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कैश के लिए किसानों की मजबूरी बने खुले बाजार, चिंता में डूबे यूपी-बंगाल के कोल्डस्टोर मालिक

यूपी में 2,000 कोल्ड स्टोरेज हैं जिनमें अभी तक 50 फ़ीसदी ही आलू पहुंच पाया है

By Vivek Mishra

On: Monday 13 April 2020
 
फोटो: मीता अहलावत
फोटो: मीता अहलावत फोटो: मीता अहलावत

"2019 में तो खेती से कुछ फायदा नहीं मिला था। बारिश के कारण आलू की फसल खराब हो गई थी और आलू-प्याज भाव भी काफी नीचे चला गया था। इस वर्ष से लागू हुए देशव्यापी लॉकडाउन का हमारे यहां स्थानीय खुले बाजारों पर असर नहीं पड़ा बल्कि उल्टे मुझे बीते वर्षों के मुकाबले आलू-प्याज का अच्छा दाम मिल गया। कुछ लेबरों की कमी हो गई थी जिससे प्याज को खेतों से निकालकर स्थानीय बाजार तक पहुंचाने में बड़ी तकलीफ हुई। ज्यादातर के आलू तो बाजार तक पहुँच गए लेकिन लेबर की कमी के चलते अभी गांव के कई खेतों के बाड़े में प्याज रखे हैं। "
 
हुगली के बालागढ़ ब्लॉक निवासी बिकास मौलिक ने डाउन टू अर्थ से यह बात कही। उन्होंने बताया कि इस बार स्थानीय बाजार में ही आलू-प्याज बेच दिया। एक बीघा खेत मे 50 किलो प्रति बैग वजन वाले 40 से 45 बैग आलू के मिल गए। इसी तरह से करीब 40 किलो वजन वाले 40 प्याज के बैग एक बीघा से हासिले हुए। 40 किलो वाले प्याज के प्रति बैग का थोक भाव करीब 600 रुपये प्रति बैग मिला, जबकि लॉकडाउन से पहले प्रति बैग का थोक भाव 350 रुपये से लेकर 400 रुपये का ही था। वहीं, एक किलो प्याज का स्थानीय बाजार में खुदरा भाव 40 रुपये है। जबकि उन्हें करीब 15 से 16 रुपए प्रति किलो ही मिला। 
 
बिना श्रमिक और पाबंदियों के कारण किसानों का कोल्डस्टोरेज पहुँच पाना मुश्किल हो गया। वहीं खुले बाजारों के प्रति बढ़ते झुकाव ने यूपी और पश्चिम बंगाल में कोल्ड स्टोरेज मालिकों का सरदर्द बढ़ा दिया है। कोल्ड स्टोरेज मालिकों का कहना है कि हुगली और आस-पास की जगहों से करीब 80 फीसदी ही आलू अब तक स्टोरेज पहुंच पाया है। ऐसा अनुमान है कि श्रमिकों की कमी की वजह से यह आलू करीब दो महीने तक अभी कोल्डस्टोरेज से किसान निकाल नहीं पाएंगे। 2 महीने बाद आलू सप्लाई की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 
 
यूपी में करीब 50 फीसदी खाली हैं स्टोरेज
 
फेडरेशन ऑफ कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन ऑफ इंडिया के पूर्व प्रेसिडेंट 83 वर्षीय महेंद्र स्वरूप ने डाउन टू अर्थ से कहा " मैंने 1945 में खत्म हो रहे द्वितीय विश्वयुद्ध को देखा है तब भी ऐसे हालात नहीं थे, जैसे आज हैं। मौजूदा व्यवस्था में एक अविश्वास पैदा हो गया है और  ज्यादातर लोग कोल्ड स्टोरेज में पैसा लगाना नहीं चाह रहे हैं।" 
 
उन्होंने बताया कि यूपी में 2,000 कोल्ड स्टोरेज हैं जिनमें अभी तक 50 फ़ीसदी ही आलू पहुंच पाया है। इस वक्त घरों में आलू की खपत काफी ज्यादा हो गई है लिहाजा या तो किसानों ने आलू अपने घरों में ही रखा हुआ है या फिर वह खुले बाजारों में उन्हें बेच रहे हैं। फरवरी के अंत तक आलू आना शुरू हो जाता था लेकिन इस बार लगातार होती रही बारिश के कारण किसान कोल्ड स्टोरेज तक मार्च के पहले और दूसरे हफ्ते तक भी नहीं पहुंच पाए। जब आना शुरू हुआ तब तक देश में लॉक डाउन की स्थिति हो गई और अभी तक बहुत कम आलू पहुंच पाया है। निश्चित ही जून-जुलाई में आलू को लेकर मारा-मारी मचे। 
 
हुगली के नालीकुल में स्थित एक कोल्ड स्टोरेज ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आलू स्टोरेज तक आया तो जरूर है लेकिन श्रमिकों की भारी कमी है। ऐसे में किसानों को यहां से आलू उठाने में काफी परेशानी होगी। यदि किसान ज्यादा माल खुले बाजार में ही बेच देंगे तो कोल्ड स्टोरेज और आगे बाजार प्रभावित होंगे। 
 
पश्चिम बंगाल कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन के तरुन शांति घोष ने कहा कि अभी तक स्टोरेज में 80 फीसदी आलू स्टोर हुआ है। यह पिछले समान अवधि की तुलना में करीब 8 फीसदी कम है। श्रमिक न होने से ऐसी मुसीबत आई है, राज्य सरकार मदद करेगी तो आगे बाजार पर असर नहीं होगा। 
 
नेशनल हॉर्टीकल्चर बोर्ड के मुताबिक देश में कुल आलू उत्पादन का 75 फीसदी कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता है। देश में 5 फीसदी सरकारी और सामुदायिक कोल्डस्टोरेज के साथ ही 95 फीसदी निजी कोल्ड स्टोरेज 75 फीसदी हॉर्टीकल्चर उत्पादों का ही भंडारण क्षमता रखते हैं। 
 
पश्चिम बंगाल में हुगली वेजिटेबल्स ग्रोवर्स प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड के प्रबंधनिदेशक सुब्रत कर्मकार ने कहा कि उनसे हुगली के 1024 छोटी जोत (एक एकड़ के आस-पास वाले) वाले किसान सम्बद्ध हैं। यह किसान मुख्य रूप से आलू और प्याज की पैदावार करते हैं। लॉकडाउन से पहले ही मार्च के पहले हफ्ते तक आलू को कोल्ड स्टोरेज में पहुंचा दिया गया था। इसके बाद जैसे ही 25 मार्च को लॉकडाउन शुरू हुआ बड़ी संख्या में मजदूर अपने-अपने राज्यों या घरों की ओर पलायन कर गए। किसानों के आलू कोल्ड स्टोर में ही रखे हुए हैं। हमारे पास दो महीने का स्टॉक बचा हुआ है जिससे हम आलू को बाजार तक पहुंचा रहे हैं। यदि दो महीने के भीतर हालात नहीं सुधरते हैं तो बड़ा संकट हो सकता है। 
 
इस बार बुलबुल तूफान के चलते आलू की पैदावार देर से हुई थी और कोल्ड स्टोरेज में भंडारण भी देर से शुरु हुआ। 10 मार्च के करीब आलू कोल्ड स्टोरेज पहुंचना शुरू हुआ वहीं कोलकाता में करीब 450 कोल्ड स्टोरेज हैं जिन्हें भरने में करीब 20 से 25 दिन लगता है। हर वर्ष आलू की पैदावार करने वाले किसान इनमें अपने खर्चे पर अच्छे दाम की उम्मीद से भंडारण कर देते हैं। लेकिन इस बार लॉकडाउन के कारण यह प्रक्रिया टूट गई। कुछ किसान कोल्ड स्टोरेज पहुंचने के बजाए स्थानीय बाजारों या बिचौलियों को ही आलू टुकड़ों में बेच रहे हैं। 
 
 
बांग्लादेश करना था निर्यात 
सुब्रत कर्मकार ने बताया कि लॉकडाउन के चलते सबसे ज्यादा खराब हालत प्याज की है। जो भी नया प्याज तैयार हुआ है वह अभी खेतों के बाड़े में ही पड़ा है। जबकि हम पुराने प्याज के स्टॉक से काम चला रहे हैं। नया प्याज ज्यादा से ज्यादा 15 से 20 दिन ही बचाया जा सकता है। इसे बचाने के लिए हमें अतिरिक्त लगत लगानी पड़ रही है। इससे हमें प्याज की असली कीमत नहीं मिल पाएगी। करीब 35 से 40 रुपये किलो बाजार भाव वाले प्याज को किसान 10 से 15 रुपये प्रति किलो बेचने पर मजबूर हैं। लॉकडाउन लगते ही लेबर की कमी हो गई और प्रति बीघा कम से कम 10 लेबर की जरूरत है। कुछ लेबर रुक गए थे लेकिन बाद में वही चले गए। प्याज पूरी तरह से हार्वेस्ट नहीं हो पाया। 
 
हुगली का आधे से ज्यादा प्याज बांग्लादेश निर्यात होता है। उत्तर 24 परगना और नदिया जिले के कुछ सीमावर्ती इलाकों से यह प्याज बांग्लादेश पहुंचाया जाता है लेकिन लॉकडाउन के चलते प्याज का निर्यात नहीं हो पा रहा है। साथ ही असम, बिहार और झारखंड के बाजारों में भी हमारा माल नहीं जा रहा है। इस लॉकडाउन में सबसे ज्यादा नुकसान प्याज का हो सकता है, जिसका सीधा असर छोटे किसानों पर पड़ने वाला है। कर्माकर ने बताया कि उनके यहां पंजीकृत किसानों के जरिए 500 एकड़ में प्याज की खेती हुई। 
 
महेंद्र स्वरूप ने बताया कि देश में प्याज भंडारण के लिए अभी तक कोई खास व्यवस्था नहीं हो पाई है क्योंकि प्याज कोल्ड स्टोरेज में नहीं रखे जा सकते। यदि प्याज कोल्ड स्टोरेज में रखे जाते हैं तो वे जल्दी ही सड़ सकते हैं। ऐसे में प्याज ज्यादातर खुले बाजारों की तरफ जा रहे हैं।  
 
बंपर पैदावार, करीब 5 लाख मजदूर प्रभावित 
 
आलू पैदावार के मामले में सर्वाधिक उत्तर प्रदेश और दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल फिर बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश का स्थान है। यह पांचो राज्य कुल आलू पैदावार में करीब 75 फीसदी की हिस्सेदारी करते हैं। कृषि मंत्रालय के मुताबिक 2019-20 में आलू के कुल उत्पादन का पहला एडवांस अनुमान 519.47 लाख टन है। 
लॉकडाउन के चलते देेेश के विभिन्न किसानों व फार्मर प्रोड्यूसर कंपनियों और संगठनो से बातचीत के मुताबिक आलू की खेती और कोल्ड स्टोरेज से जुड़े 5 लाख से ज्यादा मजदूर उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के प्रभावित हुए हैं।