Climate Change

रास्ते हैं, बस चलने की जरूरत

महात्मा गांधी ने कहा था कि हम जैसी दुनिया देखना चाहते हैं, उसी हिसाब से हमें खुद को ढालना होगा। आज की दुनिया में हमें इस पर अमल करना होगा।

 
By Sunita Narain
Last Updated: Thursday 30 May 2019
रास्ते हैं, बस चलने  की जरूरत
तारिक अजीज / सीएसई तारिक अजीज / सीएसई

यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि मानवीय दखल भरे इस युग में पर्यावरण को अब तक की सबसे भारी क्षति पहुंची है। यह भी सर्वविदित है कि दुनिया तेजी से धरती द्वारा निर्धारित सीमाओं से परे जाकर रहने की क्षमताओं का विस्तार कर रही है। कुछ खबरें लगातार हमारी नजरों के सामने आ रही हैं जो बार-बार याद दिलाती हैं कि पर्यावरण के कुप्रबंधन के कारण स्वास्थ्य का संकट बढ़ गया है और दुनिया जलवायु परिवर्तन का दंश झेल रही है।

ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए? अक्सर यह सवाल बहुत से लोग पूछते हैं। हम बदलाव चाहते हैं। हम स्पष्ट रूप से चाहते हैं कि पर्यावरण की रक्षा होनी चाहिए। हम उस परिवर्तन का हिस्सा बनना चाहते हैं जिसकी आज सख्त जरूरत है। हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं वह प्रदूषित है और हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हमारी नदियां सीवेज और गंदगी से बेमौत मर रही हैं। हमारे जंगलों के सामने संकट है। हमें पता है कि पर्यावरण को बचाने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो हमारी धरती का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

हम यह जानते हैं। लेकिन हमारे जेहन में सवाल यह है कि आखिर हम क्या कर सकते हैं? ऐसा क्या है जो हम व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से कर सकते हैं। स्कूल, कॉलेज, आवासीय परिसर और कॉलोनी संयुक्त रूप से क्या कर सकते हैं। हम क्या योगदान दे सकते हैं और कैसे?

इसका जवाब है, हां हम बदलाव ला सकते हैं। बहुत साल पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि हम जैसी दुनिया देखना चाहते हैं, उसी हिसाब से हमें खुद को ढालना होगा। आज की दुनिया में हमें इस पर अमल करना होगा। यह साफ हो चुका है कि हमारी जीवनशैली का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। हम क्या करते हैं और कैसे करते हैं, यही महत्वपूर्ण बदलाव लाते हैं। इसीलिए हमें सबसे पहले यही समझना होगा कि हम क्या कर रहे हैं। यह जानना जरूरी है कि हम कितना पानी और कितनी ऊर्जा इस्तेमाल कर रहे हैं और कितनी पैदा कर रहे हैं। हम अपने तरीकों में बदलाव लाकर कम से कम पानी का उपयोग कर पाएंगे। साथ ही इसकी बर्बादी भी कम करेंगे। धरती का सम्मान करना हमारा मूल उद्देश्य होना चाहिए। हमें बदलाव को खुद में उतारना होगा।

अब पानी का ही उदाहरण लीजिए। हमें पता है कि जहां एक तरफ पानी का संकट बढ़ रहा है और हममें से बहुत से लोगों को साफ पेयजल भी नहीं नसीब हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ उपलब्ध पानी प्रदूषित हो रहा है। इसे देखते हुए हमें कुछ कदम उठाने की जरूरत है। सबसे पहले हमें पानी की हर बूंद को पकड़कर अपने जलस्रोतों को समृद्ध करना होगा। हम हर छत, हर फुटपाथ से वर्षा जल का संचलन कर सकते हैं। ये स्थान जलग्रहण क्षेत्र बनाए जा सकते हैं। इससे हम समाधान के रास्ते पर होंगे। यह काम सरकार का नहीं है। यह हमारी पहुंच के अंदर है। हर गांव, हर स्कूल, हर कॉलोनी और हर एजेंसी को वर्षा जल संचयन में अपना योगदान देना होगा और हर बूंद का महत्व समझना होगा। हमें पानी की जरूरतों को न्यूनतम करना होगा। यह काम हम जरूर कर सकते हैं। शुरुआत हम पानी को बर्बाद न करके कर सकते हैं। हम पानी को बर्बाद होने से बचा सकते हैं। हमें पानी को दोबारा इस्तेमाल करने के समाधान पर काम करना चाहिए। रसोईघर, बाथरूम और बगीचों में पानी के कम से कम उपयोग के तरीकों को खोजना चाहिए। यह वैसा बिल्कुल नहीं है जो अक्सर हमारी पहुंच में होता है। गंदा पानी हमारे आधिकारिक सीवेज व्यवस्था से जुड़ा होता है जिसे हम इस्तेमाल करके भूल जाएंगे।

यह भी तथ्य है कि बहुत से घर जो तथाकथित रूप से सीवर तंत्र से जुड़े हैं, वे भी ऑनसाइट कलेक्शन सिस्टम पर निर्भर हैं। चाहे वह अच्छी तरह से डिजाइन किए गए सेप्टिक टैंक हों अथवा कूड़े को एकत्रित करने वाले बॉक्स। वे अब भी खुले में कचरा फेंकते और नाले में बहाते हैं। स्थानीय स्तर पर बेकार पानी को उपचार करने वाले तंत्र से जोड़ा जा सकता है। इससे पानी दोबारा इस्तेमाल करने लायक बन सकता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सबसे पहले हमें बेकार पानी को साफ पानी में तब्दील करना होगा।

कूड़े के साथ भी ऐसा ही है। अगर हम आकलन शुरू करें तो पता चलेगा कि हम कितना कचरा उत्पन्न करते हैं। हमें गीले कचरे को अलग-थलग करना होगा। हमें कचरे से खाने के छिलकों, पत्तियों और अन्य गलनशील कचरे को प्लास्टिक, कांच और धातू आदि से अलग करना सीखना होगा। इसके बाद ही हमें अपने कचरे की संरचना का पता चलेगा। यह जानने के बाद हम उसका प्रबंधन कर सकते हैं। जैविक घुलनशील कचरे को ऊर्जा बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही साथ प्लास्टिक, शीशे और धातुओं को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाया जा सकता है। इससे अहम बात यह है कि हमें यह जानकारी हो सकेगी कि किन पदार्थों से न गलने वाला कचरा उत्पन्न होता है। यह जानने के बाद हम उनके उपयोग में कमी लाने के प्रयास कर सकते हैं। यह हमारे हाथ में है।

इसके अलावा हमें अपनी ऊर्जा की जरूरतें कम करनी होंगी। सबसे पहले हमें अनावश्यक ऊर्जा की खपत कम करनी होगी और उसका कुशलता के साथ उपयोग करना होगा। इसके बाद घरों और संस्थानों में नवीन ऊर्जा स्रोतों की बिजली का उपयोग करने की दिशा में काम करना होगा। उदाहरण के लिए वर्षा जल, उपचारित सीवेज और कूड़े से बनी खाद का उपयोग सुनिश्चित करना होगा। ये छोटे-छोटे कदम संयुक्त रूप से बड़े कदम में तब्दील हो जाएंगे।

मैं सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) में काम करती हूं। हमने ग्रीन स्कूल कार्यक्रम तैयार किया है, जहां स्कूल पर्यावरण में बदलाव का उपदेश नहीं देते बल्कि उसका अभ्यास करते हैं। इससे अद्भुत बदलाव आ रहे हैं। इस कार्यक्रम में छात्र और शिक्षक सबसे पहले अपने स्कूल की पर्यावरण स्थिति की रिपोर्ट बनाते हैं। मिसाल के तौर पर स्कूल में कितना पानी है, उपयोग होने वाली ऊर्जा व वाहन और कितना कचरा व प्रदूषण उनके द्वारा होता है। इसके बाद वे अपने स्तर पर पर्यावरण फुटप्रिंट का समाधान करते हैं। ये सभी कदम निश्चित रूप से बदलाव ला रहे हैं। मैं मानती हूं कि अगर सभी स्कूल और घर काम करने की प्रयोगशाला बन जाए तो ऐसे बदलाव तेजी से फैलेंगे। हमें अपने जीवन से प्राप्त अनुभवों को आने वाली पीढ़ियों तक वक्त रहते पहुंचाना होगा। फिलहाल इसके लिए हमें बहुत लंबा सफर तय करना है।

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