Environment

स्वच्छ हवा और मेरी चिंताएं

सर्दी के आते ही प्रतिकूल मौसम होने के कारण दिल्ली की हवा घातक और विषाक्त हो चुकी है 

 
By Sunita Narain
Last Updated: Tuesday 08 January 2019

तारिक अजीज / सीएसई

दिल्ली में कोयला संचालित एकमात्र बिजली संयंत्र बंद कर दिया गया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ऐसे उद्योगों को अपना काम रोकने को कहा गया है, जो कोयले का उपयोग करते हैं। सभी निर्माण गतिविधियों को रोक दिया गया है। स्टोन क्रशर, ईंट की भट्टियां और हॉट मिक्स प्लांट बंद कर दिए गए हैं। यह सब एक सप्ताह से अधिक समय के लिए रोका गया है। सड़क से पुराने डीजल वाहनों को हटाया जा रहा है। कचरा नहीं जलाने के लिए कड़े आदेश जारी किए गए हैं।

अधिकारी धूल नियंत्रित करने के लिए अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं। सर्दी के आते ही प्रतिकूल मौसम होने के कारण दिल्ली की हवा घातक और विषाक्त हो चुकी है। इस सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए ये असाधारण आपातकालीन कार्रवाई है। बावजूद इसके, वायु प्रदूषण का स्तर बहुत ही खराब श्रेणी में रहा और स्थिति गंभीर होती चली गई। फसल के अवशेष जलाने से भी हवा के जरिए प्रदूषण दिल्ली की तरफ आया। जिन क्षेत्रों में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए ये कार्रवाई की गई, वहां वायु प्रदूषण का स्तर उस सामान्य स्तर के आसपास नहीं है, जिसकी हमें जरूरत है।

तो सवाल है कि हम क्या करें? सबसे पहले तो यह साफ हो चुका है कि इस संकट का स्तर बहुत बड़ा है और टुकड़े में किए गए उपाय कारगर नहीं हैं। दूसरा, हम आपातकालीन कार्रवाई के जरिए संकट से नहीं निपट सकते। मैं और मेरे साथियों ने ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (जीआरएपी) का प्रस्ताव दिया था और जिसे लागू किया गया था। यह प्लान उस स्थिति में निर्णायक कार्रवाई करने के लिए डिजाइन किया गया था, जब प्रदूषण का स्तर खतरे के स्तर से अधिक हो। यह अपनी सीमाओं में काम काम रहा है लेकिन यह प्रदूषण कम करने के लिए आवश्यक एक्शन का विकल्प नहीं हो सकता।

असल में कार्रवाई का पैमाना इतना बड़ा होना चाहिए जो संकट से मेल खाता हो। जब साल 2000 की शुरुआत में दिल्ली ने वाहनों के लिए कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी) इस्तेमाल आरंभ किया तो यह काम बड़े पैमाने पर किया गया। दो साल की अवधि में 100,000 वाहन सीएनजी में बदले गए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन वाहनों को लक्षित किया गया था जो सबसे अधिक यात्रा करते हैं। शहर की सभी बसों और ऑटोरिक्शा स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल करने लगे। तब सीएनजी आपूर्ति तेजी से बढ़ी थी।

सीएनजी वाहनों के लिए नई विनिर्माण सुविधाएं तैयार की गई थीं। सुरक्षा कारणों के समाधान के लिए प्रौद्योगिकी की खोज की गई, उसे अनुकूलित किया गया और काम करने लायक बनाया गया। ईंधन और वाहन प्रौद्योगिकी को शुरू करने का काम भी बड़े पैमाने पर किया गया था। हम प्रति मिलियन 10,000 पार्ट (पीपीएम) सल्फर से 500 पीपीएम सल्फर तक आ गए थे। यह एक बड़ा कदम था और इससे हमें बहुत लाभ हुआ। हम शाम को आकाश देख सकते थे और रात में सितारों की खूबसूरती पर मोहित हो सकते थे। हमारी वर्तमान कोशिश संकट के पैमाने से मेल नहीं खाती।

मेरे विचार में पिछले कुछ सालों में हमने जो सबसे बड़ी जीत हासिल की है, वे हैं गंदे पेट कोक का ईंधन के रूप में उपयोग प्रतिबंधित करना, उद्योग से निकलने वाले सल्फर और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन मानकों को निर्धारित करना और 2020-भारत स्टेज VI (BSVI) ईंधन और उत्सर्जन मानकों के जरिए पेट्रोल और डीजल में 10 पीपीएम तक जाने के लिए सहमत होना।

लेकिन इससे तब तक कोई खास फायदा नहीं होगा जब तक और अधिक काम नहीं किया जाता। हमें पहले उद्योगों और अन्य स्रोतों से होने वाले उत्सर्जन मानकों के क्रियान्वयन को लेकर कठोर कदम उठाने होंगे। यह हमारी सफलता की राह में बाधा है। हम आंशिक रूप से प्रदूषण नियंत्रण को लागू नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे पास अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए आवश्यक संस्थागत संरचना नहीं है। हमारे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड काम के बोझ से दबे हुए हैं। स्टाफ की संख्या कम है। कई बार उत्सर्जन निगरानी के लिए बुनियादी उपकरण भी नहीं होते।

पिछले कुछ सालों में हमने नियमों के अनुपालन के लिए निजी क्षेत्र को आउटसोर्स किया है लेकिन यह काम नहीं करता। फिर पिछले कुछ वर्षों में व्यवसाय करने में आसानी के नाम पर, हमने यह कहते हुए थोड़ी नरमी भी दिखाई है कि ज्यादा सख्ती से “इंस्पेक्टर राज” को बढ़ावा मिलेगा और व्यवसाय लागत बढ़ेगी। हमने इसे बहुत ही कमजोर और खराब ऑनलाइन निगरानी प्रणाली में बदल दिया है। इसे असल में एक घोटाला कहा जाना चाहिए। वास्तव में, प्रदूषण के इस समय में ऐसा कहा भी जा रहा है।

इस बार जब बीएस VI लॉन्च किया जाएगा तो ईंधन में सल्फर 50 पीपीएम से 10 पीपीएम तक कम हो जाएगा। लेकिन इतना भी काफी नहीं है। इस बार ईंधन की गुणवत्ता नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर उत्सर्जन नियंत्रित करने के लिए वाहन प्रौद्योगिकी में प्रगति की आवश्यकता है। वाहनों से उत्सर्जन में भारी अंतर आएगा, जो 60 से 90 प्रतिशत तक कम होने की उम्मीद है। लेकिन ये वाहन 2020 अप्रैल में आएंगे।

ऑटोमोबाइल कंपनियों के विरोध को देखते हुए ये अपने आप में एक बड़ी जीत है। फिर बीएस VI का लाभ मिलने में समय भी लगेगा, क्योंकि वाहनों के बेड़े को बीएस VI में बदलने में समय लगेगा। भारत एक अमीर देश नहीं है, जहां सभी पुराने वाहनों को एक ही रात में सड़क से हटा दिया जाए। तो, विकल्प क्या हैं? स्वच्छ हवा के अधिकार के लिए हमें क्या करना चाहिए? हम इस पर चर्चा जारी रखेंगे।

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