हक की हकीकत

क्या कहता है खनन जिलों के लिए भारत की महत्वाकांक्षी संसाधन साझेदारी योजना का पहला स्वतंत्र मूल्यांकन 

 
By Srestha Banerjee, Chinmayi Shalya
Last Updated: Monday 12 June 2017
श्रेष्ठा बैनर्जी / सीएसई
श्रेष्ठा बैनर्जी / सीएसई श्रेष्ठा बैनर्जी / सीएसई

उप्पारजगर गांव के आसमान पर ढलता सूरज शाम होने का संकेत दे रहा है। मानो भुइयां और उसकी पत्नी अपनी छोटी सी झोपड़ी के अहाते में बैठे हैं। उन्होंने अपने सामने आग जला रखी है। पास ही में उनका तीन साल का नन्हा सा बेटा खेल रहा है। पिछले कुछ सालों से यह परिवार पशुपालन और छोटी-मोटी खेती कर अपना गुजर बसर कर रहा है।

भुइयां की किस्मत तब रूठ गई जब उनको पता चला कि उनके बेटे को ट्यूमर है। बेटे के इलाज का खर्चा इतना अधिक था कि उन्हें अपने दोनों बैल बेचने पड़ गए। इसके साथ ही वे जिस छोटी सी जमीन के मालिक थे, उसे भी बेचने के लिए मजबूर होना पडा। हताशा भरे स्वर में भुइयां कहते हैं कि मेरा बेटा तो ठीक हो गया, लेकिन मेरी आर्थिक स्थिति बदतर हो गई और अब मुझे इसके ठीक होने के आसार दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ते।

उप्पारजगर गांव ओडिशा के केंदुझार जिले के बंसपाल ब्लॉक में स्थित है। यहां की अस्सी फीसदी आबादी आदिवासी समुदाय की है। यह ब्लॉक भूयान, जुआंग, मुंडा आदि जनजाति समुदायों में बंटा है। गंधमरदन की पहाड़ियों से घिरा यह इलाका लौह खनिज के लिए जाना जाता है। यहां के बहुमूल्य खनिजों के दोहन से ओडिसा माइिनंग कारपोरेशन और कुछ निजी कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं। लेकिन भुइयां जैसे लोग अपनी इस धरती से कोई लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

बंसपाल ब्लॉक के आधे से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं। यहां बेरोजगारी चरम पर है। इलाके की आधी आबादी के हाथों में काम नहीं है। उप्पारजगर जैसे गांव में शायद ही कोई स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराई गई है। यदि कहीं आसपास स्वास्थ्य केंद्र हैं भी तो वहां तक स्थानीय लोगों का पहुंचना बहुत कठिन है।

किसी भी सरकारी सुरक्षा और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में भुइयां जैसे लोगों को इलाज के लिए अपनी जमीन और घर का सामान बेचने पर मजबूर होना पड़ता है। यह सच अपने नग्न रूप में सामने है कि अपनी धनी जमीन पर ये लोग गरीबी रेखा से नीचे खड़े हैं, जबकि बाहरी लोग इस जमीन से मुनाफा कमा रहे हैं। खनन जैसी व्यावसायिक गतिविधियों का लाभ देने की स्थानीय लोगों की मांग बहुत पुरानी है।

दो साल पहले, सरकार ने स्थानीय संपत्ति के पुनर्वितरण की चुनौती को स्वीकार किया। परिणाम स्वरूप खनिज समृद्ध जिलों में जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) की स्थापना के लिए मार्च 2015 में खान और खनिज (विकास और नियमन) अधिनियम (1957) में संशोधन किया गया।

डीएमएफ खनन-संबंधित कार्यों से प्रभावित प्रत्येक जिले के लिए एक गैर-लाभकारी ट्रस्ट है, जिसे खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के हित और लाभ के लिए काम करना होता है। डीएमएफ दशकों से ऐसी गतिविधियों का बोझ उठा रहे समुदायों को खनन से होने वाले लाभ का साझेदार बनाने के लिए एक वाहक के तौर पर काम करता है।

इसके तहत जिस स्थान पर खनन संबंधी कार्य हो रहे हैं, खनिक और खनन कंपनियों को उनके रॉयल्टी भुगतान के आधार पर निर्धारित राशि उस जिले के डीएमएफ ट्रस्ट में जमा करानी होगी। कोयले, लौह अयस्क, बॉक्साइट जैसे सभी प्रमुख खनिजों के लिए राज्य सरकार को दी जाने वाली रॉयल्टी का 10 प्रतिशत भुगतान 12 जनवरी 2015 को या उसके बाद दिए गए पट्टों के लिए दिया जाएगा। इससे पहले के पट्टों के लिए रॉयल्टी का 30 प्रतिशत भुगतान दिया जाएगा।

छोटे खनिजों के लिए भुगतान राशि का निर्धारण राज्यों द्वारा किया जाएगा। प्रत्येक खनन जिले में डीएमएफ की स्थापना की जाएगी।

ओडिशा के जोड़ा बरबिल गांव के निकट लौह अयस्क के खनन से प्रभावित ग्रामीण  (अग्निमिढ़ बासु / सीएसई)

खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की तत्काल और दीर्घकालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डीएमएफ को नियोजन अभ्यास करने और वार्षिक योजनाएं बनानी चाहिए। 17 सितंबर, 2015 को केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेकेवाई) का शुभारंभ किया। यह योजना खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए डीएमएफ के धन का उपयोग करती है।

दो साल बाद, डीएमएफ धन के मामले में समृद्ध हो रहे हैं और खनन क्षेत्रों में स्थानीय विकास के लिए शक्तिशाली निकाय के रूप में उभरे हैं। केंद्रीय खनन मंत्रालय के अनुसार, फरवरी 2017 तक डीएमएफ के तहत करीब 5,800 करोड़ रुपए एकत्र किए गए हैं। वहीं, सीएसई द्वारा सर्वेक्षित पचास जिलों में ही जमा राशि 5,469 करोड़ रुपए है। और इसमें सभी खनन जिले शामिल नहीं है, क्योंकि उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे कुछ महत्वपूर्ण राज्यों के जिलों में डीएमफ अभी स्थापित होना शेष है। इसके अलावा, कई जिलों को अभी तक खान के पट्टेदारों से अपेक्षित योगदान प्राप्त नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के यवतमाल, आंध्र प्रदेश के गुंटूर, तेलंगाना के खम्मम आदि जिलों में अभी तक अपेक्षा से कम धनराशि एकत्रित हुई है। एक अनुमान के अनुसार यह राशि, पिछड़े जिलों के विकास के लिए एकमात्र केंद्र प्रायोजित पूर्ववर्ती योजना, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि (बीआरजीएफ) के 250 शीर्ष खनन जिलों (2016 में बंद) के बजट के समान थी।

यह फंड भारत के सबसे गरीब राज्यों के लिए एक वरदान है। तीन खनन राज्यों—ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़, जो भारत के सबसे गरीब और अविकसित राज्यों में शामिल हैं—के डीएमएफ में जमा राशि कुल धन संग्रह का करीब 70 प्रतिशत है। कुल 1,932.5 करोड़ रुपए संग्रह के साथ ओडिशा शीर्ष पर है। यह राशि राज्य के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के वित्तीय वर्ष 2016-17 के कुल बजटीय आवंटन से भी अधिक है। इसके बाद झारखंड (1,056.2 करोड़) और छत्तीसगढ़ (1,042 करोड़) का नंबर आता है। एक अन्य प्रमुख खनन राज्य मध्य प्रदेश में 979 करोड़ रुपए संग्रहित हुए हैं, जिसमें मुख्य रूप से कोयला खदानों के लिए जाना जाने वाले सिंगरौली जिले का महत्वपूर्ण योगदान है। इस लेख के लिए किए गए 50 खनन जिलों के सर्वेक्षण में आमतौर पर कोयला खनन जिलों में धन का अत्यधिक संग्रह हुआ है।

तो, क्या नियमानुसार स्थानीय विकास के लिए धन खर्च किया गया है? दिल्ली स्थित नॉन प्रॉफिट सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एन्वायरॉन्मेंट (सीएसई) ने डीएमएफ का पहला स्वतंत्र मूल्यांकन किया। यह सर्वेक्षण दिसंबर 2016 से फरवरी 2017 तक की अवधि के लिए किया गया था।   मूल्यांकन में 11 राज्यों में फैले 50 खनन प्रधान जिलों को शामिल किया गया। सीएसई शोधकर्ताओं ने यह देखा कि डीएमएफ निधि का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है। साथ ही क्या सरकार के दिशा-निर्देशों के मुताबिक यह योजना लागू की जा रही है।

डीटीई/सीएसई डेटा सेंटर द्वारा तैयार, इंफोग्राफिक: राज कुमार सिंह
 (डेटा स्रोत: विभिन्न स्रोत)

नींव रखी जा रही है, धीरे-धीरे

संस्थागत व्यवस्था: किसी भी सरकारी पहल के सफल होने के लिए संस्थागत संरचना बेहद महत्वपूर्ण है। विशेषकर डीएमएफ के लिए जो स्थानीय समुदायों की भागीदारी के माध्यम से स्थानीय विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्थापित किए गए हैं। केंद्रीय मंत्रालय द्वारा निर्धारित डीएमएफ नियमों और डीएमएफ ट्रस्ट डीड के तहत, हर जिले के डीएमएफ को पंजीकृत होना चाहिए ताकि वह कानून के प्रति जवाबदेह हो। डीएमएफ ट्रस्ट के संचालन के लिए एक शासी परिषद (गवर्निंग काउंसिल) और एक प्रबंध समिति (मैनेजिंग कमिटी) का गठन होना चाहिए। कार्यान्वयन में प्रगति के बारे में नियमित रूप से जानकारी साझा करने के लिए डीएमएफ कार्यालय और एक वेबसाइट होनी चाहिए।

सर्वे किए गए पचास जिलों में से अधिकतर जिलों में गवर्निंग काउंसिल और मैनेजिंग कमेटी का गठन हो चुका है। सिर्फ तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में गवर्निंग काउंसिल और मैनेजिंग कमेटी का गठन अभी तक नहीं हुआ है क्योंकि इन राज्यों के डीएमएफ नियम हाल ही में बनाए गए हैं।

लेकिन, कई जिलों में अब तक डीएमएफ कार्यालय नहीं खोले गए हैं। सर्वेक्षण में शामिल 50 जिलों में से 20 के अनुसार उनके यहां प्रक्रिया चालू है। ओडिशा ने डीएमएफ कार्यालय के लिए प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट (पीएमयू) खोलने हेतु निविदाएं आमंत्रित की हैं। अक्टूबर 2016 में राज्य सरकार ने R100 करोड़ सालाना से अधिक पावती वाले जिलों को निर्देश दिया कि वे एक-एक पीएमयू की स्थापना करें जो डीएमएफ ट्रस्ट की योजना बनाने, निगरानी एवं मूल्यांकन में सहायता करे। इनमें से पांच जिलों (सुंदरगढ़, जजपुर, क्योंझर, झारसुगुड़ा और अंगुल) ने इन मामलों की विशेषज्ञ एजेंसियों से प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं ताकि इस नई प्रक्रिया का क्रियान्वयन आसानी से हो सके।

हालांकि दो अन्य खनिज प्रधान राज्यों—झारखंड और छत्तीसगढ़—के अधिकारियों की मानें तो उनका डीएमएफ की प्रबंधन इकाई की स्थापना के लिए निविदा की प्रक्रिया अपनाने का कोई विचार नहीं है। ये राज्य डीएमएफ कार्यालय में कर्मचारियों की बहाली के लिए उपयुक्त पृष्ठभूमि रखने वाले लोगों की खोज में हैं। हालांकि अबतक कोई खास तरीका निर्धारित नहीं किया जा सका है।

इन सब के इतर, एक विषम प्रवृत्ति भी देखने में आ रही है। यद्यपि लगभग सभी जिलों में गवर्निंग काउंसिल और प्रबंध समितियां बनाई गई हैं, लेकिन 50 जिलों में से केवल 48 प्रतिशत ने ही कानूनी तौर पर आवश्यक अपने डीएमएफ को ट्रस्टों के रूप में पंजीकृत करवाए हैं। छत्तीसगढ़ और झारखंड में सभी जिलों को पंजीकृत किया गया है। पंजीकरण नहीं करने के कारण अलग-अलग राज्य में अलग-अलग हैं।

ओडिशा में, अधिकारियों का कहना है कि पंजीकरण की आवश्यकता को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है। इस संबंध में जब सीएसई ने राज्य सरकार के प्लानिंग एंड कनवर्जन्स विभाग से संपर्क किया तो बताया गया कि विधि विभाग से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही कुछ कारण बताया गया था। राज्य के अधिकारियों का कहना है कि डीएमएफ को पूरी तरह से पंजीकृत किये जाने को लेकर एक भ्रम की स्थिति बनी हुई है। उदाहरण के लिए, जब नागपुर जिले के अधिकारियों ने डीएमएफ को पंजीकृत करवाने के लिए चैरिटी कमिश्नर से संपर्क किया तो उन्होंने यह कहते हुए पंजीकरण करने से इनकार कर दिया कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। राजस्थान में किसी भी जिले ने यह मानते हुए डीएमएफ को पंजीकृत नहीं करवाया कि राज्य सरकार ने यह कर दिया होगा। इस धारणा का स्रोत राज्य के खान विभाग की ओर से जारी एक अधिसूचना थी। 9 जून, 2016 की अधिसूचना में कहा गया था कि राज्य सरकार राज्य के सभी जिलों में एक गवर्निंग काउंसिल और एक मैनेजिंग कमेटी के साथ एक ट्रस्ट की स्थापना करेगी, जिसे जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट के रूप में जाना जाएगा।

श्रेष्ठा बैनर्जी / सीएसई

बिल्डिंग ब्लॉक को एक साथ रखा जाना चाहिए

नियोजन पर: यह एक विडंबना है कि खनिज समृद्ध जिलों में रहने वाली आबादी भारत की सबसे गरीब आबादी है। उच्च मूल्य वाले खनिज की खोज और मुनाफे के कारण प्रत्येक जिले की वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद आकर्षक होने के बावजूद इन जिलों की प्रति व्यक्ति आय आमतौर पर कम है। सर्वेक्षण में शामिल 11 राज्यों के शीर्ष खनन जिले राज्यों के मानव विकास सूचकांक में सबसे निचले पायदान पर हैं। आदिवासी मामलों के मंत्रालय द्वारा 2014 के नवीनतम अनुमानों के मुताबिक जनजातीय आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, खासतौर पर खनन राज्यों के ग्रामीण इलाकों में, गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहा है। ओडिशा में ग्रामीण जनजातीय आबादी का 75 प्रतिशत से अधिक गरीबी रेखा के नीचे है, जबकि छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से अधिक है।

इसलिए, डीएमएफ नियमों ने फंड को ऐसे तरीके से खर्च करने के लिए निर्दिष्ट किया है, जिससे कि स्थानीय समुदायों को सबसे अधिक लाभ मिले और उनके पास यह निर्णय लेने के लिए पर्याप्त गुंजाइश हो कि पैसा किन कार्यों पर खर्च किया जाना चाहिए। नियमों के तहत, डीएमएफ को वार्षिक तौर पर एक नियोजन अभ्यास करना चाहिए, ताकि प्राथमिकता वाली ऐसी परियोजनाओं की पहचान की जा सके जिसे फंड किया जाना है। नियमों ने विशेष रूप से कुछ बुनियादी ढांचे पर खर्चों पर प्रतिबंध लगाए हैं ताकि ऐसे परिदृश्य से बचा जा सके, जिसमें सरकार द्वारा इन परियोजनाओं के लिए पहले से पर्याप्त फंड उपलब्ध कराया गया हो। नियमों के अनुसार, डीएमएफ की धनराशि का 60 प्रतिशत पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिलाओं और बच्चों के कल्याण, कौशल विकास और पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण उपायों पर खर्च किया जाना चाहिए। इसके अलावा, नियम स्पष्ट करते हैं कि भौतिक बुनियादी ढांचे, सिंचाई और ऊर्जा और वाटरशेड विकास जैसी परियोजनाओं पर 40 प्रतिशत से ज्यादा पैसे खर्च नहीं किए जाने चाहिए। ये परियोजनाएं राज्य सरकार के सामान्य बजट से भी महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त करती हैं।

स्थिति: जिन 50 जिलों का सर्वेक्षण किया गया उनमें से केवल आधे जिलों ने इस बात के संकेत दिए कि उन्होंने नियमों के अनुसार आवश्यक कार्ययोजना तैयार की है। लेकिन, सीएसई शोधकर्ता केवल 17 जिलों के लिए मसौदे की रूपरेखा के साथ योजनाओं को देख पाए हैं। योजना तैयार करने की प्रगति को देखते हुए छत्तीसगढ़ को सर्वश्रेष्ठ राज्य का दर्जा दिया जा सकता है। छत्तीसगढ़ के नौ खनन जिलों में से आठ जिलों के लिए योजना बना ली गई है। ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में, कई जिलों ने योजना के मुताबिक परियोजनाओं को लागू करना शुरू कर दिया है। इसलिए, संक्षेप में, कानून के लागू होने के दो साल बाद भी कार्य प्रगति पर ही है।

प्राथमिकताओं पर कितना ध्यान?

कार्यान्वयन पर: योजना तैयार करने और फंड प्रवाह में धीमी प्रगति को देखते हुए, सीएसई सर्वेक्षण में विकास कार्यों का विश्लेषण करने के लिए सीमित अवसर थे कि विकास के कौन से काम जा रहे हैं और स्थानीय विकास के लिए फंड का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है। सीएसई ने उन्हीं नौ जिलों की तैयार योजना का विश्लेषण किया, जिनके पास पूरी योजना, चिह्नित परियोजनाएं और धन की उपलब्धता थी। इन जिलों में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा, कोरबा और रायगढ़; झारखंड के पश्चिम सिंहभूम और धनबाद; ओडिशा के क्योंझर, सुंदरगढ़ और झारसुगुडा; और मध्य प्रदेश के सिंगरौली शामिल थे।

सर्वेक्षण की विश्वसनीयता इस बात से निर्धारित होती है कि ये जिले भारत के शीर्ष खनन जिलों में से हैं और ये इस बात का संकेत दे सकते हैं कि ऐसी महत्वाकांक्षी योजना कैसे शुरू की जा सकती है।

इन योजनाओं के तहत प्रस्तावों और परियोजनाओं को लागू करने पर कोई समानता नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रत्येक राज्य के अपने डीएमएफ नियम हैं और स्थानीय विकास के लिए स्थानीय विशिष्ट दृष्टिकोण अपनाए गए हैं। इस प्रकार प्रगति का मूल्यांकन राज्यवार किया गया था।
स्थिति छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ में, राज्य सरकार योजना तैयार करने और कार्यान्वयन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लेकिन इसके साथ साथ योजना बनाने में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। हालांकि, नियमों के अनुसार प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर खर्च करने पर, राज्य को कुछ अंक दिए जा सकते हैं।

राज्य में डीएमएफ को बड़ी मात्र में प्राप्त धनराशि को ध्यान में रखते हुए जिलों को तीन साल की योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। राज्य ने सिर्फ खान-प्रभावित जिलों में नहीं बल्कि पड़ोसी जिलों के विकास के लिए भी डीएमएफ का इस्तेमाल किया है। लेकिन एक शर्त के साथ कि पड़ोसी जिलों में भी कुछ खदान प्रभावित क्षेत्र होने चाहिए। सरकार का कहना है कि यह विकास के लिए एक क्षेत्रीय दृष्टिकोण है। निकटवर्ती क्षेत्रों का हिस्सा राज्य सरकार द्वारा खनन प्रभावित इलाकों के आधार पर तय किया गया है। उदाहरण के लिए, दंतेवाड़ा जिला अपने डीएमएफ की धनराशि का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा निकटवर्ती पांच जिलों के साथ साझा कर रहा है। इसी तरह, कोरबा अपने फंड का 40 प्रतिशत हिस्सा करीब के तीन जिलों के साथ साझा कर रहा है।

तीन जिलों की योजनाओं में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। दंतेवाड़ा और कोरबा ने अपने बजट का 19 प्रतिशत बजट इसके लिए आवंटित किया है। कृषि एक और फोकस क्षेत्र है, जिसमें पर्याप्त बजटीय आवंटन दिया गया है। योजनाओं में बड़े पैमाने पर ढांचागत विकास के लिए काफी आवंटन किया गया है। वास्तव में, गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में ढांचागत विकास को इन तीन जिलों में अधिकतम आवंटन किया है।

इसका मतलब है कि जिलों ने राज्य डीएमएफ नियमों और पीएमकेकेवाई के दिशा-निर्देशों के अनुसार बजट आवंटित किए हैं। लेकिन डीएमएफ की जिम्मेदारी धनराशि को स्थानीय रूप से प्रासंगिक विकास आवश्यकताओं पर खर्च करना है, इसलिए यह जांचना महत्वपूर्ण है कि आवंटित राशि पर्याप्त है कि नहीं और स्थानीय जीवन पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है कि नहीं। उदाहरण के लिए, राज्य के इन तीन जिलों में सुरक्षित पेयजल की पहुंच सबसे कम है। 2011 की जनगणना के अनुसार, तीन प्रतिशत से भी कम ग्रामीण घरों में नल का पानी पहुंच रहा है। इसलिए, पेयजल उपलब्धता पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। लेकिन समस्या के स्तर को ध्यान में रखते हुए बजटीय आवंटन काफी कम लगता है। कोरबा ने अपने बजट में पेयजल के लिए फंड का 13.7 प्रतिशत राशि का प्रावधान किया है। जबकि दंतेवाड़ा ने अभी इसके लिए फंड का 4.1 प्रतिशत राशि ही रखी है। दंतेवाड़ा में 98 प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल का पानी नहीं पहुंच रहा है।

झारखंड के धनबाद जिले में कोयला खदान से बाजार में बेचने के लिए कोयला ले जाते स्थानीय लोग  (सुगंध जुनेजा / सीएसई)

इसी प्रकार जहां तक ​​समग्र बजटीय सहायता का संबंध है, शिक्षा के लिए आवंटन प्रभावशाली है। लेकिन बजट की अधिकांश धनराशि का प्रावधान विभिन्न निर्माण कार्यों के लिए किया गया है। पहले वर्ष के लिए रायगढ़ का पूरा बजटीय आवंटन निर्माण कार्यों के लिए है जबकि कोरबा में 89 प्रतिशत धनराशि ऐसे कार्यों के लिए दी गई है। प्रशिक्षित कर्मचारियों की भर्ती पर या छात्रों के लिए मौद्रिक सहायता जैसे कार्यों के लिए ज्यादा प्रावधान नहीं है। हालांकि दंतेवाड़ा में कुछ सकारात्मक झुकाव देखने में आया है। शिक्षकों के अभाव को दंतेवाड़ा में डीएमएफ निधि से पूरा करने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा प्राथमिक पाठ्यक्रम की पुस्तकों को स्थानीय आदिवासी भाषाओं में अनुवादित करने का प्रस्ताव है ताकि आदिवासी बच्चे पाठ्यक्रम को समझें और उनके स्कूल छोड़ने की दर को कम किया जा सके।

इन सभी जिलों में खनन गतिविधियों के कारण प्रदूषण की समस्या व्यापक है। खनन की वजह से रायगढ़ राज्यभर में सबसे तीव्र श्वसन संक्रमण वाला जिला है। यहां हर 1,00,000 लोगों में से 6,471 लोग श्वसन संबंधी बीमारियों से जूझ रहे हैं। इसको देखते हुए स्वास्थ्य के लिए बजटीय आवंटन सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन जिले ने स्वास्थ्य के मद में खर्च करने के लिए डीएमएफ फंड से सिर्फ 5.5 फीसदी धनराशि का आवंटन किया है। दंतेवाड़ा में स्वास्थ्य के लिए आवंटन का 70 प्रतिशत धन जिला अस्पताल के उन्नयन और अन्य स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों के निर्माण पर खर्च करने का प्रावधान किया गया है। इस मोर्चे पर यह एकमात्र उत्साहजनक खबर है।

झारखंड: राज्य सरकार के निर्देशानुसार सभी डीएमएफ योजनाओं को विकास की दो महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं पर ध्यान देना चाहिए: खनन प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना और गांव को खुले में शौच से मुक्त बनाना। इसलिए, सीएसई ने दो जिला योजनाओं का विश्लेषण किया। यह उम्मीद थी कि बजट का एक बड़ा हिस्सा इन दो कार्यों के लिए आवंटित किया गया होगा। धनबाद ने अपने डीएमएफ बजट का 62.5 प्रतिशत हिस्सा पेयजल के लिए आवंटित किया है जबकि पश्चिम सिंहभूम ने इस काम के मद में 60.7 प्रतिशत धनराशि आवंटित की है। दोनों जिलों ने अपने पानी के बजट का 90 प्रतिशत से अधिक का प्रावधान पाइप से पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए किया है।

दूसरी तरफ, डीएमएफ फंड का प्रयोग वर्ष 2018 तक राज्य को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए किया जा रहा है। सरकार ने खनन जिलों से स्वच्छ भारत मिशन के लिए डीएमएफ के एक हिस्से को जमा करने के लिए कहा है। स्वच्छता के लिए बजटीय आवंटन धनबाद में पांच प्रतिशत और पश्चिमी सिंहभूम में नगन्य है। इससे दोनों जिलों में स्वच्छता की स्थिति में कितना सकारात्मक बदलाव आएगा, यह एक खुली बहस का मुद्दा होगा।

ओडिशा: यह राज्य डीएमएफ फंड का कार्यान्वयन किस तरह से कर रहा है, यह देश के बाकी हिस्सों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूरे देश में खनन प्रभावित क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले फंड में से सबसे ज्यादा फंड ओडिशा के पास उपलब्ध है। तीन जिला योजनाओं के सीएसई विश्लेषण, विभिन्न प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए आवंटन के मामले में किसी भी प्रवृत्ति को प्रदर्शित नहीं करता है। वास्तव में राज्य ने डीएमएफ के लिए क्षेत्र की प्राथमिकता पर कोई भी निर्देश जारी नहीं किया है। इसका मतलब है कि डीएमएफ ट्रस्ट के पास निर्णय लेने की शक्ति है। जबकि जिला योजनाओं के नियमों के तहत उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए बजट आवंटित किया गया है, फिर भी बजटीय आवंटन अलग-अलग हैं। सीएसई विश्लेषण में पता चला है कि योजनाओं ने स्थानीय महत्व के महत्वपूर्ण क्षेत्रों-जैसे स्वास्थ्य और महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल और कल्याण को बड़े पैमाने पर नजरअंदाज किया है।

ओडिशा में एक परेशान करने वाला पहलू यह है कि डीएमएफ योजना ने शहरी इलाकों में विकास परियोजनाओं के लिए विसंगतिपूर्ण तरीके से अधिक राशि का आवंटन किया है, जबकि खनन से प्रभावित ज्यादातर लोग ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। उदाहरण के लिए, क्योंझर ने ग्रामीण क्षेत्रों से संबंधित परियोजनाओं के लिए बजट का केवल 14.5 प्रतिशत निर्धारित किया है जबकि जिले की 86 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण है। इसी प्रकार झारसुगुडा में, डीएमएफ बजट का लगभग 69 प्रतिशत शहरी इलाकों में परियोजनाओं के लिए आवंटित किया गया है। इस जिले की ग्रामीण आबादी लगभग 60 प्रतिशत है और जिले का सबसे खनन प्रभावित प्रखंड लखनपुर भी ग्रामीण है।

इसी तरह का असंगत आवंटन अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में भी देखा गया है। पेयजल के लिए क्योंझर ने 33.4 प्रतिशत धनराशि आवंटित की है। लेकिन इसका 80 प्रतिशत ट्यूबवेल की खुदाई में खर्च हो जाएंगे। खनन के कारण भूजल के अत्यधिक प्रदूषण वाले और तेजी से कम हो रहे भूजल स्तर वाले जिले के लिए यह आवंटन ऊंट के मुंह में जीरा साबित होगा। झारसुगुडा के नगरपालिका क्षेत्र में जलापूर्ति बढ़ाने के लिए पानी के बजट का 90 प्रतिशत से अधिक मंजूर कर दिया गया है, जिसमें निर्माणाधीन हवाई अड्डे पर पानी की आपूर्ति भी शामिल है।

मध्य प्रदेश: इस राज्य की स्थिति एक से अधिक तरीकों में असाधारण है। सबसे पहले, फरवरी तक राज्य का कुल डीएमएफ फंड रु 979 करोड़ था। लेकिन इनमें से 63 प्रतिशत सिर्फ एक जिला सिंगरौली से आया था। सीएसई ने इस जिले की डीएमएफ योजना का विश्लेषण किया। दूसरा, राज्य ने असाधारण प्रावधान तैयार किया है, जिसके तहत डीएमएफ को कुछ प्रतिशत फंड राज्य निधि को स्थानांतरित करना पड़ता है, जिसे राज्य खनिज निधि कहते हैं। इसका मतलब यह है कि डीएमएफ निधि के आवंटन और खर्च पर राज्य का काफी नियंत्रण रहेगा। राज्य का वित्त विभाग राज्य खनिज निधि को नियंत्रित करता है। वित्त विभाग के प्रभारी मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय समिति राज्य निधि का प्रशासन करती है। उन्हें यह तय करने की शक्ति है कि किस प्रस्ताव को वित्त पोषित किया जाए और मुख्यमंत्री द्वारा इसका अंतिम अनुमोदन अनिवार्य है।

सिंगरौली की तरफ वापस जाएं तो जिले की डीएमएफ योजना विरोधाभासों का सबसे बड़ा पुलिंदा है और खान प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के साथ एक मजाक है। वर्ष 2010 में, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा देश में 9 सबसे गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्र की घोषणा की गई थी, जिसमें सिंगरौली जिला भी शामिल था। यहां के लगभग सभी जल स्रोत प्रदूषित हैं और पीढ़ियों से साफ पानी स्थानीय निवासियों के लिए सबसे ज्यादा मूल्यवान वस्तु है। एक प्रतिशत से भी कम ग्रामीण घरों में नल से साफ पानी की आपूर्ति की जाती है। लेकिन यह योजना पेयजल के लिए बजट का सिर्फ 0.9 प्रतिशत आवंटित करता है। जैसे यह आवंटन पर्याप्त नहीं है, इस योजना ने शिशु और महिला कल्याण के लिए बजट का 0.6 प्रतिशत या सिर्फ R1.7 करोड़ का आवंटन किया। यह जिला अपने शिशु मृत्यु दर के लिए कुख्यात है। यहां की शिशु मृत्यु दर 67 और पांच साल तक की उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 112 है। जिले में करीब 35 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं और इस योजना ने पोषण वृद्धि के लिए फंड का 0.1 प्रतिशत आवंटित किया है।

मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में स्थित कोयले की खदान। यह खदान क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रदूषण का कारण बन रहा है (अनुपम चक्रवर्ती / सीएसई)

बुनियादी बदलाव की जरूरत

एक राष्ट्रीय कार्यक्रम उपयोगिता या कार्यक्षमता का आकलन करने के लिए दो साल का समय पर्याप्त नहीं है, लेकिन कुछ इसमें ऐसे बदलावों का सुझाव दिया जा सकता है जो प्रभावी हो। यह सर्वेक्षण स्पष्ट रूप से इस योजना के कार्यान्वयन के तरीके में सुधार की गुंजाइश की ओर इशारा करता है। और मुख्य संदेश यह है कि योजना अच्छी तरह से और समावेशी तरीके से बनाएं। विश्लेषण से पता चलता है कि अगर योजना ठीक से नहीं बनाई जाएगी तो बड़ी मात्रा में धन बर्बाद हो जाएगा। किसी भी अन्य विकास कार्यक्रमों की तरह इसका अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है। लेकिन खनन प्रभावित समुदाय पहले से ही बहुत कुछ भुगत रहे हैं। वे एक और अवसर का खो जाना सहन नहीं कर सकते।

सबसे पहले, जिला योजना को किसी क्षेत्र के विकास की तात्कालिक जरूरतों और दीर्घकालिक जरूरतों के बीच भेद करना चाहिए। तात्कालिक जरूरतों को प्राथमिकता के आधार पर वित्तपोषण मिलना चाहिए और दीर्घकालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए तीन से पांच वर्षों की योजना बनाई जानी चाहिए। जितने जिलों में यह दीर्घकालिक योजना होगी, उनका कार्यान्वयन बाद में आसानी से किया जा सकेगा। दूसरा, प्रस्तावित योजनाएं व्यापक योजना के दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित नहीं करती हैं। इसका एक प्रमाण यह है कि डीएमएफ किस तरह से पीने के पानी के उपयोग की योजना बना रहे हैं। कई जिलों में वे भूजल पर खर्च करने की योजना बना रहे हैं जो पहले से ही प्रदूषित है। इसके बजाय, योजना को उन स्रोतों की ओर ध्यान देना जो सुरक्षित हैं और लंबे समय तक बने रहेंगे।

तीसरी बात, कई योजनाओं में उन गतिविधियों के लिए भी बजट निर्धारित कर दिया गया है, जिनका वित्त पोषण आदर्श रूप से राज्य के सामान्य बजट द्वारा किया जाना चाहिए था। इसके अलावा, इसका भी कोई साक्ष्य नहीं दिखता कि क्या डीएमएफ का पैसा उस क्षेत्र में काफी बदलाव ला सकता है। बल्कि, योजनाओं को अन्य सरकारी कार्यक्रमों के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि उनकी गुणवत्ता को और भी बढ़ाया जा सके।

और आखिर में, डीएमएफ संस्थानों को एक सशक्त चेष्टा करने की आवश्यकता है ताकि एक ऐसी योजना का कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सके जो निचले तबकों से शुरू करते हुए प्रभावित क्षेत्रों की जनता की जरूरतों और महत्त्वकांक्षाओं को पूरा कर सके। जनता से जुड़े किसी भी संस्थान या योजना की सफलता तभी मानी जाती है जब वह जमीनी स्तर पर उपयुक्त या सुसंगत हो।

आरुषि धींगरा के इनपुट सहित

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