Agriculture

किसान को देने होंगे गैर कृषि कार्यों के मौके, तब बढ़ेगी आय

डाउन टू अर्थ ने कृषि व कृषि शिक्षा की दशा पर देशव्यापी पड़ताल की। प्रस्तुत है, इस सीरीज की तीसरी कड़ी में सरदार पटेल इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक एंड सोशल रिसर्च के उपाध्यक्ष वाईके अलघ का लेख

 
By Y K Alagh
Last Updated: Wednesday 14 August 2019
Photo: Moyna
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इस साल की दूसरी तिमाही में दो प्राथमिकताएं अहम हैं। पहला, पीने के पानी और बिजाई की दृष्टि से खराब मॉनसून के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रिकवरी के लिए आर्थिक पैकेज और दूसरा निवेश बढ़ाने की बात है। आर्थिक नीति को महत्वपूर्ण मुद्दों की बात करनी चाहिए। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति ने ठीक ही कहा कि जीडीपी में परिवर्तन को लेकर अरविंद सुब्रह्मण्यम द्वारा की गई आलोचना नासमझी भरी है, क्योंकि पिछले काफी समय से जीडीपी और कुछ प्रभावित करने वाली वस्तुओं के बीच संबंधों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि उत्पादकता बढ़ रही है। जबकि इस तकनीक का इस्तेमाल आधी सदी पहले सोवियत अर्थव्यवस्था और मार्क्सवादी अवधारणा पर काम कर चुके आर्थिक विशेषज्ञ फ्रांसिस सेटन ने किया था, लेकिन आज के भारत में इसकी जरूरत नहीं है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से निकली वित्तमंत्री की वास्तविक प्राथमिकताएं क्या होंगी, इस पर अब तक उनके विचार सामने नहीं आए हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि वास्तव में देश का ग्रामीण क्षेत्र संकट में है। यहां पीने के पानी की कमी है। मौजूदा सिंचाई प्रणालियों में सुधार की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्र में वित्तीय हालात में सुधार करना होगा, इसमें ऋण अदायगी में अस्थायी छूट दी जा सकती है। सभी को पैसों की आवश्यकता होती है, खासकर प्रभावित राज्यों के पास पैसा नहीं है, हालांकि पंजाब और हरियाणा जैसे समृद्ध राज्य इससे प्रभावित नहीं होते हैं। पिछले दिनों हुई नीति आयोग की परिषद की बैठक में बताई गई प्राथमिकताएं सही हैं। लेकिन आयोग के पास आवंटन शक्तियां नहीं हैं। राज्यों को धन तो देना ही होगा, साथ ही यह विश्वास दिलाना होगा कि धन का आवंटन नियमों के तहत होगा, जैसा योजना आयोग के समय में होता था। धन आवंटन में राजनीतिक पक्षपात नहीं दिखना चाहिए।

रोजगार सृजन की दृष्टि से कृषि क्षेत्र पर ध्यान देना होगा। कुछ समय तक मनरेगा को अधिक धन की आवश्यकता होगी।

राजकोषीय घाटा भी वास्तविक मुद्दा है, जो बैंक दर और विनिमय दरों पर दबाव बनाता है। मेरा सुझाव है कि करों के माध्यम से संसाधन जुटाए जाएं और सरकारी व गैर-सरकारी क्षेत्रों के उपभोग में कटौती न की जाए। किसी को मुफ्त में न दिया जाए। चुनाव के बाद के पहले साल में कम से कम हमें ईमानदार रहना होगा। ग्रामीण क्षेत्र के पुनर्विकास के लिए हमें एक दीर्घकालिक नीति की जरूरत है।

सुधार कार्यक्रमों को क्षेत्र व शाखाओं के स्तर पर अलग-अलग लागू किया जाना चाहिए। सवाल है कि उर्जित पटेल, पनगढ़िया और अरविंद सुब्रह्मण्यम की छुट्टी क्यों हुई? जबकि ग्रामीण क्षेत्र के सुधार के लिए विशेषज्ञों के समूह की जरूरत है। पी.डी. ओझा, यशवंत थोरात और योगेश चंद्र सारंगी जैसे विशेषज्ञ यह भूमिका निभा चुके हैं, लेकिन हम अब ग्रामीण क्षेत्र में सुधार के लिए इस तरह की प्रतिभाओं का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। हमें भूमि का सही ढंग से कम्प्यूटरीकृत और उपग्रह आधारित रिकॉर्ड सिस्टम रखने के साथ सर्वेक्षण करना चाहिए। 2012 के एनएसएस राउंड में जिन समस्याओं का जिक्र किया गया था, उन्हें देखना चाहिए और इस मामले में गुजरात और कर्नाटक में सफलता की कहानियों को दोहराया जाना चाहिए। इसके लिए धन उपलब्ध कराया जाना चाहिए और भूमि सांख्यिकी को पुनर्जीवित करने के लिए केंद्रीय योजना को फिर से शुरू किया जाना चाहिए। मैंने इस बारे में सांख्यिकी आयोग को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है। नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद जैसे विशेषज्ञ इस प्रक्रिया की निगरानी कर सकते हैं।

हमें कृषि निर्यात से होने वाले लाभ को कम करने के प्रयासों में प्रतिस्पर्धा करनी होगी। इसके लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा विकसित करना होगा और वित्तीय प्रोत्साहन देना होगा।

जब हम आर्थिक नीतियों की बात अल्पावधि के लिए करते हैं तो सुधार पर कुछ अच्छे भाषण दे सकते हैं, लेकिन जब हमें सरकार की नीतियों को अंतिम छोर तक पहुंचाने की बात होती है तो इसे विश्व व्यापार संगठन की दृष्टि से देखना चाहिए। इस बजट को भी इसी दृष्टि से आंका जाएगा।

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गुजरात के अनुभव से पता चलता है कि उच्च स्तर पर उत्पादन बढ़ाने से आर्थिक विकास दर तो बढ़ जाती है, लेकिन इससे कृषि पर निर्भर कार्य बल कम हो जाता है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में 12 फीसदी की वृद्धि और रोजगार समानुपाती दर 0.25 रहने के बावजूद रोजगार में 3 फीसदी वृद्धि होती है, जो कुल कार्य बल की वृद्धि दर का दोगुना है। रोजगार रहित विकास को हमने ही बढ़ावा दिया है। किसी भी विकास योजना में कृषि को गैर-कृषि विकास के साथ जोड़ा जाना चाहिए। मेरी किताब ‘द फ्यूचर ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर’ में इसका उदाहरण दिया गया है। जिसमें कहा गया है कि कृषि को गैर कृषि विकास के साथ एकीकरण करने से सबसे गरीब भारतीय की आय में 20 फीसदी की वृद्धि हो सकती है।


(लेखक सरदार पटेल इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक एंड सोशल रिसर्च के उपाध्यक्ष हैं)

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