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झारखंड: न गेहूं की कटाई शुरू हुई न धान का पैसा मिला

झारखंड के 80 फीसदी हिस्से में एक फसलीय खेती होती है, इसलिए किसान धान ज्यादा लगाते हैं, लेकिन धान उत्पादक हो या गेहूं, दोनों को ही लॉकडाउन का सामना करना पड़ रहा है

On: Monday 20 April 2020
 

झारखंड में अभी धान की खरीद चल रही है। फोटो: आनंद दत्ता

आनंद दत्त

लाॅकडाउन के चलते झारखंड के ज्यादातर इलाकों में गेहूं की कटाई शुरू नहीं हो पाई है। वहीं, किसानों की दिक्कत यह है कि उन्हें अब तक चार माह पहले बिके धान का पैसा भी नहीं मिल पाया है। 

झारखंड में सिंचाई की सुविधा बहुत कम हैं, इसलिए कुल कृषि भूमि के 80 प्रतिशत हिस्सों में एक फसलीय खेती होती है। और किसान धान के मुकाबले गेहूं की खेती कम करते हैं। राज्य में अभी भी धान की खरीद हो रही है। लेकिन जिन लोगों ने गेहूं की खेती की थी, फरवरी-मार्च की बारिश ने फसल को काफी नुकसान पहुंचाया और जो बच गई है। लॉकडाउन की वजह से किसान गेहूं की कटाई तक नहीं कर पा रहे हैं।

रांची जिले के कांके प्रखंड के किसान राजेंद्र मुंडा के तीन एक खेत में गेहूं की फसल लगी है. हाल ही में हुए बारिश में लगभग एक एकड़ की फसल बर्बाद हो चुकी है. बचे हुए फसल को खुद ही परिजनों के साथ मिलकर काट रहे हैं. यही हाल ओखरागढ़ गांव के रेयाज अहमद का है. अर्जुन पाहन के फसल पर भी मौसम की मार पड़ी है. बचा हुआ गेहूं अब उन्होंने अपने खाने के लिए रख लिया है। लातेहार जिले के परहाटोली गांव के जेरका नगेसिया बताते हैं कि कोरोनावायरस के डर के कारण तैयार गेहूं की फसल काट नहीं पा रहे हैं और फिर बारिश ने अलग नुकसान पहुंचाया है। महामारी के डर से मजदूर भी काम करना नहीं चाहते हैं, अकेले कैसे कटाई करे। गांव में लोग एक दूसरे पर निर्भर होते हैं, लेकिन फिलहाल सबको अपने-अपने खेत की चिंता है। 

डूमरडीह के प्रीतम नगेसिया का कहना है कि फरवरी-मार्च में हुई बारिश से एक एकड़ में लगाया गया गेहूं काफी खराब हो गया, जो बच गया है, उसे काट नहीं पा रहे हैं। थोड़ी बहुत सब्जी लगाई थी, लॉकडाउन की वजह से यह भी बिक नहीं पा रही है। 

धान का पैसा नहीं मिला

रामगढ़ जिले के दुलमी प्रखंड के किसान श्रीकांत महतो ने बताया कि उन्होंने 37 क्विंटल धान बेचा है। चार महीना हो चुके हैं, लेकिन अभी तक एक रुपया नहीं मिल पाया है। केवल दुलमी प्रखंड में ही 400 से अधिक किसानों के खाते में पैसा नहीं गया है। जिनके खाते में पैसा पहुंच भी गया है। वे लॉकडाउन की वजह से पैसा निकाल नहीं पा रहे हैं, क्योंकि उनके ब्लॉक में एक भी सरकारी बैंक नहीं है।

उनके मुताबिक जिन कुछ किसानों को पैसा मिला भी है, उनके घर बैंक की दूरी 10 से 20 किलोमीटर है। लॉकडाउन में वो निकल नहीं पा रहे हैं, जिस वजह से पैसा भी नहीं निकाल पा रहे हैं।

दुलमी के ही प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसायटी (पैक्स) अध्यक्ष विनय सिन्हा ने बताया कि सरकारी आंकड़ों में दिखा दिया कि उनके इलाके के 99 किसानों के खाते में पैसा चला गया, लेकिन जब उन्होंने बैंक स्टेटमेंट निकाली तो पता चला कि 46 के खाते में ही गया है। पूछने पर सरकारी अधिकारी कहने लगे कि ऐसा क्यों हुआ उन्हें नहीं पता।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 26,760 किसानों का पेमेंट अभी तक नहीं हो पाया है, लेकिन यह आंकड़ा बढ़ सकता है।

ये वो वर्ग है जिसके पास किसी अन्य तरह की सरकारी सहायता नहीं मिलती है। ऐसे में, उसका फसल ही उसके जीने खाने का एकमात्र उपाय है। अर्जुन पाहन को सरकारी धान खरीद के बारे में जानकारी ही नहीं थी. उन्होंने 50 क्विंटल से अधिक धान मात्र 14 रुपए प्रति किलो की दर से बेच दिया, जबकि सरकार 20 रुपए प्रति किलो की दर से खरीदती है।

बायर क्रॉप साइंस कंपनी में खूंटी जिले के फील्ड ऑफिसर निखिल मिश्रा ने बताया कि कर्रा ब्लॉक 60 टन से ज्यादा बीज बिकता है, लेकिन सरकार को बेचने वाले किसी भी किसान को अब तक पैसा नहीं मिला है। जिले के रौशन केसरी ने बताया कि उन्होंने तीन एकड़ और उनके भैया ने 15 एकड़ में धान उपजाया था, लेकिन सरकार को नहीं बेचा, क्योंकि पेमेंट तीन महीने तक नहीं मिलती है। पांच रुपए किलो के घाटे में अब प्राइवेट को ही वो बेचने जा रहे हैं।

अब सवाल ये है कि किसानों को पैसा अब तक मिलने के लिए जिम्मेवार कौन है? राज्य खाद्य निगम (एसएफसी) के जनरल मैनेजर रामचंद्र पासवान कहते हैं ‘’फसल खरीद प्रक्रिया अभी चल रही है यह 30 अप्रैल तक चलेगी. जहां तक किसानों के पेमेंट में देरी की बात है, इसमें देरी हुई है, लेकिन एक हफ्ते पहले ही मुख्य सचिव की ओर जिलों को पत्र लिखा गया है कि जल्द-से-जल्द पेमेंट कर दिया जाए। अगर किसानों को नहीं मिला है तो इसकी जानकारी मुझे नहीं है। जिलाधिकारी से जाकर पूछिए।’’ 

राज्य में कुल एमएसपी 328 हैं. धान खरीद की नोडल एजेंसी राज्य खाद्य निगम (एसएफसी) ने 137634 लाख किसानों की सूची बनाई थी जिनसे धान खरीदना था. कुल लक्ष्य 30 लाख क्विंटल का रखा गया था. जिसमें दावों के मुताबिक 24 लाख क्विंटल से अधिक धान की खरीददारी हो चुकी है. झारखंड सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक 19 अप्रैल तक 1,64,59,90,454 रुपए किसानों को धान खरीद के बदले दिए जा चुके हैं. जबकि सरकार की ओर से बैंकों को 1,94,28,57,934 पैसे भेजे जा चुके हैं. यानी 29,68,67,480 रुपए अभी भी बैंक में ही रखे हुए हैं जो किसानों को दिया जाना है.

झारखंड में 185 रुपए बोनस के साथ धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2000 रुपए है। बीते फरवरी माह में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के साथ पूर्वी राज्यों की बैठक हुई थी. बैठक में न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाकर 2784 रुपए करने की मांग हुई थी, लेकिन इस पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया जा सका है।