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किसानों को सब्सिडी नहीं, सही कीमत दिलाना चाहते थे महेंद्र सिंह टिकैत

जब देश कृषि संकट से जूझ रहा है तो किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की बातों में समाधान ढ़ूंढ़ने की कोशिश की जा सकती है। 

By DTE Staff

On: Saturday 25 May 2019
 

देशज व गंवई किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत अपनी असाधारण राजनीति से राजधानी दिल्ली को झुकने के लिए मजबूर कर देते थे। वे अब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन ऐसे समय में जब देश कृषि संकट से जूझ रहा है, उनकी बातों में समाधान ढ़ूंढ़ने की कोशिश की जा सकती है। इसी के चलते डाउन टू अर्थ अपनी मैगजीन के 1-15 अक्टूबर 2008 अंक में छपे महेंद्र सिंह टिकैत के साक्षात्कार को पुनप्रर्काशित कर रहा है। पढ़ें, इस साक्षात्कार का दूसरा भाग-

डाउन टू अर्थ: क्या सरकार ने कभी किसानों से बातचीत की?

टिकैत: सरकार ने कृषि नीतियां बनाते वक्त कभी भी किसान यूनियन से विचार-विमर्श नहीं किया। हालांकि अलग-अलग किसान संगठनों से थोड़ा बहुत सहयोग लिया जाता है। कृषि मंत्री (तत्कालीन) शरद पवार ने कई किसानों को सरकार से बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन उनमें से कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट हैं। हाल ही में कुछ किसान नेताओं ने कीटनाशक कंपनियों के प्रतिनिधि के साथ मंच साझा किया। शरद जोशी, ने हाल ही में एग्रो कंपनी के अधिकारियों के साथ से बैठक की है। कृषि मंत्री ने बताया कि कुछ किसान नेता स्वयं भू हैं, जो हमारे खिलाफ हैं। उन नेताओं के विचार किसानों के खिलाफ हैं और सच्चा किसान चाहता है, वे उसका विरोध करते हैं। ऐसी स्थिति में क्या किया जा सकता है।

डाउन टू अर्थ: विश्व व्यापार संगठन में दोहा समझौतों पर आपका क्या कहना है?

टिकैत: मैं कुछ समय तक यूरोप में रहा हूं। उनकी सरकारें अपने किसानों को बंजर भूमि के लिए सब्सिडी देती है। उन देशों से हम तुलना करें तो हमारे किसानों को कुछ भी सब्सिडी नहीं मिलती। हालांकि हमें सब्सिडी नहीं चाहती, किसान को केवल उसकी फसल की सही कीमत दे दो। ऐसी स्थिति में किसी भी तरह की बात से हमारी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

हाल ही में जिनेवा में हुई डब्ल्यूटीओ की मिनिस्ट्रियल मीटिंग में निर्णय लिया गया कि भारत के बाजार को दूसरे देशों के कृषि उत्पादों के लिए खोल दिया जाएगा। यह फैसला चीजों को खत्म कर देगा। सोचिए, अगर दूसरे देशों से गन्ना आने लगेगा तो हमारा गन्ना किसान क्या करेगा? अगर हम बाहर से गेहूं मंगाने लगेंगे तो हमारे देश का गेहूं किसान का क्या करेगा, हमारे धान किसानों का क्या होगा?

डाउन टू अर्थ: दूसरे विकसित देशों के मुकाबले हमारे किसानों को दी जा रही सब्सिडी के बारे में आपका क्या कहना है?

टिकैत: मुझे समझ नहीं आता कि सरकार का सब्सिडी से क्या मतलब है, मुझे बताइए, यहां सब्सिडी कौन ले रहा है?

डाउन टू अर्थ: अगले सीजन के लिए बीज रखने का विकल्प क्या है?

टिकैत: यह किसानों को पूरी तरह से बीज कंपनियों पर निर्भर कर देगा। पहले किसान बीज को अगले सीजन के लिए रख लेता था। क्या हमारे पास देश के वैज्ञानिक हैं? उन्हें बीज विकसित करने चाहिए, जिन्हें एक से ज्यादा सीजन तक इस्तेमाल किया जा सके।

डाउन टू अर्थ: पारंपरिक खेती के बारे में आप क्या कहते हैं?

टिकैत: कम से कम इससे हम अपनी पारंपरिक खाने की आदत को फिर से बना सकते हैं और बार-बार डॉक्टर के पास जाने से बच सकते हैं। पारंपरिक खेती गाय के गोबर पर आधारित थी, गौमूत्र हमारी कई समस्याओं का समाधान कर सकता है, लेकिन इस तरह के फायदों के लिए जानवर हैं ही कहां हमारे पास? ज्यादातर पशुओं को बूचड़खानों में भेजा ज रहा है।

डाउन टू अर्थ: पारंपरिक खेती से उत्पादन कम होता है?

टिकैत: पारंपरिक खेती से उत्पादन कम होगा, लेकिन हमारी लागत में भी काफी कमी आ जाएगी, जिससे किसानों के लिए खेती करना काफी फायदेमंद होगा।

डाउन टू अर्थ: मजदूरी की बढ़ती दर के बारे में आपका क्या कहना है?

टिकैत: वे मजदूरी नहीं बढ़ाते। इन दिनों 80 और 120 रुपए के बीच में है। लेकिन अर्थशास्त्र पूरी तरह बदल गया है। लगभग 40 साल पहले किसान मजदूरों को अनाज का हिस्सा दे दिया करते हैं। जिसमें मजूदर कुछ हिस्से अपने खाने के लिए रख लेता था, बाकी अनाज बाजार में बेच देता था, जिससे वह अपने बाजार की दूसरी जरूरतों को पूरा करता था।

लेकिन आजकल हम उन्हें केवल पैसा देते हैं, क्योंकि अब मजदूर अनाज लेने से इंकार कर देता है, क्योंकि जब अनाज लेकर वह बाजार में बेचने जाता है तो उसे इतना पैसा नहीं मिलता कि जिससे वह अपना परिवार चला सके, लेकिन किसान को वही फसल बेचकर मजदूर को मजदूरी देनी होती है।

डाउन टू अर्थ: बीटी बैंगन और बीटी टमाटर व बीटी पपीता के बारे में क्या कहना है?

टिकैत: हम इन सब्जियों के फायदे-नुकसान के बारे में नहीं जानते। हम इन सब्जियों का बीज अगले सीजन के लिए नहीं रख सकते तो फिर कैसे इससे किसानों को फायदा होगा?

डाउन टू अर्थ: पश्चिमी देशों में खेती भारत के मुकाबले अधिक फायदेमंद क्यों है?

टिकैत: पश्चिम में, किसानों को कई तरह की सुविधाएं दी जाती हैं। उदाहरण के लिए, सिंचाई की फव्वारे प्रणाली, हमारे किसानों के पास इस तरह की टैक्नोलॉजी के लिए पैसे नहीं हैं। यहां तक कि इन दिनों भी देश के कई हिस्सों में सिंचाई के लिए पानी नहीं है। किसानों के लिए बिजली नहीं है। इसलिए बीज खरीदने के लिए जो पैसा खर्च होना चाहिए, उसे सिंचाई पर खर्च किया जा रहा है। हर कोई उत्पादकता की बात करता है, लेकिन बिना पानी के कुछ भी नहीं किया जा सकता।

डाउन टू अर्थ: भारत के किसानों और कृषि के भविष्य के बारे में आपका क्या मानना है?

टिकैत: यह पूरी तरह से अंधेरे में है। आज सरकार उद्योग लगाने के लिए उपजाऊ कृषि भूमि का अधिग्रहण कर रही है, वह भी काफी सस्ते दाम पर। मैं उद्योगों के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन उपजाऊ जमीन पर उद्योग नहीं लगाए जाने चाहिए। उद्योग केवल बंजर जमीन पर ही लगाए जाने चाहिए।

इस साक्षात्कार का पहला भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें : टिकैत की ये बातें मान लेती सरकारें तो नहीं होता कृषि संकट