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नए कृषि कानूनों ने छोटे और सीमांत किसानों के भविष्य पर संकट खड़ा किया

हर नागरिक को ये बताना चाहिए कि भोजन का उत्पादन कैसे होता है, किसान किस तरह की मुश्किलों का सामना करते हैं

By Kapil Shah

On: Thursday 11 February 2021
 

इलस्ट्रेशन : रितिका बोहरा / सीएसई

हालिया कृषि कानूनों ने छोटे और सीमांत किसानों की बड़ी तादाद वाले कृषि प्रधान देश में खेती के भविष्य को लेकर हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है। अगर हम इसी तरह रसायन के बेतहाशा इस्तेमाल, एक फसली खेती और बाजार खरीद इनपुट पर निर्भर मॉडल को जारी रखते हैं, तो खेती का भविष्य क्या होगाका जवाब बहुत आसान है। ये मॉडल न केवल बहुसंख्यक किसानों को फायदा देने में विफल रहा है बल्कि पारिस्थितिकी, सामाजिक और आर्थिक (करदाताओं के पैसे पर बोझ) मामलों में भी दिवालिया साबित हुआ है। हालिया अनुवांशिक रूप से संशोधित फसलों के लॉलीपॉप ने भी रसायन के इस्तेमाल को बढ़ाया, उपज में इजाफा बरकरार रखने में विफल रहा और बौद्धिक संपदा अधिकार के जरिये कंपनियों के नियंत्रण को बढ़ावा दिया। कृषि उत्पादों के अनियंत्रित निजी व्यापार को प्रोत्साहित करना भी इसी का एक हिस्सा है। 

 

यूएन एजेंसी की रिपोर्ट द इंटरनेशनल असेसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल नॉलेज, साइंस एंड टेक्नोलॉजी फॉर डेवलपमेंट (आईएएएसटीडी, 2009)’ में 110 मुल्कों के 400 से ज्यादा विज्ञानियों ने बताया कि उच्च उपज की सफलता’ ‘उच्च पर्यावरणीय कीमतपर आई है और इस सफलता ने विकासशील देशों के गरीबों की सामाजिक और आर्थिक समस्या का समाधान नहीं किया।भारत में ये मॉडल भारी कृषि चिंता और देश की राजधानी की तहलीज पर अभूतपूर्व प्रदर्शन का कारण बना। रिपोर्ट कहती है कि न्यायसंगत विकास और चिरस्थायित्व के लक्ष्य को प्राप्त करने में कृषि संबंधी जानकारी, विज्ञान और तकनीक की भूमिका पर बुनियादी तौर पर पुनर्विचार करने का ये सही वक्त है। विविध पारिस्थितिकी तंत्रों के छोटे किसानों की जरूरतों व जिन क्षेत्रों में ज्यादा जरूरी है, उन क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन (एफएओ) की साल 2017 की रिपोर्ट द फ्यूचर ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर: ट्रेंड्स एंड चैलेंजेजमें उत्पादकता को बढ़ाते हुए प्राकृतिक संसाधनों के आधार की रक्षा और विस्तार के लिए नवीन प्रणालियों का सुझाव दिया गया है....जो स्वदेशी और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित कृषि विज्ञान, कृषि-वानिकी, जलवायु-स्मार्ट कृषि और संरक्षित कृषि जैसे 'समग्र' दृष्टिकोणों के लिए एक परिवर्तनकारी प्रक्रिया होगी।'

अतः भारतीय कृषि का भविष्य क्या होना चाहिए, इस सवाल का जवाब बहुत सीधा और आसान है। हालांकि इसमें बड़े बदलाव की जरूरत है। सदियों पुरानी और सिद्धांतों पर आधारित भारत की कृषि पद्धति में नवाचार, कड़ी मेहनत करने वाले और उद्यमी किसानों की पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सामाजिक रूप से सिर्फ कृषि-पारिस्थितिकी आधारित खेती की कई हालिया कहानियां वैज्ञानिक संस्थानों के अपने बड़े नेटवर्क के माध्यम से प्रदर्शित की गई हैं, जो राजनीतिक इच्छाशक्ति के बल पर निश्चित रूप से भारतीय खेती की दिशा बदल सकती है। आईएएएसटीडी रिपोर्ट के अनुसार संभावित कार्रवाइयों में जैविक कृषि जैसे कम प्रभाववाली प्रथाओं में सुधार करना और जल, पशुधन, वन और मत्स्य पालन के स्थायी प्रबंधन के लिए प्रोत्साहन प्रदान करना शामिल है। नीति-निर्माता अस्थाई प्रथा को प्रोत्साहित करने वाली सब्सिडी समाप्त कर स्थायी प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के लिए प्रोत्साहन प्रदान कर सकते हैं।'

ये जानना बहुत जरूरी है कि जिस यूरिया पर सब्सिडी दी जाती है, उसका 33 प्रतिशत हिस्सा ग्लोबल वार्मिंग और इतना ही प्रतिशत पानी में नाइट्रेट का प्रदूषण बढ़ाता है। बाकी 33 प्रतिशत ही पौधों तक पहुंचती है और ये यूरिया प्राय: कीड़ों को फसल बर्बाद करने के लिए लुभाती है। 

खेती एक गूढ़ व्यवस्था है, जिसमें न केवल विज्ञान की कई शाखाएं बल्कि सामाजिक विज्ञान भी शामिल है, क्योंकि सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस पर राजनीतिक, अर्थव्यवस्था और व्यापार से जुड़ी नीतियों का असर पड़ता है। हमारे जीवन की मूल्य व्यवस्था और आकांक्षाओं का प्रभाव भी इस पर पड़ता है। इसलिए कृषिगत बदलावों में बहुविध दृष्टिकोण की जरूरत है; यूरिया की जगह कंपोस्ट के इस्तेमाल से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बदलाव का व्यवस्थित दृष्टिकोण न केवल ग्रामीण संकट को खत्म करेगा, बल्कि समाज की दूसरी समस्याओं जैसे बेरोजगारी, शहरीकरण, अस्वास्थ्यकर भोजन, प्राकृतिक स्रोतों के प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग का भी हल देगा।  

बड़े बदलाव की शुरुआत नीति निर्धारकों की उत्पादन केंद्रित मानसिकता को वहनीयता केंद्रित मानसिकता में तब्दीली के साथ करनी होगी । उनमें अभी कृषि-पारिस्थितिकी मॉडल को लेकर विश्वास नहीं जग नहीं सका है। नीति आयोग की हालिया कोशिशें स्वागतयोग्य हैं, लेकिन दुर्भाग्य से ये कोशिशें विज्ञान और सबूत की जगह धारणा पर आधारित हैं। इसलिए जब बैठकों में नीति आयोग भारतीय परम्परागत कृषि पद्धति (बीपीकेपी) को प्रोत्साहित करता है, तो आईसीएआर विज्ञानी आपस में ही कानाफूसी करते रह जाते हैं और बीपीकेपी को प्रमोट करने वाले ओल्ड इज गोल्डऔर भारत का सबकुछ बेहतरीन हैकी फंतासी दुनिया में विचरते रहते हैं। भारत को वैश्विक स्तर पर दीर्घकालिक प्रगतिशील विज्ञान से बनी तकनीक और हमारी अपनी परम्परा का विवेकपूर्ण मिश्रण चाहिए। हरित क्रांति की तरह कृषि पारिस्थितिकी के तहत मिलने वाला तकनीकी पैकेज एक समान और अचानक नहीं हो सकता है। हर खेती अद्वितीय है, इसलिए किसानों को कृषि-पारिस्थितिकी के कुछ बुनियादी सिद्धांतों और आसान तकनीकों से रूबरू कराना चाहिए और इसके बाद उन्हें प्रयोग, नवाचार और स्थानीय स्तर पर जो अनुकूल हो उसे लागू करने के लिए छोड़ देना चाहिए। ये सिद्ध तकनीकों को हतोत्साहित नहीं करता है बल्कि लगातार सुधार के असीमित मौके देता है। तकनीक में प्रगति जरूर जारी रहनी चाहिए। नवाचार और सुधार सभी सफल कृषि-पारिस्थितिक किसानों का बेहद सामान्य चरित्र है।

कृषि विज्ञानी अब ये समझने लगे हैं कि वे दिन गये जब शोध प्रोजेक्ट का मुख्य लक्ष्य पैदावार और वित्तीय लागत-लाभ अनुपात से जुड़ा होता था। अब वे पानी के इस्तेमाल की क्षमता, ऊर्जा इस्तेमाल की क्षमता, जैवविविधता सूचकांक, कार्बन उत्सर्जन, प्रदूषण, स्वास्थ्य पर प्रभाव, सामाजिक संकट, महिला सशक्तीकरण, किसानों की कुशलता आदि के आधार पर तकनीकों का मूल्यांकन करते हैं। आजादी के तुरंत बाद वे कृषि पंडित जो स्थानीय बीजों व रसायनमुक्त तकनीकों की मदद से हरित क्रांति से एक दशक पहले तक उच्च पैदावार लेते थे, कृषि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का कभी भी हिस्सा नहीं बन पाये। दुर्भाग्य से कृषि विज्ञानी अब भी हरित क्रांति के दौर में अमेरीका में हुए प्रशिक्षण की विरासत को ढो रहे हैं। सर अलबर्ट होवार्ड जैसे महान विज्ञानियों ने एक सदी पहले भारत की पारंपरिक खेती की प्रशंसा की थी, लेकिन ज्यादातर विज्ञानी अब तक इनसे अनजान हैं। इस चूक में सुधार करने का ये सही वक्त है। हमें व्यवस्थित दृष्टिकोण के साथ और सफल कृषि-पारिस्थितिक किसानों की मदद से कृषि विज्ञानियों के लिए कृषि विज्ञान के पुनर्पाठ कार्यक्रम को लागू करने पर विचार करना चाहिए।

हमारे प्रतिभावान किसानों के पास मौजूद जानकारियां एग्रो-इनपुट डीलरों के प्रभाव में खत्म हो रही हैं। हाल ही में पता चला है कि ओडिशा के मुनीगोडा में हजारों किसानों को लोन के चंगुल में फंसाकर उनसे जहरीले कीटनाशक का इस्तेमाल कर सफलतापूर्वक अवैध तरीके से तृणनाशक से अप्रभावी रहने वाली कपास की खेती कराई जा रही थी और मौलिक वनों को प्रदूषित किया जा रहा था। क्या इसके जरिये किसानों को कर्ज (मृत्यु) के जाल में नहीं पहुंचाना नहीं है? एग्री-इनपुट कंपनियों को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने की जरूरत है।  

ये दुखद बात है कि एक कषि प्रधान देश में शिक्षा के हर स्तर में कृषि उपेक्षित है। युवाओं के लिए क्यों कृषि प्रशिक्षण अनिवार्य नहीं है? शाक वाटिका (किचेन गार्डेनिंग) या कृषि संबंधी प्रशिक्षण स्कूल स्तर क्यों नहीं उपलब्ध है? हर नागरिक को ये बताना चाहिए कि भोजन का उत्पादन कैसे होता है; किसान किस तरह की मुश्किलों का सामना करते हैं और कृषि से जुड़ा समुदाय कितना लचीला है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे किसानों को सम्मानजनक न्यूनतम व सुनिश्चित कमाई होगी। 

किसानों को अपने उत्पाद किसी भी तरह बेचने का अधिक होना ही चाहिए, लेकिन इसमें समान अवसर मिलना चाहिए। पिछले एक दशक में ज्यादातर राज्यों ने निजी मंडी की इजाजत दे दी, ठेका खेती की सुविधा दी, फार्मर्स प्रोड्यूसर्स आर्गनाइजेशन (एफपीओ) और फार्मर-कंज्यूमर मार्केट (एफसीएम) को प्रोत्साहित किया, नियंत्रित तरीके से अंतरराज्यीय व ई-ट्रेडिंग को सुविधाजनक बनाया। लेकिन, दूसरे देशों में अनियंत्रित व मुक्त व्यापार ने किसानों खासकर छोटे किसानों को संकट में डाल दिया। ये विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि ऐसे अनियंत्रित निजी बाजार भारत में दूसरे तरह का परिणाम लायेगा। भारत में ही बिहार और गन्ना उद्योग जैसे बहुत उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि मुक्त बाजार फेल हो गया है। भारतीय कृषि की विविधता भरी प्रकृति और कृषि बाजारों को संबंधित राज्य सरकारों द्वारा बेहतर तरीके से प्रबंधन किया जा सकता है। एक आकार ही सबके लिए फिट होता हैएक बुरा बदलाव है। किसान-हितैषी मार्केटिंग तरीकों मसलन किसान बाजार, किसान दुकान व फार्म/गांव स्तर पर मूल्य संवर्धन को प्राथमिकता देनी चाहिए। एफपीओ भी इतना आसान नहीं है कि हर जगह इसे प्रभावी तरीके से लागू किया जाये जैसा कि सामान्य तौर पर प्रोजेक्ट किया जाता है। किसानों को सहयोग, एफपीओ में पंजीयन और आधिकारिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भरोसे में लेने के साथ ही समस्या शुरू होती है। सामान्य तौर पर जैविक किसानों को अपने उत्पाद बेचने में ज्यादा सहूलियत मिलती है, लेकिन किसान व किसान समूहों को टैक्स और नियंत्रण में छूट देकर व्यापार करने में सहूलियत में निवेश करने की तत्काल जरूरत है। किसानों की मोलभाव की शक्ति को मजबूत किये बिना निजी कंपनियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। निजी कंपनियों को लाइसेंसिंग, पारदर्शिता, बैंक गारंटी, तकनीकी सत्यापन, न्यूनतम समर्थन मूल्य, किसान हितैषी विवाद निपटान तंत्र, बुनियादी ढांचे के विकास के संबंधित अनिवार्यता और खरीद तथा स्टॉक की सीमा तय कर नियंत्रित किया जाना चाहिए। भारतीय संदर्भ में सच में कॉरपोरेट खेती के लिए कोई जगह नहीं है। 

लैंड होल्डिंग के सिकुड़ते आकार को देखते हुए को-ऑपरेटिव व समूहिक दृष्टिकोण बेहतरीन लाभकारी विकल्प लगता है। दक्षिणी गुजरात में फल-सब्जी व शुगर को-ऑपरेटिव अच्छा उदाहरण है। एपीएमसी को राजनीतिक प्रभावों से मुक्त रखते हुए बेहतर नियंत्रण की जरूरत है। एपीएमसी की पहुंच समान रूप से हर तरफ होनी ही चाहिए। सभी जैविक/कृषि पारिस्थितिक खेती करने वाले किसानों को न केवल रासायनिक खाद को मिलने वाली सब्सिडी (जो वर्तमान में 4500 रुपए/प्रति हेक्टेयर/वर्ष है) की भरपाई के तौर पर अपितु बल्कि कार्बन संरक्षण, पानी और बिजली के कम इस्तेमाल, मिट्टी की सेहत में सुधार, वर्षा जल संचयन, मिश्रित खेती, जीवित बाड़ और फसल चक्र में बदलाव के जरिये जैवविविधता के संरक्षण और पर्यावरण प्रदूषण न करने जैसी पर्यावरणीय सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए भी सहायता मिलनी चाहिए।

आलू से पोटैटो चिप्स बनाने के लिए हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जरूरत क्यों है? कृषि-प्रसंस्करण और विभिन्न प्रकार के अणुजीव और वानस्पतिक के लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है। ये फार्म/ग्रामीण स्तर पर बहुत मामूली वैज्ञानिक प्रशिक्षण और निवेश से किया जा सकता है। इससे हजारों ग्रामीण युवाओं को नौकरी मिल सकती है। स्थानीय स्तर तैयार बीज बेहतर है। बीज तैयार करने वाले किसान खासकर महिलाएं हमारी बीज धरोहर की असल खोजकर्ता और संरक्षक हैं, इन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है। 

गांवों में विशेष अणुजीव संरोपण और छोटी मशीनरी की मदद से वैज्ञानिक खाद कार्यक्रमों को लागू कर जैव ईंधन में निहित पोषक तत्वों और ऊर्जा को पुनर्चक्रित करने की बहुत गुंजाइश है। शहरी क्षेत्रों को कृषि भूमि से निकले पोषक तत्वों को वापस करना चाहिए। खेत से शहरी स्तर तक बायोगैस-खाद संयंत्र को विशेष बढ़ावा देने की जरूरत है। स्थानीय रूप से उपलब्ध कृषि-इनपुट्स से उत्पादन लागत कम होगी और किसानों का पैसा स्थानीय स्तर पर प्रसारित होगा।

मरती कृषि से सदाबहार कृषि में संक्रमण के लिए भारत ने पर्याप्त आत्मविश्वास और विशेषज्ञता हासिल कर ली है। जैविक खेती के लिए आईसीएआर-नेटवर्क प्रोजेक्ट कई जगहों पर कई सालों तक अध्ययन कर इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि ज्यादातर फसलों पर जैविक पद्धति का सकारात्मक प्रभाव पड़ा और रासायनिक से जैविक पद्धति में प्रवेश के 2-3  साल बाद ही जैविक खेती से रासायनिक खेती जितनी ही या उससे 4 से 14% अधिक पैदावार हुई। ये रासायनिक खाद के ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पंजाब व हरियाणा सभी राज्यों के किसानों के अनुभव से साबित होता है कि जैविक खेती करने वाले किसानों को पैदावार से समझौता नहीं करना पड़ा और बाजार पर उनकी निर्भरता कम हुई, कर्ज के चंगुल से मुक्त हुए और बिना किसी आर्थिक मदद के तनावमुक्त खेती कर रहे हैं। सरकार और एनजीओ के कार्यक्रमों के जरिए महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में बड़े स्तर पर जैविक खेती का चुनाव इस बात का भी सबूत है कि हम संस्थानिक रूप से भी सक्षम हुए हैं।

असामान्य बदलाव की जरूरत की जो अनदेखी करते हैं और कृषि-पारिस्थितिकी की सफलता को संदेह की नजर से देखते हैं, वे आलसी हैं। कृषि-पारिस्थितिकी आधारित खेती कोई फंतासी नहीं है; ये प्रगतिशील विज्ञान और तकनीक पर आधारित एक स्थापित पेशा है। भारत वैश्विक कृषि को इस मार्ग पर चलने में नेतृत्व कर सकता है। खेती को लेकर मौजूदा प्रदर्शन एक पुरानी बीमारी का दर्दनाक लक्षण है। इससे हमारी आंखें खुल जानी चाहिए और इसे भारतीय कृषि के लिए 'तमसोमाज्योतिर्गमय' मानना चाहिए। भारतीय कृषि की सफलता आत्मनिर्भरता की आत्मा में बसी है। 

(लेखक कुदरती खेती अभियान, रोहतक से जुड़े डॉ राजिंदर चौधरी को इस लेख में इनपुट देने के लिए धन्यवाद देते हैं।)

(लेखक कृषि में स्नातकोत्तर हैं और वर्ष 1985 से ही जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे गुजरात के वड़ोदरा में रहते हैं। उनसे jatantrust@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)