Sign up for our weekly newsletter

डाउन टू अर्थ तफ्तीश: कृषि वैज्ञानिकों की सलाह आई किसानों के काम

मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के गांव नवाबगंज के किसानों का कहना है कि कृषि विज्ञान केंद्र के प्रयासों से उनकी आमदनी बढ़ी है

On: Thursday 10 December 2020
 
मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के गांव नवाबगंज में मुन्ने खां ने खेती के साथ-साथ बकरी पालन भी शुरू कर दिया है। फोटो: विक्रांत भट्ट
मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के गांव नवाबगंज में मुन्ने खां ने खेती के साथ-साथ बकरी पालन भी शुरू कर दिया है। फोटो: विक्रांत भट्ट मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के गांव नवाबगंज में मुन्ने खां ने खेती के साथ-साथ बकरी पालन भी शुरू कर दिया है। फोटो: विक्रांत भट्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि देश की आजादी के 75 साल पूरे होने पर किसानों की आय दोगुनी हो जाए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अलग-अलग स्तर पर योजनाएं चल रही हैं। इनमें से एक बड़ी योजना हर जिले में दो "डबलिंग फार्मर्स इनकम विलेज " बनाना, ताकि इन गांवों से सीख लेते हुए जिले के सभी गांवों के किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाए। डाउन टू अर्थ ने इनमें से कुछ गांवों की तफ्तीश शुरू की है। इससे पहली कड़ी में आपने पढ़ा, हरियाणा के गुड़गांव जिले के दो गांवों की हकीकत । इसके बाद आपने पढ़ी, बिहार के भागलपुर जिले के गांव गंगा करहरिया की रिपोर्ट, इसके बाद आपने मध्यप्रदेश के एक मॉडल गांव की रिपोर्ट पढ़ी। आज पढ़ें मध्य प्रदेश के ही जिले रतलाम जिले के गांव नवाबगंज से विक्रांत भट्ट की रिपोर्ट - 

साल 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लक्ष्य के मद्देनजर मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के कृषि विज्ञान केन्द्र कालूखेड़ा ने दो गांवों को गोद लिया है। इनमें पिपलौदा तहसील के नवाबगंज और रतलाम तहसील के जामथून शामिल हैं।

डाउन टू अर्थ ने नवाबगंज का दौरा किया। इस गांव के किसान लक्ष्मण सिंह खड़िया बताते हैं कि उनके पास कुल 2 बीघा जमीन है जिस पर वो खेती करते है। पहले वह पारंपरिक खेती करते थे। जिले में पानी का इंतजाम न होने के कारण वह साल भर में एक ही फसल ले पाते थे। लेकिन अब कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक एक डेढ़ महीने के बीच उनके पास आते हैं। उनकी सलाह पर इस बार मैंने गेहूं और चने के अलावा लगभग पौन बीघा क्षेत्र में अश्वगंधा भी लगाया है। जिसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से बीज उपलब्ध करवाया गया, बल्कि कुछ अन्य जिलों का भी दौरा कराया। इसका फायदा यह हुआ कि अब मैंने खेती का तरीका बदला है। इसका असर कमाई पर दिखेगा।

वहीं, लगभग 10 बीघा क्षेत्रफल में खेती कर रहे चंदू खां का अनुमान हैं कि 2016-17 में कृषि विज्ञान केंद्र ने उनका गांव गोद लिया था, उसके बाद से अब उनकी कमाई में लगभग 50 हजार रुपए की वृद्धि हुई है। वह गेहूं और चना लगाते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र ने उन्हें उन्नत किस्म के विशाल चने के बीज उपलब्ध करवाए। इसके अलावा वर्मी कम्पोस्ट के लिए भी मार्गदर्शन किया। पशुपालन विभाग द्वारा मुझे 4 बकरी और एक बकरा भी उपलब्ध करवाया गया। हर महीने पशुपालन विभाग के पशु चिकित्सक भी आकर निरीक्षण करते है।

करीब 12 बीघा में खेती कर रहे ओमप्रकाश राठौड़ बताते हैं कि कृषि विज्ञान केंद्र ने उन्हें जैविक खाद का इस्तेमाल करने और प्लांट लगाने की सलाह दी थी। उन्होंने अपने घर पर ही जैविक खाद की यूनिट भी लगा ली। साथ ही एक कुंड में उन्होंने आईजोल घास भी लगा रखी है, जो वे अपनी भैसों को खिलाते हैं, जिससे भैंसों के दूध उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है।

ओम प्रकाश राठौड़ द्वारा बनाया गया आइजोल घास का टैंक। फोटो: विक्रांत भट्ट

राठौड़ कहते हैं कि तीन साल पहले तक मैं लगभग 3 लाख रुपए सालाना कमा रहा था, लेकिन अब लगभग 5 लाख रुपए सालाना आमदनी हो रही है। इन सालों के दौरान उन्हें उद्यानिकी विभाग द्वारा फलदार वृक्ष आम, अमरूद, सीताफल और नींबू के पौधे भी प्रदान किए गए। वह बताते हैं कि कृषि विज्ञान केंद्र की वजह से पहले की तरह फिजूलखर्ची पर लगाम लगी है। पहले जरूरत से ज्यादा बीज व खाद इस्तेमाल कर देते थे।