेज इंडिया (सीईएसएसआई) के प्रमुख हैं। एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी ऑफ इंडिया की पब्लिक आउटरीच कमेटी के अध्यक्ष नीरूज मोहन ने भी कहा है कि “सभी पूर्वानुमानों की पुष्टी कर ली गई है।”

सूर्य के दक्षिण-पूर्वी किनारे पर मौजूद एक संरचना को, जिसे सूर्य की भूमध्य-रेखा के करीब माना जा रहा था, छोड़कर सभी स्ट्रीमर्स की लोकेशन प्राथमिक तौर पर पूर्वानुमान के मुताबिक पाई गई है। सुपर कंप्यूटर्स का उपयोग किए बिना सामान्य कंप्यूटिंग क्षमता के दम पर किया गए इस पहले प्रयास में पूर्वानुमानों और वास्तविक अवलोकन के बीच के बारीक अंतर का पाया जाना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

इस मॉडल की सफलता का फायदा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा लॉन्च की जाने वाली सौर वेधशाला, आदित्य-एल1 द्वारा किए जाने वाले परीक्षणों को भी मिलेगा। इसमें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के दीपंकर बनर्जी द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया विजिबल एमिशन लाइन क्रोनोग्राफ (वीईएलसी) नामक यंत्र भी लगा होगा। इसके बारे में बताया जा रहा है कि यह सौर डिस्क से आने वाले उत्सर्जन को अवरुद्ध करके अंतरिक्ष में कृत्रिम रूप से पूर्ण सूर्य-ग्रहण बनाकर अदृश्य कोरोना को प्रकट कर सकता है।

डॉ. नंदी के अलावा अध्ययनकर्ताओं की टीम में प्रांतिका भौमिक, सुमन पांडा, राजशिक तरफदर, सौम्यरंजन दास और यूके की डरहम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक एंथनी आर. यीट्स शामिल थे।

(इंडिया साइंस वायर)

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