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किसानों की अगली पीढ़ी तैयार करना देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती

देश में कृषि और कृषि शिक्षा की दशा की पड़ताल करती सीरीज रिपोर्ट की श्रंखला में प्रस्तुत है, जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के कुलपति डॉ. पीके बिसेन का साक्षात्कार

By Manish Chandra Mishra

On: Saturday 30 November 2019
 
Photo: Gettyimages

कृषि शिक्षा में कितनी दिलचस्पी ले रहे हैं युवा?

कृषि की पढ़ाई करने की ओर युवाओं का बहुत ध्यान है। इस क्षेत्र में पढ़ाई करने वाले युवाओं को शत प्रतिशत प्लेसमेंट मिल जाता है। यानि एक भी युवा यहां बेरोजगार नहीं है। हालांकि, जिस तरह किसान का बेटा किसान नहीं बनना चाहता, और किसान स्वयं अपने बच्चों को खेती में नहीं रखना चाहता इसी तरह कृषि की पढ़ाई करने वाले युवा भी वापस गांव में जाकर खेती नहीं करना चाहता।

युवाओं के लिए कृषि शिक्षा के क्या मायने हैं?

नौकरी। मैं नहीं समझता कि एक प्रतिशत बच्चों में भी खेती करने की रूचि होगी। हमारे कोर्स में 6 महीने गांव में जाकर खेतों में काम करना शामिल है और सिर्फ इसी लिए कुछ छात्र खेतों पर जाते हैं। लेकिन वापस आकर वे नौकरी में ही जाना चाहते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि उन्हें नौकरी मिल रही है। इंसेक्टिसाइड, पेस्टिसाइड, फर्टिलाइजर, मशीनरीज, सीड सर्टिफिकेशन, कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग और इसके विश्वविद्यालय, सभी जगह नौकरी मिल रही है। मेरे मुताबिक जितने युवा कृषि की शिक्षा लिए नहीं है उनसे अधिक संख्या में नौकरियां उपलब्ध है। इसी वजह से युवा खेती में नहीं जाना चाहता है।

क्या भारत अब कृषि संकट की चपेट में है? यदि हाँ तो क्यों?

आज कृषि जगत में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि युवा खेती नहीं करना चाह रहे। यह स्थिति एक संकट की स्थिति है। युवा गांव में नहीं रहना चाह रहे और अगर वे वहां रह रहे तो खेती को हाथ नहीं लगाना चाहते। हमारे सामने ये चुनौती है कि किसानों की अगली पीढ़ी कैसे तैयार हो। अगर युवा इसमें नहीं आएंगे तो हम आगे किसान कहां से लाएंगे। ये पूरे देश के नीति नियंताओ के सामने चुनौती है कि ऐसी नीतियां बनाए कि गांवों में युवा रह सके और किसानी कर सके। हमारे विश्वविद्याय की सोच ने एक आर्या प्रोजेक्ट चालू किया है। इसमें हम ग्रामीण युवाओं को खेती से जोड़ने की कवायद कर रहे हैं।

खेती की ओर युवाओं का रुझान बढ़ाने के लिए आप क्या सलाह देंगे?

कई बार खबरों में सुनने को मिलता है कि युवा नौकरी छोड़कर खेती में वापस आ रहे हैं। ऐसा हो भी रहा है लेकिन उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। मैं कई लोगों को जानता हूं जो खेती करने आए और फिर वापस लौट गए। मेरे ख्याल से समस्या कुछ और है। हम अबतक कहते आए हैं प्रोडक्शन, प्रोडक्शन औप प्रोडक्शन। जिसकी हमारे देश को जरूरत भी है। हमारे देश के आजादी के समय 50 करोड़ जनता के लिए भी अनाज की कमी थी और अब हम 135 करोड़ जनता का पेट भरने में सक्षम हैं। कई गुना जनसंख्या बढ़ने के बाद भी प्रोडक्शन बढ़ाकर ही हम ऐसा कर पाए। ये प्राइमरी एग्रीकल्चर का हिस्सा था। अब जरूरत है सेकेंड्री एग्रीकल्चर पर जोर डालने की। इसका मतलब फूड प्रोसेसिंग, वेल्यू एडिशन, मार्केंटिंग। कैसे मार्केट लिंकेज हो जाए। किसानों को सिर्फ मार्केट दे दीजिए तो खेती अपने आप लाभकारी हो जाएगी। गांव में ही प्रोसेसिंग हो, गांव में ही पैकेजिंग हो और वहीं से सीधे मार्केट तक सामान पहुंचे। कई किसान ऐसे हैं जिनका इंटरनेशनल मार्केट में लिंग हो गया और वे लाभ कमा रहे हैं।

दूसरी समस्या है कि जो कृषि क्षेत्र का उत्पादक है, उसकी हिस्सेदारी ज्यादा हो। जैसे उपभोक्ता को अधिक पैसा देना पड़ा रहा है और उत्पादक को वह पैसा मिल भी नहीं रहा है। दोनों छोड़ पर दोनों लोग परेशान हैं तो बीच में ये पैसा कौन ले जा रहा है?

कृषि शिक्षा खेती को कैसे लाभ पहुंचा रही है?

भारत सरकार की योजना कृषि विज्ञान केंद्र के तहत हर जिला स्तर पर किसानों से वाकई में सेवा जा रही है। यहां लगभग 8 विशेषज्ञ अलग-अलग विभागों के होते हैं। इस माध्यम से हम लेबोरेटरी से निकलकर खेतों तक पहुंचे हैं। इन विज्ञान केंद्रों का संपर्क सीधे किसानों से है। इस वक्त हमारे विश्वविद्यालय में हमलोग सीधे तौर पर 15 लाख किसानों के संपर्क में हैं। हमारा वैज्ञानिक एक क्लिक करता है और 15 लाख किसानों तक संदेश उनके मोबाइल पर पहुंच जाता है। हालांकि ये संपर्क अभी एक तरफा है। हमें पता नहीं चलता कि किस मौसम में किसान क्या फसल लगा रहा है। जब किसान को हम सोयाबीन की एडवायजरी भेजते हैं तो संभव है कि वह धान लगा रहा हो। हमने इस समस्या के समाधान के लिए जर्मन सरकार के साथ मिलकर एक पायलेट प्रोजेक्ट मंडला और बालाघाट जिले में शुरू हुआ है। हम 12वीं पास बच्चों को उन्हीं के गांव में टेबलेट और प्रोजेक्टर देकर किसानों की समस्या का समाधान करेंगे। इससे किसान जो उगा रहा है उसी की एडवायजरी जाएगी। किसान के सवाल कृषि विज्ञान केंद्र तक पहुंचेंगे और उसका समाधान भी उन्हें मिलेगा।

वर्तमान कृषि शिक्षा और शोध पर आपकी राय क्या है ?

हमारे कई महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट हैं लेकिन अनुसंधान पर सरकार के अधिकारियों का उतना ध्यान नहीं। लाल बहादुर शास्त्री जी ने 1965 में पहले कहा था जय जवान, जय किसान। साल 1988 में आते-आते अटल बिहारी वाजपेयी जी ने जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान कहा था। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान और जय अनुसंधान। अनुसंधान बहुत जरूरी है। अगर अनुसंधान पर निवेश नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा।

अधिकारी आज की सोचते हैं लेकिन वैज्ञानिक 50 साल आगे की सोच रखता है। खेती की समस्याएं सुलझाने के लिए अनुसंधान जरूरी है। फॉल आर्मी वर्म देश में आया है पर इससे लड़ने के लिए पिछले 6 महीने से हमारे वैज्ञानिक लगे हुए थे। पिछली बार मध्यप्रदेश के किसानों का गन्ना अच्छी कीमत पर बिका तो किसानों ने सोचा कि अब भी गन्ना लगाया जाए। हमारे वैज्ञानिकों ने अनुसंधान से पता किया कि तेलंगाना, आंध्रप्रदेश के किसानों का गन्ना फॉल आर्मी वर्म की वजह से चौपट हो गया इसलिए यहां अच्छी कीमत मिली। इस वर्ष यह वर्म हमारे खेतों में भी आ गया है। अनुसंधान बहुत जरूरी है और इसपर ध्यान देना चाहिए। हम अपने स्तर पर हर संभव कोशिश कर खेती में कुछ न कुछ नया कर रहे हैं।

क्या भारत अब भी कृषि प्रधान देश है?

हां बिल्कुल। भारत अब भी कृषि प्रधान देश है क्योंकि देश की 70 फीसदी आबादी को कृषि से रोजगार मिलता है। जितनी भी इंडस्ट्री है उसका सारा का सारा कच्चा माल कृषि से ही मिलता है, चाहे वो टेक्सटाइल इंडस्ट्री हो, ऑइल हो या फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री हो।