Environment

“शहर में बसा वह गर्म द्वीप”

आसमान छूती ये इमारतें ही अब हीट आईलैंड बन गई हैं। एक अध्ययन में इन स्थानों का तापमान सामान्य से 4 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक मापा गया है।

 
By Anil Ashwani Sharma
Last Updated: Monday 06 August 2018 | 11:59:31 AM

भारतीय प्रौद्योगि की
संस्थान (आईआईटी) दिल्ली की
प्रोफेसर मंजु मोहन

महानगरों में आवासीय समस्याओं के तत्कालिक हल के लिए पिछले चार दशकों के दौरान गगन चुंबी इमारतों के निर्माण में तेजी आई है। आसमान छूती ये इमारतें ही अब हीट आईलैंड (गर्म द्वीप) बन गई हैं। एक अध्ययन में इन स्थानों का तापमान सामान्य से 4 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक मापा गया है। वास्तव में पिछले कुछ सालों से ये हीट आईलैंड ही अब हीट वेव (गर्म हवा या लू) के एक बड़े कारक के रूप में सामने आए हैं। हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली की प्रोफेसर मंजु मोहन ने हीट आईलैंड के प्रभावों का विस्तार से अध्ययन किया है। साथ ही इसके दुष्प्रभावों से बचने के उपाय भी सुझाए हैं। गर्म द्वीप की इस वैज्ञानिक अवधारणा पर मंजू मोहन ने अनिल अश्विनी शर्मा के सवालों का विस्तार से उत्तर दिया

शहरी क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में हीट वेव (लू ) की चपेट में जल्दी आ जाते हैं, इसके प्रमुख कारण क्या हैं?

शहरी क्षेत्रों की संरचना गर्म हवाओं के प्रभाव को तेज कर देती है। शहरों में कृत्रिम निर्माण की अधिकता इसके ढांचे को ग्रामीण ढांचे से अलग करती है। कृत्रिम निर्माण के साजो-सामान वास्तव में शहरों को और तंग बना रहे हैं। नतीजतन तेजी से हरित क्षेत्र कम होते जा रहे हैं और वातावरण में नमी की कमी होती जा रही है। इसके कारण सूरज से मिलने वाली ज्यादातर ऊर्जा धरती के द्वारा अवशोषित कर ली जाती है, जिससे शहरों के वातावरण का तापमान रात के समय ग्रामीण क्षेत्रों के तापमान की तुलना में बढ़ जाता है।

इसका कारण यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तुलनात्मक रूप से शहरों की अपेक्षा ज्यादा वाष्पोत्सर्जन (वनस्पतियों के द्वारा जल का अवशोषण व उत्सर्जन) होता है। इस प्रक्रिया से वातावरण ठंडा होता है। इसके अलावा सामान्य मिट्टीवाली भूमि या कृषि क्षेत्र की तुलना में शहरी क्षेत्र में ऊष्मा का अवशोषण अधिक होता है, जिसका कारण है शहरों में इस्तेमाल होने वाले कृत्रिम निर्माण सामग्रियों के तापीय गुण। इनके द्वारा अवशोषित ऊर्जा रात के समय उत्सर्जित होती है जो शहरी कृत्रिम संरचना में फंसकर रात में शहरों का तापमान बढ़ा देती है। इसके कारण गर्म हवा का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में ज्यादा होता है।

भूमि का उपयोग किस प्रकार गर्म हवाओं को प्रभावित करता है?

जैसा कि पहले बताया गया है, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि के उपयोग में बदलाव से शहरी क्षेत्रों के स्थानीय मौसम विज्ञान में परिवर्तन हो सकता है। मौसम विज्ञान के अनुसार कई वायुमंडलीय प्रक्रियाएं भूमि की सतह की स्थिति पर निर्भर करती हैं। ये भूमि की सतह के मानकों जैसे-नमी की उपलब्धता, उत्सर्जन, खुरदरापन और तापीय जड़त्व के द्वारा तय की जाती हैं। ये सभी मानदंड भूमि क्षेत्र के उपयोग और सतह के कार्य हैं। तेजी से बढ़ रहे शहरी क्षेत्रों के लिए बढ़ती आबादी और संरचनात्मक ढांचे के दबाव के कारण भूमि उपयोग और भूमि कवर (एलयूएलसी) में परिवर्तन, शहरी मौसम विज्ञान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैसे-जैसे शहर बढ़ता है, शहर के मानवजनित स्रोतों से उत्सर्जित ऊष्मा भी बढ़ती है जो इसको आसपास के ग्रामीण या कम विकसित क्षेत्रों की तुलना में गर्म बनाती है। यह शहरों के स्थानीय मौसम की एक ऐसी स्थिति है, जिसे “शहरी गर्म द्वीप प्रभाव” के रूप में जाना जाता है। गर्म द्वीप घटनाओं का प्रमुख कारण है इमारतों और सड़कों के द्वारा भूमि की हरियाली को प्रतिस्थापित कर दिया जाता है तो सतह के तापीय गुण, विकिरण की प्रवृत्ति, नमी की उपस्थिति और वायुगतिकीय गुण और वातावरण बदल जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरों में प्रयुक्त निर्माण सामग्री में विशेष तापीय (गर्मी की क्षमता और तापीय चालकता) और विकिरण (परावर्तन और उत्सर्जन) के गुण होते हैं।

आपका एक पर्चा प्रकाशित हुआ है, जिसमें बताया है कि किस प्रकार “गर्म द्वीप प्रभाव” के मॉडल द्वारा दिल्ली की परिस्थितियों को बेहतर और वास्तविक ढंग से समझा जा सकता है, यह किस प्रकार ऊष्मा लहरों से बचाव के लिए उपयोगी हो सकता है?

इस अध्ययन में दिल्ली में “गर्म द्वीप प्रभाव” का मूल्यांकन मेसोस्केल मौसम विज्ञान मॉडल या मौसम अनुसंधान और पूर्वानुमान मॉडल (डब्ल्यूआरएफ वी3.5) तथा शहरी सतह के आवरण मॉडल (यूसीएम) को साथ मिलाकर किया गया। गर्म द्वीप की तीव्रता गर्म द्वीप प्रभाव को मापने का एक तरीका है। भूमि उपयोग और भूमि आवरण (एलयूएलसी) को इसकी प्राकृतिक अवस्था तथा उपग्रह अवलोकन के आधार पर एक मॉडल उत्पादक की कसौटी पर आंका गया। साथ ही इनके अंतर संबंधों को परखा गया। इस मॉडल ने दिखाया है कि यह तार्किक रूप से गर्म द्वीप प्रभाव की तीव्रता (यूएचआई) का आकलन कर सकता है तथा यूएचआई की प्रवृत्ति को पुन: प्रस्तुत कर सकता है। मेसोस्केल मॉडल की अनुमान क्षमता बढ़ाने के लिए शहरी सतह एवं भूमि उपयोग एवं भूमि आवरण का सही ढंग से अध्ययन में समायोजन एक महत्वपूर्ण तरीका है।

आपके इस अध्ययन के माध्यम से किस निष्कर्ष पर पहुंचा गया?

इस अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि डब्ल्यूआरएफ मॉडल और एलयूएलसी के सावधानीपूर्ण मूल्यांकन तथा बेहतर इनपुट से दिल्ली शहर के गर्म द्वीप प्रभाव को तय किया जा सकता है। शहरी आवरण की विशेषताओं को अध्ययन में शामिल करके गर्म हवाओं के प्रभाव का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप हम बढ़ते तापमान से लड़ने और इसके प्रभाव को कम करने के लिए बेहतर तरीके अपना सकते हैं। साथ ही इन तरीकों का प्रभाव भी हम इस मॉडलिंग सिस्टम से माप सकते हैं।

ऐसा अनुमान है कि भारत में गर्म हवाओं का प्रभाव भविष्य में और बढ़ जाएगा। आपके विचार से ये अनुमान कितने चिंताजनक हैं?

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल के पिछले शोध से पता चला है कि गर्म हवाओं को कुछ हिस्सों में कुछ हद तक ग्लोबल वार्मिंग के रूप में जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिसका कारण वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों की सांद्रता बढ़ना है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सौ सालों में विश्व भर में सभी अत्यधिक तापमान वृद्धि के 75 प्रतिशत और अत्यधिक वर्षा के लगभग 18 प्रतिशत के लिए मानव द्वारा पैदा की गई ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेदार है। भूमि उपयोग एवं भूमि आवरण में बदलाव, मानव जनित ऊर्जा उत्सर्जन, उच्च तापमान की बढ़ती घटनाएं एवं परिणामस्वरूप गर्मी के मौसम में गर्म हवाओं का प्रभाव विशेषकर साल 2000 के बाद हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि गर्म हवाओं का प्रकोप बढ़ने की संभावना है।

क्या इनसे मुकाबले के लिए पूरे इंतजाम किए जा रहे हैं?

गर्म हवाओं के प्रभाव को कम करने और इनसे अनुकूलन की सभी विधियां अब ज्ञात हैं। जरूरत है कि इन्हें शीघ्रता से लागू किया जाए। सर्दी में शीत लहर से बचने के लिए बनाए गए रैनबसेरों की तरह ज्यादा गर्मी के दिनों में ऐसे आश्रयों की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए जहां जरूरत के हिसाब से पानी का पूरा इंतजाम हो और इन परिस्थतियों से बचाव के सभी वैज्ञानिक उपाय शामिल होने चाहिए।

भारत में गर्मी से बचने के अधिकांश उपाय, योजनाएं व्यक्ति विशेष का मामला होता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि निजी तौर पर वो खुद को गर्मी और निर्जलीकरण की स्थिति से बचाने के लिए क्या प्रयास करता है। आप इसे किस तरह से देखती हैं?

दीर्घकालीन अवधि में निश्चित तौर पर वही बचाव क्रियाएं अधिक प्रभावशाली होंगी जो किसी शहर के तापमान को बढ़ाने वाले कारकों को रोकेंगी। गर्मी से बचने के उपायों को इस तरह बनाया गया है कि ये भवन निर्माण सामग्री के परावर्तक एवं तापीय गुणों को बदलकर ऊर्जा के अवशोषण को कम कर देती हैं। इसके अंतर्गत परावर्तक छत एवं फुटपाथ बनाए जाते हैं। छतों, दीवारों और अन्य निर्मित संरचनाओं पर हरियाली की व्यवस्था की जाती है, जहां तक संभव हो छत पर सौर पैनलों की स्थापना की जाती है, जल अवशोषित करने वाले फुटपाथ बनाए जाते हैं। परंपरागत भवन सामग्री के ताप भंडारण गुणों को कम करने के लिए वैकल्पिक रूप से बांस और मिट्टी जैसी निर्माण सामग्री का प्रयोग किया जाना चाहिए। जहां भी संभव हो शहर में छोटे, हरे-भरे, खुले स्थान या छोटे जल स्रोत होने चाहिए क्योंकि ये गर्मी अवशोषित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। अंत में, स्कूलों से लेकर वाणिज्यिक या औद्योगिक सभी स्तरों तक गर्म द्वीप के विषय में जागरुकता फैलाना अति महत्त्वपूर्ण है। सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कई अध्ययन हुए हैं।

इस संदर्भ में किस तरह की योजनाएं एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय देश में सफल हुए हैं?

गुजरात के अहमदाबाद में किया गया एक प्रयोग मुझे याद है। वहां हीट हाई लैंड के कारण बढ़ने वाली हीटवेब से बचने के लिए गुजरात के अहमदाबाद नगर निगम ने अपने एक अस्पताल की सबसे ऊंची मंजिल पर बने नवजात वार्ड को सबसे नीचली मंजिल पर स्थानांतरित कर दिया था। इससे नवजात मृत्यु दर में कमी दर्ज की गई। यह एक ऐसा सरल कार्य था, जिसने तात्कालिक राहत दी। यह घटना 2010 की है। हीट आईलैंड पर वहां किए गए अध्ययन में यह बात निकल कर आई। अस्पताल के नवजात वार्ड के नीचली मंजिल पर स्थानांतरित करने के बाद अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने बताया कि 2009 में नवजात वार्ड में हीटवेब से पीिड़त मामलों की संख्या 8 थी तो 2010 में यह बढ़कर 24 हो गई थी। लेकिन जैसे ही नवजात वार्ड का स्थानांतरण हुआ, इसके कारण इस प्रकार के मामलों की संख्या में तेजी से कमी दर्ज की गई। 2011 में नवजात वार्ड में हीटवेब के मामले देखें तो मात्र 4 मामले ही दर्ज किए गए।

इस प्रकार 24 से 4 यानी 6 गुना कमी आई। इस अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ ख्याति कक्कड़ ने बताया था कि हमारे द्वारा इस प्रकार से किए गए एक सरल कार्य की बदौलत यह देखने में आया कि हीटवेब से बीमार होने वाले बच्चों की संख्या में अच्छी खासी कमी आई है। कभी-कभी सरल अनुकूलन के उपाय भी दीर्घकालिक और प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। अहमदाबाद नगर निगम अस्पताल का यह उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सरल उपाय भी बहुत प्रभावकारी होते हैं।

आपने अपने अध्ययन में अर्बन कूल आईलैंड यानी यूसीआई के बारे में जानकारी दी है, यह वास्तव में कौन सी परिघटना है और यह कब घटित होती है?

ताप के अवशोषण, भवनों के निर्माण और गहरी दीवारों की परतों की वजह से कभी-कभी शहरी क्षेत्र सूर्योदय के समय आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में ठंडे महसूस किए जाते हैं। इस परिघटना को अर्बन कूल आइलैंड (शहरी ठंडे द्वीप या यूसीआई) कहते हैं। हालांकि यूसीआई प्रभाव की अवधि तथा तीव्रता उस शहरी क्षेत्र की संरचना पर निर्भर करती है। राष्ट्रÑीय राजधानी क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में धरातलीय तापमान (एलएसटी) पर किए गए अध्ययन में ये तथ्य सामने आए हैं कि जैसे-जैसे शहरी क्षेत्र अपना आकार बढ़ाता गया है, वैसे-वैसे एलएसटी तथा टी2एम (रात 2 बजे का तापमान) की मात्रा में बढ़ोतरी नोट की गई है। यह बढ़ोतरी दोपहर से शुरू होकर रात्रि में अपने अधिकतम स्तर पर पहुंच जाती है। सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय तक एलएसटी की यह बढ़ोतरी लगभग 4 से 5 डिग्री सेल्सियस नोट की गई है। यद्यपि सुबह के समय इसका प्रभाव कम होता है और यह शहरी ठंडा द्वीप ही दिखता है। लेकिन इसका परिमाण 1 डिग्री सेल्सियस से भी कम व व्याप्तता अधिकतम दो घंटे तक ही पाई गई है।

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