Water

सरदार सरोवर बांध के कारण डूब गए 1.75 लाख पेड़

लगातार पानी में डूब के कारण पेड़ सड़ने लगे हैं और उनसे विषैली गैसें निकलनी लगी हैं

 
By Anil Ashwani Sharma
Last Updated: Monday 09 September 2019
सरदार सरोवर बांध की वजह से गांव चिखलदा में डूबते पेड़। फोटो: रहमत
सरदार सरोवर बांध की वजह से गांव चिखलदा में डूबते पेड़। फोटो: रहमत सरदार सरोवर बांध की वजह से गांव चिखलदा में डूबते पेड़। फोटो: रहमत

सरदार सरोवर बांध के लगातार जल स्तर बढ़ने के कारण अकेले गांव ही नहीं डूब रहे हैं बल्कि इसके कारण लाखों पेड़-पौधे भी डूब गए हैं। कल रविवार को 8 अगस्त, 2019 को सरदार सरोवर बांध में जल स्तर 136.6 मीटर जा पहुंचा है। इससे मध्य प्रदेश के 178 गांवों में डूब आने से उन गांवों के घरों के साथ गांव के पेड़-पौधे भी डूब गए हैं।

सरकार केवल घर डूबने की बात कर रही है, लेकिन वास्तविकता ये है कि इस डूब के कारण गांवों और उसके आसपास के लाखों की संख्या में पेड़-पौघे डूब गए हैं। और जहां एक ओर घर डूबने से जहां हजारों लोग बेघर हो कर सड़क पर आ गए हैं, वहीं गांवों व इसके आसपस के पेड़ों के लगातार डूबने वे सड़ने गले हैं। 

इस पर अब तक न तो स्थानीय प्रशासन ने और न ही मध्य प्रदेश सरकार का ध्यान गया है। लाखों पेड़ों के डूबने के बाद उसके सड़न से उत्पन्न होने वाली विषैली गैसों के प्रर्यावरणीय प्रभावों पर अब तक राज्य सरकार का ध्यान नहीं दे रही है।

केन्द्र सरकार के समर्थन से गुजरात सरकार द्वारा लाई जा रही गैरकानूनी डूब के कारण मध्य प्रदेश के गांवों के लाखों पेड़-पौधे पिछले कई माहों से डूब कर अब सड़ने गले हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने एक आंशिक सर्वे किया है। इसके अनुसार 178 गांवों में लगभग  1.75 लाख पेड़ डूब चुके हैं। 

ध्यान रहे कि इन जैविक पर्दा‍थों के सड़ने से उत्पन्न विषैली गैसें स्थानीय पर्यावरण पर लंबे समय पर विपरीत प्रभाव डालेगी। कार्बन डाईऑक्साईड और अमोनिया वायुमण्ड‍ल के गैसीय संतुलन में बदलाव लाएगी जो स्थानीय जीव-जंतुओं और नए पेड़-पौधों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।

इसके अलावा सरदार सरोवर में लगातार जलभराव के साथ डूब क्षेत्र में भूगर्भीय हलचलें तेज हुई हैं। अब इसका विस्तार होने लगा है। बड़वानी जिले के भमोरी से गत 9 अगस्त, 2019  से लगातार भूकंप के झटके शुरु हुए थे। ये झटके साकड,  हरिबड़,  उमरिया,  सिवई, बिलवा रोड़, मंदिल, सुराणा, बाण्डी, देवझिरी गांव से आगे बढ़ते हुए अब झोलपिपरी (अंजड़) तक पहुंच गए हैं। यह पूरी नर्मदा घाटी की सुरक्षा के लिए खतरे का संकेत है।

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