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बजट 2020-21: यूरिया की सब्सिडी सीधा बैंक खाते में!

यूरिया का उपयोग सीमित करने और जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार बजट में कर सकती है घोषणा

By Jitendra

On: Friday 31 January 2020
 
Credit: Vikas Chaudhary
Credit: Vikas Chaudhary Credit: Vikas Chaudhary

केंद्र सरकार 1 फरवरी को पेश होने वाले बजट 2020-21 में यूरिया की सब्सिडी सीधा बैंक खाते में ट्रांसफर करने की घोषणा कर सकती है। उच्च पदस्थ सूत्र ने डाउन टू अर्थ को यह जानकारी दी है।

अभी 45 किलो के यूरिया का एक कट्टा 266.50 रुपए का पड़ता है। बिना सब्सिडी यह 450 रुपए का पड़ेगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि सरकार ने तय किया है कि वह 183.50 रुपए की सब्सिडी सीधा किसानों के बैंक खाते में ट्रांसफर करेगी। यह खाता बायोमीट्रिक आधार नंबर से जुड़ा होगा। 1 फरवरी को आम बजट में इसकी आधिकारिक घोषणा की जाएगी।  

यूरिया उत्पादक कंपनी के एक प्रबंधक ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि यह व्यवस्था एलपीजी सब्सिडी की तर्ज पर होगी। गैस सिलिंडर लेते समय उपभोक्ता को पहले पूरा पैसा देना होता है और बाद में सब्सिडी बाद में खाते में ट्रांसफर की जाती है। अब यही व्यवस्था यूरिया की सब्सिडी में अपनाई जाएगी।  

अधिकारी का कहना है कि सरकार यूरिया को खपत को नियंत्रित करने और जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने के लिए यह कदम उठाने जा रही है। केंद्र सरकार ने उर्वरक सब्सिडी के तौर पर 2018-19 में 73,000 करोड़ रुपए दिए थे।

यूरिया की खपत  

केंद्र सरकार ने यूरिया को खपत को सीमित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। जैसे, सरकार ने यूरिया का उपयोग अवैध गैर कृषि कार्यों में रोकने के लिए नीम कोटेट यूरिया की शुरुआत की थी। सरकार ने जैविक और जीरो बजट खेती के लिए भी यूरिया का उपयोग सीमित करने की पहल की है। लेकिन यूरिया के अत्यधिक उपयोग के कारण ये उपाय कारगर साबित नहीं हो पा रहे हैं। यह तथ्य आंकड़ों से भी स्पष्ट होता है।

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, देश में यूरिया का उपभोग 2015-16 में 29.95 मिलियन टन जो 2018-19 में बढ़कर 31.55 मिलियन टन पर पहुंच गया है। यूरिया का घरेलू उत्पादन लगभग स्थिर है लेकिन इसका आयात 38 प्रतिशत बढ़ गया है। इस अवधि में यूरिया का आयात 5.48 मिलियन टन से बढ़कर 7.6 मिलियन टन हो गया है।

भारत में मिट्टी की गुणवत्ता का क्षरण चिंता की एक बड़ी वजह है। भूमि क्षरण का राष्ट्रीय डेटाबेस बताता है कि भारत में 120.7 मिलियन हेक्टेयर (36.7 प्रतिशत भूमि) कृषि एवं गैर कृषि भूमि विभिन्न प्रकार के क्षरण से प्रभावित है। इस क्षरण में जल अपरदन से 83 मिलियन हेक्टेयर (68.4 प्रतिशत) जमीन प्रभावित है।

मिट्टी की गुणवत्ता लंबे समय तक उर्वरकों के इस्तेमाल से भी प्रभावित होती है। पंजाब और हरियाणा में नाइट्रोजन (यूरिया) का आठ गुणा अधिक इस्तेमाल होता है। 2014-15 में इन दोनों राज्यों में 306 मिलियन टन यूरिया का इस्तेमाल हुआ। जबकि इस अवधि में देशभर में 485 मिलियन टन उर्वरक का प्रयोग हुआ था।

फर्टिलाइजर असोसिएशन की 2017 में जारी रिपोर्ट भी स्पष्ट रूप से बताती है कि पिछले तीन दशकों में खेती में माइक्रो न्यूट्रिएंट्स में असंतुलन रहा है। साल 1990 में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम का अनुपात 6 : 2.4 : 1 था। 2000 में यह 7 : 2.7 : 1 और 2010 में 4.7 : 2.3 : 1 और 2016 में 6.7 : 2.7 : 1  हो गया। आदर्श स्थिति में यह अनुपात 4 : 2 : 1  होना चाहिए।

भारत में उर्वरक का इस्तेमाल चुनिंदा जिलों में केंद्रित है। भारत के कुल 525 जिलों में 292 जिले 85 प्रतिशत यूरिया की खपत करते हैं।