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जल संकट का समाधान: एक-एक बूंद की कीमत जानता है यह गांव

गांव के लोग अपने प्रयासों से पानी की एक-एक बूंद को सहेज कर रखते हैं। यहां न कुएं सूखे हुए हैं और न तालाब  

 
Last Updated: Monday 01 July 2019
भीषण गर्मी के मौसम में इस तालाब में पानी कम नहीं हुआ है। फोटो: प्रियंका पांडेय
भीषण गर्मी के मौसम में इस तालाब में पानी कम नहीं हुआ है। फोटो: प्रियंका पांडेय भीषण गर्मी के मौसम में इस तालाब में पानी कम नहीं हुआ है। फोटो: प्रियंका पांडेय

प्रियंका पांडे 

इस गांव का का नाम जखनी है, जो बुंदेलखंड के बांदा जिले के महुआ ब्लॉक के अंतर्गत आता है। वैसे तो पूरा बुंदेलखंड पानी के लिए तरस रहा है, लेकिन इस गांव में पानी ही पानी है। जखनी गांव में 32 कुएं हैं। जिनमें पर्याप्त पानी है। यहां 25 हैंडपंप हैं। खास बात यह है कि जहां अन्य इलाकों में इस समय जून के तपते महीने में हैंडपंपों ने पानी देना बंद कर दिया है तो वहीँ इस गांव के सभी हैंडपंप पानी दे रहे हैं। साथ ही, यहाँ 6 तालाब हैं जिनमें से 4 में पानी है। बाकी 2  में इस समय साफ सफाई का काम किया जा रहा है। और और तो और यहाँ के कुओं में 8 फुट में ही पानी है। 

पानी को बर्बाद होने से बचाने के लिए यहाँ के लोगों के मन में सोच लगभग 7-8 साल पहले पैदा हुआ। जल संरक्षण और जल संचयन ध्यान में रखते हुए यहाँ के कुछ लोगों ने मिलकर सर्वोदय आदर्श जल ग्राम स्वराज अभियान समिति का गठन किया। सर्वोदय आदर्श जल ग्राम स्वराज अभियान समिति के संयोजन उमाशंकर पांडेय ने बताया कि गाँव के घरों से निकलने वाले और हैण्डपों से नालियों में बहने वाला पानी बर्बाद न हो इसके लिए इन्होंने इस पानी को खेतों की और मोड़ दिया और जब यह पानी खेतों की ओर मुड़ गया तो बिना खर्च के ही यह सिंचाई का साधन बन गया, जिससे लोग अपने खेतों में सब्जियों का उत्पादन करने लगे। और आज यहाँ के लोग सब्जियों का उत्पादन कर भी पैसे कमा रहे हैं।

Photo: Priyanka Pandey

इसके पीछे सोच यह थी कि गांव का पानी गांव में ही रहना चाहिए। जल संरक्षण के परम्परागत तरीके अजमाए गए। नालियों से बहने वाले पानी को तालाबों में गिराया जाता है जिससे यहां पानी की एक बूंद भी बर्बाद नहीं जाती। वहीँ, यहां पूरे गांव के खेतों में मेड़बंदी कराई गयी जिससे वर्षा का पानी बरसात के समय काफी मात्रा में खेतों में जमा हो जाता है जो भूगर्भ जल स्तर को बनाये रखने में काफी सहायक होता है, वहीं वर्षा का पानी जो खेतों से बहता है उसे तालाबों में संरक्षित कर लिया जाता है, जिससे साल भर मवेशियों में पीने के पानी के साथ साथ लोगों के उपयोग में भी यह पानी आता है।

वहीं, कुछ तालाबों में मछली पालन भी किया जाता है। और अब इलाके के कई गांव के लोग भी परम्परागत तरीके से जल संरक्षण का काम कर रहे हैं। उमाशंकर पांडेय ने ये भी बताया कि गांव के नौजवान जो पलायन कर गए थे। अब वो पढ़े लिखे लोग वापस गांव आकर यहां खेती कर रहे हैं।  

इस गांव की रहने वाली महिला शांति बताती हैं कि नालियों का पानी खेतों की ओर मोड़ने के बाद सब्जियों की पैदावार बढ़ी है और वह अच्छा मुनाफा पा रही हैं। साथ ही, वह साल भर अपने खुद के खाने के लिए भी भरपूर सब्जी पैदा कर लेती हैं। इसी गांव के रहने वाले अली मोहम्मद ने बताया कि लगभग 8 साल से वो पानी को संरक्षित करने का काम कर रहे हैं पहले उन्होंने खेतों में मेड़बंदी कराई और फिर गांव से निकलने वाले गंदे पानी वो लोग तालाबों और खेतों में ले जाते है जिससे यहाँ पानी की कोई कमी नहीं है। 

तमाम सरकारें आई और गई पर बुंदेलखंड का जल संकट जस का तस है। बुंदेलखंड पैकेज के तहत हजारों करोड़ रुपए दिए गए।  जिसमें 40 हजार कुओं, 30 हजार तालाबों को भरने व 2 लाख हेक्टेयर जमीन पर पौधरोपण, 11 लाख हेक्टयर जमीन को सिंचित करने का दावा किया गया था। तमाम भरी भरकम सरकारी योजनाओ के बावजूद बुंदेलखंड पानी को तरस रहा है। वहीं, इस गांव के इन चंद लोगों ने बिना किसी सरकारी मदद से तस्वीर ही बदल दी। ग्रामीणों ने गांव स्तर पर ही सर्वोदय आदर्श जलग्राम स्वराज समिति की स्थापना कर रखी है। चंदे से जुटाई धनराशि व आपसी सहयोग से जखनी गांव के ग्रामीणों ने वो कर दिखाया, जो करोड़ों रूपए खर्च करके भी नहीं हो पाया। इनके प्रयास को देखते हुए जखनी गांव को जलग्राम का नाम दिया गया है।

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